प्रश्न पत्र
हल
उत्तर— 1
1 (क) : गद्यांश का आशय
आशय : मानव शरीर क्षणभंगुर है, अतः हमें निरंतर समाज हित में पूरी शक्ति और ओज के साथ कार्य करना चाहिए। हमारा यह जीवन व्यर्थ नहीं होना चाहिए। उत्तम लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए हमें प्रयत्नशील होना चाहिए ताकि मरणोपरान्त लोग हमारे सत्कार्यों के लिए हमें याद रख सकें। ईश्वर प्रदत्त इस शरीर का जन-हित में सदुपयोग करना है, न कि यूँ ही न व्यर्थ करना है। हमारे इन उत्तम कार्यों से अन्य लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त होगी तथा वे भी अपने निजी हित से ऊपर उठाकर लोकहित के कार्यों में संलग्न होंगे। हमारा व्यक्तित्व दीपक की तरह एक सीमित क्षेत्र को आलोकित न करके एक मशाल की तरह बड़े दायरे को आलोकित करने वाला होना चाहिए। अपने प्रयासों से हम समाज में नवीन परिवर्तनों का सकारात्मक प्रकाश फैला सकते हैं।
1 (ख) : ‘जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए’ का अभिप्राय
‘जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए’ से अभिप्रेत है जीवन एक अवसर है अपनी अंतर्निहित शक्ति और प्रतिभा को जानने और विकसित करने का। जीवन के असंख्य आयाम है, इन सभी आयामों में महत्तम विकसित होना और श्रेष्ठ, जनोपयोगी और कल्याणकारी अस्तित्व तथा व्यक्तित्व का निर्माण करना ही जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिये।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
हमारी देह ……………. फैला सकती है।
व्याख्या : हमारा शरीर एक ज्योति-पुंज की तरह है। शरीर ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम सभी कार्यों का संचालन करते हैं। व्यक्ति के द्वारा किये जा रहे उत्तम कार्यों से अन्य लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त होती है और वे भी परमार्थ में प्रवृत्त होते हैं। एक व्यक्ति के उत्तम कार्य उस तक सीमित न रहकर एक पूरे समूह तक विस्तारित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर कर पाना अधिक आसान हो जाता है। अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठे स्वर अधिक तीव्र हो जाते हैं तथा समाज में हो रहे सकारात्मक परिवर्तनों का दायरा अधिक विस्तृत हो जाता है।
उत्तर— 2
2 (क) : गद्यांश का शीर्षक
नैतिकता / नैतिकता का महत्त्व या सत्कर्म का सामाजिक प्रभाव / सत्कार्य और समाज
2 (ख) : धर्म और नैतिकता का संबंध
जब तक व्यक्ति किसी-न-किसी स्तर पर कर्म सिद्धांत को स्वीकार न कर ले, तब तक विश्व में नैतिक व्यवस्था नहीं चल सकती। कर्म सिद्धांत का सरल सा अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके नैतिक व अनैतिक कर्मों के अनुपात में अच्छा या बुरा फल मिलना अनिवार्य है। यह सिद्धांत किसी-न-किसी रूप में सभी संगठित धर्म स्वीकार करते हैं। इसीलिए सभी धर्म अपने अनुयायियों के लिये एक आचरण संहिता बनाते हैं, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों को नैतिक पथ पर चलने के लिये प्रेरित करना होता है। परोपकार, दया, करुणा, अहिंसा, ईमानदारी इत्यादि मूल्यों को धर्म व्यक्ति के जीवन में प्रवेश कराने का प्रयास करता है। इस प्रकार धर्म और नैतिकता को परस्पर पूरक माना जाता है।
2 (ग) : गद्यांश का संक्षेपण
नैतिकता उचित-अनुचित का ज्ञान कराकर सामाजिक मानदंड उपस्थित करती है। नैतिकता तर्काधारित होती है, इसलिए इनमें स्थायित्व होता है। नैतिकता दो प्रकार की होती है— एक, धर्म-पोषित ‘सामान्य’ तथा दो, विशिष्ट (आचारशास्त्र)। विशिष्ट नैतिकता कानूनी दंड के भय पर कार्य करती है, जबकि सामान्य नैतिकता पारलौकिक दंड के भय पर। विशिष्ट नैतिकता के उल्लंघन पर व्यक्ति अपराधी माना जाता है। सामान्य नैतिकता के उल्लंघन पर पापी माना जाता है। परन्तु सभी नैतिक व्यवहारों की प्रकृति धार्मिक नहीं होती।
उत्तर — 3
3 (क) : सरकारी पत्र

3 (ख) : कार्यालय आदेश

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम
- शब्द — विलोम
- मसृण — रुक्ष
- त्याज्य — अत्याज्य, ग्राह्य
- उद्धत — अनुद्धत, सौम्य, विनीत, विनत
- ज्ञेय — अज्ञेय
- पाच्य — अपाच्य
- प्रखर — मंद
- धृष्ट — विनम्र, विनीत, नम्र
- संघटन — विघटन
- अभिज्ञ — अनभिज्ञ, अज्ञ
- अनिवार्य — वैकल्पिक, निवार्य, ऐच्छिक
उत्तर— 5
5 (क) : उपसर्ग
| शब्द | उपसर्ग + शब्द | प्रयुक्त उपसर्ग |
| पर्यटन | परि + अटन | परि |
| प्रतीक्षा | प्रति + ईक्षा | प्रति |
| अन्वेषण | अनु + एषण | अनु |
| निरूपण | नि + रूपण | नि |
| अध्यक्ष | अधि + अक्ष | अधि |
5 (ख) : प्रत्यय
| शब्द | शब्द + प्रत्यय | प्रयुक्त प्रत्यय |
| वैष्णव | विष्णु + अ | अ |
| ग्रामीण | ग्राम + ईन | ईन |
| वाणिज्य | वाणिज + य | य |
| गड़रिया | गाड़र (गाडर) + इया | इया |
| कौन्तेय | कुन्ती + एय | एय |
उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (1) | अनिश्चित जीविका। | आकाशवृत्ति |
| (2) | बच्चों से लेकर बूढ़ों तक। | आबालवृद्ध |
| (3) | चार अंगों वाली सेना। | चतुरंगिणी सेना |
| (4) | पेट की आग। | जठराग्नि, जठरानल |
| (5) | दूसरों के दोष निकालने की जिसकी प्रवृत्ति हो। | छिद्रान्वेषी |
उत्तर— 7
7 (क) : वाक्य शुद्धि
(1) अशुद्ध : जीवन और साहित्य का घोर संबंध है।
शुद्ध : जीवन और साहित्य का घनिष्ठ संबंध है।
(2) अशुद्ध : इतने में हल्की सी हवा का झोंका आया।
शुद्ध : इतने में हवा का हल्का सा झोंका आया।
(3) अशुद्ध : जंगली फल और झरनों का पानी पीकर हम आगे बढ़े।
शुद्ध : जंगली फल खाकर और झरने का पानी पीकर हम आगे बढ़े।
(4) अशुद्ध : सीता ने माला गूँध ली।
शुद्ध : सीता ने माला गूँथ ली।
(5) अशुद्ध : उसने अपने पाँव से जूता निकाला।
शुद्ध : उसने पाँव से जूता निकाला।
7 (ख) : वर्तनी-शुद्ध
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (1) | वाल्मीकी | वाल्मीकि |
| (2) | अन्ताक्षरी | अन्त्याक्षरी |
| (3) | संग्रहीत | संगृहीत |
| (4) | ह्रष्ट पुष्ट | हृष्ट-पुष्ट |
| (5) | धुरंदर | धुरंधर |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(1) बिल्ली के गले में घंटी बाँधना।
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— स्वयं को संकट में डालना
- प्रयोग— महँगाई और बेरोजगारी से पीड़ित व्यक्ति भी बिल्ली के गले में घंटी बाँधने से कतराते हैं।
(2) कुएँ में भाँग पड़ना।
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— सभी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाना
- प्रयोग— आखिर किस-किस को समझाओगे, यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी है।
(3) उड़ती चिड़िया के पंख गिनना।
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— अनुभवी होना/मन की बात जानना
- प्रयोग— गुरुजी के साथ रहते हुए उनका शिष्य अब उड़ती चिड़िया के पंख गिन सकता है।
(4) बहती गंगा में हाथ धोना।
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— अवसर का लाभ उठाना
- प्रयोग— अनेक अवसरवादी विधायक / सांसद सत्तारूढ़ दल में शामिल होकर बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं कतराते हैं।
(5) डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना।
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— बहुमत से अलग-थलग रहना
- प्रयोग— समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अनेक मुद्दों पर डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना ही पसंद करते हैं।
(6) दमड़ी की हाँड़ी गई कुत्ते की जात पहचानी गई।
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— थोड़ी-सी हानि उठाकर किसी भी वास्तविकता को जान लेना
- प्रयोग— सत्तारूढ़ दल के नेताओं को अक्सर विपक्षी दल प्रलोभन देकर उनकी कमजोरियों को पहचानने के लिए हर हथकंडे अपनाकर सच्चाई उगलवा लेते हैं। सत्य कहा गया है दमड़ी की हाँड़ी गई कुत्ते की जात पहचानी गई।
(7) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— अपने दोष को बहाना बनाकर टाल देना/अपनी अयोग्यता के लिए साधनों को दोष देना
- प्रयोग— परीक्षा में जो विद्यार्थी पूरे पाठ्यक्रम का अध्ययन नहीं करते, वे प्रश्न के आने पर यह कहते हैं कि प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर है। ऐसे विद्यार्थियों को ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ वाली कहावत चरितार्थ करते हैं।
(8) थोथा चना बाजे घना।
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— गुणहीनता में भी गुणी होने का ढोंग करना
- प्रयोग— मोहन गणित विषय में बार-बार फेल होता है फिर भी अपने को गणित का विद्वान बताता रहता है। ठीक ही कहा गया है थोथा चना बाजे घना।
(9) छछूँदर के सिर में चमेली का तेल।
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— अयोग्य व्यक्ति को मूल्यवान वस्तु की प्राप्ति
- प्रयोग— चुनाव जीतने पर अनपढ़ नेताओं पर सरकारी सुख-सुविधाओं की वृद्धि होने लगती है, किन्तु यह ठीक वैसे ही है, जैसे छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल।
(10) जहाँ देखे तवा परात वहीं गुजारे सारी रात।
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— जहाँ कुछ मिलने की उम्मीद होती है, वहाँ लालची व्यक्ति जरूर पहुँचते हैं
- प्रयोग— लाला जी के बड़े लड़के के विवाह में ऐसे भी लोग शामिल हो गये, जिनको निमंत्रण नहीं दिया गया था, क्योंकि ऐसे लोगों को उम्मीद थी कि बरात में अच्छा भोजन जरूर मिलेगा। ठीक ही कहा गया है कि जहाँ देखे तवा परात वहीं गुजारे सारी रात।
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