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उपवाक्य

उपवाक्य पदों का ऐसा समूह है, जिसका अपना अर्थ होता है, जो एक वाक्य का भाग होता है और जिसका उद्देश्य और विधेय होता है। वाक्य और उपवाक्य सामान्यतया वाक्य सार्थक शब्द का समूह है, जिसमें कर्ता और क्रिया दोनों होते हैं। जैसे— यह एक शब्द-समूह है, परन्तु क्रियापद एक भी नहीं है। अतः इसे

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पदबन्ध

शब्द जब वाक्य में प्रयुक्त होते है तो वे पद कहलाते हैं। वाक्य पदों से बना होता है। जब एक से अधिक पद एक में बँधे हों तथा वे सभी मिलकर या बँधकर एक व्याकरणिक इकाई (जैसे— संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण आदि) का काम कर रहे हों, तो उस ‘बँधी इकाई’ को पदबन्ध (phrase) कहते हैं।

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वाक्य

मौखिक अथवा लिखित अभिव्यक्ति में हम प्रायः एक के बाद एक कई वाक्यों का प्रयोग करते हैं और इन्हीं वाक्यों के माध्यम से अपनी बात दूसरों तक सम्प्रेषित करते हैं। भाषा-व्यवहार में कभी हम एक ही वाक्य से अपनी पूरी बात कह देते हैं, तो कभी हमें अनेक वाक्यों के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है।

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वर्तनी

भूमिका लिखने की रीति (ढंग) को ‘वर्तनी’ या ‘अक्षरी’ या ‘हिज्जे’ कहते हैं। इसको आँग्ल भाषा में (spelling) कहते हैं। किसी भी भाषा की समस्त ध्वनियों को सही ढंग से उच्चरित करने के लिए ही वर्तनी की एकरूपता स्थिर की जाती है। जिस भाषा की वर्तनी में अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं की ध्वनियों

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पर्यायवाची शब्द ‘ऊष्म-वर्ग’

‘ऊष्म’ वर्ग ‘श’ शंकर :- अनंत, उमापति, शिव, चंद्रशेखर, उमापति, शंभु, भोलेनाथ, त्रिलोचन, त्रिपुरारि, महादेव, महेश, महेश्वर, कैलाशपति, चंद्रमौलि, मदनारि, त्रिचक्षु, त्रिनेत्र, त्रिलोचन, अमदन, अर्द्धनारीश्वर, अर्द्धांग, अर्द्धांगी, कालकंठ, गंगधर, गंगाधर, गंगेश, गणपति, गणनाथ, गणाधिप, स्मरारि, धरणीश्वर, पिनाकी, विश्वात्मा, हर शंकर :- कल्याणकारी, शुभंकर शंका :- संशय, संदेह, शक, आशंका, शुवहा शंकित :- शंकाशील, संशययुक्त, शकी

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