परिभाषा
किसी व्यंजन के बाद किसी स्वर या व्यंजन के आने के कारण जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन सन्धि कहते हैं, अर्थात् व्यंजन + स्वर / व्यंजन = व्यंजन संधि।
व्यंजन संधि को हल् संधि भी कहते हैं, क्योंकि जैसा वर्ण हम लिखते हैं उसमें पहले से ही ‘अ’ स्वर का योग होता है। जब यही ‘अ’ स्वर वर्ण से पृथक कर दिया जाता है तो वह हलंत के साथ हो जाता है; जैसे— क = क् + अ, ख = ख् + अ, त = त् + अ इत्यादि।
इसी हलंत युक्त वर्ण के योग होने से जो शब्द बनते हैं वे व्यंजन सन्धि कहलाते हैं। हल् युक्त वर्ण के योग होने के कारण व्यंजन संधि को हल् संधि भी कहते हैं।
व्यंजन संधि के संदर्भ में हमें बार-बार ‘अघोष’ और ‘सघोष’ शब्दों का प्रयोग मिलेगा, इसलिए पहले इसे ही स्पष्ट कर लेते हैं।
- अघोष व्यंजन — वर्गों के प्रथम और द्वितीय व्यंजन के साथ-साथ ऊष्म व्यंजन में ‘ह’ को छोड़कर शेष तीन अघोष होते हैं; अर्थात् क, ख; च, छ; ट, ठ; त, थ; प, फ और श, ष, स अघोष व्यंजन हैं।
- सघोष व्यंजन — वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पंचम व्यंजन के साथ-साथ ड़, ढ़; अंतस्थ व्यंजन और ह सघोष व्यंजन हैं; अर्थात् ग, घ, ङ; ज, झ, ञ; ड, ढ, ण; द, ध, न; ब, भ, म; ड़, ढ़; और य, र, ल, व एवं ह सघोष व्यंजन हैं।
- सभी स्वर सघोष होते हैं।
नियम
पहला नियम
पहले शब्द के अंत में अघोष व्यंजन हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में सघोष व्यंजन या स्वर हो तो अघोष व्यंजन के स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा व्यंजन हो जाता है।
- वास्तव में हिन्दी में तत्सम शब्दों के अंत व्यंजन केवल पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) होते हैं।
अर्थात् यदि ‘क्’, ‘च्’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प्’ के बाद किसी वर्ण का तृतीय या चतुर्थ वर्ण आये; अथवा य, र, ल, व आये; अथवा कोई स्वर आये, तो ‘क्’, ‘च्’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प्’ के स्थान पर अपने ही वर्ण का ‘तृतीय वर्ण’ हो जाता है। जैसे—
- कवर्ग : क् का ग् होना—
- ऋक् + वेद = ऋग्वेद (क् + व = ग् + व)
- दिक् + अन्त = दिगन्त (क् + अ = ग् +अ)
- दिक् + अन्तर = दिगन्तर (क् + अ = ग् + अ)
- दिक् + अम्बर = दिगम्बर (क् + अ = ग् + अ)
- दिक् + गज = दिग्गज (क् + ग = ग् + ग)
- दिक् + दर्शन = दिग्दर्शन (क् + द = ग् + द)
- दिक् + भ्रम = दिग्भ्रम (क् + भ् = ग् + भ्)
- दिक् + विजय = दिग्विजय (क् + व = ग् + व)
- वाक् + ईश = वागीश (क् + ई = ग् + ई)
- वाक् + ईश्वरी = वागीश्वरी (क् + ई = ग् + ई)
- वाक् + जाल = वाग्जाल (क् + ज = ग् + ज)
- वाक् + दत्त = वाग्दत्त (क् + द = ग् + द)
- वाक् + दत्ता = वाग्दत्ता (क् + द = ग् + द)
- वाक् + दान = वाग्दान (क् + द = ग् + द)
- वाक् + धारा = वाग्धारा (क् + ध = ग् + ध)
- वाक् + भ्रम = वाग्भ्रम (क् + भ = ग् + भ)
- चवर्ग : च का ज् होना—
- अच् + अन्त = अजन्त (च् + अ = ज् + अ)
- अच् + आदि = अजादि (च् + आ = ज् + आ)
- टवर्ग : ट का ड् होना—
- षट् + अंग = षडंग (ट् + अ = ड् + अ)
- षट् + आनन = षडानन (ट् + आ = ड् + आ)
- षट् + आनन्द = षडानन्द (ट् + आ = ड् + आ)
- षट् + दर्शन = षड्दर्शन (ट् + द = ड् + द)
- षट् + रिपु = षड्रिपु (ट् + र = ड् + र)
- तवर्ग : त का द् होना—
- उत् + अय = उदय (त् + अ = द् + अ)
- उत् + गम = उद्गम (त् + ग = द् + ग)
- उत् + घाटन = उद्घाटन (त् + घ = द् + घ)
- उत् + हार = उद्धार (त् + ध = द् + ध)
- उत् + योग = उद्योग (त् + य = द् + य)
- उत् + वेग = उद्वेग (त् + व = द् + व)
- कृत् + अन्त = कृदन्त (त् + अ = द् + अ)
- जगत् + अम्बा = जगदम्बा (त् + अ = ग् + अ)
- जगत् + आधार = जगदाधार (त् + आ = द् + आ)
- जगत् + आनन्द = जगदानन्द ( त् + आ = द् + आ)
- जगत् + ईश = जगदीश (त् + ई = ग् + ई)
- जगत् + गुरु = जगद्गुरु (त् + ग = द् + ग)
- तत् + अनुसार = तदनुसार (त् + अ = द् + अ)
- तत् + आकार = तदाकार (त् + आ = द् + आ)
- तत् + इच्छा = तदिच्छा (त् + इ = द् + इ)
- तत् + भव = तद्भव (त् + भ = द् + भ)
- तत् + रूप = तद्रूप (त् + र = द् + र)
- भगवत् + गीता = भगवद्गीता (त् + ग = द् = ग)
- भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति (त् + भ = द् + भ)
- भगवत् + भजन = भगवद्भजन (त् + भ = द् + भ)
- वृहत् + रथ = वृहद्रथ (त् + र = द् + र)
- सत् + आचार = सदाचार (त् + आ = द् + आ)
- सत् + आनन्द = सदानन्द = (त् + आ = द् + आ)
- सत् + आशय = सदाशय (त् + आ = द् + आ)
- सत् + उपयोगी = सदुपयोग (त् + उ = द् + उ)
- सत् + गति = सद्गति (त् + ग = द् + ग)
- सत् + धर्म = सद्धर्म (त् + ध = द् + ध)
- सत् + बुद्धि = सद्बुद्धि (त् + ब = द् + ब)
- सत् + भावना = सद्भावना (त् + भ = द् + भ)
- सत् + वंश = सद्वंश (त् + व = द् + व)
- सत् + वाणी = सद्वाणी (त् + व = द् + व)
- पवर्ग : प का ब् होना—
- अप् + ज = अब्ज (प् + ज = ब् + ज)
- अप् + इन्धन = अबिन्धन (प् + इ = ब् + इ)
- अप् + धि = अब्धि (प् + ध = ब् + ध)
- सुप् + अन्त = सुबन्त (प् + अ = ब् + अ)
दूसरा नियम
पहले शब्द के अंत में अघोष व्यंजन हो और दूसरे के प्रारंभ में कोई नासिक्य (पंचम) वर्ण हो तो अघोष वर्ण अपने ही वर्ण के पंचम वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं।
- वास्तव में हिन्दी में तत्सम शब्दों के अंत व्यंजन केवल पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) होते हैं।
अर्थात् यदि ‘क्’, ‘च्’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प्’ के बाद किसी वर्ण का पंचम वर्ण (वस्तुतः केवल ‘न’ और ‘म’) आये, तो ‘क्’, ‘च्’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प्’ अपने ही वर्ण के पंचम वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं; जैसे—
- क् का ङ् होना —
- दिक् + नाग = दिङ्नाग (क् + न = ङ् + न)
- दिक् + मण्डल = दिङ्मण्डल (क् + म = ङ् + म)
- वाक् + मय = वाङ्मय (क् + म = ङ् + म)
- ट् का ण् होना—
- षट् + मार्ग = षण्मार्ग (ट् + म = ण् + म)
- षट् + मास = षण्मास (ट् + म = ण् + म)
- षट् + मुख = षण्मुख (ट् + म = ण् + म)
- त् का न् होना—
- उत् + नत = उन्नत (त् + न = न् + न)
- उत् + नति = उन्नति (त् + न = न् + न)
- उत् + नयन = उन्नयन (त् + न = न् + न)
- उत् + नायक = उन्नायक (त् + न = न् + न)
- उत् + मत्त = उन्मत्त (त् + म = न् + म)
- उत् + माद = उन्माद (त् + म = न् + म)
- उत् + मेष = उन्मेष (त् + म = न् + म)
- एतत् + मुरारी = एतन्मुरारी (त् + म = न् + म)
- चित् + मय = चिन्मय (त् + म = न् + म)
- जगत् + नाथ = जगन्नाथ (त् + न = न् + न)
- तत् + मय = तन्मय (त् + म = न् + म)
- रुत् + मय = रुन्मय (त् + म = न् + न)
- सत् + मार्ग = सन्मार्ग (त् + म = न् + म)
- सत् + मित्र = सन्मित्र (त् + म = न् + म)
- प् का म् होना—
- अप् + मय = अम्मय (प् + म = म् + म)
तीसरा नियम
यदि ‘म्’ के बाद कोई स्पर्श व्यंजन (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग) का कोई वर्ण आये और वह निरनुनासिक हो, तो ‘म्’ का अनुस्वार या बादवाले वर्ण के अपने वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है। हिन्दी में पंचमाक्षर के स्थान पर ‘अनुस्वार’ का प्रचलन हो चला है। उदाहरण—
- अहम् + कार = अहंकार, अहङ्कार (म् + क = अनुस्वार / ङ् + क)
- किम् + कर = किंकर
- किम् + चित् = किंचित, किञ्चित (म् + च = अनुस्वार / ञ् + च)
- पम् + चम = पंचम, पञ्चम (म् + च = अनुस्वार / ञ् + च)
- परम् + तु = परंतु, परन्तु
- सम् + कलन = संकलन, सङ्कलन (म् + क = अनुस्वार / ङ् + क)
- सम् + कल्प = संकल्प, सङ्कल्प
- सम् + कीर्ण = संकीर्ण
- सम् + क्रान्ति = संक्रान्ति
- सम् + गत = संगत, सङ्गत (म् + ग = अनुस्वार / ङ् + ग)
- सम् + गति = संगति, सङ्गति
- सम् + गम = संगम, सङ्गम
- सम् + ग्रह = संग्रह
- सम् + घर्ष = संघर्ष
- सम् + चय = संचय, सञ्चय (म् + च = अनुस्वार / ञ् + च)
- सम् + चित = संचित, सञ्चित
- सम् + जय = संजय, सञ्जय
- सम् + जीवनी = संजीवनी, सञ्जीवनी
- सम् + ताप = संताप, सन्ताप (म् + त = अनुस्वार / न् + त)
- सम् + तोष = संतोष, सन्तोष
- सम् + ध्या = संध्या
- सम् + पर्क = संपर्क, सम्पर्क (म् + प = अनुस्वार / म् + प)
- सम् + पूर्ण = संपूर्ण, सम्पूर्ण
- सम् + बंध = संबंध, सम्बंध
चौथा नियम
यदि ‘म्’ के बाद अंतस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) अथवा ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) हो तो अनुस्वार ही होता है; जैसे—
- किम् + वा = किंवा
- सम् + भव = संभव
- सम् + यम = संयम
- सम् + युक्त = संयुक्त
- सम् + योग = संयोग
- सम् + रक्षक = संरक्षक
- सम् + रक्षण = संरक्षण
- सम् + रक्षा = संरक्षा
- सम् + लग्न = संलग्न
- सम् + लाप = संलाप
- सम् + लिप्त = संलिप्त
- सम् + वत् = संवत्
- सम् + वर्द्धन = संवर्द्धन
- सम् + वहन = संवहन
- सम् + वाद = संवाद
- सम् + विधान = संविधान
- सम् + वेग = संवेग
- सम् + शय = संशय
- सम् + रक्षण = संरक्षण
- सम् + वाद = संवाद
- सम् + सार = संसार
- सम् + स्मरण = संस्मरण
- सम् + हार = संहार
परन्तु यदि ‘म्’ के वाद ‘म’ आये तो ‘म्’ सुरक्षित रहता है अर्थात् वह द्वित्व हो जाता है; जैसे—
- सम् + मति = सम्मति
- सम् + मानित = सम्मानित
- सम् + मान = सम्मान
- सम् + मिश्रण = सम्मिश्रण
- सम् + मिलित = सम्मिलित
- सम् + मोहन = सम्मोहन
पाँचवाँ नियम
यदि पहले शब्द के अंत में ‘त्’, ‘द्’, ‘न्’ हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ‘ल’ हो तो ‘त्’, ‘द्’ दोनों ‘ल’ में बदल जाते हैं जबकि ‘न्’ का अनुनासिक के साथ ‘ल्’ हो जाता है। इसी तरह दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ‘ज’ हो तो अघोष व्यंजन भी ‘ज्’ में बदल जाता है। जैसे—
- उत् + लंघन = उल्लंघन (त् + ल = ल् + ल)
- उत् + लास = उल्लास (त् + ल = ल् + ल)
- उत् + लेख = उल्लेख (त् + ल = ल् + ल)
- तत् + लीन = तल्लीन (त् + ल = ल् + ल)
- शरत् + लीला = शरल्लीला (त् + ल = ल् + ल)
- महान् + लाभ = महाँल्लाभ (न् + ल = अनुनासिक + ल् + ल)
- उत् + ज्वल = उज्ज्वल (त् + ज = ज् + ज)
- विपद् + जाल = विपज्जाल (द् + ज = ज् + ज)
- जगत् + जननी = जगज्जननी (त् + ज = ज् + ज)
- सत् + जन = सज्जन (त् + ज = ज् + ज)
छठा नियम
अघोष के उपरान्त अघोष व्यंजन हो, प्रायः कोई परिवर्तन नहीं होता है; जैसे—
- उत् + साह = उत्साह
- क्षुत् + पिपासा = क्षुत्पिपासा
- तत् + पर = तत्पर
- सत् + कार = सत्कार
सातवाँ नियम
सकार और तवर्ग का शकार और चवर्ग के योग में शकार और चवर्ग तथा षकार और टवर्ग के योग में षकार और टवर्ग हो जाता है। जैसे—
- स् + श
- रामस् + शेते = रामश्शेते
- त् + च
- सत् + चित् = सच्चित्
- त् + छ
- महत् + छत्र = महच्छत्र
- त् + ण
- महत् + णकार = महण्णकार
- त् + ट
- बृहत् + टिट्टिभ = बृहट्टिट्टिभ
- ष् + त
- द्रष् + ता = द्रष्टा
आठवाँ नियम
यदि वर्गों के अन्तिम वर्णों के छोड़कर शेष वर्णों के बाद ‘ह’ आये, तो ‘ह’ पूर्ववर्ण के वर्ग का चतुर्थ वर्ण हो जाता है और ‘ह’ के पूर्ववाला वर्ण अपने वर्ग का तृतीय वर्ण हो जाता है। जैसे—
- उत् + हत = उद्धत
- उत् + हरण = उद्धहरण
- उत् + हार = उद्धार
- उत् + हृत = उद्धृत
- जगत् + हित = जगद्धित
- तत् + हित = तद्धित
- पद् + हति = पद्धति
- वाक् + हरि = वाग्घरि
ह्रस्व स्वर के बाद ‘छ’ हो, तो ‘छ’ के पहले ‘च्’ जुड़ जाता है। दीर्घ स्वर के बाद ‘छ’ होने पर यह विकल्प से होता है। जैसे—
- परि + छेद = परिच्छेद
- शाला + छादन = शालाच्छादन
पहले शब्द के अंत में ‘त्’ या ‘द्’ के बाद दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ‘च’ या ‘छ’ आने पर ‘त्’ और ‘छ’; ‘च्’ में बदल जाता है; जैसे—
- त् + च = च् + च
- उत् + चारण = उच्चारण
- उत् + चाटन = उच्चाटन
- शरत् + चन्द्र = शरच्चन्द्र
- सत् + चरित्र = सच्चरित्र
- त् + छ = च् + छ
- उत् + छिन्न = उच्छिन्न
- उत् + छेद = उच्छेद
- जगत् + छाया = जगच्छाया
- महत् + छत्र = महच्छत्र
- वृहत् + छाया = वृहच्छाया
- सत् + छात्र = सच्छात्र
- द् + छ = च् + छ
- पद + छेद = पदच्छेद
पहले शब्द के अन्त में ‘त्’ या ‘द्’ हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ‘ज’ या ‘झ’ आये तो ‘त्’ या ‘द्’ के स्थान पर ‘ज्’ हो जाता है; जैसे—
- त् + ज = ज् + ज
- उत् + ज्वल = उज्ज्वल
- जगत् + जननी = जगज्जननी
- सत् + जन = सज्जन
- त् + झ = च् + झ
- उत् + झटिका = उज्झट्टिका
- उत् + झटिल = उज्झटिल
- द् + ज = च् + ज
- विपद् + जाल = विपज्जाल
कुछ स्थितियों में पहला अघोष और बाद के अघोष से संयुक्त होकर बाद वाले ही अघोष व्यंजन में बदल जाता है; यथा—
- तत् + टीका = तट्टीका
- वृहत् + टीका = वृहट्टीका
- सत् + चित् = सच्चित्
- सत् + चिदानन्द = सत् + चित् + आनन्द = सच्चिदानन्द
- सत् + टीका = सट्टीका
यदि पहले शब्द के अन्त में ‘त्’ या ‘द्’ और दूसरे शब्द के अन्त में ‘ड’ या ‘ढ’ हो तो ‘त्’ या ‘द्’ के स्थान पर ‘ड्’ हो जाता है; जैसे—
- उत् + डयन = उड्डयन
‘त्’ के बाद ‘श्’ आने पर ‘त्’ का ‘च्’ में और ‘श्’ का ‘छ्’ में परिवर्तन हो जाता है; अर्थात् (त् + श् = च् + छ्); जैसे—
- उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
- उत् + श्वास = उच्छ्वास
- उत् + शृंखल = उच्छृंखल
- महत् + शक्ति = महच्छक्ति
- तत् + शंकर = तच्छंकर
- तत् + शरण = तच्छरण
- तत् + शिव = तच्छिव
- पठेत् + शिव = पठेच्छिव
- शरत् + शशि = शरच्छशि
- सत् + शासन = सच्छासन
- सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
दसवाँ नियम
स्वर के बाद छ हो, तो ‘च्छ’ हो जाता है; जैसे—
- अनु + छेद = अनुच्छेद
- अव + छेद = अवच्छेद
- आ + छादन = आच्छादन
- छत्र + छाया = छत्रच्छाया
- तरु + छाया = तरुच्छाया
- परि + छेद = परिच्छेद
- प्रति + छवि = प्रतिच्छवि
- लक्ष्मी + छाया = लक्ष्मीच्छाया
- वि + छेद = विच्छेद
- वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया
- शाला + छादन = शालाच्छादन
- स्व + छंद = स्वच्छंद
ग्यारहवाँ नियम (णत्व अर्थात् न का ण होना)
यदि शब्द में ऋ, र्, ष् के बाद न् हो, भले ही बीच में कोई स्वर, कवर्ग, पवर्ग अथवा य व ह हो, तो न का ण हो जाता है; जैसे—
- उत्तरायण
- ऋ + न = ऋण
- कल्याण
- कृष् + न = कृष्ण
- तृष् + ना = तृष्णा
- परि + नय = परिणय
- परि + नाम = परिणाम
- परि + मान = परिमाण
- पूर् + न = पूर्ण
- पोष् + अन = पोषण
- प्र + नाम = प्रणाम
- प्र + मान = प्रमाण
- प्रापण
- भर् + अन = भरण
- भूष् + अन = भूषण
- रण
- राम + अयन = रामायण
- वि + स्मरण = विस्मरण
- विष् + नु = विष्णु
- शोष् + अन = शोषण
- हर् + न = हरण
परन्तु चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, श और स का व्यवधान होने पर न् का ण नहीं होता है; जैसे— अर्चना, अर्जुन, दर्शन, दुर्जन, पर्यटन, रतन, रसना आदि।
बारहवाँ नियम (षत्व अर्थात् स का ष होना)
स से पहले अ, आ से भिन्न कोई स्वर हो, तो स का ष हो जाता है; जैसे—
- अनु + संगी = अनुषंगी
- अभि + सिक्त = अभिषिक्त
- अभि + सेक = अभिषेक
- नि + सिद्ध = निषिद्ध
- नि + सेध = निषेध
- युधि + स्थिर = युधिष्ठिर
- वि + सम = विषम
- वि + साद = विषाद
- सु + समा = सुषमा
- सु + सुप्त = सुषुप्त
- सु + सुप्ति = सुषुप्ति
परन्तु यदि ‘स’ के बाद ‘ऋ’ या ‘र्’ लगने वाली मूल धातु से कोई शब्द निर्मित हुआ हो (यथा— स्मृ से स्मरण) और ‘स’ से पहले ‘अ’ व ‘आ’ के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर आये तो ‘स’ का परिवर्तन ‘ष’ में नहीं होता है; जैसे—
- वि + स्मरण (स्मृ धातु) = विस्मरण
- अनु + सरण (सृ धातु) = अनुसरण
- वि + सर्ग (सृज धातु) = विसर्ग
तेरहवाँ नियम
यदि व्यंजन के बाद कोई स्वर हो तो वह स्वर पूर्ववर्ती व्यंजन की मात्रा बन जाता है, लेकिन पहला नियम अवश्य लगता है; जैसे—
- अन् + अधिकृत = अनधिकृत
- अन् + अन्त = अनन्त
- अन् + आचार = अनाचार
- तद् + अर्थ = तदर्थ
- निर् + उद्यम = निरुद्यम
- सम् + ईक्षा = समीक्षा
चौदहवाँ नियम
वे यौगिक शब्द जो धातुओं में प्रत्यय लगने से बनते हैं उनमें यदि पहले शब्द के अन्तिम में ‘न्’ हो, तो सन्धि की अवस्था में ‘न्’ का लोप हो जाता है; जैसे—
- धनिन् + त्व = धनित्व
- प्राणिन् + मात्र = प्राणिमात्र
- राजन् + आज्ञा = राजाज्ञा
- हस्तिन् + दन्त = हस्तिदन्त
पंद्रहवाँ नियम
‘अहन्’ शब्द की सन्धि किसी शब्द से होने पर ‘न्’ के स्थान पर ‘र्’ हो जाता है; जैसे—
- अहन् + गण = अहर्गण
- अहन् + मुख = अहर्मुख
परन्तु जब ‘अहन्’ शब्द के बाद ‘रात्र’ या ‘रूप’ शब्द आता है तो ‘न्’ का ‘उ’ हो जाता है और ‘उ’ अपने पहले ‘अ’ से जुड़कर गुण सन्धि के नियमानुसार ‘ओ’ हो जाता है; अर्थात् अह् + अ + न् + रात्र = अह् + अ + उ + रात्र = अह् + ओ + रात्र = अहोरात्र; जैसे—
- अहन् + रात्र = अहोरात्र
- अहन् + रूप = अहोरूप
व्यंजन सन्धि के अपवाद
यदि “सम्” उपसर्ग के बाद “कृ” धातु से बना कोई शब्द आ जाये तो “सम्” के “म्” का अनुस्वार हो जाता है और दन्त्य “स” का आगम हो जाता है; जैसे— संस्कार, संस्कृत, संस्कृति।
- सम् + कार = संस्कार
- सम् + कृत = संस्कृत
- सम् + कृति = संस्कृति
