कर्मधारय समास (समानाधिकरण तत्पुरुष)

👤 By Pinwas IAS📅 2 September 2026⏱ 1 min read
💬 Comments 0

कर्मधारय समास में एक खण्ड विशेषण अथवा उपमासूचक शब्द होता है। इसे ‘समानाधिकरण तत्पुरुष’ भी कहते हैं, क्योंकि विग्रह करने पर इसके दोनों पद एक ही कारक या विभक्ति में होते हैं। ये समास विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय की स्थिति के अनुसार बनते हैं।

दूसरे शब्दों में “जिस तत्पुरुष समास के समस्त होनेवाले पद समानाधिकरण हों, अर्थात् विशेष्य-विशेषण-भाव को प्राप्त हों, कर्त्ताकारक के हों और लिंग वचन में समान हों, वहाँ ‘कर्मधारय समास’ / ‘समानाधिकरण तत्पुरुष’ होता है।”

कर्मधारय समास

कर्मधारय समास के भेद

कर्मधारय का वर्गीकरण—

  • विशेषतावाचक कर्मधारय समास— सात भेद
    • विशेषणपूर्वपद
    • विशेषणोत्तरपद
    • विशेषणोभयपद
    • विशेष्यपूर्वपद
    • विशेष्योभयपद 
    • अव्ययपूर्वपद
    • संख्यापूर्वपद (द्विगु समास)
    • मध्यपदलोपी
  • उपमानवाचक कर्मवाचक समास— चार भेद
    • उपमानपूर्वपद
    • उपमानोत्तरपद
    • अवधारणापूर्वपद
    • अवधारणोत्तरपद

अर्थात्, इस समास में कभी पहला पद, कभी दूसरा पद और कभी दोनों पद विशेषण होते हैं या कभी पहला पद, कभी दूसरा पद और कभी दोनों पद विशेष्य।

कर्मधारय समास
कर्मधारय समास (समानाधिकरण तत्पुरुष) की सारांश तालिका
प्रकारउपप्रकारलक्षण/उदाहरण
विशेषतावाचकविशेषणपूर्वपद पहला पद विशेषण होता है; जैसे— संस्कृत: नीलकमल, परमानंद, पीतांबर, पूर्णेंदु, पूर्वकाल, महाजन, मिथ्याचार, शिष्टाचार, शुभागमन, सदाचार, सद्गुण, स्वैराचार। हिन्दी: कालापानी, कालीमिर्च, खड़ीबोली, छुटभैया, तलघर, नीलगाय, पुच्छलतारा, बड़ाघर, भलामानस, भ्रष्टाचार, मझधार, सुंदरलाल, साढ़ेतीन। उर्दू: खुशबू, जवाँमर्द, नौरोज, बदबू।
विशेषणोत्तरपद दूसरा पद विशेषण होता है; जैसे— संस्कृत: जन्मांतर, पुरुषोत्तम, नराधम, प्रभुदयाल, मुनिवर। हिन्दी: प्रभुदयाल, रामदहिन, शिवदीन।
विशेषणोभयपद दोनों पद विशेषण होते हैं; जैसे— संस्कृत: नीलपीत, मृदुमंद, शीतोष्ण, शुद्धाशुद्ध, श्यामसुन्दर। हिन्दी: कही-अनकही, खटमिट्ठा, बड़ाछोटा, भलाबुरा, मोटाताजा, लालपीला, ऊँचनीच। उर्दू: कम-बेश, नेक-बद, सुस्त-सख्त।
विशेष्यपूर्वपदपहला पद विशेष्य होता है; जैसे— धर्मबुद्धि, विंध्यपर्वत।
अव्ययपूर्वपद पहला पद अव्यय होता है; जैसे— संस्कृत: कुवेश, दुर्वचन, निराश, सुयोग। हिन्दी: अधमरा, दुकाल।
संख्यापूर्वपद (द्विगु) पहला पद संख्यावाचक होता है और समुदाय का बोध कराता है; जैसे— संस्कृत: अष्टाध्यायी, चतुष्पदी, त्रिकाल, त्रिभुवन, त्रैलोक्य, पंचवटी। हिन्दी: अठवाड़ा, चौघड़ा, चौबेला, चौमासा, चौराहा, छदाम, छमाही, तिमाही, दोपहर, दुअन्नी, दुपट्टा, पसेरी, सतनजा, सतसई। उर्दू: चहारदीवारी, शशमाही, सिमाही।
मध्यमपदलोपी बीच का पद लुप्त रहता है; जैसे— संस्कृत: गजगामिनी, घृतान्न, छायातरु, देवब्राह्मण, पर्णशाला, बिम्बोष्ठ, सिंहासन। हिन्दी: दहीबड़ा, गुड़ंबा, जेबघड़ी, गुड़धानी, तिलचावला, गोबरगणेश, चितकबरा, पनकपड़ा, गीदड़भभकी।
उपमानवाचकउपमानपूर्वपद उपमा देने वाला शब्द पहले आता है; जैसे— चंद्रमुख, घनश्याम, वज्रदेह, प्राणप्रिय।
उपमानोत्तरपद उपमा देने वाला शब्द बाद में आता है; जैसे— चरणकमल, राजर्षि, पाणिपल्लव, मुखचंद्र।
अवधारणापूर्वपद उत्तर पद का अर्थ पूर्व पद पर आधारित होता है; जैसे— कर्मबंध, गुरुदेव, धर्मसेतु, पुरुषरत्न, बुद्धिबल।
अवधारणोत्तरपद पूर्व पद का अर्थ उत्तर पद पर आधारित होता है; जैसे— साधुसमाजप्रयाग।

विशेषणपूर्वपद

इसमें पहला पद विशेषण होता है।

विशेषणपूर्वपद
(कर्मधारय समास)
विशेषणविशेष्यसमास
पीतअम्बरपीताम्बर
परमईश्वरपरमेश्वर
छोटेभैयेछुटभैये
नीलीगायनीलगाय
प्रियसखाप्रियसखा
महान्आत्मामहात्मा
दीर्घआयुदीर्घायु
महान्देवमहादेव
महान्राजामहाराज
अंधविश्वासअंध‑विश्वास
भलामानसभलामानस
नीलाकमलनीलकमल
नीलाकंठनीलकंठ
कालीमिर्चकालीमिर्च
कृष्णसर्पकृष्णसर्प

द्रष्टव्य— विशेषण के रूप में पूर्वपद अगर “कुत्सित” हो, तो उसके स्थान में “कु”; “का”; या “कद” हो जाता है। जैसे—

  • कुत्सित पुरुष = कुपुरुष या कापुरुष
  • कुत्सित अन्न = कदन्न

“कुत्सित” के स्थान में “का” या “कद” आदेश संस्कृत समासपद में ही होता है। हिन्दी के “कुघड़ी” या “कुपन्थ” जैसे सामासिक पदों का “कु” संस्कृत के इस अर्थ का नहीं है, बल्कि “बुरा” या “हीन” के अर्थ में हिन्दी का उपसर्ग है। ऐसी हालत में “कुघड़ी” या “कुपन्थ” जैसे सामासिक पद हिन्दी के विचार से “प्रादितत्पुरुष” समास के अन्तर्गत माने जायेंगे।

विशेष्यपूर्वपद

इसमें पहला पद विशेष्य होता है और इस प्रकार के सामासिक पद अधिकतर संस्कृत में मिलते हैं। जैसे—

विशेष्यपूर्वपद
(कर्मधारय समास)
विशेष्यविशेषणसमास
कुमारी (क्वाँरी लड़की)श्रमणा (संन्यास ग्रहण की हुई)कुमारश्रमणा
मुनि (मनन करनेवाला)वर (उत्तम)मुनिवर
पुरुषउत्तमपुरुषोत्तम
नरअधमनराधम
देशअंतरदेशांतर

नोट— विशेष्यपूर्वपद के कुछ शब्दों को दूसरे प्रकार से विग्रह करने पर तत्पुरुष समास हो जाता है; जैसे—

  • पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम (अधिकरणतत्पुरुष)
  • नराधम = नरों में अधम (अधिकरणतत्पुरुष)
  • कविवर = कवियों में श्रेष्ठ (अधिकरणतत्पुरुष)

विशेषणोभयपद (विशेषण + विशेषण)

इसमें दोनों पद विशेषण होते हैं; जैसे—

  • मोटा-ताज़ा
  • हृष्ट-पुष्ट
  • सीधा-सादा
  • नीललोहित
  • हरा-भरा
  • नील-पीत (नीला-पीला)
  • शीतोष्ण (ठण्डा-गरम)
  • लालपीला
  • भलाबुरा
  • दोचार
  • कृताकृत (किया-बेकिया, अर्थात् अधूरा छोड़ दिया गया)
  • सुनी-अनसुनी
  • कहनी-अनकहनी
  • ऊँचनीच
  • खचमिट्ठा
  • बड़ाछोटा
  • सख्त-सुस्त
  • नेकबद
  • कमबेश

द्रष्टव्य— विशेषणोभयपद या दोनों पद विशेषणवाले कर्मधारय के विषय में यह ध्यान रखना चाहिए कि इसके विग्रह में दोनों पदों के बीच ‘और’ जैसा संयोजक अव्यय न आये, अर्थात् दोनों पद विशेषण ही बने रहे, संज्ञा के रूप में स्पष्ट न हों—

  • मैंने जब तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा, तब तुम मुझपर नाहक ‘लाल-पीले’ क्यों हो रहे हों।
  • ‘पाँच-सात’ से मुठभेड़ हुई, तो ‘दो-चार’ मारे ही जायेंगे।

उपर्युक्त दोनों वाक्यों में ‘लाल-पीला’ का अर्थ है ‘ढंग-ढंग के तेवर बदलना या नाराज होना’, ‘पाँच-सात’ और ‘दो-चार’ के अर्थ हैं— ‘कुछ बहुत’ और ‘कुछ कम’। अतः, इन सामासिक पदों के दोनों शब्द स्पष्ट संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण ही हैं और इसलिए ये समस्तपद विशेषणोभयपद हैं।

कुछ और उदाहरण लेते हैं—

  • इस पेड़ पर बहुत-से ‘लाल-पीले’ फल है।
  • हमारे देश में ‘सौ-पचास’ के बीच वेतन पानेवाले ही अधिक है।

उपर्युक्त दोनों वाक्यों में—

  • ‘लाल-पीले’ का अर्थ है— ‘लाल और पीले फल’।
  • ‘सौ-पचास’ का अर्थ है— ‘सौ और पचास के बीच’।

अतः, यहाँ समास में आये शब्द विशेषण न होकर स्पष्ट संज्ञाएँ हैं। इन समस्त पदों की व्युत्पत्ति में दोनों समस्त शब्दों के बीच ‘और’ जैसे संयोजक अव्यय आता है। इसलिए ये समस्त पद ‘द्वन्द्वसमास’ के उदाहरण हैं, न कि ‘विशेषणोभयपद-कर्मधारय-तत्पुरुष’ के।

विशेष्योभयपद (विशेष्य + विशेष्य)

इसमें दोनों पद विशेष्य होते हैं; जैसे—

  • आमगाछ या आम्रवृक्ष
  • वायस-दम्पति

कर्मधारयतत्पुरुष समास के अन्य उपभेद हैं—

  1. उपमानकर्मधारय
  2. उपमितकर्मधारय
  3. रूपककर्मधारय

जिससे किसी की उपमा दी जाये, उसे ‘उपमान’ और जिसकी उपमा दी जाये, उसे ‘उपमेय’ कहा जाता है; जैसे— घन की तरह श्याम = घनश्याम, यहाँ ‘घन’ उपमान है और ‘श्याम’ उपमेय।

उपमानकर्मधारय (उपमान + उपमेय)

इसमें उपमानवाचक पद का उपमेयवाचक पद के साथ समास होता है। इस समास में दोनों शब्दों के बीच से ‘इव’ या ‘जैसा’ अव्यय का लोप हो जाता है और दोनों ही पद, चूँकि एक ही कर्त्ताविभक्ति, वचन और लिंग के होते है, इसीलिए समस्त पद कर्मधारय-लक्षण का होता है। उदाहरण—

  • विद्युत्-जैसी चंचला = विद्युच्चंचला
  • घन-जैसा श्याम = घनश्याम
  • चंद्रमा-जैसा मुख = चंद्रमुख
  • बिंब-जैसा मुख = बिंबोष्ठ
  • कंबु-जैसा (शंख-जैसा) ग्रीव) गला = कंबुग्रीव

उपमितकर्मधारय (उपमेय + उपमान)

यह उपमानकर्मधारय का उलटा होता है, अर्थात् इसमें उपमेय पहला पद होता है और उपमान दूसरा; जैसे—

  • अधर पल्लव के समान = अधर-पल्लव
  • नर सिंह के समान = नरसिंह
  • चरण कमल के समान = चरणकमल
  • मुख कमल के समान = मुखकमल
  • स्त्री रत्न के समान = स्त्रीरत्न
  • मुख चंद्र के समान = मुखचंद्र
  • भव (जगत्) सागर के समान = भवसागर
  • कर किसलय के समान = करकिसलय
  • पुरुष सिंह के समान = पुरुषसिंह
  • क्रोध अग्नि के समान = क्रोधाग्नि
  • विद्या धन के समान = विद्याधन
  • वदन सुधाकर के समान = वदन सुधाकर

रूपककर्मधारय

रूपककर्मधारय समास में उपमान उपमेय की तुलना न करके उपमेय को ही उपमान कर दिया जाय। दूसरे शब्दों में, जहाँ एक का दूसरे पर आरोप कर दिया जाये, वहाँ रुपककर्मधारय समास होगा।

रूपककर्मधारय समास को ही अवधारणापूर्व कर्मधारय समास कहते हैं। अवधारणापूर्व कर्मधारय समास में पहला पद (पूर्व पद) एक विचार, अमूर्त भाव या अवधारणा होता है, और दूसरा पद उसका वाचक होता है। यहाँ पहले पद को ही दूसरे पद का वास्तविक रूप मान लिया जाता है, अर्थात् पूर्वपद के अर्थ पर उत्तर पद का अर्थ अवलंबित होता है।

दोनों ही स्थितियों में उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) के बीच का भेद समाप्त करके दोनों को एक मान लिया जाता है, अर्थात् दोनों पदों के बीच ‘अभेद’ की अवधारणा होती है। काव्य शास्त्र में ‘रूपककर्मधारय समास’ और व्याकरण में ‘अवधारणापूर्व कर्मधारय समास’ कहा जाता है।

विग्रह— ज्ञानप्रकाश

  • रूपक की दृष्टि से— पहला पद + रूपी + दूसरा पद = ज्ञान रूपी प्रकाश
  • अवधारणा की दृष्टि से— पहला पद + ही है + दूसरा पद = ज्ञान ही है प्रकाश

इसे उदाहरणों से समझते हैं—

समासविग्रह
उपमितकर्मधारयरूपककर्मधारय
नरसिंहनर सिंह के समाननर ही है सिंह
अधर‑पल्लवअधर पल्लव के समानअधर ही है पल्लव
मुखचन्द्रमुख चंद्र के समानमुख ही है चन्द्र
विद्यात्नविद्या रत्न के समानविद्या ही है रत्न
भाष्याब्धिभाष्य अब्धि के समानभाष्य ही है अब्धि (समुद्र)

उपमितकर्मधारय और रुपककर्मधारय में विग्रह का यही अन्तर है।

कर्मधारय समास का संग्रह

कर्मधारयतत्पुरुष (विशेषणपूर्वपदकर्मधारय)
समास  विग्रह
अन्धकूपअन्ध (अँधेरा) कूप (कुआँ)
अन्ध-विश्वासअन्धा विश्वास
अल्पायु  अल्प आयु
उड़नतश्तरीउड़ती है जो तश्तरी
उत्तरार्ध  उत्तरवाला (बादवाला) है जो अर्ध (आधा)
उष्णोदक  उष्ण (गरम) उदक (जल)
कदन्नकुत्सित अन्न
कापुरुषकुत्सित पुरुष / कायर पुरुष
कालापानी  काला पानी
कालीमिर्चकाली मिर्च
कृष्णसर्पकाला सर्प
कृष्णांगीकृष्ण (श्याम) है जिसके अंग
खड़ी-बोलीखड़ी बोली
खुशबूखुश (प्रसन्न) करनेवाली बू (गंध/महक)
छुटभैयेछोटे भैये
जवाँमर्दजवान मर्द
तलघरतल (नीचे) घर
नवयुवकनव युवक
नववर्षनव (नया) वर्ष (साल)
नवान्ननया अन्न
नवागंतुकनव आगंतुक
नीलकमल  नीला कमल
नीलगगननीला गगन
नीलगायनीली गाय
नीलाम्बर नीला अम्बर
नीलोत्पलनीला उत्पल (कमल)
नौरोज़ (नौरोज)नौ (नया) रोज़ (दिन)
परमानन्द  परम आनन्द
परमेश्वर  परम ईश्वर
पीतपटपीत (पीला) पट (वस्त्र)
पीतसागरपीला सागर
पीताम्बर  पीत अम्बर
पुच्छलतारापुच्छल तारा
पूर्णांकपूर्ण अंक
पूर्णेंदुपूर्ण चंद्र 
पूर्वकालपूर्व काल
प्राप्तकामप्राप्त (पूर्ण) हो गयी हैं जिसकी कामनाएँ
प्रियसखाप्रिय सखा
बदबूबद (खराब) बू (महक)
बहुसंख्यकबहुत संख्या
भलामानस (भलामानुस)भला मानव
भ्रष्टाचारभ्रष्ट (दूषित) आचार (आचरण)
मंदाग्निमंद अग्नि
मंदबुद्धिमंद बुद्धि
मँझधारमध्य (मँझ) धारा
मधुरवचनमधुर वचन
महाकविमहान् कवि
महापुरुषमहान् पुरुष
महाकाव्यमहान् काव्य
महाजनमहान् (बड़ा) जन (आदमी)  
महात्मामहान् आत्मा (वाला)
महादेवमहान् देव
महाराजमहान् राजा
महाविद्यालयमहान् (बड़ा) विद्यालय
महावीरमहान् वीर
महौषदिमहान् औषधि
मिथ्याचारमिथ्या आचार
रक्त-लोचनरक्त (लाल) लोचन
वीरबालावीर बाला
शिष्टाचारशिष्ट (सभ्य) आचार (आचरण/व्यवहार)
शुभागमनशुभ है जो आगमन
श्वेतकमलश्वेत कमल
श्वेतपत्रश्वेत पत्र
श्वेताम्बरश्वेत अम्बर (वस्त्र)
सज्जनसत् जन
सत्यप्रतिज्ञसत्य है जिसकी प्रतिज्ञा
सदाचारसत् (अच्छा) आचार (आचरण)
सदाशयसत् आशय
सद्गुणसत् गुण
सद्धर्मसत् धर्म
सद्भावनासत् भावना
सद्वैद्यसत् (अच्छा) वैद्य
सन्मार्गसत् मार्ग
साढ़े-तीनसाढ़े (आधा के साथ) तीन
सुन्दरनारीसुन्दर नारी
सुन्दरलाल  सुन्दर लाल
स्वैराचारस्वैर (स्वच्छंद/मनमाना) आचार (आचरण)
हथगोलाहाथ से फेंका जाता है जो गोला
विशेष्यपूर्वपदकर्मधारय
कुमारश्रमणाकुमारी (क्वाँरी) श्रमणा (सन्यास ग्रहण की हुई)
जनकखेतिहरजनक खेतिहर (खेती करनेवाला)
दीनदयालदीन दयालु
नराधमनर अधम
पुरुषोत्तम  पुरुष उत्तम
प्रभुदयालप्रभु दयालु
मदनमनोहरमदन जो मनोहर है
मदनमोहनमदन जो मोहन है
मुनिवरमुनि वर
रामदहिनराम दहिन (अनुकूल)
शिवदीन  शिव दीन
श्यामसुन्दरश्याम जो सुन्दर है
विशेषणोभयपदकर्मधारय
कृताकृतकृत-अकृत (किया-बेकिया)
कहनी-अनकहनीकहना-न-कहना
नीलपीतनीला-पीला (दोनों मिले)
नील-लोहितनीला लाल
शीतोष्णशीत-उष्ण (दोनों मिले)
विशेष्योभयपदकर्मधारय
आम्रवृक्षआम्र है जो वृक्ष
वायसदम्पत्तिवायस है जो दम्पत्ति
उपमानकर्मधारय
कनकलताकनक की सी लता
कमलनयनकमल के समान नयन
कमलमुखकमल के समान मुख
कुसुमकोमलकुसुम के समान कोमल
घनश्यामघन-जैसा श्याम
चन्द्रमुखचन्द्रमा के समान मुख
चन्द्रोज्ज्वल   चन्द्र-जैसा उज्ज्वल
नवनीतकोमलनवनीत (मक्खन) के समान कोमल
प्राणप्रियप्राण के समान प्रिय
मृगनयनमृग के समान नयन
मृगलोचन मृग के समान लोचन
लतादेहलता के समान देह
वायुवेगवायु के समान वेग
विद्युच्चंचलाविद्युत-जैसी चंचला
विद्युद्वेगविद्युत के समान वेग
लौहपुरुषलोहे के समान पुरुष (कठोर)
शैलोन्नतशैल के समान उन्नत
उपमितकर्मधारय
अधरपल्लवअधर पल्लव के समान
करकमलकर (हाथ) कमल के समान
चरणकमल  चरण कमल के समान या कमल-रूपी चरण
नररत्ननर रत्न के समान / नरों में रत्न के समान
नरसिंह (नृसिंह)नर सिंह के समान / नरों में सिंह के समान
नरशार्दूलनर शार्दूल (सिंह) के समान / नरों में शार्दूल के समान
पद पंकजपद पंकज (कमल) के समान
पुरुषव्याघ्रपुरुष व्याघ्र के समान / पुरुषों में व्याघ्र के समान
भुजदण्डभुजा दण्ड के समान
मुखचन्द्रमुख चन्द्र के समान
वचनामृतवचन अमृत के समान (वचन रूपी अमृत)
वदनसुधाकरवदन (मुख) सुधाकर (चन्द्रमा) के समान
रूपककर्मधारय
करकमलकर ही है कमल / कर जो कमल है
ज्ञानधन ज्ञान ही है धन
पुत्ररत्नपुत्र ही है रत्न
पुरुषरत्नपुरुष ही है रत्न
भाष्याब्धिभाष्य ही है अब्धि
मानसविहंगमानस ही है विहंग
मुखचन्द्रमुख ही है चन्द्र
वदनसुधाकरवदन (मुख) ही है सुधाकर (चन्द्रमा)
विद्यारत्नविद्या ही है रत्न
स्त्रीरत्नस्त्री ही है रत्न

संबंधित लेख

Join Discussion0 Responses

Join the Discussion

Ask a doubt, add an exam-relevant point, or share a useful observation. Keep the discussion respectful and focused.

Scroll to Top