सामान्य हिंदी | UPPSC (Main) Examination 2022: Question Paper and Solution

प्रश्न पत्र

2022
सामान्य हिन्दी
GENERAL HINDI
निर्धारित समय : तीन घंटे अधिकतम अंक : 150
Time Allowed : Three Hours Maximum Marks : 150

उत्तर देने से पूर्व निम्नलिखित निर्देशों को कृपया सावधानीपूर्वक पढ़ें :
(i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(ii) प्रत्येक प्रश्न के अंत में निर्धारित अंक अंकित हैं।
(iii) पत्र, प्रार्थना पत्र या किसी अन्य प्रश्न के उत्तर के साथ अपना अथवा अन्य किसी का नाम, पता (प्रश्नपत्र में दिये गये नाम, पदनाम आदि को छोड़कर) एवं अनुक्रमांक न लिखें। आवश्यक होने पर क, ख, ग का उल्लेख कर सकते हैं ।
Please read each of the following instructions carefully before attempting questions :
(i) All questions are compulsory.
(ii) Marks are given against each of the question.
(iii) Do not write your or another’s name, address (excluding those name, designation etc. given in the question paper) and roll no. with letter, application or any other question. You can mention क, ख, ग if necessary.
1. निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
जीवन को उसकी समग्रता में सोचना और जीवन को एक ख़ास इरादे से सोचना दो अलग तरह की तैयारियाँ हैं और इस माने में साहित्य जब भी राजनीति की तरह भाषा का एकतरफ़ा या इकहरा इस्तेमाल करता है, तो वह अपनी मूल शक्ति को सीमित या कुंठित करता है। राजनीति के मुहावरे में बोलते समय हम एक ऐसे वर्ग की भाषा बोल रहे होते हैं जिसके लिए भाषा प्रमुख चीज़ नहीं है, वह भाषा का दूसरे या तीसरे दर्जे का इस्तेमाल है : वह एक खास मकसद तक पहुँचने का साधन मात्र है। उसे भाषा की सामर्थ्य, प्रामाणिकता या सच्चाई में उस तरह दिलचस्पी नहीं रहती जिस तरह साहित्य की। उसकी भाषा प्रचार-प्रमुख रेटारिकल और नकली व्यक्तित्व की भाषा हो सकती है, क्योंकि राजनीति के लिए भाषा एक व्यावहारिक और कामचलाऊ चीज़ है जबकि साहित्यकार के लिए भाषा उस जिंदगी की सचाई का एक जीता-जागता हिस्सा है जिसे वह राजनीतिक, व्यावसायिक, व्यावहारिक या स्वार्थों की हिंसा, तोड़-फोड़ और प्रदूषण से बचा करके उसकी मूल गरिमा और शक्ति में स्थापित या पुनर्स्थापित करना चाहता है। साहित्य का काम अपनी पहचान को राजनीति की भाषा में खो देना नहीं, बल्कि उस भाषा के छद्म से अपने को लगभग बेगाना करके अकेला कर लेना है, एक सन्त की तरह अकेला, कि राजनीति के लिए ज़रूरी हो जाए कि वह बार-बार अपनी प्रामाणिकता और सचाई के लिए साहित्य से भाषा माँगे न कि साहित्य ही राजनीति की भाषा बनकर अपनी पहचान खो दे।
(क) प्रस्तुत गद्य का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। 5
(ख) राजनीति की भाषा का लक्ष्य क्या होता है? 5
(ग) उपर्युक्त गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। 20
2. भारत में अपना समाजशास्त्र रचने की आवश्यकता है। पश्चिम का समाजशास्त्र जिस मानव-केन्द्रित सामाजिकता और उसकी आधारभूत समता की बात करता है, वह किंचित् अपर्याप्त है। मनुष्य तक ही जीवन सीमा नहीं है। मनुष्य जब अपने आसपास के चर-अचर जीवन के साथ ओतप्रोत है, आसपास की क्षति से जब उसकी भी क्षति होती है, तो उसका दायित्व तो बढ़ जाता है। यह सही है कि जिस प्रकार की तर्क-प्रज्ञा मनुष्य को प्राप्त है, वह अन्य प्राणी को नहीं; पर उस अन्य को भी कुछ ऐसा प्राप्त है, जो मनुष्य को नहीं — और उस अप्राप्त के प्रति मनुष्य को श्रद्धा होनी चाहिए। हमारा संगठन उनकी सत्ता को नकारकर या हेय मानकर होगा; जैसा पिछले तीन सौ वर्षों से हुआ है, तो यह जितनी उनकी क्षति करेगा उससे अधिक मनुष्य की क्षति होगी, यह बात तो अब प्रमाणित हो चुकी है। इसलिए समाजशास्त्र की मानव-केन्द्रित दृष्टि का ध्यान सर्वभूतहित पर जाना चाहिए। दूसरी बात समता की है। सम शब्द का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ-जो सत् मात्र हो, अर्थात् शुद्ध सत्ता हो, इसलिए समता को अर्थात् शुद्ध समता को सर्वत्र देखना। समता इस प्रकार एकत्व है, एकत्व बुद्धि है, बराबरी नहीं हैं, क्योंकि पृथकत्व के बिना बराबरी की बात ही नहीं सोची जा सकती, दो वस्तुएँ अलग होंगी, तभी वे बराबर या गैर-बराबर दिखेंगी, जब एक हैं तो फिर बराबरी या गैर-बराबरी का सवाल ही नहीं उठता।
उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उचित शीर्षक दीजिए। 5
(ख) नए भारतीय समाजशास्त्र की, रचना की आवश्यकता क्यों है? 5
(ग) उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। 20
3.
(क)
अधिसूचना किसे कहते हैं? हिन्दी प्रदेश के न्यायालयों में हिन्दी के प्रयोग को अनिवार्य करने की एक अधिसूचना विधि मंत्रालय द्वारा दी गई है। उसका उपयुक्त प्रारूप तैयार कीजिए। 10
(ख)
परिपत्र किसे कहते हैं? जिला अधिकारी की ओर से जिले के सभी ग्राम प्रधानों के लिए सफाई व्यवस्था पर ध्यान रखने के लिए एक परिपत्र का प्रारूप तैयार कीजिए। 10
4.निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए। 10
विपन्न, महत्ता, स्तुत्य, सद्भाव, विरल, शीर्ष, समष्टि, अपराधी, अवशेष, एकत्र
5.
(क) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों का निर्देश कीजिए। 5
उद्ग्रीव, दुर्दशा, निमीलित, निश्चल, अत्यंत
(ख) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्ययों को अलग कीजिए। 5
देव, पूज्य, कौन्तेय, पौराणिक, तन्द्रालु
6. निम्नलिखित वाक्यांशों या पदबंध के लिए एक-एक शब्द लिखिए।
10
(1) जो जुड़ा या मिला न हो।
(2) अपना पेट भरने वाला।
(3) जिस पर विश्वास किया गया है।
(4) जिसका रोकना कठिन हो।
(5) तैरकर पार करने की इच्छा वाला।
7.
(क) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए। 5
(1) तुम्हारे हर काम गलत होते हैं।
(2) दंगे में कई निरपराधी व्यक्ति मारे गए।
(3) तुम कौन गाँव में रहते हो?
(4) यह बात उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है।
(5) प्रेमचन्द अच्छी कहानी लिखे हैं।
(ख) निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी का संशोधन कीजिए। 5
अनुसुइया, वहिर्गमन, मध्यान्ह, प्रज्ज्वल, कृशांगिनी
8. निम्नलिखित मुहावरों/लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
10+20=30
(1) चूहे के चाम से नगाड़ा नहीं बनता।
(2) खूँटे के बल बछड़ा कूदे।
(3) दालभात में मूसरचंद।
(4) पराए धन पर लक्ष्मीनारायण।
(5) एक ही लकड़ी से सबको हाँकना।
(6) अधजल गगरी छलकत जाए।
(7) लहू के आँसू पीना।
(8) मीठी छुरी चलाना।
(9) निन्यानबे के फेर में पड़ना।
(10) जबान में लगाम न देना।

हल

उत्तर— 1

1 (क) : गद्यांश का भावार्थ

साहित्य की भाषा और राजनीति की भाषा में अंतर होता है। साहित्य में भाषा का प्रयोग जीवन और व्यक्तित्व की समग्रता को साधता है, जबकि राजनीतिक भाषा सतहीपन लिए हुए छद्म व्यक्तित्व को व्यक्त करती है। इसलिए साहित्यकार का उत्तरदायित्व है कि वह राजनीतिक भाषा को परिष्कृत करे, उसे सत्य के साँचे में ढाले और समग्रता के वहन के योग्य बनाये। साहित्यकार को सावधान रहना है कि कहीं स्वयं ही राजनीतिक प्रभाव में भाषा की गरिमा ही न खो दे। सत्य केवल साहित्य का ही नहीं वरन् राजनीति का भी निकष होना चाहिए। साहित्यकार का उत्तरदायित्व है कि इस कसौटी पर राजनीतिक भाषा को परिष्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव डाले।

1 (ख) : राजनीति की भाषा का लक्ष्य

राजनीति की भाषा का लक्ष्य सदैव एकहरा रहा है। उसके लिए भाषा एक व्यावहारिक और काम चलाऊँ चीज है। राजनीति के लिए भाषा कोई प्रमुख चीज नहीं है, बल्कि वह उसके खास उद्देश्य तक पहुँचने का साधन मात्र है, जिसका प्रयोग राजनेता समय एवं परिस्थिति को देखते हुए करते रहते है। राजनीति अपने स्वार्थ के लिए भाषा को तोड़-मरोड़कर अपनी शक्ति के अनुसार प्रयोग करता हैं।

1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या

(1) साहित्य जब भी ……………………… कुंठित करता है।

राजनीति में भाषा का प्रयोग एक तरफा होता है। सम्प्रेषणीयता का अभाव सदैव उपस्थिति रहता है जबकि साहित्य मे जीवन एवं उसकी समग्रता का तत्त्व मौजूद होता है। यदि साहित्य राजनीतिक भाषा का प्रयोग करने लगेगी वह अपने मूल आधार से विमुख हो जायेगी। उसके शब्दों की ताकत कमजोर पड़ने लगेगी। अतः साहित्य एवं राजनीति की भाषा सदैव अलग-अलग होनी चाहिए।

(2) उसे भाषा की सामर्थ्य, ………………. तरह साहित्य की।

राजनीति को साहित्यिक भाषा के सामर्थ्य, प्रामाणिकता एवं सत्यता में किसी प्रकार की कोई रूचि नहीं होती है। राजनीति सदैव भाषा का प्रयोग अपने लाभ के लिए करती है, जबकि साहित्य के लिए भाषा सर्वोपरि है, साहित्य में भाषा का प्रयोग प्राण की तरह होता है। साहित्य के लिए भाषा का साधन नहीं बल्कि साध्य है।

(3) साहित्य के लिए …………………. करना चाहता है।

साहित्यकार के लिए भाषा समग्र व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने का माध्यम होती है। वह समाज की तमाम राजनीतिक, व्यावसायिक, व्यावहारिक एवं व्यक्तिगत लाभों से एक आधुनिक भाषायी प्रदूषित जीवनशैली से संरक्षित करते हुए भाषा की गरिमा एवं शक्ति को बनाएँ रखना चाहता हैं। साहित्यकार भाषा का संरक्षक होता है।

उत्तर— 2

2 (क) : गद्यांश का शीर्षक

भारतीय समाजशास्त्र या लोक की पहचान

2 (ख)

नए समाजशास्त्र की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि समाजशास्त्र परिवर्तनशील समाज का अध्ययन करता है घटनाओं एवं तथ्यों की देखने समझने का अपना नवीनतम दृष्टिकोण होता है। प्राचीन समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ अब कमजोर प्रतीत हो रही है, उससे मानव जाति की क्षति ही होगी। नवीन अवधारणाओं के साथ एकत्ववादी समता का निर्माण कर सकेंगे, जिससे दो वस्तुओं पर समतापूर्ण एवं तुलनात्मक दृष्टिकोण से विचार व्यक्त किया जा सकता है।

2 (ग) : गद्यांश का संक्षेपण

भारतीय समाजशास्त्र को मानव‑केन्द्रित पश्चिमी दृष्टि से आगे बढ़कर सर्वभूतहित पर आधारित होना चाहिए। मनुष्य अकेला नहीं है, वरन् वह चर‑अचर जीवन के साथ गुथा हुआ है। मानवेतर की उपेक्षा अंततः मनुष्य को ही क्षति पहुँचाएगी। मानव विवेकशील प्राणी है, लेकिन अन्य प्राणियों में भी वह है जो मनुष्य में नहीं। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा आवश्यक है। समता का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि सम‑स्वरूप एकत्व है। जहाँ एकत्व है, वहाँ बराबरी‑गैर-बराबरी का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः समाजशास्त्र को जीवन‑समग्रता और शुद्ध समता की दृष्टि अपनानी चाहिए।

उत्तर — 3

3 (क) : अधिसूचना (Notification)

परिभाषा —

“अधिसूचना पत्राचार का ऐसा रूप है जिसका प्रकाशन राजकीय गजट में सर्वसाधारण के सूचनार्थ किया जाता है।”

या

“लोक-विषयक मामलों, शासकीय निर्णयों, सूचनाओं और अन्य सांविधिक आदेशों को सर्वसाधारण के सूचनार्थ राजकीय गजट में प्रकाशित पत्र को अधिसूचना या विज्ञप्ति कहते हैं।”

अधिसूचना का प्रारूप :

अधिसूतना - UPPSC Mains 2022 Hindi Paper solution

3 (ख) : परिपत्र (Circular)

परिभाषा —

“पत्र आलेखन का ऐसा रूप, जिसके द्वारा समान सूचना, निर्देश, अनुदेश इत्यादि सभी सम्बन्धित अथवा अधीनस्थ अधिकारियों को विभिन्न कार्यों के संदर्भ में प्रतिलिपियों के माध्यम से प्रेषित किया जाता है, परिपत्र कहलाता है।”

या

“जब प्रेषक एक हो, विषय एक हो लेकिन प्रेषिती (प्राप्तकर्ता) अनेक हों तब सरकारी पत्र ही परिपत्र बन जाता है।”

परिपत्र का प्रारूप :

परिपत्र - UPPSC Mains 2022 Hindi Paper solution

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम

  • शब्द — विलोम
  • विपन्न — अविपन्न, संपन्न, नीरोग
  • महत्ता — लघुता
  • स्तुत्य — निंद्य
  • सद्भाव —  दुर्भाव
  • विरल — अविरल, सघन, सुलभ
  • शीर्ष — तल
  • समष्टि — व्यष्टि
  • अपराधी — निरपराध
  • अवशेष —  निःशेष (समाप्त)
  • एकत्र — विकीर्ण

उत्तर— 5

5 (क) : उपसर्ग

शब्दउपसर्ग + शब्दप्रयुक्त उपसर्ग
उद्‌ग्रीवउत् + ग्रीवाउत्
दुर्दशादुः + दशादुः (दुर्)
निमीलितनि + मीलितनि
निश्चलनिः + चलनिः (निश्)
अत्यंतअति + अंतअति  

5 (ख) : प्रत्यय

शब्दशब्द + प्रत्यय प्रयुक्त प्रत्यय
देवदिव् + अ
पूज्यपूज् + य
कौन्तेयकुन्ती + एयएय
पौराणिकपुराण + इकइक
तन्द्रालुतन्द्रा + आलुआलु

उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द

क्र॰ सं॰वाक्यांश या पदबंधएक शब्द
(1)जो जुड़ा या मिला न होअसंगी, असंबद्ध 
(2)अपना पेट भरने वालास्वपोषी 
(3)जिस पर विश्वास किया गया हैविश्वस्त, विश्वासपात्र
(4)जिसका रोकना कठिन हो।दुर्निवार, दुर्निवार्य
(5)तैरकर पार करने की इच्छा वालातितीर्षु

उत्तर— 7

7 (क) : वाक्य शुद्धि

(1) अशुद्ध : तुम्हारे हर काम गलत होते हैं।

शुद्ध : तुम्हारे हर एक काम गलत होते हैं।

(2) अशुद्ध : दंगे में कई निरपराधी व्यक्ति मारे गए।

शुद्ध : दंगे में कई निरपराध मारे गए। / दंगे में कई निरपराध व्यक्ति मारे गए।

(3) अशुद्ध : तुम कौन गाँव में रहते हो?

शुद्ध : तुम किस गाँव में रहते हो?

(4) अशुद्ध : यह बात उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है।

शुद्ध : इस बात को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। / इस बात को उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है।

(5) अशुद्ध : प्रेमचन्द अच्छी कहानी लिखे हैं।

शुद्ध : प्रेमचन्द ने अच्छी कहानियाँ लिखी हैं।

7 (ख) : वर्तनी-शुद्धि

क्र॰ सं॰अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
 (1)अनुसुइयाअनसूया
 (2)वहिर्गमनबहिर्गमन
 (3)मध्यान्हमध्याह्न
 (4)प्रज्ज्वलप्रज्वल
 (5)कृशांगिनी कृशांगी

उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग

(1) चूहे के चाम से नगाड़ा नहीं बनता।

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— अत्यधिक सीमित संसाधनों से बड़े कार्य नहीं हो सकते
  • प्रयोग— बड़े लोग अपना कार्य साधने के लिए सदैव बड़े लोगों की तलाश में रहते हैं, क्योंकि उनको पता होता है कि छोटे आदमियों के सम्पर्क से कोई लाभ नहीं। ठीक ही कहा गया है कि चूहे के चाम से नगाड़ा नहीं बनता।

(2) खूँटे के बल बछड़ा कूदे।

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— किसी की शह पाकर अकड़ दिखाना
  • प्रयोग— मोहन के मौसा जी पुलिस कप्तान क्या बन गये कि वह गाँव के हर छोटे-मोटे मामलों को लेकर थाने में अकड़ दिखाने लगा है। सच ही कहा गया है कि खूँटे के बल बछड़ा कूदे।

(3) दाल-भात में मूसरचंद।

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— बीच में दखल देने वाला
  • प्रयोग— पारिवारिक झगड़ों में कभी-कभी पड़ोसी भी दखल देने लगते है। सच ही कहा गया है कि दाल-भात में मूसरचन्द।

(4) पराए धन पर लक्ष्मीनारायण।

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— दूसरे के धन पर गुलछर्रे उड़ाना
  • प्रयोग— जैसे ही मोहन को ससुराल की संपत्ति मिली वह रोज-रोज नये सूट सिलवाने लगा। सच ही कहा गया है कि पराए धन पर लोग लक्ष्मीनारायण बन जाते हैं।

(5) एक ही लकड़ी से सबको हाँकना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— सबके साथ समान व्यवहार करना
  • प्रयोग— कक्षा में विद्यार्थी विभिन्न परिवेश से आते हैं। अतः अध्यापक को एक ही लकड़ी से सबको नहीं हाँकना चाहिए।

(6) अधजल गगरी छलकत जाए।

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— ओछा व्यक्ति थोड़े से गुण या धन पर ही इतराने लगता है
  • प्रयोग— सोहन ने चार अक्षर अंग्रेज़ी क्या पढ़ लिया कि सबको अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी से झाड़ता रहता है। ठीक ही कहा गया है कि अधजल गगरी छलकत जाय।

(7) लहू के आँसू पीना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— दुःख सह लेना
  • प्रयोग— माँ-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई में दिन-रात मेहनत मजदूरी करके लहू के आँसू पी लेते हैं लेकिन उफ तक नहीं करते।

(8) मीठी छुरी चलाना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— विश्वासघात करना
  • प्रयोग— कचहरियों में ऐसे अनेक दलाल टहलते रहते हैं, जो बातें तो ऐसी करेंगे जैसे जज साहब उनके लंगोटिया यार हो, लेकिन मौका पाते ही मीठी छुरी चलाने से बाज नहीं आते।

(9) निन्यानबे के फेर में पड़ना ।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— धन-संग्रह की चिन्ता में पड़ना
  • प्रयोग— सेठ जी हर समय हाय पैसा, हाय पैसा करते हुए निन्यानबे के फेर में पड़े रहते हैं।

(10) जबान में लगाम न देना।

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— बिना मतलब का बोलते जाना
  • प्रयोग— आजकल अनेक राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता टीवी. प्रोग्रामों में अनाप-सनाप बोलते नजर आते हैं, जैसे लगता है कि इनकी जबान पर कोई लगाम नहीं है।

संबंधित लेख

Scroll to Top