प्रश्न पत्र
हल
उत्तर— 1
1 (क) : गद्यांश का भावार्थ
कोई भी धर्म अपनी संकीर्णता की अपेक्षा अपनी व्यापकता से महान बनता है। धर्म के विविध रूप हैं; जैसे— गृहधर्म, कुल धर्म, समाज धर्म, लोक धर्म, विश्व धर्म। इनमें विश्व धर्म सबसे व्यापक है और अन्य इसी के अंग हैं। विश्व धर्म का उद्देश्य विश्व कल्याण है, इसलिए यह सर्वश्रेष्ठ धर्म है। यह गुण पुरुषोत्तम में ही स्थापित होते हैं और लोग उन्हीं के आचरण का अनुसरण करते हैं। जितना व्यापक उनका लक्ष्य रहेगा उतनी आनंद की अनुभूति होगी। कभी-कभी यह स्थिति के अनुसार नहीं बल्कि उद्देश्य के अनुसार निर्धारित होता है क्योंकि विसंगति की स्थिति में भी अलग-अलग परिणाम देखने को मिलते हैं।
1 (ख)
धर्म समाज का कल्याण अपनी व्यापकता और लक्ष्य से करता है। धर्म की महानता संकीर्णता में ना होकर व्यापकता में है। व्यक्ति, गृह, कुल तक सीमित न होकर सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का उद्देश्य रखता है। इसमें ऐसे कुछ आदर्श स्थापित होते है जिसका लोग अनुसरण करते हैं और आनंद की अनुभूति करते हैं इसके मूल में स्वहित न होकर परहित एवं विश्वहित होता है।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
(1) किसी परिमित ……………… उच्च कोटि का है।
व्याख्या : संकीर्णता नहीं अपितु व्यापकता एवं जन कल्याण की सीमा ही धर्म की श्रेष्ठता का परिचायक है। धर्म जितने अधिक लोगों के लिए हितकारी होता जाता है उसकी गुणवत्ता, पवित्रता और अस्तित्व उतना अधिक प्रभावशाली हो जाता है धर्म का उसके इस प्रयोजन से सीधा सम्बन्ध है।
(2) पूर्ण धर्म …………………….. पुरुषोत्तम में ही रहता है।
व्याख्या : गृह धर्म से होते हुए कुल धर्म, समाज धर्म, लोक धर्म और अंततः विश्व धर्म में परिवर्तन ही पूर्णता है। विश्व धर्म ही श्रेष्ठ है और इसका पालनकर्ता पूर्ण पुरुष (पुरुषोत्तम) होता है। पूर्ण पुरुष में ही धर्म की सच्ची पराकाष्ठा देखी जा सकती है। पूर्ण पुरुष के लिए पूरी वसुधा ही कुटुम्ब होती है।
(3) गरीबों का गला ………………………… डालते देखे जाते हैं।
व्याख्या : व्यक्ति के व्यक्तित्व की अपेक्षा उसके तत्कालीन मनोभाव ज्यादा प्रभावशाली होते हैं। यही कारण है कभी-कभी एक धार्मिक व्यक्ति साधारण कोटि का आचरण करता है, जबकि स्वार्थी व्यक्ति उच्च कोटि का आचरण करता है। एक स्वार्थी व्यक्ति चीटियों को आटा डालता हैं और एक जनकल्याण से विमुख व्यक्ति मात्र अपने मित्र को बचाने के भावावेश में अपने प्राणों तक की भी परवाह नहीं करता है।
उत्तर— 2
2 (क) : गद्यांश का शीर्षक
लोभियों का वैशिष्ट्य या लोभियों के गुण
2 (ख)
गद्यांश के आधार पर लोभियों के गुण :
- लोभियों का दमन योगियों के समकक्ष होता है।
- मान-अपमान में समान भाव
- केवल पाने की लालसा, देने की बिल्कुल अनिच्छा
- लाभ की स्थिति में निकृष्ट से निकृष्ट कार्य करने से परहेज नहीं
- लोभियों निष्ठुरता, निर्लज्जता, अविवेक, अन्याय जैसी विशेषताओं से दूर रहना चाहिए परन्तु अक्रोध, इन्द्रिय सम्बन्धी संयम, समभाव अनुकरणीय है।
2 (ग) : गद्यांश का संक्षेपण
लोभियों का आत्मनियंत्रण योगियों के समान है। लोभी स्वभाव के कारण वह हर समय समभाव रखते है। निंदा, घृणा भी झेल सकते हैं; वह कभी अपना धन नहीं छोड़ सकते है। अपने लाभ के लिए किसी के सामने भी हाथ फैला सकते है। गुस्सा दया, घृणा, शर्म जैसी भावनाओं का वास उनमें नहीं होता है। लोभ वश वो अच्छा भोजन और वस्त्र की भी इच्छा नहीं करते है। लोभियों की मनः भावना निंदनीय है, और इंद्रिय-निग्रह धन्य है।
उत्तर — 3
3 (क)
अर्ध सरकारी पत्र :
“अर्ध-सरकारी पत्र किसी कार्यालय के अधिकारी द्वारा किसी अन्य अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से लेकिन सरकारी कार्य हेतु प्रेषित किया जाता है।”
ये पत्र प्रायः सम्बन्धित कार्याधिक्य अथवा किसी अन्य कारण से समय पर वांछित सूचना न मिलने और कार्यालय की ओर से अनुस्मारक भेजने पर भी उचित उत्तर न प्राप्त होने की दशा में भेंजे जाते हैं।
सरकारी पत्र एवं अर्द्ध सरकारी पत्रों में अंतर :
| आधार | सरकारी-पत्र | अर्ध-सरकारी पत्र |
| उद्गम | पद से होता है। | अधिकारी / व्यक्ति के स्तर से होता है। |
| संचलन | सदैव पद से पद को प्रेषित होता है। ऐसे में तीन स्थितियाँ हो सकती हैं; क. समान पदों के बीच, ख. वरिष्ठ से कनिष्ठ पद के बीच और ग. कनिष्ठ से वरिष्ठ पद के बीच। | प्रायः समान स्तर के अधिकारियों के बीच अथवा किसी अशासकीय व्यक्ति को भी सरकारी कार्य हेतु प्रेषित। |
| विषय-वस्तु | शासकीय प्रयोजन और पदीय दायित्वों की पूर्ति से सम्बन्धित | शासकीय प्रयोजन हेतु ध्यानाकर्षण, विचार-विमर्श और गोपनीय मामलों में वार्ता से सम्बन्धित |
| भाषा-शैली | औपचारिक भाषा में, रूढ़ व अन्य पुरुष शैली में तटस्थ भाव से लिखा जाता है। वैयक्तिक भावों का कोई स्थान नहीं। | अनौपचारिक भाषा में व्यक्तिगत और मैत्री व आत्मीय भाव से उत्तम व मध्यम पुरुष शैली में लिखा जाता है। |
| प्रेषिती | पत्र को प्रेषिती कार्यालय का नियत प्राधिकारी खोलता है। | व्यक्तिगत होने के कारण पत्र को सदैव प्रेषिती ही खोलता है। |
| सम्बोधन व समापन | इसमें मात्र औपचारिक शब्दावली ‘महोदय’ सम्बोधन और समापन के लिये कोई औपचारिक शब्द नहीं होता है। | इसमें अनौपचारिक शब्द शब्द ‘प्रिय श्री …’ ; ‘प्रिय महोदय’ से सम्बोधन और समापन के लिये आदरसूचक ‘सादर / ससम्मान /सद्भावनाओं सहित’ जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है। |
| उद्देश्य | अधिकारी अपने पदीय दायित्व का निर्वहन तटस्थ भाव से करते हैं। | अधिकारी व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासकीय समस्याओं का निर्वहन करते हैं। |
अर्द्ध-सरकारी पत्र का प्रारूप :

सरकारी पत्र का प्रारूप :

3 (ख)

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम
- शब्द — विलोम
- अनुक्रिया — प्रतिक्रिया
- अधिष्ठित — अनधिष्ठित
- वादी — प्रतिवादी
- आगमन — प्रत्यागमन, प्रस्थान
- सज्जन — दुर्जन
- सुपुत्र — कुपुत्र
- राग — विराग, द्वेष
- सम्मुख — विमुख
- सलज्ज — निर्लज्ज
- उदात्त — अनुदात्त
उत्तर— 5
5 (क) : उपसर्ग
| शब्द | उपसर्ग + शब्द | प्रयुक्त उपसर्ग |
| उपासना | उप + आसन | उप |
| दुस्साध्य | दुः + साध्य | दुः (दुस्) |
| निमीलित | नि + मीलित | नि |
| सुपुत्र | सु + पुत्र | सु |
| अपस्मार | अप + स्मार (स्मृ) | अप |
5 (ख) : प्रत्यय
| शब्द | शब्द + प्रत्यय | प्रयुक्त प्रत्यय |
| अपनापा | अपना + आपा | आपा |
| वैदिक | वेद + इक | इक |
| राधेय | राधा + एय | एय |
| गुरुता | गुरु + ता | ता |
| ग्रामीण | ग्राम + ईन | ईन |
उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (1) | उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति | रिक्थ |
| (2) | शत्रुओं का हनन करने वाला | शत्रुघ्न |
| (3) | मुकदमा दायर करने वाला व्यक्ति | मुद्दई, वादी |
| (4) | युद्ध की प्रबल इच्छा हो जिसमें | युयुत्सु |
| (5) | उत्तर देकर खण्डन करना | प्रत्युक्तर |
उत्तर— 7
7 (क) : वाक्य शुद्धि
(1) अशुद्ध : तुम तुम्हारी किताब ले जाओ।
शुद्ध : तुम अपनी किताब ले जाओ।
(2) अशुद्ध : यही सरकारी महिलाओं का अस्पताल है।
शुद्ध : यह महिलाओं का सरकारी अस्पताल है।
(3) अशुद्ध : यह एक गहरी समस्या है।
शुद्ध : यह एक गम्भीर समस्या है।
(4) अशुद्ध : मोहन आगामी वर्ष कलकत्ता गया था।
शुद्ध : मोहन विगत वर्ष कलकत्ता गया था। / मोहन आगामी वर्ष कलकत्ता जायेगी।
(5) अशुद्ध : गणित एक कठोर विषय है।
शुद्ध : गणित एक कठिन विषय है।
7 (ख) : वर्तनी-शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (1) | व्यवहारिक | व्यावहारिक |
| (2) | तत्कालीक | तात्कालिक |
| (3) | आशीर्वाद | आशीर्वाद |
| (4) | पुज्यनीय | पूजनीय, पूज्य |
| (5) | इच्छिक | ऐच्छिक |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(1) जब तक साँस तब तक आस
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— अन्त समय तक आशा रखनी चाहिए
- प्रयोग— प्रयागराज में ऐसे अनेक प्रतियोगी हैं, जो परीक्षाओं में तब तक लगे रहते हैं, जब तक कि उनकी उम्र सीमा बाकी है। सच कहा गया है कि जब तक साँस तब तक आस।
(2) जिसका काम उसी को साजै
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— जो काम जिसका है, उसे वही ठीक तरह से कर सकता है
- प्रयोग— श्याम बिजली मिस्त्री को न बुलाकर स्वयं ही घर की लाइटिंग करने लगा, जिससे सारा सर्किट शार्ट हो गया। पिता जी ने उसे डाँटते हुए कहा कि जब तुम्हें इस काम के बारे में जानकारी नहीं थी, तो बिजली मिस्त्री को क्यों नहीं बुलाए। ठीक ही कहा गया है कि जिसका काम उसी को साजै।
(3) चित भी मेरी पट भी मेरी
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— हर तरह से स्वयं का ही लाभ
- प्रयोग— पिता जी के साथ सबसे बड़ी मुसीबत यह रहती है कि वे हरदम अपनी ही मनमानी करते हैं, चाहते हैं कि चित भी उनकी हो और पट भी उन्हीं का हो।
(4) झूठ के पाँव नहीं होते
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— झूठा आदमी एक बात पर स्थिर नहीं रहता
- प्रयोग— झूठे व्यक्ति की बातों में मत आइए, क्योंकि वह जितनी बार आपसे बात कहेगा सब अलग-अलग रहेगी, इसीलिए कहा गया है कि झूठ के पाँव नहीं होते।
(5) हाथ कंगन को आरसी क्या
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता
- प्रयोग— भारत में होने वाली लगभग सभी आतंकवादी घटनाओं में पाकिस्तानी नागरिक ही रहते हैं, फिर भी भारत से पाकिस्तान द्वारा प्रमाण माँगा जाता है, यह तो वही बात हुई कि हाथ कंगन को आरसी क्या।
(6) आड़े आना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— बाधक होना / बाधक बनना
- प्रयोग— अच्छे गुरु निर्धन विद्यार्थियों की हर तरह से सहायता करते हैं, जिनसे उनकी सफलता में कोई बात आड़े न आए।
(7) आँखें बिछाना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— प्रेम से स्वागत करना
- प्रयोग— लंका विजय के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासी आँखें बिछाए खड़े थे।
(8) खाक छानना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— मारा-मारा फिरना
- प्रयोग— अज्ञातवास के दौरान पाण्डव खाक छानते रहे।
(9) ठन-ठन गोपाल
- अर्थ— मुहावरा
- अर्थ— बिल्कुल खोखला
- प्रयोग— कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो लोगों को संस्कारित होने की प्रेरणा देते हैं, किन्तु अन्दर से ठन-ठन गोपाल होते हैं।
(10) शैतान की आँत
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— लम्बी बात
- प्रयोग— अल्पज्ञ अक्सर शैतान की आँत वाली बात करते हैं, जिससे लोग उन्हें बहुत ही जानकर समझें।
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