पदक्रम = पद + क्रम; अर्थात् ‘वाक्य में पदों के रखे जाने का क्रम।’ कहीं-कहीं पदक्रम के स्थान पर ‘शब्दक्रम’ शब्द का प्रयोग मिलता है। शब्दों का प्रयोग जब वाक्य में होता है, तब वह पद कहलाता है। वाक्य में यथास्थान प्रयुक्त शब्द को पद कहते हैं, इसलिए वाक्य-रचना में पद-व्यवस्था को ‘पदक्रम’ कहना उचित है।
अतः ‘किसी वाक्य के सार्थक शब्दों को यथास्थान रखने की क्रिया को ‘पदक्रम’ कहते हैं।’ प्रत्येक वाक्य में ‘पद’ एक निश्चित क्रम में आते हैं। कर्ता, कर्म, पूरक, क्रिया-विशेषण, क्रिया आदि सामान्यतः जिस क्रम में आते हैं, उसे पदक्रम कहते हैं।
हिन्दी वाक्य व्यवस्था में या पदक्रम में “कर्ता + कर्म + क्रिया” आते हैं।
उदाहरण—
- मोहन (कर्ता) सेब (कर्म) खाता है (क्रिया)।
- राजू (कर्ता) ने किताब (कर्म) फाड़ दी (क्रिया)।
पदक्रम के प्रमुख नियम
हिन्दी वाक्य व्यवस्था में पदक्रम के प्रमुख नियम अधोलिखित हैं—
- क्रम की दृष्टि से भाषा की विभिन्न इकाइयों में तर्कसंगत निकटता होनी चाहिए।
- यदि पद या पदबन्ध यथोचित क्रम में नहीं होंगे, तो वाक्य हास्यास्पद हो जाता है; यथा—
- मुझे गर्म भैस का दूध चाहिए। … मुझे भैंस का गर्म दूध चाहिए।
- मरीज को एक दूध का गिलास पीने को दो। … मरीज को दूध का एक गिलास पीने को दो। … मरीज को एक गिलास दूध पीने को दो।
- यदि पद या पदबन्ध यथोचित क्रम में नहीं होंगे, तो वाक्य हास्यास्पद हो जाता है; यथा—
- कर्ता और कर्म के बीच अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान और करण कारक क्रमशः आते हैं; जैसे—
- रमेश ने घर में (अधिकरण) आलमारी से (अपादान) श्याम के लिए (सम्प्रदान) हाथ से (करण) पुस्तक निकाली।
- कर्ता, कर्म और क्रिया :
- वाक्य में ‘कर्ता पद’ सामान्यतः सबसे पहले आता है, ‘कर्म पद’ मध्य में और ‘क्रिया पद’ अंत में; यथा—
- मोहन (कर्ता) ने भोजन (कर्म) किया (क्रिया)। इस वाक्य में ‘मोहन’ सबसे पहले, उसके बाद ‘भोजन’ और सबसे बाद ‘किया’ पद आया है; जो क्रमशः कर्ता, कर्म और क्रिया पद हैं।
- शिखा (कर्ता) सो रही है (क्रिया)। इस वाक्य में ‘शिखा’ सबसे पहले और अंत में ‘सो रही है’ पद आया है; जो क्रमशः कर्ता और क्रिया पद हैं।
- सोहन (कर्ता) मिठाई (कर्म) खा रहा है (क्रिया)। इस वाक्य में ‘सोहन’ सबसे पहले, उसके बाद ‘मिठाई’ और सबसे बाद ‘खा रहा है’ पद आया है; जो क्रमशः कर्ता, कर्म और क्रिया पद हैं।
- पूजा (कर्ता) प्रतिदिन सुबह विद्यालय (कर्म) जाती है (क्रिया)। इस वाक्य में ‘पूजा’ सबसे पहले, उसके बाद ‘प्रतिदिन सुबह विद्यालय’ और सबसे बाद ‘जाती है’ पद आया है; जो क्रमशः कर्ता, कर्म और क्रिया पद हैं।
- वाक्य में ‘कर्ता पद’ सामान्यतः सबसे पहले आता है, ‘कर्म पद’ मध्य में और ‘क्रिया पद’ अंत में; यथा—
- कर्ता, कर्म और क्रिया का विस्तार :
- उद्देश्य या कर्ता के विस्तार को कर्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे—
- अच्छे लड़के धीरे-धीरे पढ़ते हैं। इस वाक्य में लड़के (कर्ता) का विस्तारक पद ‘अच्छे’ और पढ़ते हैं (क्रिया) का विस्तारक पद ‘धीरे-धीरे’ दोनों विशेषण हैं। ये दोनों विस्तारक पद अच्छे व धीरे-धीरे क्रमशः लड़के (कर्ता) और पढ़ते हैं (क्रिया) से पहले आया है।
- ‘दशरथ के पुत्र श्रीराम ने लंका के राजा रावण को मारा था।’ इस वाक्य में श्रीराम (कर्ता) का विस्तारक पद ‘दशरथ के पुत्र’ है। रावण (कर्म) का विस्तारक पद ‘लंका के राजा’ है।
- ‘परिश्रमी और धैर्यवान् व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है।’ इस वाक्य में व्यक्ति (कर्ता) का विस्तारक शब्द ‘परिश्रमी और धैर्यवान्’ है।
- उद्देश्य या कर्ता के विस्तार को कर्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे—
- कर्म :
- जिन वाक्यों में दो कर्म होते हैं उनमें पहले गौण कर्म (या सम्प्रदान) और बाद में मुख्य कर्म प्रयुक्त होता है; यथा—
- वर्माजी ने शर्माजी को (गौण कर्म) अपना मकान (मुख्य कर्म) बेच दिया।
- राम ने मोहन को (गौण कर्म) पत्र (मुख्य कर्म) लिखा।
- कर्म तथा पूरक के विस्तार उनके पूर्व आते हैं; यथा—
- राम ने अपने मित्र के बेटे राजीव को बधाई का पत्र लिखा।
- मोहन अच्छा डाक्टर है।
- बल देने के लिए कर्म पहले भी आ सकता है; यथा—
- पुस्तक ले ली तुमने?
- जिन वाक्यों में दो कर्म होते हैं उनमें पहले गौण कर्म (या सम्प्रदान) और बाद में मुख्य कर्म प्रयुक्त होता है; यथा—
- प्रश्नवाचक पद :
- प्रश्नवाचक वाक्यों में ‘कर्ता पद’ से पूर्व ‘क्या’ का प्रयोग किया जाता है। अथवा प्रश्नवाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता है, जिसके बारे में कुछ पूछा जाय। और स्पष्ट रूप से कहें तो जिन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ/ना’ में दिया जा सके उस वाक्य के आरम्भ में प्रश्नवाचक शब्द ‘क्या’ आता है; यथा—
- क्या शिखा प्रतिदिन विद्यालय नहीं जाती है? (हाँ/नहीं)
- क्या मोहन सो रहा है? (हाँ/नहीं)
- अन्य प्रश्नवाचक वाक्यों के मध्य में प्रश्ननवाचक पद आता है; यथा—
- आप कहाँ जा रहे हैं? (हम अयोध्या जा रहें हैं।)
- दरवाज़े पर कौन खड़ा है? (दरवाज़े पर सोहन खड़ा है।)
- आप कैसे जाएँगे? (हम बस से जाएँगे।)
- प्रश्नवाचक पद उस शब्द के ठीक पूर्व ही प्रायः आता है, जिसके बारे में प्रश्न पूछा जाता है; यथा—
- कौन आदमी आएगा?
- क्या चीज चाहिए?
- तुम क्या देख रहे हो?
- वह कैसे जा रहा है?
- प्रश्नवाचक पद का स्थान बदलने से अर्थ पर अन्तर पड़ता है, अतः प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए; यथा—
- क्या तुम लिख रहें हो?
- तुम क्या लिख रहे हो?
- तुम लिख क्या रहे हो?
- तुम लिख रहे हो क्या?
- प्रश्नवाचक वाक्यों में ‘कर्ता पद’ से पूर्व ‘क्या’ का प्रयोग किया जाता है। अथवा प्रश्नवाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता है, जिसके बारे में कुछ पूछा जाय। और स्पष्ट रूप से कहें तो जिन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ/ना’ में दिया जा सके उस वाक्य के आरम्भ में प्रश्नवाचक शब्द ‘क्या’ आता है; यथा—
- संबोधन :
- संबोधन पद वाक्य से पहले प्रयुक्त होते हैं; यथा—
- राम, कहाँ चले?
- मित्र, आओ यहीं बैठें।
- हे प्रभु ! मुझपर दया करें।
- संबोधन पद कभी-कभी अन्त में भी आता है; यथा—
- बैठो मित्र !
- चलो भाई !
- उठो मोहन !
- कहाँ जा रहे हो राजीव?
- संबोधन पद वाक्य से पहले प्रयुक्त होते हैं; यथा—
- करण कारक :
- वाक्य में करण कारक प्रायः कर्ता और कर्म के बीच में आता है; यथा—
- शीला ने कलम से पत्र लिखे।
- परन्तु बल देने के लिए करण कारक पद में परिवर्तन भी सम्भव है; यथा—
- कलम से शीला ने पत्र लिखे।
- मैंने पत्र तो लिखा था कलम से और खो गई है पेंसिल।
- वाक्य में करण कारक प्रायः कर्ता और कर्म के बीच में आता है; यथा—
- सम्प्रदान कारक :
- सम्प्रदान कारक का प्रयोग कर्ता के बाद तथा करण से पहले होता है; यथा—
- हम पढ़ने के लिए विद्यालय जाते हैं।
- मोहन अपनी बहन के लिए डाक से साड़ी भेज रहा है।
- परन्तु बल देने के लिए सम्प्रदान कारक का प्रयोग करण कारक के बाद भी होता है; यथा—
- मोहन डाक से अपनी बहन के लिए साड़ी भेज रहा है।
- सम्प्रदान कारक का प्रयोग कर्ता के बाद तथा करण से पहले होता है; यथा—
- अपादान कारक :
- अपादान कारक कर्ता और क्रिया के बीच में प्रयुक्त होता है; यथा—
- लड़का छत से गिरा।
- कर्ता और कर्म के बीच में प्रयोग; यथा—
- मैंने आलमारी से कपड़े निकाले।
- बल देने के लिए दूसरे प्रकार के प्रयोग भी किए जाते हैं; यथा—
- आलमारी से मैंने कपड़े निकाले।
- कपड़े निकाले आलमारी से और टूट गया सन्दूक, वाह ! यह भी कोई बात हुई।
- अपादान कारक कर्ता और क्रिया के बीच में प्रयुक्त होता है; यथा—
- अधिकरण कारक :
- अधिकरण कारक प्रायः वाक्य के बीच में क्रिया के पहले आता है; यथा—
- कपड़े सन्दूक में हैं।
- डाकू घोड़े पर है।
- किन्तु बल देने के लिए अन्यत्र भी आ सकता है; यथा—
- सन्दूक में कपड़े हैं, तुम्हें दूँ कैसे?
- घोड़े पर डाकू हैं, और आप पैदल उनका पीछा करना चाहते हैं।
- अधिकरण कारक प्रायः वाक्य के बीच में क्रिया के पहले आता है; यथा—
- आग्रहात्मक ‘न’ :
- आग्रहात्मक ‘न’ वाक्य के अन्त में आता है; यथा—
- तो तुम शाम की चाय पर आओगे न?
- वह मेरा काम कर देगा न?
- आग्रहात्मक ‘न’ वाक्य के अन्त में आता है; यथा—
- विस्मयादिसूचक पद :
- यह वाक्य से पहले प्रयुक्त होते हैं; यथा—
- वाह ! क्या मनोरम दृश्य है।
- ओह ! बहुत दुःख हुआ।
- हाय ! यह क्या किया।
- अरे ! तुम आ गये।
- यह वाक्य से पहले प्रयुक्त होते हैं; यथा—
- निषेधात्मक अव्यय :
- निषेधात्मक अव्यय प्रायः क्रिया से पहले आते हैं; जैसे—
- मैं नहीं जा रहा हूँ।
- बल देने के लिए या कोई और उपवाक्य जोडने के लिए अन्यत्र भी इसे रखा जा सकता है; जैसे—
- नहीं जाऊँगा मैं।
- नहीं मैं जाऊँगा, देखें क्या कर लेते हो।
- मैं जाऊँगा नहीं, तुम चाहे कुछ भी बको।
- निषेधात्मक अव्यय प्रायः क्रिया से पहले आते हैं; जैसे—
- समुच्चयबोधक अव्यय :
- समुच्चयबोधक अव्यय दो पदों, पदबंधों आदि के बीच में आता है; जैसे—
- राजीव और गिरीश आ रहे हैं।
- सिपाहियों ने उसे पकड़ा और हवालात में बन्द कर दिया।
- यदि कई पदों या पदबंधों को जोड़ना हो तो प्रायः इसे अन्तिम दो के बीच में रखते हैं और पूर्ववर्ती के बीच में अल्पविराम का चिह्न लगा देते हैं; जैसे—
- सुरेश, सौरभ, राजीव और गिरीश आ रहे हैं।
- सिपाहियों ने उसे पकड़ा, मारा और हवालात में बन्द कर दिया।
- समुच्चयबोधक अव्यय दो पदों, पदबंधों आदि के बीच में आता है; जैसे—
- सर्वनाम :
- सर्वनाम प्रायः संज्ञा के स्थान पर आता है, किन्तु दो बातें ध्यान देने की हैं—
- सर्वनाम वाक्य में संबोधन के रूप में नहीं आता है।
- विशेषण सर्वनाम के पहले न आकर प्रायः बाद में आता है; यथा—
- वह अच्छा है।
- तुम मूर्ख हो।
- यों बोलचाल में बल देने के लिए कभी-कभी विशेषण को सर्वनाम से पहले भी ला देते हैं; यथा—
- अच्छा वह है मगर…, मूर्ख तुम हो वह नहीं। इस वाक्य में बल ‘तुम’ पद पर है पर साथ ही ‘मूर्ख’ पर भी बल है। ऐसे प्रयोगों में मूल वाक्य ‘वह अच्छा है’ ‘तुम मूर्ख हो’ ही होता है, अर्थात् विशेषण पूरक या विधेय विशेषण ही रहता है।
- सर्वनाम प्रायः संज्ञा के स्थान पर आता है, किन्तु दो बातें ध्यान देने की हैं—
- विशेषण :
- प्रायः विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है; जैसे—
- मेरी नीली कमीज कहीं खो गयी।
- तेज घोड़े को इनाम मिला।
- अकर्मण्य विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हो गया।
- पूरक विशेषण विशेष्य के बाद आता है। यह केवल तब होता है जब क्रिया ‘है’, ‘था’, ‘होगा’ आदि हो; जैसे—
- राम लम्बा है।
- कई विशेषण हों तो संख्यावाचक पहले आता है; जैसे—
- मैंने एक लम्बा काला आदमी देखा।
- सामान्यतः विशेषण क्रिया के पहले अवश्य आ जाता है, किन्तु कभी-कभी क्रिया के बाद में, अर्थात् वाक्यांत में भी आता है; जैसे—
- चाहे कुछ भी कहो भाई, है वह सुन्दर।
- प्रायः विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है; जैसे—
- प्रविशेषण :
- प्रविशेषण प्रायः विशेषण के पहले आते हैं; जैसे—
- वह बहुत लम्बा है।
- क्षत्रिय बड़े साहसी होते हैं।
- अर्चना अत्यन्त सुन्दर है।
- कश्मीरी सेब सिन्दूरी लाल होता है।
- प्रविशेषण प्रायः विशेषण के पहले आते हैं; जैसे—
- प्रक्रियाविशेषण :
- प्रक्रियाविशेषण प्रायः क्रियाविशेषण के पहले आते हैं; जैसे—
- घोड़ा काफी तेज भाग रहा था।
- राजीव बहुत अच्छा गाता है।
- रंजन कुछ ऊँचा सुनता है।
- किरण मुकुल की तुलना में अधिक तेजी से दौड़ती है।
- तुम तो बिल्कुल गंदा लिखते हो।
- शिखा निहायत साफ़ लिखती है।
- सीमा बहुत कम बोलती है।
- प्रक्रियाविशेषण प्रायः क्रियाविशेषण के पहले आते हैं; जैसे—
- क्रिया :
- हिन्दी में क्रिया सामान्यतः अन्त में आती है; जैसे—
- मैं चला।
- मैं अब चला।
- परन्तु बल देने के लिए क्रिया आरम्भ में भी आ सकती है; जैसे—
- चला मैं।
- चला अब मैं।
- प्रश्नवाचक वाक्य में तो क्रिया प्रायः आरम्भ में आती है; जैसे—
- है भी वह यहाँ।
- गया भी होगा वह।
- आज्ञावाचक वाक्य में बल देने के लिए क्रिया प्रायः आरम्भ में आती है; जैसे—
- जाओ तुम। … तुम जाओ।
- बेठो वहाँ। … वहाँ बैठो।
- लिखो तो जरा। … जरा लिखो तो। … तो जरा लिखो। … तो लिखो जरा।
- ‘चाहिए’ की भी प्रायः यही स्थिति हैं; जैसे—
- चाहिए तो था कि मुझसे मिल लेते।
- चाहिए तो बहुत कुछ मगर करता कौन है?
- हिन्दी में क्रिया सामान्यतः अन्त में आती है; जैसे—
- पूर्वकालिक क्रिया :
- पूर्वकालिक-क्रिया प्रायः मुख्य क्रिया के पहले आती है; जैसे—
- मैं खाकर आया हूँ।
- वह आकर आराम कर रहा है।
- पूर्वकालिक-क्रिया पद पर बल देने के लिए कर्ता के पहले भी आ सकती है; जैसे—
- चलकर तुम देख लो।
- यदि कर्म हो तो प्रायः पूर्वकालिक क्रिया उसके पूर्व आती है; जैसे—
- पंडितजी नहाकर पूजा करते हैं।
- यद्यपि वाक्य में कर्म होने पर भी बल देने के लिए पूर्वकालिक-क्रिया पदक्रम प्रयोग का उल्लंघन कर लिया जाता है; जैसे—
- नहाकर पंडितजी पूजा करते हैं।
- पंडितजी पूजा नहाकर करते हैं।
- पंडितजी पूजा करते हैं नहाकर।
- पूर्वकालिक-क्रिया प्रायः मुख्य क्रिया के पहले आती है; जैसे—
- क्रियाविशेषण :
- क्रिया के पहले आता है, अर्थात् कर्त्ता और क्रिया के बीच में आता है; जैसे—
- बच्चा धीरे धीरे खा रहा है।
- वह तेज दौड़ता है।
- कालबोधक क्रियाविशेषण कभी-कभी जोर देने के लिए कर्ता के पहले भी आता है; जैसे—
- अब मैं जा रहा हूँ।
- मैं अब जा रहा हूँ।
- स्थानबोधक क्रियाविशेषण कभी-कभी जोर देने के लिए कर्ता के पहले भी आता है; जैसे—
- भारत के उत्तरी भाग में कश्मीर है।
- कश्मीर भारत के उत्तरी भाग में है।
- दोनों (कालबोधक और स्थानबोधक क्रियाविशेषण) एक साथ प्रारम्भ में भी आ सकते हैं; जैसे—
- आज उस हाल में कवि सम्मेलन हो रहा है।
- क्रियाविशेषण कर्त्ता और कर्म के बीच में तो आता है; जैसे—
- मैं धीरे-धीरे उसे सिखा रहा हूँ।
- लड़का चुपके-चुपके तैयारी कर रहा है।
- परन्तु अपवादतः क्रियाविशेषण अन्यत्र भी आ सकता है; जैसे—
- चलो चलें अब।
- आ गये फिर यहीं?
- शीघ्र ही मैं आऊँगा।
- मैं शीघ्र ही आऊँगा।
- मैं आऊँगा शीघ्र ही।
- क्रिया के पहले आता है, अर्थात् कर्त्ता और क्रिया के बीच में आता है; जैसे—
- ही, भी, तो, तक, भर जिस पर बल देना हो उसके बाद में आते है; जैसे—
- राम ही प्रथम आया है।
- मैं भी गया था।
- वह तो प्रयागराज गया है।
- मोहन तक नहीं आया।
- वह आ भर जाए।
- ‘केवल’ पहले आता है; जैसे—
- केवल राम जाएगा।
- राम केवल जाएगा।
- ऐसे प्रयोग कम होते हैं।
- ‘मात्र’ पहले भी आता है और बाद में भी; जैसे—
- मात्र दस रुपये चाहिए।
- दस रुपये मात्र चाहिए।
- कई बार अँग्रेजी के प्रभाव से पदक्रम में परिवर्तन होता है, जो अशुद्ध है; यथा—
- अँग्रेजी प्रभाव से अशुद्ध वाक्य— पार्थ, जो प्रयागराज में रहता है, को प्रथम पुरस्कार मिला है।
- शुद्ध वाक्य— प्रयागराज में रहने वाले पार्थ को प्रथम पुरस्कार मिला है।
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