UPPSC 2025 Mains Answer Writing Program · Published on 30 October 2025
The UPPSC 2025 Mains Answer Writing Program by Pinwas IAS is a structured initiative designed to help aspirants improve their concept clarity, analytical ability, and writing precision for the upcoming UPPSC 2025 Mains examination. Each day focuses on one topic from the official syllabus, with carefully framed questions and model answers. Students can submit their answers to our Telegram Group for evaluation.
Topic / GS-V
उत्तर प्रदेश के सुविख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं व्यक्तित्व।
Eminent freedom fighters and personalities of UP.
Question & Model Answer
NOTE: मॉडल उत्तर को जानबूझकर निर्धारित शब्द-सीमा से अधिक रखा गया है, जिससे आपको विषय से संबंधित व्यापक सामग्री प्राप्त हो सके। / The model answer is deliberately kept above the prescribed word limit to provide you with comprehensive information on the topic.
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पंडित मदन मोहन मालवीय के योगदान पर प्रकाश डालें। / Highlight the contributions of Pandit Madan Mohan Malaviya in India’s freedom struggle. [12 Marks / 200 Words]
उत्तर: प्रयागराज में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय (1861–1946) एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता, शिक्षाविद् और समाज सुधारक थे। उन्होंने शैक्षिक पहलों, पत्रकारिता, संवैधानिक संघर्ष और सामाजिक सुधार के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संवैधानिक संघर्ष और राजनीतिक आंदोलन
वे संवैधानिक सुधार और वैधानिक उपायों में विश्वास करते थे। उन्होंने होमरूल आंदोलन (1916) के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। उन्होंने असहयोग आंदोलन (1920–22) के उद्देश्य से सहमति जताई, लेकिन इसके अंतर्गत विद्यालयों और विधायी संस्थाओं के बहिष्कार का विरोध किया। उन्होंने साइमन कमीशन (1928) के विरोध में आयोजित प्रदर्शनों का समर्थन किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) में भाग लिया।
विधायी और न्यायिक योगदान
मालवीय जी 1909 से 1926 के बीच इंपीरियल/सेंट्रल लेजिसलेटिव काउंसिल के सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने प्रेस एक्ट और सेडीशियस मीटिंग्स एक्ट का विरोध किया तथा निशुल्क प्राथमिक शिक्षा और सेवाओं के भारतीयकरण की माँग की। एक वकील के रूप में उन्होंने चौरी-चौरा घटना (1922) में आरोपित स्वतंत्रता सेनानियों की पैरवी की और उनमें से अधिकांश को बरी या दंड में कमी दिलाई।
पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण
मालवीय जी ने पत्रकारिता को जन जागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने अभ्युदय (1907, प्रयागराज), दि लीडर (1909, प्रयागराज) और मर्यादा (1910, वाराणसी) का प्रकाशन किया ताकि स्वदेशी, नागरिक मूल्यों और राष्ट्रवादी विचारों को प्रोत्साहन दिया जा सके। उन्होंने दि हिंदुस्तान टाइम्स के भारतीय अधिग्रहण और पुनरुत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शैक्षणिक राष्ट्रवाद
उन्होंने 1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति का संगम बना। इसके छात्र राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय रहे। मालवीय जी के लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा था।
सामाजिक सुधार और आर्थिक आत्मनिर्भरता
मालवीय जी ने अस्पृश्यता का विरोध किया और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित किया। 1918 में उन्होंने भारतीय युवाओं में देशभक्ति और अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए हिंदुस्तान स्काउट्स एसोसिएशन की स्थापना में सहायता की। उन्होंने बंधुआ मज़दूरी प्रणाली का विरोध किया और स्वदेशी उद्योगों तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित किया। उन्होंने भारतीय सामान की खरीद को बढ़ावा देने के लिए 1932 में एक घोषणापत्र जारी किया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व
मालवीय जी ने 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.) में प्रवेश किया और एक उदारवादी नेता के रूप में राष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त की। उन्होंने कांग्रेस के दो अधिवेशनों की अध्यक्षता की—लाहौर (1909) और दिल्ली (1918)। बाद में वो 1932 और 1933 के अधिवेशनों के लिए भी अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने कांग्रेस की उदारवादी और उग्रवादी धाराओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने महात्मा गांधी के साथ 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने महात्मा गांधी और हिंदू समुदाय की ओर से पूना पैक्ट (1932) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें दलितों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों से असहमति के कारण कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी (1934) की स्थापना की।
पंडित मदन मोहन मालवीय का योगदान शिक्षा, पत्रकारिता, संवैधानिक सुधार और सामाजिक उत्थान के सम्मिलित प्रयासों का प्रतीक था। महात्मा गांधी ने उनके निस्वार्थ सेवा और नैतिक नेतृत्व के लिए उन्हें ‘महामना’ की उपाधि प्रदान की। भारत सरकार द्वारा 2015 में मालवीय जी को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
Answer: Born in Prayagraj, Pandit Madan Mohan Malaviya (1861–1946) was a leading nationalist leader, educationist, and social reformer. He played a significant role in India’s freedom struggle through educational initiatives, journalism, constitutional struggle, and social reform.
Constitutional Struggle and Political Movements
He believed in constitutional reform and lawful methods. He sympathised with the Home Rule Movement (1916). He agreed with the cause of the Non-Cooperation Movement (1920–22) as well, but opposed its boycott of schools and legislatures. But he supported protests against the Simon Commission (1928) and participated in the Civil Disobedience Movement (1930–34).
Legislative and Legal Contributions
Malaviya served in the Imperial and later Central Legislative Councils between 1909-1926, where he opposed the Press Act and Seditious Meetings Act, and demanded free primary education and the Indianisation of services. As a lawyer, he defended the freedom fighters accused in the Chauri Chaura incident (1922), securing acquittal or commutation of sentences for most of them.
Journalism and National Awakening
Malaviya used journalism as an instrument of public awakening. He published Abhyudaya (1907, Prayagraj), The Leader (1909, Prayagraj), and Maryada (1910, Varanasi) to promote Swadeshi, civic values and nationalist ideas. He played a key role in the Indian acquisition and revival of The Hindustan Times.
Educational Nationalism
He established the Banaras Hindu University (BHU) in 1915, which became a centre where modern science and Indian culture coexisted. Its students engaged in nationalist causes. For Malaviya, the purpose of education was not merely employment, but service to the nation.
Social Reform and Economic Self-Reliance
Malaviya opposed untouchability and promoted social harmony. In 1918, he supported the establishment of the Hindustan Scouts Association to promote patriotism and discipline among Indian youth. He also opposed the Indentured Labour System. He promoted Swadeshi industries and economic self-reliance. He issued a manifesto in 1932 to promote the purchase of Indian goods.
Leadership in the Indian National Congress
He joined the Indian National Congress (INC) in 1886 and rose to national prominence as a moderate leader. He presided over two INC sessions: Lahore (1909) and Delhi (1918). Later, he was also elected President for the 1932 and 1933 sessions. He sought to reconcile the moderate and extremist wings of the Congress. He participated in the Second Round Table Conference in 1931, alongside Mahatma Gandhi. He signed the Poona Pact (1932) on behalf of Gandhi and the Hindu community, which provided reserved seats for the depressed classes. He formed the Congress Nationalist Party (1934) due to his disagreement with the policies of the Congress.
Pandit Madan Mohan Malaviya’s contributions combined education, journalism, constitutional reform, and social upliftment. Mahatma Gandhi conferred on him the title of ‘Mahamana’ for his selfless service and moral leadership. Malviya ji was posthumously awarded the Bharat Ratna by the Government of India in 2015.
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