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कोष्ठक चिह्न ( )

कोष्ठक का प्रयोग वाक्य के अंतर्गत किसी पद का अर्थ देने या स्पष्ट करने के लिए किया जाता है; जैसे— कोष्ठक का प्रयोग वाक्य के अंतर्गत किसी संदर्भ प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है; जैसे— कोष्ठक का प्रयोग क्रम संख्या इंगित करने के लिए किया जाता है; जैसे— कोष्ठक का प्रयोग भाव या मनोदशा

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उद्धरण चिह्न

उद्धरण चिह्न के दो रूप हैं— इकहरे उद्धरण चिह्न (‘ ’) किसी व्यक्ति या लेखक का उपनाम, पुस्तक, समाचारपत्र, लेख का शीर्षक इत्यादि का नाम इकहरे उद्धरण चिह्न के साथ लिखा जाता है। अर्थात् जहाँ कोई विशेष शब्द, पद, वाक्य-खण्ड इत्यादि उद्धृत किये जायें वहाँ इकहरे उद्धरण लगते हैं; जैसे— व्याकरण, तर्क, अलंकार आदि साहित्यिक

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योजक चिह्न (-)

भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिन्दी भाषा की प्रकृति विश्लेषणात्मक है, संस्कृत की तरह संश्लेषणात्मक नहीं। अतएव, हिन्दी में सामासिक पदों या शब्दों का अधिक प्रयोग नहीं होता। संस्कृत में योजक चिह्न (Hyphen) का प्रयोग नहीं होता। उदाहरणार्थ— “नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्ग सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥” हिन्दी में इसका अनुवाद इस प्रकार होगा— जिनके शरीर के कोमल

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विस्मयादिबोधक चिह्न (!)

हर्ष, विषाद, विस्मय, घृणा, आश्चर्य, करुणा, भय इत्यादि भाव व्यक्त करने के लिये विस्मयादिबोधक चिह्न (Sign of Exclamation) का प्रयोग होता है। विस्मयादिबोधक चिह्न में प्रश्नकर्ता उत्तर की अपेक्षा नहीं करता। इसका प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है— संबन्धित लेख—

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