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वाक्यांतरण

किसी वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में, बिना अर्थ बदले, परिवर्तित करने की प्रक्रिया को ‘वाक्यांतरण’ या ‘वाक्यपरिवर्तन’ या ‘वाक्य का रूपान्तरण’ कहते हैं। हम किसी भी वाक्य को भिन्न-भिन्न वाक्य-प्रकारों में परिवर्तित कर सकते हैं और उनके मूल अर्थ में तनिक विकार नहीं आयेगा। हम चाहें तो एक सरल वाक्य को मिश्र या

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वाक्य भेद

वाक्यों का वर्गीकरण मुख्यतः दो दृष्टियों से होता है— रचना की दृष्टि से वर्गीकरण रचना के अनुसार वाक्यों के तीन भेद हैं— रचना के अनुसार वाक्यों के तीन भेद हैं— सरल वाक्य जिस वाक्य में एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय हो, उसे सरल वाक्य कहते हैं; जैसे— यदि किसी वाक्य में एक में

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अध्याहार

अध्याहार का अर्थ है, “वाक्य का अर्थ करते समय कुछ ऐसे शब्दों को लाना जिन्हें वाक्य बनाते समय छोड़ दिया गया है।” ऐसा करने के दो प्रमुख कारण हैं; एक, उनके न रहने पर भी उस प्रसंग वाक्य को समझने में बाधा नहीं पड़ती और द्वितीय, वाक्य छोटा हो जाता है; जैसे— उपर्युक्त वाक्य मूलतः

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अन्विति या अन्वय (मेल)

अन्वय (पुल्लिंग) शब्द है, जिसका स्त्रीलिंग शब्द अन्विति होता है। अन्वय का अर्थ है ‘पीछे जाना’, ‘अनुरूप होना’ अथवा ‘समानता’। व्याकरण में इसका अर्थ है ‘व्याकरणिक एकरूपता’ अर्थात् वाक्य में हो या अधिक शब्दों की आपसी व्याकरणिक एकरूपता को अन्वय कहते हैं। अर्थात् वाक्य में पदों की परस्पर संगति को ‘अन्विति’ कहते हैं। इसमें वाक्य

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पदक्रम

पदक्रम = पद + क्रम; अर्थात् ‘वाक्य में पदों के रखे जाने का क्रम।’ कहीं-कहीं पदक्रम के स्थान पर ‘शब्दक्रम’ शब्द का प्रयोग मिलता है। शब्दों का प्रयोग जब वाक्य में होता है, तब वह पद कहलाता है। वाक्य में यथास्थान प्रयुक्त शब्द को पद कहते हैं, इसलिए वाक्य-रचना में पद-व्यवस्था को ‘पदक्रम’ कहना उचित

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