सामान्य हिंदी | UPPSC (Main) Examination 2023: Question Paper and Solution

प्रश्न पत्र

2023
सामान्य हिन्दी
GENERAL HINDI
निर्धारित समय : तीन घंटे अधिकतम अंक : 150
Time Allowed : Three Hours Maximum Marks : 150

उत्तर देने से पूर्व निम्नलिखित निर्देशों को कृपया सावधानीपूर्वक पढ़ें :
(i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(ii) प्रत्येक प्रश्न के अंत में निर्धारित अंक अंकित हैं।
(iii) पत्र, प्रार्थना पत्र या किसी अन्य प्रश्न के उत्तर के साथ अपना अथवा अन्य किसी का नाम, पता (प्रश्नपत्र में दिये गये नाम, पदनाम आदि को छोड़कर) एवं अनुक्रमांक न लिखें। आवश्यक होने पर क, ख, ग का उल्लेख कर सकते हैं ।
Please read each of the following instructions carefully before attempting questions :
(i) All questions are compulsory.
(ii) Marks are given against each of the question.
(iii) Do not write your or another’s name, address (excluding those name, designation etc. given in the question paper) and roll no. with letter, application or any other question. You can mention क, ख, ग if necessary.
1. निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
हमारा सांसारिक जीवन एक-न-एक दिन खत्म होगा ही लेकिन हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारी देह एक मशाल है जो निरंतर संसार को, समाज को आलोकित कर उसका मार्गदर्शन कर सकती है। यानी हमारा यह जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए, समाज के लिए हमें एक कर्मठ एवं ओजस्वी जीवन का अभिलाषी होना चाहिए। हमें असहाय, निर्बलों का संबल बनना चाहिए, हमारा संपूर्ण सांसारिक जीवन किसी उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति में व्यतीत होना चाहिए कि हम इस संसार से जाएँ तो लोग हमें स्मरण कर सकें। हमारे जीवन का लक्ष्य सत्कर्म है और सत्कर्म हमारी देह के माध्यम से ही हो सकता है। हम हमारे कार्यों को अपनी देह के संचालन के द्वारा ही तो संपादित करते हैं। यदि हमारे कार्य इतने संकीर्ण हों, केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए हों तो फिर देह हमारे घर में जल रहे एक दीपक की तरह ही होगी जिसके प्रकाश का लाभ केवल हमें ही मिलेगा। किंतु यदि हम लोकहित के कार्यों में संलग्न हैं तो समझिए किहमारी देह एक मशाल की तरह है जिसकी रोशनी से दूसरे न केवल प्रभावित हैं बल्कि प्रेरित भी हैं। मशाल में वह ताकत है कि दूसरों में उत्साह भर कर अन्य मशालों को आमंत्रित कर सकती है और अन्याय-उत्पीड़न रूपी अंधकार में विरोध का, आजादी का, नये परिवर्तन का प्रकाश फैला सकती है।
(क) उपरिलिखित गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए। 5
(ख) ‘जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए’ से क्या अभिप्रेत है? 5
(ग) गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। 20
2. नैतिकता हमारे लिए सामाजिक मानदंड उपस्थित करती है क्योंकि यह उचित और अनुचित का ज्ञान कराती है। नैतिक नियमों में चरित्र-निर्माण की महत्ता पर जोर दिया जाता है और उन्हें माननेवाला कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर व्यवहार करते हैं। नैतिकता महज इसलिए नहीं मानी जाती कि पूर्वज भी ऐसा मानते आए हैं, बल्कि वह इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसके पीछे न्याय, पवित्रता, औचित्य व दृढ़ता होती है। नैतिकता आत्म-चेतना से प्रेरित होती है। रूढ़ियाँ तो तर्कपूर्ण नहीं होती, किंतु नैतिकता का आधार मनुष्य के जीवन-मूल्य होते हैं जिनके अनुसार वे तर्कों का निर्माण कर लेते हैं। नैतिकता रूढ़ियों व जनरीतियों की अपेक्षा स्थायित्व लिए रहती हैं। नैतिकता का एक और अर्थ हो सकता है, जिसका संबंध एक समूह-विशिष्ट से होता है, जैसे, डॉक्टरों की नैतिकता, प्राध्यापकों की नैतिकता आदि। यह आचारशास्त्र के निकट है। धर्म अक्सर नैतिक सिद्धांतों का समर्थन करता है। नैतिक सिद्धांतों का परिपालन धर्म के भय के कारण होता है, क्योंकि बहुत से नीति-नियमों की उत्पत्ति धर्म से बतलायी गयी है। भारत में कर्म, पुनर्जन्म एवं स्वर्ग-नरक की अवधारणाएँ धर्म द्वारा प्रतिपादित हैं। ये अवधारणाएँ सुव्यवस्थित सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होती हैं। यदि व्यक्ति नैतिकता का पालन नहीं करता है तो उसको अपराधी माना जाता है, जबकि धर्म का पालन न करने पर वह पाप का भागी बनता है। आवश्यक नहीं कि सभी प्रकार के नैतिक व्यवहारों की प्रकृति धार्मिक हो।
उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। 5
(ख) धर्म और नैतिकता का संबंध स्पष्ट कीजिए। 5
(ग) गद्यांश का संक्षेपण (लगभग एक-तिहाई शब्दों में) कीजिए। 20
3.
(क)
जिला कलेक्टर की ओर से मंडल आयुक्त को एक पत्र लिखिए। इस पत्र में राज्य सरकार द्वारा घोषित ‘स्वच्छता-सप्ताह’ के दौरान जिले में किये गये विविध कार्यों का विवरण हो। 10
(ख)
जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से एक आदेश जारी कीजिए, जिसमें श्री राम सिंह, व्याख्याता, गणित, उच्च माध्यमिक विद्यालय ‘क’ नगर को उच्च माध्यमिक विद्यालय ‘ख’ नगर में तत्काल प्रभाव से दो माह की प्रतिनियुक्ति हेतु आदेशित किया गया हो। 10
4.निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए। 10
मसृण, त्याज्य, उद्धत, ज्ञेय, पाच्य, प्रखर, धृष्ट, संघटन, अभिज्ञ, अनिवार्य।
5.
(क) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों का निर्देश कीजिए। 5
पर्यटन, प्रतीक्षा, अन्वेषण, निरूपण, अध्यक्ष।
(ख) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्ययों को पृथक् कीजिए। 5
वैष्णव, ग्रामीण, वाणिज्य, गड़रिया, कौन्तेय।
6. निम्नलिखित वाक्यांशों या पदबंध के लिए एक-एक शब्द लिखिए।
10
(1) अनिश्चित जीविका।
(2) बच्चों से लेकर बूढ़ों तक।
(3) चार अंगों वाली सेना।
(4) पेट की आग।
(5) दूसरों के दोष निकालने की जिसकी प्रवृत्ति हो।
7.
(क) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए। 5
(1) जीवन और साहित्य का घोर संबंध है।
(2) इतने में हल्की सी हवा का झोंका आया।
(3) जंगली फल और झरनों का पानी पीकर हम आगे बढ़े।
(4) सीता ने माला गूंध ली।
(5) उसने अपने पाँव से जूता निकाला।
(ख) निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए। 5
वाल्मीकी, अन्ताक्षरी, संग्रहीत, ह्रष्ट पुष्ट, धुरंदर।
8. निम्नलिखित मुहावरों / लोकोक्तियों का अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में इस प्रकार प्रयोग कीजिए कि अर्थ स्पष्ट हो जाये।
10+20=30
(1) बिल्ली के गले में घंटी बाँधना।
(2) कुएँ में भाँग पड़ना।
(3) उड़ती चिड़िया के पंख गिनना।
(4) बहती गंगा में हाथ धोना।
(5) डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना।
(6) दमड़ी की हाँड़ी गई कुत्ते की जात पहचानी गई।
(7) नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
(8) थोथा चना बाजे घना।
(9) छछूँदर के सिर में चमेली का तेल।
(10) जहाँ देखे तवा परात वहीं गुजारे सारी रात।

हल

उत्तर— 1

1 (क) : गद्यांश का आशय

आशय : मानव शरीर क्षणभंगुर है, अतः हमें निरंतर समाज हित में पूरी शक्ति और ओज के साथ कार्य करना चाहिए। हमारा यह जीवन व्यर्थ नहीं होना चाहिए। उत्तम लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए हमें प्रयत्नशील होना चाहिए ताकि मरणोपरान्त लोग हमारे सत्कार्यों के लिए हमें याद रख सकें। ईश्वर प्रदत्त इस शरीर का जन-हित में सदुपयोग करना है, न कि यूँ ही न व्यर्थ करना है। हमारे इन उत्तम कार्यों से अन्य लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त होगी तथा वे भी अपने निजी हित से ऊपर उठाकर लोकहित के कार्यों में संलग्न होंगे। हमारा व्यक्तित्व दीपक की तरह एक सीमित क्षेत्र को आलोकित न करके एक मशाल की तरह बड़े दायरे को आलोकित करने वाला होना चाहिए। अपने प्रयासों से हम समाज में नवीन परिवर्तनों का सकारात्मक प्रकाश फैला सकते हैं।

1 (ख) : ‘जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए’ का अभिप्राय

‘जीवन निष्प्रयोजन नहीं होना चाहिए’ से अभिप्रेत है जीवन एक अवसर है अपनी अंतर्निहित शक्ति और प्रतिभा को जानने और विकसित करने का। जीवन के असंख्य आयाम है, इन सभी आयामों में महत्तम विकसित होना और श्रेष्ठ, जनोपयोगी और कल्याणकारी अस्तित्व तथा व्यक्तित्व का निर्माण करना ही जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिये।

1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या

हमारी देह ……………. फैला सकती है।

व्याख्या : हमारा शरीर एक ज्योति-पुंज की तरह है। शरीर ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम सभी कार्यों का संचालन करते हैं। व्यक्ति के द्वारा किये जा रहे उत्तम कार्यों से अन्य लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त होती है और वे भी परमार्थ में प्रवृत्त होते हैं। एक व्यक्ति के उत्तम कार्य उस तक सीमित न रहकर एक पूरे समूह तक विस्तारित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर कर पाना अधिक आसान हो जाता है। अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठे स्वर अधिक तीव्र हो जाते हैं तथा समाज में हो रहे सकारात्मक परिवर्तनों का दायरा अधिक विस्तृत हो जाता है।

उत्तर— 2

2 (क) : गद्यांश का शीर्षक

नैतिकता / नैतिकता का महत्त्व या सत्कर्म का सामाजिक प्रभाव / सत्कार्य और समाज

2 (ख) : धर्म और नैतिकता का संबंध

जब तक व्यक्ति किसी-न-किसी स्तर पर कर्म सिद्धांत को स्वीकार न कर ले, तब तक विश्व में नैतिक व्यवस्था नहीं चल सकती। कर्म सिद्धांत का सरल सा अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके नैतिक व अनैतिक कर्मों के अनुपात में अच्छा या बुरा फल मिलना अनिवार्य है। यह सिद्धांत किसी-न-किसी रूप में सभी संगठित धर्म स्वीकार करते हैं। इसीलिए सभी धर्म अपने अनुयायियों के लिये एक आचरण संहिता बनाते हैं, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों को नैतिक पथ पर चलने के लिये प्रेरित करना होता है। परोपकार, दया, करुणा, अहिंसा, ईमानदारी इत्यादि मूल्यों को धर्म व्यक्ति के जीवन में प्रवेश कराने का प्रयास करता है। इस प्रकार धर्म और नैतिकता को परस्पर पूरक माना जाता है।

2 (ग) : गद्यांश का संक्षेपण

नैतिकता उचित-अनुचित का ज्ञान कराकर सामाजिक मानदंड उपस्थित करती है। नैतिकता तर्काधारित होती है, इसलिए इनमें स्थायित्व होता है। नैतिकता दो प्रकार की होती है— एक, धर्म-पोषित ‘सामान्य’ तथा दो, विशिष्ट (आचारशास्त्र)। विशिष्ट नैतिकता कानूनी दंड के भय पर कार्य करती है, जबकि सामान्य नैतिकता पारलौकिक दंड के भय पर। विशिष्ट नैतिकता के उल्लंघन पर व्यक्ति अपराधी माना जाता है। सामान्य नैतिकता के उल्लंघन पर पापी माना जाता है। परन्तु सभी नैतिक व्यवहारों की प्रकृति धार्मिक नहीं होती।

उत्तर — 3

3 (क) : सरकारी पत्र

सरकारी पत्र - 2023

3 (ख) : कार्यालय आदेश

कार्यालय आदेश - 2023

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम

  • शब्द — विलोम
  • मसृण — रुक्ष
  • त्याज्य — अत्याज्य, ग्राह्य
  • उद्धत — अनुद्धत, सौम्य, विनीत, विनत
  • ज्ञेय — अज्ञेय
  • पाच्य — अपाच्य
  • प्रखर — मंद
  • धृष्ट — विनम्र, विनीत, नम्र
  • संघटन — विघटन
  • अभिज्ञ — अनभिज्ञ, अज्ञ
  • अनिवार्य — वैकल्पिक, निवार्य, ऐच्छिक

उत्तर— 5

5 (क) : उपसर्ग

शब्दउपसर्ग + शब्दप्रयुक्त उपसर्ग
पर्यटनपरि + अटनपरि
प्रतीक्षाप्रति + ईक्षाप्रति
अन्वेषणअनु + एषणअनु
निरूपणनि + रूपण  नि
अध्यक्षअधि + अक्षअधि

5 (ख) : प्रत्यय

शब्दशब्द + प्रत्यय प्रयुक्त प्रत्यय
वैष्णवविष्णु + अ
ग्रामीणग्राम + ईनईन
वाणिज्यवाणिज + य
गड़रियागाड़र (गाडर) + इयाइया
कौन्तेयकुन्ती + एयएय

उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द

क्र॰ सं॰वाक्यांश या पदबंधएक शब्द
(1)अनिश्चित जीविका।आकाशवृत्ति  
(2)बच्चों से लेकर बूढ़ों तक।आबालवृद्ध  
(3)चार अंगों वाली सेना।चतुरंगिणी सेना
(4)पेट की आग।जठराग्नि, जठरानल  
(5)दूसरों के दोष निकालने की जिसकी प्रवृत्ति हो।छिद्रान्वेषी

उत्तर— 7

7 (क) : वाक्य शुद्धि

(1) अशुद्ध : जीवन और साहित्य का घोर संबंध है।

शुद्ध : जीवन और साहित्य का घनिष्ठ संबंध है।

(2) अशुद्ध : इतने में हल्की सी हवा का झोंका आया।

शुद्ध : इतने में हवा का हल्का सा झोंका आया।

(3) अशुद्ध : जंगली फल और झरनों का पानी पीकर हम आगे बढ़े।

शुद्ध : जंगली फल खाकर और झरने का पानी पीकर हम आगे बढ़े।

(4) अशुद्ध : सीता ने माला गूँध ली।

शुद्ध : सीता ने माला गूँथ ली।

(5) अशुद्ध : उसने अपने पाँव से जूता निकाला।

शुद्ध : उसने पाँव से जूता निकाला।

7 (ख) : वर्तनी-शुद्ध

क्र॰ सं॰अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
 (1)वाल्मीकीवाल्मीकि
 (2)अन्ताक्षरीअन्त्याक्षरी
 (3)संग्रहीतसंगृहीत
 (4)ह्रष्ट पुष्टहृष्ट-पुष्ट 
 (5)धुरंदर धुरंधर

उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग

(1) बिल्ली के गले में घंटी बाँधना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— स्वयं को संकट में डालना
  • प्रयोग— महँगाई और बेरोजगारी से पीड़ित व्यक्ति भी बिल्ली के गले में घंटी बाँधने से कतराते हैं।

(2) कुएँ में भाँग पड़ना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— सभी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाना
  • प्रयोग— आखिर किस-किस को समझाओगे, यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी है।

(3) उड़ती चिड़िया के पंख गिनना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— अनुभवी होना/मन की बात जानना
  • प्रयोग— गुरुजी के साथ रहते हुए उनका शिष्य अब उड़ती चिड़िया के पंख गिन सकता है।

(4) बहती गंगा में हाथ धोना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— अवसर का लाभ उठाना
  • प्रयोग— अनेक अवसरवादी विधायक / सांसद सत्तारूढ़ दल में शामिल होकर बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं कतराते हैं।

(5) डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— बहुमत से अलग-थलग रहना
  • प्रयोग— समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अनेक मुद्दों पर डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना ही पसंद करते हैं।

(6) दमड़ी की हाँड़ी गई कुत्ते की जात पहचानी गई

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— थोड़ी-सी हानि उठाकर किसी भी वास्तविकता को जान लेना
  • प्रयोग— सत्तारूढ़ दल के नेताओं को अक्सर विपक्षी दल प्रलोभन देकर उनकी कमजोरियों को पहचानने के लिए हर हथकंडे अपनाकर सच्चाई उगलवा लेते हैं। सत्य कहा गया है दमड़ी की हाँड़ी गई कुत्ते की जात पहचानी गई।

(7) नाच न जाने आँगन टेढ़ा

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— अपने दोष को बहाना बनाकर टाल देना/अपनी अयोग्यता के लिए साधनों को दोष देना
  • प्रयोग— परीक्षा में जो विद्यार्थी पूरे पाठ्यक्रम का अध्ययन नहीं करते, वे प्रश्न के आने पर यह कहते हैं कि प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर है। ऐसे विद्यार्थियों को ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ वाली कहावत चरितार्थ करते हैं।

(8) थोथा चना बाजे घना

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— गुणहीनता में भी गुणी होने का ढोंग करना
  • प्रयोग— मोहन गणित विषय में बार-बार फेल होता है फिर भी अपने को गणित का विद्वान बताता रहता है। ठीक ही कहा गया है थोथा चना बाजे घना।

(9) छछूँदर के सिर में चमेली का तेल

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— अयोग्य व्यक्ति को मूल्यवान वस्तु की प्राप्ति
  • प्रयोग— चुनाव जीतने पर अनपढ़ नेताओं पर सरकारी सुख-सुविधाओं की वृद्धि होने लगती है, किन्तु यह ठीक वैसे ही है, जैसे छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल।

(10) जहाँ देखे तवा परात वहीं गुजारे सारी रात

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— जहाँ कुछ मिलने की उम्मीद होती है, वहाँ लालची व्यक्ति जरूर पहुँचते हैं
  • प्रयोग— लाला जी के बड़े लड़के के विवाह में ऐसे भी लोग शामिल हो गये, जिनको निमंत्रण नहीं दिया गया था, क्योंकि ऐसे लोगों को उम्मीद थी कि बरात में अच्छा भोजन जरूर मिलेगा। ठीक ही कहा गया है कि जहाँ देखे तवा परात वहीं गुजारे सारी रात।

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