“तत्पुरुष समास में अन्तिम पद (उत्तरखंड) प्रधान होता है।” इस समास में साधारणतः प्रथम पद विशेषण और द्वितीय पद विशेष्य होता है। द्वितीय पद, अर्थात् बादवाले पद के विशेष्य होने के कारण इस समास में उसकी प्रधानता रहती है।
तत्पुरुष, कर्मधारय और द्विगु समास
तत्पुरुष, कर्मधारय और द्विगु समास के वर्गीकरण में बहुत भ्रम होता है। पदों की प्रधानता के आधार पर चार प्रकार के समास है। इस वर्गीकरण में कर्मधारय और द्विगु समास नहीं आते हैं। वस्तुतः कर्मधारय समास तत्पुरुष समास का उप-प्रकार और द्विगु समास कर्मधारय समास का उप-भेद है।
कुछ विद्वानों ने कर्मधारय और द्विगु को भी पृथक मानते हुए छः समास मानते हैं।
सबसे पहले तत्पुरुष समास के वर्गीकरण को स्पष्टरूप से समझ लेते है—
तत्पुरुष समास के भेद— इसके दो मुख्य भेद हैं—
- व्यधिकरण तत्पुरुष या तत्पुरुष समास
- समानाधिकरण तत्पुरुष या कर्मधारय समास
अधिकरण का अर्थ है— कारक चिह्नों का इतर शब्दों से सम्बन्ध। व्यधिकरण (वि + अधिकरण), अर्थात् दो शब्द भिन्न कारक चिह्नों से परस्पर सम्बद्ध हैं। समानाधिकरण (सम् + अधिकरण), अर्थात् दो शब्द समान कारक चिह्न द्वारा परस्पर सम्बद्ध हैं।
व्यधिकरण तत्पुरुष समास के विग्रह में उसके अवयवों में भिन्न-भिन्न विभक्तियाँ लगती हैं, ये विभक्तियाँ कर्त्ता और सम्बोधन को छोड़कर शेष सभी कारकों की विभक्तियाँ होती हैं। व्यधिकरण तत्पुरुष समास को ही संक्षेप में तत्पुरुष समास कहा जाता है। साथ ही विभक्तियों के आधार पर इनके पहचान के आधार पर व्यधिकरण तत्पुरुष को ‘विभक्तितत्पुरुष’ भी कहा जाता है।
जिस तत्पुरुष समास के विग्रह में दोनों पदों के साथ एक ही (कर्त्ता कारक) विभक्ति आती है, उसे ‘समानाधिकरण तत्पुरुष’ कहते हैं। समानाधिकरण तत्पुरुष को ही संक्षेप में कर्मधारय समास कहते हैं। अर्थात् जिस तत्पुरुष समास में कर्त्ताकारक की प्रथमा विभक्ति छिपी रहती है, उसे ‘समानाधिकरणतत्पुरुष’ अथवा ‘कर्मधारय समास’ कहा जाता है। कर्मधारय समास में दोनों पद परस्पर विशेषण-विशेष्य या उपमेय-उपमान होते हैं।
अगर इस कर्मधारय का पूर्वपद प्रथमा विभक्ति का संख्या वाचक शब्द है, तो उसे ‘द्विगु समास’ कहा जायेगा। अर्थात् द्विगु समास में पहला पद संख्यावाचक होता है और समस्त पद समूह का बोधक होता है।
इस तरह समानाधिकरण तत्पुरुष का प्रचलित नाम कर्मधारय समास है और यह तत्पुरुष समास का एक उपभेद है। इसी तरह द्विगु समास भी कर्मधारय समास का एक उपभेद है।
तत्पुरुष समास के भेद
तत्पुरुष (व्यधिकरणतत्पुरुष) समासों को पहले पद में लगी हुई कारक की विभक्तियों के नाम पर ही पुकारा जाता है और कारक चिह्नों के आधार पर इसके छः भेद हैं—
- कर्मकारक की विभक्ति लगने पर ‘कर्मतत्पुरुष’ (द्वितीया तत्पुरुष)
- करणकारक की विभक्ति लगने पर ‘करणतत्पुरुष’ (तृतीया तत्पुरुष)
- सम्प्रदानकारक की विभक्ति लगने पर ‘सम्प्रदानतत्पुरुष’ (चतुर्थी तत्पुरुष)
- अपादानकारक की विभक्ति लगने पर ‘अपादानतत्पुरुष’ (पंचमी तत्पुरुष)
- सम्बन्धकारक की विभक्ति लगने पर ‘सम्बन्ध-तत्पुरुष’ (षष्ठी तत्पुरुष)
- अधिकरणकारक की विभक्ति लगने पर ‘अधिकरणतत्पुरुष’ (सप्तमी तत्पुरुष)
कर्त्ता (प्रथमा विभक्ति) और संबोधन (अष्टमी विभक्ति) को छोड़ शेष छह कारकों की विभक्तियों के अर्थ में तत्पुरुष समास होता है। अर्थात् यहाँ ध्यान देनेवाली बात है कि इसमें कर्त्ता-कारक और सम्बोधन को छोड़कर शेष छह कारक शामिल हैं।
तत्पुरुष समास में बहुधा दोनों पद संज्ञा या पहला पद संज्ञा और दूसरा विशेषण होता है। ‘द्वितीयातत्पुरुष’, ‘तृतीयातत्पुरुष’, ‘चतुर्थीतत्पुरुष इत्यादि संस्कृत में ही कहे जाते हैं। हिन्दी में ‘कर्मतत्पुरुष’, ‘करणतत्पुरुष’ आदि ही कहने को परिपाटी है, क्योंकि हिन्दी में कारक की विभक्तियों को प्रथमा, द्वितीया, तृतीया आदि नहीं कहा जाता। इसे ‘विभक्तितत्पुरुष’ भी कहा जाता है।
वैयाकरणों ने तत्पुरुष समास के चार और प्रकार बताये हैं—
- अलुक् तत्पुरुष
- उपपद तत्पुरुष
- नञ् तत्पुरुष
- प्रादि तत्पुरुष
चारों का संदर्भ संस्कृत में है।
इस तरह तत्पुरुष समास का क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

तत्पुरुष (व्यधिकरणतत्पुरुष)
तत्पुरुष (व्यधिकरणतत्पुरुष) अर्थात् तत् (उस) का पुरुष। इसमें ‘का’ (कारक चिह्न) का लोप हुआ। इसी प्रकार ‘हवनसामग्री’ का अर्थ है— हवन के लिए सामग्री। इसमें (हवनसामग्री) ‘के लिए’ (कारक चिह्न) का लोप हुआ। “तत्पुरुष समास में अन्तिम पद (उत्तरखंड) प्रधान होता है।” इस समास में साधारणतः प्रथम पद विशेषण और द्वितीय पद विशेष्य होता है। द्वितीय पद, अर्थात् बादवाले पद के विशेष्य होने के कारण इस समास में उसकी प्रधानता रहती है।
“उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः”
दो उदाहरण लेते है— राजपुरुष व हवनसामग्री। व्याकरण में अर्थात् वाक्य के अंतर्गत उत्तरखंड (पुरुष या सामग्री) के ही रूप बदलेंगे, पूर्वखंड के नहीं; जैसे— राजपुरुषों ने, हवनसामग्री से। इसका कारण यह है कि पूर्वखंड तो मात्र विशेषण का कार्य करता है, जबकि उत्तरपद विशेष्य का और प्रधानता उत्तरखंड की रहती है। राजपुरुषों और हवनसामग्री में पूर्वखंड (राज और हवन) विशेषण की तरह और उत्तरखंड (पुरुष और सामग्री) विशेष्य की तरह व्यवहार कर रहा है।
एक और उदाहरण लेते हैं— पर्णकुटी = पर्ण की कुटी; यहाँ पहला पद ‘पर्ण’ उत्तर पद ‘कुटी’ की विशेषता बताता है, अर्थात् उत्तर पद प्रधान है।
इस तरह तत्पुरुष समास के अधोलिखित लक्षण हैं—
- अन्तिम पद (उत्तरखंड) प्रधान होता है।
- पूर्व पद विशेषण का कार्य करता है।
- उत्तर पद विशेष्य का कार्य करता है।
- व्याकरण अर्थात् वाक्य में उत्तर पद में बदलाव होता है, न कि पूर्व पद में।

कारक चिह्न के आधार पर भेद
कर्मतत्पुरुष (द्वितीया तत्पुरुष)
कर्मतत्पुरुष समास में ‘को’ कारक चिह्न का लोप होता है; जैसे—
- आशातीत — आशा को अतीत (लाँधकर गया हुआ)
- कठफोड़ा — काठ फोड़नेवाला
- कष्टापन्न — कष्ट को आपन्न (प्राप्त)
- गगनचुम्बी — गगन को छूनेवाली
- गिरहकट — गिरह (जेब) काटनेवाला
- गृहागत — गृह को आगत।
- घरफूँक — घर को फूँकना
- चिड़ीमार — चिड़िया को मारनेवाला
- चित्तचोर — चित्त को चुरानेवाला
- परलोकगमन — परलोक को जाना
- मनोहर — मन को हरनेवाला
- मुँहतोड़ — मुँह को तोड़नेवाला
- शरणागत — शरण लेने को आया हुआ
- सुखप्रद — सुख को देने वाला
- स्वर्गप्राप्त — स्वर्ग को प्राप्त
करणतत्पुरुष (तृतीय तत्पुरुष)
करणतत्पुरुष समास में ‘से’ या ‘के द्वारा’ कारक चिह्न का लोप होता है; जैसे—
- अकालपीड़ित — अकाल से पीड़ित
- आँखोदेखा — आँखों से देखा
- आचारकुशल — आचार से कुशल
- ईश्वरदत्त — ईश्वर द्वारा दिया हुआ
- ईश्वरप्रदत्त — ईश्वर से प्रदत्त
- कपड़छना — कपड़े से छना हुआ
- कष्टसाध्य — कष्ट (कठिनाई) से साध्य (किया हुआ)
- गुणयुक्त — गुणों से युक्त
- तुलसीकृत — तुलसी द्वारा कृत, तुलसी से कृत (रचित या बनाया हुआ)
- नीतियुक्त — नीति से युक्त
- पदयात्रा — पद से यात्रा
- प्रकृतिदत्त — प्रकृति द्वारा दत्त (प्रदत्त)
- प्रेतभीत — प्रेत से भीत (डरा हुआ)
- भयभीत — भय से भीत (डरा हुआ)
- भुखमरा — भूख से मरनेवाला
- मदमाता — मद से माता
- मदांध — मद से अंधा
- मनमाना — मन से माना
- मुँहमाँगा — मुँह से माँगा
- रोगग्रस्त — रोग से ग्रस्त
- वज्राहत — वज्र से आहत
- वाग्युद्ध — वाक् से युद्ध
- वृकभीत— वृक (भेड़िये) से भीत (डर)
- व्याघ्रभीत— व्याघ्र से भीत (डरा हुआ)
- शराहत — शर से आहत
- शिरोधार्य — शिर (सम्मान) से धारण करना
- शोकाकुल — शोक से आकुल
- सर्पभीत— सर्प से भीत (डरा हुआ)
सम्प्रदान
सम्प्रदान तत्पुरुष समास में ‘के लिए’ कारक चिह्न का लोप होता है; जैसे—
- आरामकुर्सी — आराम के लिए कुर्सी
- कन्याविद्यालय — कन्याओं के लिए विद्यालय
- कृष्णार्पण — कृष्ण के लिए अर्पण
- दानधन — दान के लिए धन
- देवबलि — देवों के लिए बलि
- देशभक्ति — देश के लिए भक्ति
- पशुशाला — पशुओं के लिए शाला (गृह)
- बलिपशु — बलि के लिए पशु
- भंडारघर — भंडार के लिए घर
- भूतबलि — भूतों के लिए बलि
- महँगाईभत्ता — महँगाई के लिए भत्ता
- मार्गव्यय — मार्ग के लिए भत्ता
- रसोईघर — रसोई के लिए घर
- राहखर्च — राह के लिए खर्च
- विद्यालय — विद्या के लिए आलय
- हथकड़ी — हाथ के लिए कड़ी
- हवनकुंड — हवन के लिए कुंड
अपादान
अपादान तत्पुरुष समास में कारक चिह्न ‘से’ (अलगाव के अर्थ में) का लोप होता है; जैसे—
- ऋणमुक्त — ऋण से मुक्त
- कामचोर — काम से जी चुरानेवाला।
- गुणहीन — गुण से हीन
- जन्मांध — जन्म से अन्ध (अंधा)
- जातिच्युत — जाति से च्युत
- दूरागत — दूर से आगत
- देशनिकाला — देश से निकाला
- धनरहित — धन से रहित
- धर्मभ्रष्ट — धर्म से भ्रष्ट
- धर्मविमुख — धर्म से विमुख
- पदच्युत — पद से च्युत
- बंधनमुक्त — बंधन से मुक्त
- बहिरागत — बाहर से आगत
- रणविमुख — रण से विमुख
- विद्याहीन — विद्या से हीन
सम्बन्ध
सम्बन्ध तत्पुरुष में कारक चिह्न ‘का’, ‘के’, ‘की’ का लोप होता है; जैसे—
- अनारदाना — अनार का दाना
- ऋषिकन्या — ऋषि की कन्या
- करुणासागर — करुणा के सागर
- करोड़पति — करोड़ (रूपये) का पति (स्वामी)
- गंगाजल — गंगा का जल
- गृहस्वामी — गृह का स्वामी
- ग्रंथकार — ग्रंथ का कार (करनेवाला)
- ग्रामवासी — ग्राम का वासी
- घुड़दौड़ — घोड़ों का दौड़
- घुड़साल — घोड़ों की साल (शाला)
- जलधारा — जल की धारा
- दयानिधि — दया के निधि
- दीनानाथ — दीनों के नाथ
- नरेश — नरों का ईश
- पतितपावन — पतितों का पावन करनेवाला
- पराधीन — पर के अधीन
- भक्तवत्सल — भक्त का वत्सल
- माधव — मा (लक्ष्मी) का धव (पति)
- राजदरबार — राजा का दरबार
- रामनाम — राम का नाम
- राष्ट्रपति — राष्ट्र का पति
- लखपति — लाख (रूपये) का पति (स्वामी)
- विभाध्यक्ष — विभाग का अध्यक्ष
- विद्याभ्यास — विद्या का अभ्यास
- सिरदर्द — सिर का दर्द
- सेनापति — सेना का पति
अधिकरण
अधिकरण तत्पुरुष समास में कारक चिह्न ‘में’, ‘पर’ का लोप का लोप होता है; जैसे—
- आपबीती — आप (स्वयं/खुद) पर बीती
- कानाफूसी — कान में फुस-फुस करना
- कविपुंगव — कवियों में पुगंव (श्रेष्ठ)
- गंगास्नान — गंगा में स्नान
- गृहप्रवेश — गृह में प्रवेश
- गृहागत — गृह में आगत
- जलमग्न — जल में मग्न
- प्रेममग्र — प्रेम में मग्न
- मनमौजी — मन में मौजी
- रणकुशल — रण में कुशल
- वनवास — वन में वास
- वीरश्रेष्ठ — वीरों में श्रेष्ठ
- विद्याप्रवीण — विद्या में प्रवीण
- शरणागत — शरण में आगत
- शास्त्रनिपुण — शास्त्र में निपुण
- सभापण्डित — सभा में पण्डित
- सर्वोत्तम — सर्व में उत्तम
- सिंहासनारूढ़ — सिंहासन पर आरूढ़
- स्नेहमग्न — स्नेह में मग्न
- हरफनमौला — हर फन में मौला (हर हुनर का जानकार)
- हृदयस्थ — हृदय में स्थित (रहनेवाला)
तत्पुरुष समास : पहचान की द्विविधा
नोट— तत्पुरुष समास के उदाहरणों में विभक्तियों के सम्बन्ध में मतभेद होने की सम्भावना है, पर वह विशेष महत्त्व का नहीं है। जब तक इस विषय में संदेह है कि ऊपर के सब उदाहरण तत्पुरुष के हैं, तब तक यह बात अप्रधान है कि कोई एक तत्पुरुष, इस कारक का है या उस कारक का। कोई एक तत्पुरुष समास किस कारक का है, इसका निर्णय उस समास के योग्य विग्रह पर अवलंबित है; उदाहरण—
| समस्त पद | विग्रह | समास प्रकार |
|---|---|---|
| वचनचातुरी | वचन (वाणी) में चातुरी (चतुराई) | अधिकरण तत्पुरुष |
| वचन की चातुरी | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| रसोईघर | रसोई के लिए घर | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| रसोई का घर | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| पनचक्की | पानी से चलनेवाली चक्की | करण तत्पुरुष |
| पानी की चक्की | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| कूपमंडूक | कूप में रहनेवाला मंडूक (मेंढक) | अधिकरण तत्पुरुष |
| कूप का मंडूक (मेंढक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
अन्य भेद
अलुक् तत्पुरुष
जिस समास में पहले पद के बाद कारक चिह्न किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहता है अर्थात् इसमें विभक्ति चिह्न का लोप नहीं हुआ हो उसे अलुक् तत्पुरुष समास कहते हैं, जैसे—
- युधिष्ठिर— युधि + स्थिर, विग्रह – युद्ध में स्थिर रहनेवाला, यहाँ ‘युधि’ (अर्थ – ‘युद्ध में’) में संस्कृत की सप्तमी विभक्ति लगी है, जो समास बनने के बाद भी नहीं हटी है, इसलिए अलुक् तत्पुरुष समास है।
- खेचर— खे + चर, विग्रह – आकाश में विचरने वाला (पक्षी), यहाँ ‘खे’ (अर्थ – ‘आकाश में’) में संस्कृत की सप्तमी विभक्ति लगी है, जो समास बनने के बाद भी नहीं हटी है, इसलिए अलुक् तत्पुरुष समास है।
- मनसिज— मनसि + ज, विग्रह – मन में जन्म लेने वाला (कामदेव), ‘मनसि’ (अर्थ – ‘मन में’) में संस्कृत की सप्तमी विभक्ति लगी है, जो समास बनने के बाद भी नहीं हटी है, इसलिए अलुक् तत्पुरुष समास है।
- आत्मनेपद— आत्मने + पद, विग्रह – अपने लिए (पद), ‘आत्मने’ (अर्थ – ‘अपने लिए’) में संस्कृत की चतुर्थ विभक्ति लगी है, जो समास बनने के बाद भी नहीं हटी है, इसलिए अलुक् तत्पुरुष समास है।
- परस्मैपद— परस्मै + पद, विग्रह – दूसरे के लिए (पद), ‘परस्मै’ (अर्थ – ‘दूसरे के लिए’) में संस्कृत की चतुर्थ विभक्ति लगी है, जो समास बनने के बाद भी नहीं हटी है, इसलिए अलुक् तत्पुरुष समास है।
अलुक् तत्पुरुष समास के उदाहरण— आत्मनेपद, आत्मनेभाषा, परस्मैपद, परस्मैभाषा, मृत्यंजय, युधिष्ठिर, गविष्ठिर, मनसिज, निशिचर, धनंजय, ऊटपटांग, बृहस्पति, देवानांप्रिय, मातृष्वसा, पितृष्वसा, दिविज, कालेज, शरदिज, प्रवृषिज आदि।
| अलुक् तत्पुरुष | |
|---|---|
| समास | विग्रह |
| आत्मनेपद | आत्मने पद |
| परस्मैपद | परस्मै पद |
| मृत्युंजय = मृत्युम् + जय | मृत्यु को जीतनेवाला |
| युधिष्ठिर = युधि + स्थिर | युद्ध में स्थिर रहनेवाला |
| खेचर | आकाश (ख) में घूमनेवाला (चर) |
| गविष्ठिर | गवि में स्थिर |
| मनसिज | मन में उत्पन्न या जन्म लेनेवाला (कामदेव) |
| निशिचर | रात्रि में विचरण करनेवाला |
| धनंजय | धन को जीतनेवाला |
| ऊटपटांग | ऊट पर टाँग (बेतुका) |
| बृहस्पति = बृहत् + पति | बृहत् है जो पति (गुरु) |
| देवानांप्रिय = देवानाम् + प्रिय | देवताओं का प्रिय |
| मातृष्वसा = मातृ + स्वसा | मातृ (माँ) की स्वसा (बहन), अर्थात् मौसी |
| पितृष्वसा | पितृ (पिता) की स्वसा (बहन), अर्थात् बुआ |
| दिविज = दिवि + ज | दिवि (स्वर्ग/आकाश) में होनेवाला |
| कालेज | काल (समय) पर होनेवाला |
| शरदिज | शरद में होनेवाला |
| प्रवृषिज | प्रवृषि (बरसात) में होनेवाला |
| वाचस्पति | वाणी का पति |
| विश्वंभर | विश्व को भरनेवाला |
| सहसा-कृत | एकदम (सहसा) से किया (कृत) |
उपपद तत्पुरुष
उपपद तत्पुरुष समास में उत्तरखंड ऐसा ‘कृदंत’ है जो स्वयं में सार्थक तो हैं, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है वरन् प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद बनता है। अर्थात् उपपद तत्पुरुष समास में—
- उत्तरखंड कृदंत होता है।
- सार्थक शब्द होता है।
- स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है।
उपपद तत्पुरुष समास का उत्तरखंड निम्न में से हो सकता है— ‘-अक’, ‘-कर’ ‘-कार’, ‘-घ्न’, ‘-ग’, ‘-चर’, ‘-ज’ ‘-ज्ञ’, ‘-द’, ‘-दायी’, ‘-प’ ‘-प्रद’, ‘-स्थ’ आदि।
- -अक से— गायक, लेखक, धावक
- -कर से— भास्कर, दिनकर, कलेशकर, कष्टकर, शंकर, हितकर, हिमकर
- -कार से— कुंभकार, ग्रंथकार, चर्मकार, स्वर्णकार, कर्मकार
- -ग से— उरग, विहग
- -घ्न से— कृतघ्न, शत्रुघ्न
- -चर से— अंतरिक्षचर, खेचर, गगनचर, गुप्तचर, जलचर, थलचर, दिनचर, दिवाचर, नभचर, निशाचर, निशिचर, परिचर, बालचर, भिक्षाचर, वनचर
- -ज से— अंडज, अंत्यज, अंबुज, अंहुज, अग्रज, अनुज, अब्ज, उद्भिज, कुलज, क्षत्रियज, जलज, जारज, द्विज, धर्मज, पंकज, पिण्डज, पित्तज, पूर्वज, मलयज, वंशज, वारिज, स्वेदज।
- -ज्ञ से— अभिज्ञ, कृतज्ञ, दुःखज्ञ, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, मर्मज्ञ, राजनीतिज्ञ, विज्ञ, विशेषज्ञ, वेदज्ञ, शास्त्रज्ञ, सर्वज्ञ, सुखज्ञ
- -द से— जलद, दुःखद, सुखद, धनद
- -प से— गोप, नृप
- -प्रद से— कष्टप्रद, लाभप्रद, शांतिप्रद
- -दायी से— सुखदायी, फलदायी
- -स्थ से— अंकस्थ, तटस्थ, प्रकृतिस्थ
| उपपद तत्पुरुष | |
|---|---|
| समास | विग्रह |
| अंडज | अंडे से जन्म लेनेवाला |
| अंत्यज | अंत्य (अंतिम वर्ग) में जन्म लेनेवाला |
| उरग | पेट (उर) के बल चलनेवाला |
| जलचर | जल में विचरण करनेवाला |
| नभचर | नभ में विचरण करनेवाला |
| निशाचर | निशा में विचरण करनेवाला |
| भास्कर | भास (प्रकाश) करनेवाला |
| दिनकर | दिन करनेवाला |
| क्लेशकर | क्लेश करनेवाला |
| स्वर्णकार | स्वर्ण का काम करनेवाला |
| जलद | जल देनेवाला (बादल) |
| कष्टप्रद | कष्ट प्रदान करनेवाला |
| लेखक | लेखन कार्य करनेवाला |
| राजनीतिज्ञ | राजनीति जाननेवाला |
| मर्मज्ञ | मर्म (रहस्य/गूढ़) को ज्ञ (जाननेवाला) |
| कृतज्ञ | कृत (उपकार) को ज्ञ (जाननेवाला/माननेवाला) |
| कृतघ्न | कृत (उपकार) को नष्ट करनेवाला |
| शत्रुघ्न | शत्रु को नष्ट करनेवाला |
| सुखदायी | सुख को देनेवाला |
| नृप | मनुष्यों (नृ) की रक्षा करनेवाला |
| गोप | गो (गाय) की रक्षा करनेवाला |
| विहग | विह (आकाश) गमन (ग) |
नोट— पं० कामता प्रसाद गुरु के अनुसार “जलधर, पापाहर, जलचर आदि उपपद समास नहीं हैं, क्योंकि इनमें धर, चर और हर कृदंत हैं और इनका प्रयोग अन्यत्र स्वतंत्रतापुर्वक होता है। ये केवल तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।”
हिंदी उपपद समास के उदाहरण— लकड़फोड़, तिलचट्टा, कनकटा (कान काटनेवाला), मुँहचीरा, बटमार, चिड़ीमार, पनडुब्बी, घरघुसा, घुड़चढ़ा।
उर्दू उपपद समास के उदाहरण— गरीबनिवाज (दीनपालक), कलमतराश (कलम काटनेवाला, चाकू), चोपदार (दंडधारी), सौदागर।
नोट— हिंदी में स्वतंत्र कर्म-तत्पुरुषों की संख्या अधिक न होने के कारण बहुधा उपपद समास को इन्हीं के अंतर्गत मानते हैं।
नञ् तत्पुरुष
इसमें पहला खंड नकारात्मक (‘न-’, ‘अ-’ या ‘अन्-’ उपसर्ग) अर्थात् अभाव या निषेध के अर्थ में होता है; जैसे—
- संस्कृत— अज्ञात (न ज्ञात), अधर्म (न धर्म), अनन्त (न अन्त), अनर्थ (न अर्थ), अनाचार (न आचार), अनाथ, अन्याय (न न्याय), अनन्त, अनश्व (न अश्व), अनागत (न आगत), अनादि, अनाश्रित, अनिष्ट (न इष्ट), अनीश्वर (न ईश्वर), अनुदार, अनुपकार (न उपकार), अपूर्ण, अभाव, अमोघ (न मोघ/निष्फल या व्यर्थ), अयोग्य (न योग्य), अलौकिक, अवृथा (न वृथा), असभ्य, असम्भव, असुन्दर, असिद्ध (न सिद्ध), अस्वस्थ (न स्वस्थ), अहित, नक्षत्र (न क्षर) नास्तिक (न आस्तिक), नास्तिक, निर्बल, निर्दोष, आदि।
- हिन्दी— अकाज, अछूता, अटूट, अनबन, अनचाहा, अधूरा, अनजाना, अनगढ़ा, अनपढ़, अनरीत, अलग, अनहोनी आदि।
- उर्दू— नापसंद, नालायक, नाबालिग, गैरहाजिर, गैरवाजिब आदि।
निषेध (अ-) के अर्थ प्रयोग के अनुसार होते है—
- भिन्नता के अर्थ में— अब्राह्मण अर्थात् ब्राह्मण से भिन्न कोई वर्ण; जैसे— क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र।
- अभाव के अर्थ में— अज्ञान अर्थात् ज्ञान का अभाव।
- अयोग्यता के अर्थ में— अकाल अर्थात् अनुचित काल।
- विरोध के अर्थ में— अनीति अर्थात् नीति का उलटा।
प्रादि तत्पुरुष
जिस तत्पुरुष समास के पहले स्थान पर उपसर्ग आता है, उसे संस्कृत व्याकरण में प्रादि तत्पुरुष समास कहते हैं। इसमें अपि, प्रति, उप आदि पहले खंड में होते हैं; जैसे— अतिक्रम, अतिवृष्टि, आकाश, उपदेव, दुर्गुण, प्रगति, प्रतिध्वनि, प्रतिबिंब, प्रत्यागमन, प्रदेश, व्याकुल, सुश्रुत आदि।
नोट— ‘ई’ के योग से बने हुए संस्कृत समास भी एक प्रकार से तत्पुरुष समास हैं; जैसे— वशीकरण, फलीभूत, स्पष्टीकरण, शुचीभाव आदि।
तत्पुरुष समास के इन सभी प्रकारों की सामान्य विशेषताएँ अधोलिखित हैं—
- यह समास दो पदों के बीच होता है।
- इसके समस्त पद का लिंग उत्तरपद के अनुसार है।
- इस समास में उत्तरपद का ही अर्थ प्रधान होता है।
तत्पुरुष समास का संग्रह
| तत्पुरुष (कर्मतत्पुरुष) | |
| समास | विग्रह |
| अर्थपिपासु | अर्थ (धन) को पाने की इच्छा रखनेवाला |
| आत्मविस्मृत | आत्म (स्वयं) को विस्मृत |
| आदर्शोन्मुख | आदर्श को उन्मुख |
| आशातीत | आशा को अतीत (लाँधकर गया हुआ) |
| कठखोदवा | काठ को खोदनेवाला |
| कठफोड़वा | काठ को फोड़नेवाला |
| कमरतोड़ | कमर को तोड़नेवाला |
| कष्टश्रित | कष्ट को प्राप्त |
| कष्टापन्न | कष्ट को आपन्न (प्राप्त) |
| कार्यकर्त्ता | कार्य को करनेवाला |
| कुसुमागम | कुसुमों का आगम |
| कृष्णश्रित | कृष्ण को प्राप्त |
| गँठकटा | गाँठ को काटनेवाला |
| गगनचुम्बी | गगन को चूमनेवाला |
| गिरहकट | गिरह को काटनेवाला |
| गृहागत | गृह को आगत |
| ग्रन्थकर्त्ता | ग्रन्थ को करनेवाला |
| घरफूँक | घर को फूँकना |
| चिड़ीमार | चिड़ियों को मारनेवाला |
| चितचोर | चित को चुरानेवाला |
| चूहेमार | चूहे को मारनेवाला |
| जलदागम | जलद का आगम / बादलों का आगमन |
| जलपिपासु | जल को पीने की इच्छा रखनेवाला |
| जीवनप्राप्त | जीवन को प्राप्त |
| जेबकतरा | जेब को कतरनेवाला |
| तेलचट्टा | तेल को चाटनेवाला |
| तिलकुट | तिल को कूटकर बनाया हुआ |
| दुःखद | दुःख को देनेवाला |
| दुःखातीत | दुःख को पार कर गया हुआ |
| देशगत | देश को गया हुआ |
| देशागत | देश को आगत |
| धनागम | धन का आगम / धन की प्राप्ति |
| धनापन्न | धन को आपन्न (प्राप्त) |
| नरभक्षी | मनुष्यों (नरों) को खानेवाला (भक्षी) |
| परलोकगमन | परलोक को जाना |
| पाकिटमार | पाकिट को मारनेवाला |
| पुष्पागम | पुष्पों का आगम |
| भक्तवत्सल | भक्त का वत्सल |
| माखनचोर | माखन को चुरानेवाला |
| मनोहर | मन को हरनेवाला |
| मरणासन्न | मरण को आसन्न (निकट) |
| मुँहतोड़ | मुँह को तोड़नेवाला |
| मेघागम | मेघों का आगम / बादलों का आगमन |
| मेधागम | मेधा का आगम / बुद्धि या प्रज्ञा की प्राप्ति |
| मोक्षप्राप्त | मोक्ष को प्राप्त |
| योगागम | योग का आगम / योग की प्राप्ति |
| रक्तपिपासु | रक्त को पीने की इच्छा रखनेवाला |
| रामनाम | राम का नाम |
| रोजगारोन्मुख | रोजगार को उन्मुख |
| वर्णागम | वर्ण (रंग) का आगम (प्रकट होना) |
| वर्षागम | वर्षा का आगम (आगमन) |
| वित्तागम | वित्त (धन) का आगम |
| विदेशगमन | विदेश को गमन |
| विद्यागम | विद्या का आगम / विद्या की प्राप्ति |
| विरोधजनक | विरोध को जन्म देनेवाला |
| व्यक्तिगत | व्यक्ति को गत (प्राप्त) हुआ |
| शक्तिदायक | शक्ति को देनेवाला |
| सद्गति | सत् (उत्तम लोक) को प्राप्त |
| सुखप्रद | सुख को देने वाला |
| सुखप्राप्त | सुख को प्राप्त |
| सुखापन्न | सुख को आपन्न (प्राप्त) |
| स्वर्गगत | स्वर्ग को गत (गया हुआ) |
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त |
| हिमागम | हिम का आगम / शीत-ऋतु का आगमन |
| तत्पुरुष (करणतत्पुरुष) | |
| अकालपीड़ित | अकाल से पीड़ित |
| अधिकारोन्मत्त | अधिकार से उन्मत्त |
| अभावग्रस्त | अभाव से ग्रस्त |
| अश्रुपूर्ण | अश्रु से पूर्ण |
| आँखोदेखा | आँखों से देखा |
| आचारकुशल | आचार से कुशल |
| ईश्वरदत्त | ईश्वर द्वारा दिया हुआ |
| कपड़छन | कपड़ा से छना |
| कपड़छना | कपड़ा से छना हुआ |
| करुणापूर्ण | करुणा से पूर्ण |
| आश्चर्यचकित | आश्चर्य से चकित |
| कष्टसाध्य | कष्ट (कठिनाई) से साध्य (किया हुआ) |
| कामचोर | काम से चोर |
| कृषिजीवी | कृषि से जीनेवाला |
| क्षुधापीड़ित | क्षुधा से पीड़ित |
| गुणभरा | गुण से भरा |
| गुणयुक्त | गुणों से युक्त |
| जलजीवी | जल से जीनेवाला |
| जलपूर्ण | जल से पूर्ण |
| जलावृत | जल से आवृत |
| जलासिक्त | जल से सिक्त |
| तारोंभरी | तारों से भरी |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत |
| दईमारा | दई (भाग्य) से मारा |
| दण्डपीड़ित | दण्ड से पीड़ित |
| दयार्द्र | दया से आर्द्र |
| दस्तकारी | दस्त (हाथ) से कार्य |
| दानार्थ | दान से प्रयोजन (अर्थ) |
| दुःखसन्तप्त | दुःख से सन्तप्त |
| दुःखार्त | दुःख से आर्त |
| देहचोर | देह से चोर |
| दोषपूर्ण | दोष से पूर्ण |
| धनजीवी | धन से जीनेवाला |
| धर्मरक्षित | धर्म से रक्षित |
| धान्यार्थ | धान्य (अन्न) से अर्थ (प्रयोजन/मतलब) |
| नीतियुक्त | नीति से युक्त |
| पंतप्रणीत | पंत द्वारा प्रणीत (रचित) |
| पददलित | पद से दलित |
| पदयात्रा | पद से यात्रा |
| परजीवी | पर (दूसरे) से जीनेवाला |
| प्रकाशयुक्त | प्रकाश से युक्त |
| प्रेतभीत | प्रेत से भीत (डर) |
| प्यादामात | प्यादा से मात |
| प्रेमासिक्त | प्रेम से सिक्त |
| बन्धनयुक्त | बन्धन से युक्त |
| बाणवेध | बाण से वेधा हुआ |
| बाणाहत | बाण से आहत |
| बिहारीरचित | बिहारी द्वारा रचित |
| बुद्धिजीवी | बुद्धि से जीनेवाला / बुद्धि से जीविका चलानेवाला |
| भक्तिवश | भक्ति द्वारा वश |
| भयभीत | भय से भीत (डरा हुआ) |
| भयाकुल | भय से आकुल |
| भावपूर्ण | भाव से पूर्ण |
| भावाभिभूत | भाव से अभिभूत |
| भुखमरा | भूख से मरनेवाला |
| मदान्ध | मद से अन्ध |
| मदमाता | मद से माता |
| मनगढ़ंत | मन से गढ़ा हुआ |
| मनचाहा | मन से चाहा |
| मनमाना | मन से माना |
| मसिजीवी | मसि (स्याही) से जीनेवाला / कलम से जीनेवाला |
| महिमामंडित | महिमा से मंडित |
| मुँहचोर | मुँह से चोर |
| मासपूर्व | मास से पूर्व |
| मुँहमाँगा | मुँह से माँगा |
| मेघाच्छन्न | मेघ से आच्छन्न |
| युद्धपीड़ित | युद्ध से पीड़ित |
| रत्नजड़ित | रत्न से जड़ा हुआ |
| रसभरा | रस से भरा |
| रससिक्त | रस से सिक्त |
| रेखांकित | रेखा से अंकित |
| रोगपीड़ित | रोग से पीड़ित |
| रोगग्रस्त | रोग से ग्रस्त |
| लताच्छादित | लता से आच्छादित |
| वचनबद्ध | वचन से बद्ध (बँधा हुआ) |
| वज्राहत | वज्र से आहत |
| वाग्युद्ध | वाक् से युद्ध |
| व्याधिग्रस्त | व्याधि से ग्रस्त |
| व्यासकृत | व्यास द्वारा कृत |
| शंकुलाखंड | शंकुल (सरौते) से खंड किया |
| शराहत | शर से आहत |
| शरविद्ध | शर (बाण) से विद्ध |
| शास्त्रसंगत | शास्त्र से संगत |
| शिरोधार्य | शिर (सम्मान) से धारण करना |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त |
| शोकाकुल | शोक से आकुल |
| शोकार्त | शोक से आर्त |
| श्रमजीवी | श्रम से जीनेवाला |
| सुराजीवी | सुरा से जीनेवाला |
| सूरकृत | सूरदास द्वारा कृत |
| स्वार्थांध | स्वार्थ में अंधा |
| हस्तदान | हाथ से दान |
| हस्तादान | हाथ से ग्रहण (आदान) |
| हस्तलिखित | हस्त से लिखित |
| हैदराबाद | हैदर (सिंह) से आबाद |
| तत्पुरुष (सम्प्रदानतत्पुरुष) | |
| आरामकुर्सी | आराम के लिए कुर्सी |
| आवेदन-पत्र | आवेदन के लिए पत्र |
| कमरबन्द | कमर के लिए बन्द |
| काकबलि | काक के लिए बलि |
| कारवाँसराय | कारवाँ के लिए सराय |
| क्रीड़ाक्षेत्र | क्रीड़ा के लिए क्षेत्र |
| कुष्ठाश्रम | कुष्ठों (कुष्ठ रोगियों) के लिए आश्रम |
| कृषि-भवन | कृषि (संबंधित मामलों) के लिए भवन |
| कृष्णार्पण | कृष्ण के लिए अर्पण |
| गुरुदक्षिणा | गुरु के लिए दक्षिणा |
| गृहस्थाश्रम | गृहस्थ के लिए आश्रम |
| गोशाला | गो के लिए शाला |
| घरखर्च | घर के लिए खर्च |
| घुड़साल | घोड़ों के लिए साल |
| ठकुरसुहाती | ठाकुर (स्वामी) के लिए सुहाती (रुचिकर) |
| डाकगाड़ी | डाक के लिए गाड़ी |
| डाकमहसूल | डाक के लिए महसूल |
| देवालय | देव के लिए आलय |
| देशभक्ति | देश के लिए भक्ति |
| देशहित | देश के लिए हित |
| नववर्षोपहार | नववर्ष के लिए उपहार |
| न्यायालय | न्याय के लिए आलय |
| परीक्षा-केन्द्र | परीक्षा के लिए केन्द्र |
| पुत्रशोक | पुत्र के लिए शोक |
| प्रौढ़-शिक्षा | प्रौढ़ के लिए शिक्षा |
| बलिपशु | बलि के लिए पशु |
| बालामृत | बालकों के लिए अमृत |
| बालविद्यालय | बालकों के लिए विद्यालय |
| ब्राह्मणदक्षिणा | ब्राह्मण के लिए दक्षिणा |
| ब्राह्मणदेय | ब्राह्मण के लिए देय |
| भूतबलि | भूत (जीवों) के लिए बलि (भोजन) |
| मच्छरदानी | मच्छर रोकने के लिए दानी |
| महँगाईभत्ता | महँगाई के लिए भत्ता |
| मार्गव्यय | मार्ग के लिए व्यय |
| मालगाड़ी | माल के लिए गाड़ी |
| मालगोदाम | माल के लिए गोदाम |
| मेजपोश | मेज के लिए पोश (ढकनेवाला) |
| यज्ञशाला | यज्ञ के लिए शाला |
| युद्ध-तत्पर | युद्ध के लिए तत्पर |
| युद्धभूमि | युद्ध के लिए भूमि |
| रंगमंच | रंग (कला प्रदर्शन) के लिए मंच |
| रणनिमंत्रण | रण के लिए निमंत्रण |
| रणभूमि | रण के लिए भूमि |
| रसोईघर | रसोई के लिए घर |
| राष्ट्र-भक्ति | राष्ट्र के लिए भक्ति |
| राहखर्च | राह के लिए खर्च |
| रोकड़-बही | रोकड़ के लिए बही |
| लोकहितकारी | लोक के लिए हितकारी |
| विद्यागृह | विद्या के लिए गृह |
| विधानपरिषद् | विधान के लिए परिषद् |
| विधानसभा | विधान के लिए सभा |
| शहरपनाह | शहर के लिए पनाह (चहारदीवारी) |
| शिक्षालय | शिक्षा के लिए आलय |
| शिवार्पण | शिव के लिए अर्पण |
| शौचालय | शौच के लिए आलय |
| सत्याग्रह | सत्य के लिए आग्रह |
| सभाभवन | सभा के लिए भवन |
| सभामंडप | सभा के लिए मंडप |
| समाचार-पत्र | समाचार के लिए पत्र |
| साधुदक्षिणा | साधु के लिए दक्षिणा |
| स्नानघर | स्नान के लिए घर |
| स्वदेशप्रेम | स्वदेश के लिए प्रेम |
| हथकड़ी | हाथ के लिए कड़ी |
| हवन-कुण्ड | हवन के लिए कुण्ड |
| हवन-सामग्री | हवन के लिए सामग्री |
| तत्पुरुष (अपादानतत्पुरुष) | |
| आकाशपतित | आकाश से पतित |
| आचारभ्रष्ट | आचार से भ्रष्ट |
| इन्द्रियातीत | इन्द्रियों से अतीत (परे) |
| ईश्वरविमुख | ईश्वर से विमुख |
| ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त |
| कर्जमुक्त | कर्ज से मुक्त |
| कर्त्तव्यच्युत | कर्त्तव्य से च्युत |
| कर्म-भिन्न | कर्म से भिन्न |
| कर्मविमुख | कर्म से विमुख |
| कर्महीन | कर्म से हीन |
| कल्पनाशून्य | कल्पना से शून्य |
| कामचोर | काम से जी चुरानेवाला |
| कालातीत | काल से अतीत (परे) |
| गर्व-शून्य | गर्व से शून्य |
| गुणहीन | गुण से हीन |
| गृहहीन | गृह से हीन |
| गृहनिर्गत | गृह से निकला हुआ |
| चिंतामुक्त | चिंता से मुक्त |
| जन्मांध | जन्म से अंध |
| जलरिक्त | जल से रिक्त |
| जातिच्युत | जाति से च्युत (बाहर) |
| जातिभ्रष्ट | जाति से भ्रष्ट |
| दूरागत | दूर से आगत |
| देशनिकाला | देश से निकाला |
| देशनिर्वासित | देश से निर्वासित |
| दोषमुक्त | दोष से मुक्त |
| धनहीन | धन से हीन |
| धनरहित | धन से रहित |
| धर्मच्युत | धर्म से च्युत |
| धर्मभ्रष्ट | धर्म से भ्रष्ट |
| धर्मविमुख | धर्म से विमुख |
| ध्यानातीत | ध्यान से अतीत (परे) |
| नेत्रहीन | नेत्र से हीन |
| पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट |
| पदच्युत | पद से च्युत |
| पदभ्रष्ट | पद से भ्रष्ट |
| पदमुक्त | पद से मुक्त |
| पापमुक्त | पाप से मुक्त |
| प्रेमरिक्त | प्रेम से रिक्त |
| बंधनमुक्त | बंधन से मुक्त |
| बलहीन | बल से हीन |
| भवतारण | भव (संसार) से तारण (मुक्ति) |
| मरणोत्तर | मरण से उत्तर |
| मायारिक्त | माया से रिक्त |
| रणविमुख | रणविमुख — रण से विमुख |
| लक्ष्यभ्रष्ट | लक्ष्य से भ्रष्ट |
| लोकोत्तर | लोक से उत्तर (परे) |
| विद्याहीन | विद्या से हीन |
| वृक्षपतित | वृक्ष से पतित |
| व्ययमुक्त | व्यय से मुक्त |
| शक्तिहीन | शक्ति से हीन |
| स्थानच्युत | स्थान से च्युत |
| स्थानभ्रष्ट | स्थान से भ्रष्ट |
| स्वर्गपतित | स्वर्ग से पतित |
| हतश्री | श्री (वैभव) से हत (रहित) |
| हृदयहीन | हृदय से हीन |
| तत्पुरुष (सम्बन्धतत्पुरुष) | |
| अंगघात | अंग का घात |
| अछूतोद्धार | अछूतों का उद्धार |
| अनारदाना | अनार का दाना |
| अन्नदाता | अन्न का दाता |
| अन्नदान | अन्न का दान |
| अभिलेखागार | अभिलेखों का आगार (भंडार) |
| अमचूर | आम का चूर्ण |
| अमरस | आम का रस |
| आत्मघात | आत्मा का घात / स्वयं की हत्या |
| आत्मज्ञान | आत्म (स्वयं) का ज्ञान |
| आनन्दाश्रम | आनन्द का आश्रम |
| आशाघात | आशा का घात (नाश) |
| ईश्वराधीन | ईश्वर के अधीन |
| ईश्वरोपासना | ईश्वर की उपासना |
| औषधालय | औषध (औषधि) का आलय |
| ऋषिकन्या | ऋषि की कन्या |
| कठपुतली | काठ की पुतली |
| कन्यादान | कन्या का दान |
| कपोतराज | कपोतों का राजा |
| करुणासागर | करुणा के सागर |
| करोड़पति | करोड़ (रूपये) का पति |
| कर्मयोग | कर्म का योग |
| कारागार | कारा/कार का आगार |
| कालिदास | काली का दास |
| कुलाचार | कुल का आचार |
| कोषागार | कोष का आगार |
| खरारि | खर का अरि |
| गंगाजल | गंगा का जल |
| गंगातट | गंगा का तट |
| गंगोदक | गंगा का उदक (जल) |
| गजराज | गजों का राजा |
| गुरुसेवा | गुरु की सेवा |
| गृहस्वामी | गृह का स्वामी |
| गोघात | गो का घात / गाय की हत्या |
| गोदान | गो का दान |
| ग्रंथाकार | ग्रंथ का आगार |
| ग्रंथालय | ग्रंथ का आलय |
| ग्रामवासी | ग्राम का वासी |
| ग्रामाचार | ग्राम का व्यवहार |
| ग्रामोद्धार | ग्राम का उद्धार |
| घुड़दौड़ | घोड़े या घोड़ों की दौड़ |
| चन्द्रोदय | चन्द्र का उदय |
| चरित्रचित्रण | चरित्र का चित्रण |
| चायबगान | चाय का बागान |
| चिकित्सालय | चिकित्सा का आलय |
| छात्रालय | छात्रों का आलय (निवास) |
| जगज्जननी | जगत् की जननी |
| जगदम्बा | जगत् की अम्बा (माता) |
| जन्माता | जगत् की माता |
| जन-भाषा | जन की भाषा |
| जमींदार | जमीन का दार (स्वामी) |
| जलधारा | जल की धारा |
| जलपान | जल का पान |
| जलप्रवाह | जल का प्रवाह |
| जलराशि | जल की राशि |
| ज्ञानसागर | ज्ञान का सागर |
| त्रिपुरारि | त्रिपुर का अरि |
| दयानिधि | दया के निधि (सागर) |
| दीनानाथ | दीनों के नाथ |
| दुःख-सागर | दुःख का सागर |
| देवभाषा | देवताओं का भाषा |
| देवमूर्ति | देव (देवता) की मूर्ति |
| देवालय | देव (देवता) का आलय |
| देशगत | देश से सम्बन्धित |
| देशसुधार | देश का सुधार |
| देशसेवा | देश की सेवा |
| देशाचार | देश का आचार |
| द्विजराज | द्विजों का राजा |
| धनार्थी | धन का अर्थी (इच्छुक) |
| धर्मसभा | धर्म की सभा |
| नगरसेठ | नगर का सेठ |
| नदीतट | नदी का तट |
| नरेन्द्र | नरों का इन्द्र (राजा) |
| नरेश | नरों का ईश |
| नूरजहाँ | जहाँ का नूर (प्रकाश) |
| पतितपावन | पतितों का पावन करनेवाला |
| पक्षघात | पक्ष (शरीर का अंग/पंख) का घात |
| पतितोद्धार | पतित का उद्धार |
| पदान्वय | पद का अन्वय |
| पत्राचार | पत्र का आचार (व्यवहार) |
| पत्रोत्तर | पत्र का उत्तर |
| परस्त्री | पर (दूसरे) की स्त्री |
| पराधीन | पर के अधीन |
| पशुघात | पशु का घात / पशु की हत्या |
| पशुपति | पशुओं के पति (स्वामी) |
| पनचक्की | पानी की चक्की |
| पाठशाला | पाठ का शाला (घर) |
| पापाचार | पाप का आचार (व्यवहार/कार्य) |
| पुस्तकागार | पुस्तक का आगार |
| पुस्तकालय | पुस्तक का आलय |
| पितृगृह | पिता (पितृ) का घर (गृह) |
| पितृघात | पिता का घात / पिता की हत्या |
| प्रतीक्षालय | प्रतीक्षा का आलय |
| प्रजापति | प्रजा का पति (स्वामी) |
| प्राणघात | प्राण (जीवन) का घात |
| प्राणदान | प्राण का दान |
| प्रेक्षागार | प्रेक्षण (देखने) का आगार |
| प्रेमोपहार | प्रेम का उपहार |
| प्रेमोपासक | प्रेम का उपासक |
| बंदरगाह | बंदर (साहिली मंडी) का गाह (स्थल) |
| बनमानुष | वन का मनुष्य |
| बैलगाड़ी | बैल की गाड़ी |
| ब्राह्मणपुत्र | ब्राह्मण का पुत्र |
| भंडारागार | भंडार का आगार |
| भिक्षाचार | भिक्षा का आचार (व्यवहार/कार्य) |
| भूकम्प | भू (भूमि) का कम्प (कम्पन) |
| भोजनालय | भोजन का आलय |
| मंगलाचार | मंगल का आचार (कार्य) |
| मंत्रालय | मंत्रणा का आलय (शासन-कार्यों का स्थान) |
| मधुमक्खी | मधु की मक्खी |
| मनःस्थिति | मन की स्थिति |
| मातृघात | माता का घात / माता की हत्या |
| माधव | मा (लक्ष्मी) का धव (पति) |
| मानार्थी | मान का अर्थी (इच्छुक) |
| मित्रघात | मित्र का घात |
| मिथ्याचार | मिथ्या का आचार (आचरण) |
| मुद्रणालय | मुद्रण का आलय |
| मूषकराज | मूषकों (चूहों) का राजा |
| मृगछाला | मृग की छाला (चर्म) |
| मृगछौना | मृग का छौना (शावक) |
| यज्ञगार/यज्ञागार | यज्ञ का आगार / यज्ञ का स्थल |
| यशार्थी | यश का अर्थी (इच्छुक) |
| युववाणी | युवाओं की वाणी |
| योगाभ्यास | योग का अभ्यास |
| राजकुमार | राजा का पुत्र (कुमार) |
| राजकुमारी | राजा की पुत्री |
| राजगृह | राजा का गृह |
| राजदरबार | राजा का दरबार |
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| राजपुरुष | राजा का पुरुष |
| राजपूत | राजा का पुत्र |
| राजभवन | राजा का भवन |
| राजमाता | राजा की माता |
| राज्याध्यक्ष | राज्य का अध्यक्ष |
| रामकहानी | राम की कहानी |
| रामराज्य | राम का राज्य |
| रामानुज | राम के अनुज |
| रामायण | राम का अयन |
| रामोपासक | राम का उपासक |
| राष्ट्रपति | राष्ट्र का पति (स्वामी) |
| राष्ट्रभक्त | राष्ट्र का भक्त |
| रेतघड़ी | रेत की घड़ी |
| लक्ष्मीपति | लक्ष्मी का पति |
| लखपति | लाख (रूपये) का पति |
| लाभार्थी | लाभ का अर्थी (इच्छुक) |
| लोकनायक | लोक का नायक |
| लोक-भाषा | लोक की भाषा |
| लोकाचार | लोक का आचार |
| वनवासी | वन का वासी |
| वस्त्रागार | वस्त्रों का आगार |
| वस्त्रालय | वस्त्रों का आलय |
| वाचनालय | वाचन (पढ़ने) का आलय |
| वातावरण | वात (वायु) का आवरण |
| वामाचार | वाम (तंत्र) का आचार |
| विद्याभण्डार | विद्या का भण्डार |
| विद्यार्थी | विद्या का अर्थी (इच्छुक) |
| वाक्-चातुर्य | वाणी की चतुरता |
| विद्याभ्यास | विद्या का अभ्यास |
| विद्यालय | विद्या का आलय |
| विद्यासागर | विद्या का सागर |
| विद्वत्सभा | विद्वानों की सभा |
| विप्रपुत्र | विप्र (ब्राह्मण) का पुत्र |
| विश्वामित्र | विश्व का मित्र |
| विश्वासघात | विश्वास का घात (भंग) |
| वीरकन्या | वीर की कन्या |
| वीरपुत्र | वीर का पुत्र |
| शकरपारा | शक्कर का पारा (टुकड़ा) |
| शत्रुघात | शत्रु का घात |
| शब्दानुशासन | शब्द का अनुशासन |
| शयनागार | शयन का आगार |
| शिक्षार्थी | शिक्षा का अर्थी (इच्छुक) |
| शिशुघात | शिशु का घात / शिशु की हत्या |
| शौचालय | शौच का आलय |
| शीतागार | शीत का आगार |
| श्रमदान | श्रम का दान |
| संसद-सदस्य | संसद का सदस्य |
| सभापति | सभा का पति |
| समाजद्रोही | समाज का द्रोही |
| समाजोद्धार | समाज का उद्धार |
| सम्मानार्थी | सम्मान का अर्थी (इच्छुक) |
| सिद्धांताचार | सिद्धांत का आचार (आचरण) |
| सिंहद्वार | सिंह की मूर्तिवाला द्वार |
| सिरदर्द | सिर का दर्द |
| सुखसागर | सुख का सागर |
| सुखार्थी | सुख का अर्थी (इच्छुक) |
| सूचनालय | सूचना का आलय |
| सेनानायक | सेना का नायक |
| सेनापति | सेना का पति |
| सूतिकागार | सूतिका (प्रसूता स्त्री) का आगार |
| सूर्योदय | सूर्य का उदय |
| स्नानगृह | स्नान का गृह |
| स्नानागार | स्नान का आगार |
| स्वेच्छाचार | स्वेच्छा का आचार |
| हिमपात | हिम का पात |
| हिमालय | हिम का आलय |
| हुक्मनामा | हुक्म (आज्ञा) का नामा (पत्र) |
| तत्पुरुष (अधिकरणतत्पुरुष) | |
| अक्षशौण्ड | अक्ष (जुए) में शौण्ड (कुशल/दक्ष/निपुण) |
| आतपशुष्क | आतप (धूप) में शुष्क (सूखा) हुआ |
| आत्मनिर्भर | आत्म में निर्भर या अपने पर निर्भर |
| आत्मविश्वास | आत्म (अपने) पर विश्वास |
| आनन्दमग्न | आनन्द में मग्न |
| आपबीती | आप (अपने) पर बीती |
| कर्मकुशल | कर्म में कुशल |
| कविराज | कवियों में राजा (श्रेष्ठ) |
| कविश्रेष्ठ | कवियों में श्रेष्ठ |
| कलाकुशल | कला में कुशल |
| कलाप्रवीण | कला में प्रवीण |
| कानाफूसी | कान में फुस-फुस करना |
| कार्यकुशल | कार्य में कुशल |
| कार्यदक्ष | कार्य में दक्ष |
| काव्यकुशल | काव्य में कुशल |
| कुलश्रेष्ठ | कुल में श्रेष्ठ |
| कूपमंडूक | कूप में रहनेवाला मंडूक (मेंढक) |
| क्षत्रियाधम | क्षत्रियों में अधम |
| खग | ख (आकाश) में ग (पक्षी) |
| गंगास्नान | गंगा में स्नान |
| गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश |
| गृहस्थ | गृह में स्थित |
| ग्रामवास | ग्राम में वास |
| घुड़सवार | घोड़े पर सवार |
| घृतपक्व | घी में पका हुआ |
| चक्रबन्ध | चक्र में बँधा हुआ |
| जगबीती | जग पर बीती |
| जलज | जल में उत्पन्न (ज) |
| जलमग्न | जल में मग्न |
| डिब्बाबन्द | डिब्बे में बन्द |
| दहीबड़ा | दही में डूबा हुआ बड़ा |
| दानवीर | दान में वीर |
| देशाटन | देश में अटन (घूमना-फिरना) |
| ध्यानमग्न | ध्यान में मग्न |
| नगरप्रवेश | नगर में प्रवेश |
| नगरवास | नगर में वास |
| नराधम | नरों में अधम |
| नरोत्तम | नरों में उत्तम |
| नीतिनिपुण | नीति में निपुण |
| पदारूढ़ | पद पर आरूढ़ |
| पुरुषसिंह | पुरुषों में सिंह |
| पुरुषोत्तम | पुरुषों में उत्तम |
| प्रेमधूर्त | प्रेम में धूर्त |
| प्रेममग्र / प्रेममगन | प्रेम में मग्न / प्रेम में मगन |
| बलबीर | बल में बीर |
| मनमौजी | मन में मौजी |
| मन्त्रसिद्ध | मन्त्र में सिद्ध |
| मरणातुर | मरण को आतुर |
| मुनिश्रेष्ठ | मुनियों में श्रेष्ठ |
| मृत्युंजय | मृत्यु पर जय |
| युद्धनिपुण | युद्ध में निपुण |
| रणकुशल | रण में कुशल |
| रणपण्डित | रण में पण्डित |
| रणवीर | रण में वीर |
| रणशूर | रण में शूर |
| रोजगारोन्मुख | रोजगार को उन्मुख |
| वचनचातुरी | वचन (वाणी) में चातुरी (चतुराई) |
| वनजीवी | वन में जीनेवाला |
| वनवास | वन में वास |
| वाक्-वीर (वाग्वीर) | वाक् (बोलने) में वीर (कुशल) |
| विद्याधर | विद्या को धारण करनेवाला |
| विद्याप्रवीण | विद्या में प्रवीण |
| विश्वविख्यात | विश्व में विख्यात |
| व्याकरणपटु | व्याकरण में पटु (निपुण) |
| व्यवहारकुशल | व्यवहार में कुशल |
| व्यवहारचपल | व्यवहार में चपल (उतावला) |
| शरणागत | शरण में आगत |
| शास्त्रप्रवीण | शास्त्रों में प्रवीण |
| शोकमग्न | शोक में मग्न |
| सभापण्डित | सभा में पण्डित |
| सर्वव्याप्त | सर्व में व्याप्त |
| सर्वोत्तम | सर्व में उत्तम |
| सिंहासनारूढ़ | सिंहासन पर आरूढ़ |
| स्वकेन्द्रित | स्वयं पर केन्द्रित |
| स्वर्गवास | स्वर्ग में वास |
| हरफनमौला | हर फन में मौला (कुशल/जानकार) |
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