अवबोध को पाठबोधन, बोधन, अपठित अवतरण का आदि कहा गया है। अँग्रेजी में इसे Comprehension (बोध) कहा जाता है। इसके तहत प्रश्न-पत्रों में अपठित अवतरण के आधार पर छात्रों के बोध (समझ) को परखा जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रायः गद्यांश के आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इसे ‘अपठित गद्यांश‘ भी कहा जाता है।
अपठित अवतरण : उद्देश्य और अर्थ
‘अपठित अवतरण’ से तात्पर्य है ऐसा गद्यांश या पद्यांश जिसे विद्यार्थी ने निर्धारित पाठ्यक्रम में न पढ़ा हो। ‘अपठित अवतरण’ किसी भी गद्य या पद्य की पुस्तक या पत्र-पत्रिकादि से लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त विज्ञापन, समाचारपत्र आदि का भी अपठित सामग्री के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
विद्यार्थी को अपने बोधन, सूझबूझ और कल्पना शक्ति की सहायता से ‘अपठित अवतरण’ के आधार पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना होता है।
‘अपठित अवतरण’ के बोधन से छात्रों की बौद्धिक गहराई, पहुँच और पकड़ की जाँच होती है। साथ ही इन अपठित गद्यांशों से परीक्षार्थियों के सामान्य ज्ञान और स्वतन्त्र अध्ययन की भी परीक्षा होती है।
अपठित अवतरण : सामान्य निर्देश
- मूल अवतरण को ध्यान से पढ़ना चाहिए जिससे मूल भाव स्पष्ट हो जाय, यदि समझ न आये तो उसे एक-दो बार और पढ़ना चाहिए।
- मूल भावों, विचारों तथा शब्दों को रेखांकित करना चाहिए।
- एक-एक प्रश्न का उत्तर मूल अवतरण में ही ढूँढ़ना चाहिए, बाहर नहीं।
- प्रश्नोत्तर लिखते समय मूल में दिये गये शब्दों का ही यथासम्भव प्रयोग करना चाहिए।
- यह बात याद रखनी चाहिए कि सभी प्रश्नों के उत्तर सरल और संक्षिप्त हों।
- प्रश्नोत्तर लिखते समय अपनी ओर से बढ़ा-चढ़ाकर लिखना या अतिरिक्त उदाहरण देना नहीं चाहिए।
- सभी प्रश्नोत्तर प्रसंगानुकूल होने चाहिए। अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। प्रश्न जितना किया गया हो, उत्तर उतना ही होना चाहिए।
- यदि अपठित गद्यांश का सारांश या भावार्थ पूछा जाये— तो सारांश मूल भाव को लिखना चाहिए जो प्रायः अवतरण का तिहाई होना चाहिए; और भावार्थ अवतरण का प्रायः आधा होना चाहिए।
- यदि रेखांकित ‘शब्दों’ के अर्थ लिखने हों, तो वे प्रसंगानुकूल हों; क्योंकि कभी-कभी एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं।
- यदि रेखांकित ‘अंशों’ की व्याख्या करनी हो, तो वह भी प्रसंगानुकूल करनी चाहिए।
- यदि मूल गद्यांश का ‘शीर्षक’ देने के लिए कहा जाये, तो उसके केन्द्रीय भाव की खोज करनी चाहिए। दिये गये गद्यांश के आरम्भ या अन्त में शीर्षक छिपा होता है।
- शीर्षक अत्यन्त संक्षिप्त और सरल होना चाहिए। उसके शब्द मूल गद्यांश से भी ज्यों-के-त्यों लिए जा सकते हैं।
- प्रश्नकर्ता के निर्देशानुसार ही परीक्षार्थी को अपना मत या विचार व्यक्त करना चाहिए, अन्यथा नहीं।
अपठित अवतरण के आधार पर पूछे जाने वाले प्रश्न
- अवतरण के आधार पर प्रश्न, जिनका उत्तर अवतरण में ही होता है।
- अवतरण का ‘भावार्थ’
- अवतरण का ‘आशय’
- अवतरण का ‘सारांश’
- अवतरण का ‘संक्षेपण’
- अवतरण का ‘सार-संक्षेप’
- रेखांकित ‘शब्दों’ का अर्थ
- रेखांकित ‘अंशों’ की व्याख्या
- रेखांकित ‘अंशों’ का अभिप्राय
- अवतरण का ‘शीर्षक’
आइये इसे एक-एक करके संक्षेप में समझ लेते हैं—
भावार्थ
भावार्थ (Substance) का अर्थ किसी अवतरण के मूल विचारों को सरल, संक्षिप्त और स्पष्ट रूप में लिखना है। इसमें खण्डन-मण्डन या टीका-टिप्पणी की गुंजाइश नहीं होती है। अर्थात् अपनी ओर से न तो कोई बात जोड़नी है न ही घटानी है। बस जो बातें मूल में है उसी भाव को समझकर अपने शब्दों में लिखना है।
भावार्थ और संक्षेपण— भावार्थ में मूल अवतरण का मुख्य और गौण दोनों भाव होते हैं, परन्तु संक्षेपण में केवल मुख्य भाव ही लिखा जाता है। भावार्थ में मूल अवतरण के भाव को सरल और स्पष्ट रूप से लिखना होता है, जबकि संक्षेपण में मुख्य बातों को प्रवाहपूर्ण रूप से लिखा जाता है। इसलिए भावार्थ की अपेक्षा संक्षेपण छोटा होता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- संक्षिप्तता : यह व्याख्या की तरह लंबा नहीं होता और मूल अवतरण का लगभग आधा होना चाहिए।
- सटीकता : इसमें मूल के सभी विचार शामिल होने चाहिए, कुछ भी छूटना नहीं चाहिए।
- सरल शैली : इसकी भाषा आलंकारिक होने के बजाय सरल, स्पष्ट और सामासिक होनी चाहिए।
- तटस्थता : इसमें अपनी ओर से कोई टीका-टिप्पणी, विस्तार या खण्डन-मण्डन नहीं किया जाता।
लिखने की विधि
- पढ़ना और रेखांकित करना : मूल गद्यांश/पद्यांश को दो-तीन बार पढ़कर मुख्य विचारों को रेखांकित करें।
- अनावश्यक हटाना : फालतू शब्दों, उदाहरणों और आलंकारिक भाषा को निकाल दें।
- सार्थक वाक्य बनाना : रेखांकित मुख्य बातों को मिलाकर सरल और नए सार्थक वाक्य तैयार करें।
- पुनरीक्षण : अंत में जाँच लें कि कोई मुख्य भाव छूटा तो नहीं है और भाषा पूरी तरह स्पष्ट है या नहीं।
आशय-लेखन
आशय अंग्रेजी के ‘Purpose’ का समानार्थी है। आशय को अभिप्राय भी कह सकते हैं। आशय‑लेखन (अर्थ-लेखन) में अवतरण के मूल भावों को अपनी भाषा में लिखा जाता है। इसमें सम्पूर्ण पदों या गूढ़ वाक्यों का स्पष्टीकरण किया जाता है। आशय में—
- सम्पूर्ण कथन का मन्तव्य स्पष्ट करना होता है।
- कथन में आये गूढ़ पदों या वाक्यों का स्पष्टीकरण करना होता है।
इसके लिए पहले अवतरण को ध्यान से पढ़कर उसके मुख्य विचारों को समझना होता है। फिर उन विचारों को अपनी सरल भाषा में अलग‑अलग अनुच्छेदों में लिखा जाता है। यह न तो सारांश है, न व्याख्या, न भावार्थ। भाषा सरल होनी चाहिए और मूल भावों की पूरी रक्षा होनी चाहिए। आशय की शब्द-सीमा का विस्तार या संक्षेप अंकों के अनुसार किया जाता है।
कभी-कभी आशय के स्थान पर परीक्षा में अभिप्राय पूछा जाता है। ऐसे में भ्रमित नहीं होना है। आशय और अभिप्राय एक ही है। प्रश्न में आशय शब्द का प्रयोग हो या अभिप्राय का दोनो का अर्थ समान है और हमें अवतरण के शब्दों में छिपी मूल बात को सरल भाषा में लिखना होता है।
भावार्थ और आशय में अंतर
- उद्देश्य : भावार्थ का उद्देश्य मूल विचारों को सरल और संक्षिप्त रूप देना है। आशय का उद्देश्य पूरे कथन का मन्तव्य और कठिन शब्दों/वाक्यों को स्पष्ट करना है।
- विस्तार सीमा : भावार्थ हमेशा संक्षिप्त और सीमित होता है। आशय का विस्तार परीक्षा या प्रश्न के अंकों (Marks) के आधार पर घटाया या बढ़ाया जा सकता है।
- प्रकृति : भावार्थ में टीका-टिप्पणी या अपनी तरफ से स्पष्टीकरण की कोई गुंजाइश नहीं होती। आशय में मूल रूप से गूढ़ (कठिन) पदों और वाक्यों की व्याख्या या स्पष्टीकरण किया जाता है।
- लेखन शैली : भावार्थ को मूल भाव के अनुसार सीधे लिखा जाता है। आशय में विचारों को आवश्यकतानुसार अलग-अलग अनुच्छेदों में बाँटकर लिखा जाता है।
अर्थात् भावार्थ में मूल बात को बिना घटाए-बढ़ाए छोटे रूप में लिखते हैं। जबकि आशय में छिपे हुए गहरे अर्थ को स्पष्ट रूप से समझाते हैं।
आशय और व्याख्या समान है या कुछ अंतर है?
आशय : यह किसी कथन का ‘केंद्रीय मर्म’ या ‘निहितार्थ’ है। इसमें आप केवल यह बताते हैं कि लेखक इस पंक्ति के माध्यम से ‘क्या कहना चाहता है।’ यह व्याख्या से छोटा होता है और इसमें सीधे मुख्य बिंदु पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
व्याख्या : व्याख्या का दायरा आशय से बहुत बड़ा होता है। व्याख्या के अंदर आशय तो शामिल होता ही है, लेकिन साथ ही उसमें उदाहरण, तर्क, प्रसंग, संदर्भ और साहित्यिक विशेषताएँ (जैसे भाषा-शैली, अलंकार आदि) भी जोड़नी पड़ती हैं। व्याख्या में आप बात को विस्तार से खोलकर समझाते हैं।
व्याख्या
व्याख्या न भावार्थ है, न आशय। यह इन दोनों से भिन्न है। नियम भी भिन्न है। “व्याख्या किसी भाव या विचार का विस्तार अथवा विवेचन है। इसमें परीक्षार्थी को अपने अध्ययन, मनन और चिन्तन के प्रदर्शन की पूरी स्वतन्त्रता रहती है।”
व्याख्या के लिए आवश्यक निर्देश—
- मूल अवतरण की अपेक्षा व्याख्या बड़ी होती है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई के सम्बन्ध में कोई निश्चित सलाह नहीं दी जा सकती। सिर्फ यह देखना है कि मूल भावों अथवा विचारों का समुचित और सन्तोषजनक विवेचन हुआ या नहीं। इन बातों को ध्यान में रखकर अच्छी और उत्तम व्याख्या लिखी जा सकती है।
- यदि पाठ्यक्रम पर आधारित अवतरण है तो व्याख्या से पूर्व संदर्भ, प्रसंग और व्याख्या के बाद टिप्पणी लिखी जाती है।
- यदि अपठित अवतरण है तो संदर्भ, प्रसंग और टिप्पणी की अपेक्षा नहीं होती है, केवल व्याख्या की जाती है।
- व्याख्या में मूल विचार या भाव का सन्तुलित विवेचन होना चाहिए।
- मूल के विचारों का खण्डन-मण्डन किया जा सकता है।
- मूल के विचारों के गुण-दोषों पर समान रूप से प्रकाश डालना चाहिए।
व्याख्या के प्रकार
- पठित की व्याख्या अर्थात् पाठ्यक्रम में से गद्य या पद्य की व्याख्या
- अपठित की व्याख्या
प्रथम में पाठ्यक्रम से किसी गद्य या पद्य का अवतरण देकर उसकी सप्रसंग व्याख्या पूछी जाती है। इसमें संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और टिप्पणी (विशेष) क्रमशः लिखते हैं।
अपठित गद्यांश या पद्यांश की व्याख्या— इसमें पाठ्यक्रम से इतर गद्य या पद्य खण्ड दिये जाते हैं। इसमें अवतरण के कुछ अंश रेखांकित करके उनकी व्याख्या पूछी जाती है या रेखांकित शब्दों के अर्थ पुछे जाते हैं।
संक्षेपण
परिभाषा— “किसी विस्तृत विवरण, सविस्तार व्याख्या, वक्तव्य, पत्र-व्यवहार या लेख के तथ्यों और निर्देशों के अप्रासंगिक, असम्बद्ध, पुनरावृत्त, अनावश्यक बातों का त्याग और सभी अनिवार्य, उपयोगी तथा मूल तथ्यों का प्रवाहपूर्ण संक्षिप्त संकलन को ‘संक्षेपण’ (Precis) कहते हैं।”
संक्षेपण के गुण— पूर्णता, संक्षिप्तता, स्पष्टता, सरलता, शुद्धता, प्रवाह और क्रमबद्धता। इनमें से संक्षेपण में तीन गुण सर्वप्रमुख हैं— १. संक्षिप्तता (brevity), २. स्पष्टता (clearness), और ३. क्रमबद्धता (coherence) ।संक्षेपण के तत्त्व— क. अनेक शब्दों के स्थान पर एक शब्द का प्रयोग। ख. वाक्यों के लिए पदों या शब्द-समूहों का प्रयोग। ग. अप्रासंगिक, असम्बद्ध, पुनरावृत्त, अनावश्यक बातों का त्याग। घ. सभी अनिवार्य, उपयोगी तथा मूल तथ्यों का क्रमबद्ध व प्रवाहपूर्ण संक्षिप्त संकलन। ङ. उपयुक्त शीर्षक का चुनाव।
सार-लेखन, सारांश और संक्षेपण
सार‑लेखन, सारांश और संक्षेपण में अक्सर भ्रम होता है, इसलिए इनके अंतर को समझना ज़रूरी है।
सारांश (Summary) में केवल मुख्य तथ्य को बहुत संक्षेप में लिखा जाता है; सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल करना आवश्यक नहीं होता। इसके विपरीत सार‑लेखन में दिए गए अवतरण के सभी महत्त्वपूर्ण तथ्यों को शामिल किया जाता है और यह सारांश से थोड़ा बड़ा होता है। सारांश में ध्यान केवल मूल भाव‑बिंदु पर रहता है, जबकि सार‑लेखन में सभी महत्त्वपूर्ण बातों का चयन किया जाता है।
सार‑लेखन और संक्षेपण लगभग समान हैं, लेकिन सार‑लेखन में सामान्यतः मूल पाठ को लगभग एक‑तिहाई आकार में सीमित किया जाता है, जबकि संक्षेपण में ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं होता— बस अनावश्यक विस्तार हटाकर बात को सरल और छोटा किया जाता है।
अर्थात् “संक्षेपण में अवतरण के सभी मूल भाव को क्रमबद्ध रूप से लिखते हैं। जबकि सारांश में केवल मूल भाव को संक्षेप लिखते हैं। इस तरह सारांश को किसी अवतरण के संक्षेपण का भी संक्षेपण कहा जा सकता है।”
कभी-कभी परीक्षा में सार-संक्षेप पूछा जाता है। सार-संक्षेप उपर्युक्त तीनों (सार‑लेखन, सारांश और संक्षेपण) से भिन्न और समान दोनों है— सार-संक्षेप सारांश के सबसे निकट है, परन्तु इसमें सार-लेखन की स्पष्टता और संक्षेपण की संक्षिप्तता दोनों का संतुलित रूप मिलता है।
शीर्षक का चुनाव
शीर्षक अवतरण का केन्द्रीय-विचार या आत्मा होती है। यह ‘केंद्रीय भाव’ यदि एक शब्द में व्यक्त हो सके तो अच्छा है, किंतु यदि ऐसा न हो और अधूरा लगे तो एक छोटे पदबंध में इसे समेटने का प्रयत्न करना चाहिए। शीर्षक के लिए एक उपवाक्य, संक्षिप्त वाक्य, लोकोक्ति, कहावत अथवा काव्य पंक्ति भी उपयुक्त हो सकती है।
शीर्षक का निर्धारण
- अवतरण को कई बार पढ़ना चाहिए।
- पढ़ते समय अवतरण में निहित आत्मा या केन्द्रीय विचार को खोजना चाहिए।
- अवतरण में यह ध्यान देना चाहिए कि केन्द्रीय विषय क्या है? उस पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
- शीर्षक सकारात्मक बिन्दुओं वाला होना चाहिए।
- शीर्षक वही होता है जिसका प्रभाव अवतरण पर शाश्वत विद्यमान रहे।
- शीर्षक बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए।
- शीर्षक परिणामात्मक न होकर अवधारणात्मक होना चाहिए। यदि एक से अधिक सार्थक शीर्षक प्राप्त हो रहे हों तो उन्हें अथवा करके लिखा जा सकता है।
PYQs
UPSC (Mains)
हिन्दी अनिवार्य – 2025
प्रश्न – 1 : निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट, सही और संक्षिप्त भाषा में दीजिए : (12×5=60)
जैव विविधता विश्व की जीवित प्रजातियों की विविधता है, जिसमें उनकी आनुवंशिक विविधता और उनके द्वारा निर्मित पारिस्थितिकी तंत्र के समुदाय सम्मिलित हैं। आज जीवन की यह विविधता गंभीर ख़तरों का सामना कर रही है। वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि उष्णकटिबंधीय वनों की हानि और अस्थिरता की वर्तमान दरों पर आगामी चौथाई शती के दौरान प्रति दशक लगभग पाँच से दस प्रतिशत उष्णकटिबंधीय वन्य प्रजातियाँ नष्ट हो जाएँगी। विलुप्त होने का संकट उष्णकटिबंधीय वनों तक ही सीमित नहीं है। नदियों के अवरुद्ध होने और विदेशी प्रजातियों के आने से मीठे जल के प्राकृतिक भंडारों में नाटकीय रूप से बदलाव आ रहा है। महासागरीय द्वीप, जहाँ विगत कई हज़ार वर्षों में अधिकांश विलुप्तियाँ हुई हैं, धरती पर सबसे अधिक ख़तरे वाले पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक हैं। प्रजातियों और आनुवंशिक विविधता की हानि, प्राकृतिक वास एवं पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण इस पीढ़ी तथा भावी पीढ़ियों के लिए एक बहुत बड़ी कीमत दर्शाता है। आज लुप्तप्राय प्रजातियों के मूल में अज्ञात खाद्य, चिकित्सा और इनका औद्योगिक उपयोग है। पारिस्थितिकी तंत्र मानव जनसंख्या के संरक्षण की अपनी क्षमता खो रहे हैं; और उनका क्षरण, मिट्टी के कटाव, जलाशयों के खारेपन, स्थानीय जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण एवं उत्पादकता में कमी के द्वारा अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। जैविक संसाधनों के मूल्य को निर्धारित करने के लिए तीन मुख्य दृष्टिकोणों का उपयोग किया गया है। उपभोग-उपयोग मूल्यांकन के अंतर्गत जलाऊ लकड़ी, चारा, शिकार किया गया मांस जैसे संसाधनों के मूल्य का आकलन करना शामिल है जिनका उपयोग बिना बाज़ार के होता है। उत्पादक-उपयोग मूल्यांकन में उन उत्पादों के मूल्य का आकलन करना शामिल है जिन्हें वाणिज्यिक दृष्टि से काटा व बेचा जाता है जैसे लकड़ी, मछली, मांस, शहद और औषधीय पौधे आदि। गैर उपभोक्ता-उपयोग मूल्यांकन में पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों जैसे जल संचय क्षेत्र संरक्षण, प्रकाश-संश्लेषण, जलवायु विनियमन और मृदा उत्पादन के प्रत्यक्ष मूल्यों का आकलन करना शामिल है। साथ ही, इस बात का संतोष है कि कुछ प्रजातियाँ बची हुई हैं। प्रायः नीति-निर्माता उत्पादक-उपयोग मूल्यों की अधिक सराहना करते हैं क्योंकि वे वानिकी, मत्स्यपालन जैसे बड़े उद्योगों से संबंधित हैं और व्यापार से जुड़े होने के कारण राष्ट्रीय आय में परिलक्षित होते हैं।
(a) जैव विविधता से क्या तात्पर्य है ? (12)
(b) विलुप्तता संकट क्या है ? (12)
(c) प्रजातियों और आनुवंशिक विविधता की हानि से क्या ख़तरे उत्पन्न होते हैं ? (12)
(d) गैर उपभोग-उपयोग मूल्यांकन का आशय स्पष्ट कीजिए। (12)
(e) नीति-निर्माताओं द्वारा किस मूल्यांकन को सबसे अधिक सराहा जाता है और क्यों ? (12)
प्रश्न – 2 : निम्नलिखित अनुच्छेद का सारांश लगभग एक-तिहाई शब्दों में लिखिए। इसका शीर्षक लिखने की आवश्यकता नहीं है। सारांश अपने शब्दों में ही लिखिए : (60)
यदि हम जानना चाहते हैं कि प्रसन्नता क्या है तो हमें इसे किसी काल्पनिक जगत् में नहीं अपितु समृद्ध और पूर्ण रूप से अच्छा जीवन जी रहे मनुष्यों के बीच ढूँढ़ना होगा। यदि आप वास्तव में एक प्रसन्न व्यक्ति को देखते हैं तो आप पाएँगे कि वह नाव बना रहा है, स्वर-रचना कर रहा है, अपने बेटे को पढ़ा रहा है, अपने बगीचे में सुन्दर पुष्प उगा रहा है। वह प्रसन्नता को कभी-कभार प्राप्त होने वाली दुर्लभ वस्तु के रूप में नहीं खोजेगा। उसको यह ज्ञात होगा कि वह दिन के चौबीसों घंटे व्यस्त रहने के दौरान भी प्रसन्न है। कोई भी व्यक्ति ऐसे कार्य में प्रसन्न नहीं रह सकता जो पूरी तरह से उसके अपने व्यक्तित्व पर केन्द्रित हो और केवल उसकी अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित हो। इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति ऐसे सामाजिक सम्बन्धों में पूर्णतया प्रसन्न नहीं रह सकता जो केवल स्वयं पर और उसके सीमित सरोकारों और संकीर्ण दायरों तक केन्द्रित हो। प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए हमें उसे अपने से बाहर खोजना होगा। यदि आप केवल अपने लिए जीते हैं तो आप सदैव अपने विचारों और रुचियों की आवृत्ति के मृत्यु सदृश ऊब के तात्कालिक ख़तरे में रहते हैं। अत्यधिक मानवीय प्रसन्नता की दिशा को एक अवसर चुनें और स्वयं को उसके साथ जोड़ लें। कोई भी व्यक्ति तब तक जीने का अर्थ नहीं समझ सकता, जब तक वह अपने अहं को अपने साथी मनुष्यों की सेवा में समर्पित नहीं कर देता। यदि आपको अपनी महत्त्वाकांक्षा पर गर्व है तो इसके लक्ष्यों की मानसिक सूची बनाएँ। आप स्वयं से पूछें कि क्या आप उन वैयक्तिक लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहते हैं और खुश रहने के अवसरों का त्याग करना चाहते हैं या कि आप खुश रहना पसन्द करते हैं और अपने अहं अर्जित प्रतिष्ठा को छोड़ना चाहते हैं। जो लोग अत्यधिक प्रसन्नता और अधिक सफलता चाहते हैं उनके लिए जीवन का केवल एक ही दर्शन हो सकता है, रचनात्मक परोपकारिता का दर्शन। एक वास्तविक प्रसन्न व्यक्ति सदैव संघर्षरत आशावादी होता है। आशावाद के अंतर्गत केवल परोपकारिता ही नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व, सामाजिक साहस और वस्तुनिष्ठता भी शामिल है। इस श्रेणी में आने वाले पुरुष और महिलाएँ वे हैं जो जीवन को दृढ़ता से स्वीकार करते हैं, वयस्कों की तरह वास्तविकता का सामना करते हैं, कठिनाइयों का सामना धैर्य के साथ करते हैं, ज्ञान को करुणा के साथ जोड़ते हैं, अपने जीवन को उत्साह के साथ हास्य की भावना से जोड़ते हैं— एक शब्द में कहें तो वे पूर्ण मनुष्य हैं। श्रेष्ठ जीवन सतत परोपकार के क्रियाशील दर्शन की माँग करता है। यही संतोषप्रद जीवन है और मनुष्य होते हुए भी प्रसन्न रहने का एकमात्र मार्ग है। प्रसन्नता के तत्त्व इतने सरल हैं कि उन्हें हाथ की उँगलियों पर गिना जा सकता है। प्रसन्नता भीतर से आती है, और सरल अच्छाई तथा स्वच्छ अंतरात्मा पर आधृत है। धर्म इसके लिए आवश्यक नहीं है, लेकिन किसी को भी नैतिक सिद्धांतों पर आधारित दर्शन के बिना इसे प्राप्त करने के लिए नहीं जाना जाता है। स्वार्थ इसका शत्रु है। दूसरों की खुशी में ही स्वयं की खुशी है। यह भीड़ में लम्बे समय तक शायद ही कभी पाया जाता है, एकांत और चिंतन के क्षणों में इसे आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इसे खरीदा नहीं जा सकता, वास्तव में पैसे का इससे बहुत कम लेना-देना है। कोई व्यक्ति तब तक सुखी नहीं हो सकता जब तक वह अपने आप से यथोचित रूप से संतुष्ट न हो, इसलिए शांति की खोज अनिवार्य रूप से आत्म-परीक्षण से आरम्भ होनी चाहिए। करने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हुआ बहुत कम है। तथापि, इस गहन आत्म-विश्लेषण पर उन गुणों की खोज निर्भर करती है जो प्रत्येक व्यक्ति को अद्वितीय बनाते हैं, और जिनके विकास से ही संतुष्टि मिल सकती है। इसलिए यदि किसी को सुख प्राप्ति के लिए कोई कार्यक्रम बनाना हो तो वह होगा – सीमित साधनों में संतुष्ट रहना, विलासिता की जगह शिष्टता की खोज करना, शानो-शौकत के बजाए परिष्करण की खोज करना, योग्य बनना, कठोर अध्ययन करना, शांति से चिंतन करना, मधुर बोलना, स्पष्ट रूप से कार्य करना, नक्षत्रों और पक्षियों, शिशुओं और ऋषियों को खुले मन से सुनना, सब कुछ प्रसन्नतापूर्वक सहना, सब कुछ साहसपूर्वक करना, कभी जल्दबाजी न करना और आध्यात्मिक, अनापेक्षित और अचेतन को सामान्य जीवन के बीच विकसित होने देना। यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी सरकार आपके लिए यह नहीं कर सकती, आपको यह अपने लिए स्वयं करना होगा। (721 शब्द)
हल—
उत्तर – 1
(a) जैव-विविधता का तात्पर्य –
जैव विविधता से आशय पृथ्वी पर पाई जाने वाली सभी जीवित प्रजातियों, उनकी आनुवंशिक विविधता तथा उनके द्वारा निर्मित पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता से है।
(b) विलुप्तता संकट –
विलुप्तता संकट वह स्थिति है जिसमें उष्णकटिबंधीय वनों, मीठे जल भंडारों और महासागरीय द्वीपों में प्रजातियाँ तेज़ी से नष्ट हो रही हैं और आने वाले दशकों में बड़ी संख्या में प्रजातियों के समाप्त हो जाने का खतरा है।
(c) प्रजातियों और आनुवंशिक विविधता की हानि से ख़तरे –
इनकी हानि से—
- प्राकृतिक वास और पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण
- मिट्टी का कटाव
- जलाशयों का खारापन
- स्थानीय जलवायु परिवर्तन
- मरुस्थलीकरण
- उत्पादकता में कमी जैसे गंभीर खतरे उत्पन्न होते हैं, जिससे वर्तमान और भावी पीढ़ियों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
(d) गैर उपभोग-उपयोग मूल्यांकन का आशय –
गैर उपभोग-उपयोग मूल्यांकन में उन पारिस्थितिकी तंत्रीय कार्यों के प्रत्यक्ष मूल्य का आकलन किया जाता है जिनका उपयोग सीधे उपभोग में नहीं होता; जैसे— जल-संचय क्षेत्र संरक्षण, प्रकाश-संश्लेषण, जलवायु विनियमन, मृदा उत्पादन आदि। इसमें इस संतोष का मूल्य भी शामिल है कि कुछ प्रजातियाँ अभी भी सुरक्षित हैं।
(e) नीति-निर्माताओं द्वारा किस मूल्यांकन को सबसे अधिक सराहा जाता है और क्यों?
नीति-निर्माता उत्पादक-उपयोग मूल्यांकन को सबसे अधिक सराहते हैं क्योंकि यह वानिकी, मत्स्यपालन जैसे बड़े उद्योगों से जुड़ा होता है और व्यापार के माध्यम से राष्ट्रीय आय में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।
उत्तर – 2
सारांश—
प्रसन्नता कल्पित संसार में नहीं, बल्कि सक्रिय, रचनात्मक और अर्थपूर्ण जीवन जीने में मिलती है। प्रसन्न व्यक्ति अपने काम, परिवार, प्रकृति और सृजनात्मक गतिविधियों में संलग्न रहता है तथा व्यस्तता में भी संतोष अनुभव करता है। केवल स्वयं की आवश्यकताओं पर केन्द्रित जीवन ऊब और असंतोष को जन्म देता है; इसलिए प्रसन्नता अपने से बाहर, व्यापक मानवीय सरोकारों और सामाजिक दायित्वों में खोजनी होती है। यदि मनुष्य केवल अपने लिए जीता है तो उसके विचार और रुचियाँ संकीर्ण होकर जीवन को नीरस बना देती हैं। वास्तविक सुख के लिए व्यक्ति को अपने अहं को त्यागकर दूसरों की सेवा और कल्याण से जुड़ना पड़ता है।
जो लोग अत्यधिक प्रसन्नता और सफलता चाहते हैं, उनके लिए रचनात्मक परोपकारिता ही जीवन-दर्शन हो सकता है। आशावाद, साहस, करुणा, वस्तुनिष्ठता और कठिनाइयों का धैर्यपूर्वक सामना— ये गुण जीवन को सार्थक बनाते हैं और मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाते हैं। प्रसन्नता सरल अच्छाई, स्वच्छ अंतरात्मा और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होती है; धन, भीड़ या विलासिता से इसका कोई संबंध नहीं। यह भीतर से उपजती है और एकांत तथा चिंतन के क्षणों में अधिक स्पष्ट होती है।
सुख की खोज आत्म-परीक्षण से आरम्भ होती है, क्योंकि व्यक्ति तभी संतुष्ट हो सकता है जब वह स्वयं से संतुष्ट हो। संतोषपूर्ण जीवन के लिए संयम, अध्ययन, चिंतन, मधुर व्यवहार, स्पष्ट कर्म, प्रकृति से संवाद, धैर्य और साहस आवश्यक हैं। प्रसन्नता कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि आत्म-विकास, परिष्करण और परोपकार से उपजने वाली आंतरिक अवस्था है, जिसे व्यक्ति को स्वयं ही अर्जित करना होता है। (शब्द : 248)
हिन्दी अनिवार्य – 2024
प्रश्न – 1: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट, सही और संक्षिप्त भाषा में दीजिए : (12×5=60)
आलोचना साहित्य का एक अंग मानी जाती है, इसलिए कि वह साहित्य को अपनी सीमा के अन्दर रखने की व्यवस्था करती है। साहित्य में जब कोई ऐसी वस्तु सम्मिलित हो जाती है जो उसके रस प्रवाह में बाधक होती है, तो वहीं साहित्य में दोष का प्रवेश हो जाता है, उसी तरह जैसे संगीत में कोई बेसुरी ध्वनि उसे दूषित कर देती है। हमारे सत्य भावों का प्रकाश ही आनन्द है। असत्य भावों में तो दुःख का ही अनुभव होता है। हो सकता है कि किसी व्यक्ति को असत्य भावों में भी आनन्द का अनुभव हो। हिंसा करके, या किसी के धन का अपहरण करके या अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित करके भी कुछ लोगों को आनन्द प्राप्त होता है; लेकिन यह मन की स्वाभाविक वृत्ति नहीं है। चोर को प्रकाश से अँधेरा कहीं अधिक प्रिय है, लेकिन इससे प्रकाश की श्रेष्ठता में कोई बाधा नहीं पड़ती। जिन भावों द्वारा हम अपने को दूसरों में मिला सकते हैं, वही सत्य भाव है। प्रेम हमें अन्य लोगों से मिलाता है, अहंकार पृथक् करता है। जिसमें अहंकार की मात्रा अधिक होती है वह दूसरों से कैसे मिलेगा? अतएव प्रेम सत्य भाव है; अहंकार असत्य भाव है। भक्ति करने के लिए किसी प्रत्यक्ष वस्तु की आवश्यकता है। दया करने के लिए भी किसी पात्र की आवश्यकता है। धैर्य और साहस के लिए भी हमें किसी सहारे की जरूरत है। तात्पर्य यह है कि हमारे भावों को जगाने के लिए उनका बाहर की वस्तुओं से सामंजस्य होना चाहिए। अगर बाह्य प्रकृति का हमारे ऊपर कोई असर न पड़े; अगर हम किसी को पुत्र-शोक में विलाप करते देखकर आँसू की चार बूँदें नहीं गिरा सकते; अगर हम किसी आनन्दोत्सव में मिलकर आनन्दित नहीं हो सकते; तो यह समझना चाहिए कि हम निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं। उस दशा के लिए साहित्य का कोई मूल्य नहीं। साहित्यकार तो वही सच्चा हो सकता है जो दुनिया के सुख-दुःख से सुखी या दुःखी हो सके और दूसरों में सुख या दुःख पैदा कर सके। स्वयं दुःख अनुभव कर लेना काफी नहीं है। कलाकार में उसे प्रकट करने का सामर्थ्य भी होना चाहिए। लेकिन भिन्न परिस्थितियाँ मनुष्य को भिन्न दिशाओं में डालती हैं। मनुष्य मात्र में भावों की समानता होते हुए भी, परिस्थितियों में भेद की वजह से प्रतिक्रिया में भेद पर असर पड़ता है। अगर हम किसानों में रहते हैं या हमें उनके साथ रहने के अवसर मिलते हैं, तो स्वभावतः हम उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने लगते हैं और उससे उसी मात्रा में प्रभावित होते हैं जितनी हमारे भावों में गहराई है। इसी तरह अन्य परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। अगर इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अमुक प्राणी किसानों का या मज़दूरों का या किसी आन्दोलन का प्रचार करता है, तो यह अन्याय है। साहित्य और प्रचार में क्या अन्तर है? प्रचार में अगर आत्मविज्ञापन न भी हो, तो एक विशेष उद्देश्य को पूरा करने की वह उत्सुकता होती है जो साधनों की परवाह नहीं करती। साहित्य शीतल, मन्द समीर है, जो सभी को शीतल और आनन्दित करती है। प्रचार आँधी है, जो हरे-भरे वृक्षों को उखाड़ फेंकती है और झोंपड़े तथा महल दोनों को ही हिला देती है। वह रस-विहीन होने के कारण आनन्द की वस्तु नहीं है, लेकिन यदि कोई चतुर कलाकार उसमें सौन्दर्य और रस भर सके, तो वह प्रचार की चीज़ न होकर सद्साहित्य की वस्तु बन जाती है।
(a) आलोचना साहित्य का अंग क्यों है? (12)
(b) आलोचना साहित्य का अंग क्यों है? (12)
(c) मन की स्वाभाविक वृत्ति क्या नहीं है? (12)
(d) लेखक की दृष्टि में सच्चा साहित्यकार कौन हो सकता है? (12)
(e) साहित्य और प्रचार में क्या अंतर है? (12)
प्रश्न – 2 : निम्नलिखित अनुच्छेद का सारांश लगभग एक-तिहाई शब्दों में लिखिए। इसका शीर्षक लिखने की आवश्यकता नहीं है। सारांश अपने शब्दों में ही लिखिए। (60)
यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मान से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ेगी या पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाले किसी धनी को यूरोप के किसी धनी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को अंग्रेज़ी के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। सम्बन्धियों, बाल-सखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई एक सफल हो जाता है और किसी अच्छे पद पर पहुँच जाता है, तो प्रायः देखा जाता है कि वह दूसरे साथी को वैसा ही पद प्राप्त करने से रोकने का प्रयास करता है। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग-सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की सम्भावना प्रतिष्ठित होने के साथ-ही-साथ ईर्ष्या और द्वेष की सम्भावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई-ही-भलाई की सम्भावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें; यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिल्कुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संसार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मान का गुप्त रूप से, बिना किसी समुदाय को विदित कराए; सुख या सन्तोष भोगने के लिए नहीं। ऐश्वर्य या गुण में हम चाहे किसी व्यक्ति से वस्तुतः बढ़कर या उसके तुल्य न हों, पर यदि समाज की यह धारणा है कि हम उससे बढ़कर या उसके तुल्य हैं तो हम संतुष्ट रहेंगे; ईर्ष्या का घोर कष्ट न उठाने जाएँगे। कैसी अनोखी बात है कि वस्तु-प्राप्ति से वंचित रहकर भी हम समाज की धारणा मात्र से संतुष्ट रहते हैं। ईर्ष्या सामाजिक जीवन की कृत्रिमता से उत्पन्न एक विष है। इसके प्रभाव से हम दूसरे की बढ़ती से अपनी कोई वास्तविक हानि न देखकर भी व्यर्थ दुःखी होते हैं।
न्यायाधीश न्याय करता है; कारीगर ईंटें जोड़ता है। समाज कल्याण के विचार से न्यायाधीश का साधारण व्यवहार में कारीगर के प्रति यह प्रकट करना उचित नहीं है कि तुम हमसे छोटे हो। जिस समूह में इस ‘छोटाई-बड़ाई’ का अभिमान जगह-जगह जमकर दृढ़ हो जाता है, उसके भिन्न-भिन्न वर्गों के बीच स्थायी ईर्ष्या स्थापित हो जाती है, और संघ शक्ति का विकास बहुत कम अवसरों पर देखा जाता है। यदि समाज में कार्यों की, जिनके द्वारा भिन्न-भिन्न प्राणी जीवन-निर्वाह करते हैं, परस्पर छोटाई-बड़ाई का ढिंढोरा न पीटा जाए, बल्कि उनकी विभिन्नता ही स्वीकार की जाए; तो बहुत-सा असंतोष दूर हो जाए। जहाँ इस छोटाई-बड़ाई का भाव बहुत प्रचार पा जाता है और जीवन-व्यवहारों में निर्दिष्ट और स्पष्ट रूपों में दिखाई पड़ता है, वहाँ लोगों की शक्तियाँ केवल कुछ विशेष-विशेष स्थानों की ओर प्रवृत्त होकर उन-उन स्थानों पर इकट्ठी होने लगती हैं और समाज के कार्यविभागों में विषमता आ जाती है। (622 शब्द)
हल—
उत्तर – 1
(a) आलोचना साहित्य का अंग
आलोचना साहित्य को उसकी सीमा में रखने, उसके दोषों की पहचान करने और रस‑प्रवाह में बाधक तत्त्वों को हटाने का कार्य करती है। इसलिए वह साहित्य का आवश्यक अंग मानी जाती है।
(b) सत्य और असत्य भाव का आशय
सत्य भाव वे हैं जिनसे हम दूसरों से जुड़ते हैं; जैसे— प्रेम, दया, सहानुभूति। असत्य भाव वे हैं जो मनुष्य को दूसरों से अलग करते हैं—जैसे अहंकार, हिंसा, स्वार्थ।
(c) मन की स्वाभाविक वृत्ति नहीं है
हिंसा, चोरी, दूसरों का अहित करके आनन्द प्राप्त करना मन की स्वाभाविक वृत्ति नहीं है।
(d) लेखक की दृष्टि में सच्चा साहित्यकार
वही सच्चा साहित्यकार है जो दुनिया के सुख‑दुःख से प्रभावित हो सके, दूसरों में भी सुख‑दुःख उत्पन्न कर सके और अपने अनुभवों को कलात्मक रूप में व्यक्त करने की क्षमता रखता हो।
(e) साहित्य और प्रचार में अंतर
- साहित्य शीतल, मन्द समीर की तरह है— रसयुक्त, सौम्य, सबको आनन्द देने वाला।
- प्रचार आँधी की तरह है— उद्देश्यपूर्ण, तीव्र, साधनों की परवाह न करने वाला और रस‑विहीन।
यदि प्रचार में सौन्दर्य और रस आ जाए, तो वह प्रचार न रहकर सद्साहित्य बन जाता है।
उत्तर – 2
सारांश—
ईर्ष्या केवल उन व्यक्तियों से होती है जिनसे हमारी तुलना होने की सम्भावना रहती है। दूरस्थ, असंबद्ध या भिन्न क्षेत्र के लोगों से ईर्ष्या नहीं होती, क्योंकि उनके साथ हमारे सामाजिक या व्यक्तिगत संसर्ग का कोई साझा आधार नहीं होता। इसलिए सम्बन्धियों, सहपाठियों, पड़ोसियों और बाल‑सखाओं के बीच ईर्ष्या अधिक पाई जाती है, जहाँ समान परिस्थितियों में रहने से किसी एक की उन्नति दूसरे को बाधक प्रतीत होती है। कई बार लोग अपनी उन्नति में बाधा खोजते‑खोजते अपने किसी पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं।
ईर्ष्या का मूल कारण समाज की वह धारणा है जिसके आधार पर व्यक्ति अपने मान‑प्रतिष्ठा का अनुमान लगाता है। वास्तविक गुण या ऐश्वर्य से अधिक समाज की राय व्यक्ति को संतुष्ट या दुःखी करती है। यह सामाजिक जीवन की कृत्रिमता से उत्पन्न विष है, जो बिना किसी वास्तविक हानि के भी मन को कष्ट देता है।
समाज में कार्यों की छोटाई‑बड़ाई का प्रचार स्थायी ईर्ष्या और वर्ग‑विभाजन को जन्म देता है। यदि विभिन्न कार्यों को केवल भिन्न मानकर स्वीकार किया जाए और उनमें श्रेष्ठ‑हीनता का भाव न जोड़ा जाए, तो असंतोष और ईर्ष्या दोनों कम हो सकते हैं। जहाँ छोटाई‑बड़ाई का भाव बढ़ता है, वहाँ लोगों की शक्तियाँ कुछ विशेष क्षेत्रों में सिमट जाती हैं और समाज में कार्य-विभाग की विषमता बढ़ जाती है। (209 शब्द)
हिन्दी अनिवार्य – 2023
प्रश्न – 1 : निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट, सही और संक्षिप्त भाषा में दीजिए : (12×5=60)
जब एक किसान खेतों में काम करता है, तो वह खाद्यान्न और उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करता है। कपास ही कपड़े के कारखानों, विद्युतकरघों में कपड़े का रूप धारण कर लेता है। गाड़ियाँ सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं। हम जानते हैं कि किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य इसका सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है। हमें निर्यात के लिए मूल्य प्राप्त होता है और आयात के लिए मूल्य चुकाना पड़ता है। इसमें हम देखते हैं कि निवल अर्जन धनात्मक हो सकता है या ऋणात्मक हो सकता है या शून्य हो सकता है। हम प्राप्त अर्जनों का योग करते हैं तो हमें उस वर्ष के लिए देश का सकल घरेलू उत्पाद प्राप्त होता है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को हम आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं। वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं, चाहे वे उच्च या निम्न किसी भी स्तर पर कार्य कर रहे हैं। यदि इनमें से कुछ लोग बीमारी, जख्म होने आदि शारीरिक कष्टों, खराब मौसम, त्यौहार या सामाजिक-धार्मिक उत्सवों के कारण अस्थायी रूप से काम पर नहीं आ पाते, तो भी उन्हें श्रमिक ही माना जाता है। इन कामों में लगे मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वालों को भी हम श्रमिक ही मानते हैं। आमतौर पर हम ऐसा सोचते हैं कि जिन्हें काम के बदले नियोक्ता द्वारा कुछ भुगतान किया जाता है, उन्हें श्रमिक कहा जाता है। पर ऐसा नहीं है। जो व्यक्ति स्व-नियोजित होते हैं, वे भी श्रमिक ही होते हैं। भारत में रोज़गार की प्रकृति बहुमुखी है। कुछ लोगों को वर्ष भर रोज़गार प्राप्त होता है, तो कुछ लोग वर्ष में कुछ महीने ही रोज़गार पाते हैं। अधिकांश मज़दूरों को अपने कार्य की उचित मज़दूरी नहीं मिल पाती। वैसे श्रमिकों की संख्या का अनुमान लगाते समय जितने भी व्यक्ति आर्थिक कार्यों में लगे होते हैं, उन सबको रोज़गार में लगे लोगों की श्रेणी में शामिल किया जाता है। वर्ष 2011-12 में भारत की कुल श्रमशक्ति का आकार लगभग 473 मिलियन आँका गया था। क्योंकि देश के अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं, इसलिए ग्रामीण श्रमबल का अनुपात भी शहरी श्रमबल से अधिक है। इन 473 मिलियन श्रमिकों में तीन-चौथाई श्रमिक ग्रामीण हैं। भारत में श्रमशक्ति में पुरुषों की बहुलता है। ग्रामीण क्षेत्र में महिला श्रमिक कुल श्रमबल का एक-तिहाई हैं, तो शहरों में केवल 20 प्रतिशत महिलाएँ ही श्रमबल में भागीदार पाई गई हैं। महिलाएँ खाना बनाने, पानी लाने, ईंधन बीनने के साथ-साथ खेतों में भी काम करती हैं। उन्हें नकद या अनाज के रूप में मज़दूरी नहीं मिलती। कितने ही मामलों में तो कुछ भी भुगतान नहीं किया जाता। इसी कारण इन महिलाओं को श्रमिक वर्ग में भी शामिल नहीं किया जाता। अर्थशास्त्रियों का आग्रह है कि इन महिलाओं को भी श्रमिक ही माना जाना चाहिए।
(a) श्रमिक कौन होता है ? (12)
(b) सकल घरेलू उत्पाद क्या है ? (12)
(c) भारत में रोज़गार की प्रकृति कैसी है ? (12)
(d) किन महिलाओं को श्रमिक नहीं माना जाता है ? (12)
(e) भारत में श्रमिक जनसंख्या अनुपात क्या है ? (12)
प्रश्न – 2 : निम्नलिखित अनुच्छेद का सारांश लगभग एक-तिहाई शब्दों में लिखिए। इसका शीर्षक लिखने की आवश्यकता नहीं है। सारांश अपने शब्दों में ही लिखिए : (60)
जो शब्द सबसे कम समझ में आते हैं और जिनका उपयोग होता है सबसे अधिक, ऐसे दो शब्द हैं— सभ्यता और संस्कृति। कल्पना कीजिए उस समय की जब मानव समाज का अग्नि देवता से साक्षात् नहीं हुआ था। आज तो घर-घर चूल्हा जलता है। जिस आदमी ने पहले पहल आग का आविष्कार किया होगा, वह कितना बड़ा आविष्कर्ता होगा! अथवा कल्पना कीजिए उस समय की जब मानव को सुई-धागे का परिचय न था। जिस मनुष्य ने लोहे के एक टुकड़े को सुई का स्वरूप दिया होगा, वह भी कितना बड़ा आविष्कर्ता होगा। इन्हीं दो उदाहरणों पर विचार कीजिए; पहले उदाहरण में दो बातें हैं: पहला, एक व्यक्ति विशेष की आग का आविष्कार कर सकने की शक्ति है और दूसरा, आग का आविष्कार। इसी प्रकार दूसरे सुई-धागे के उदाहरण में एक चीज़ है सुई-धागे का आविष्कार कर सकने की शक्ति और दूसरी चीज़ है सुई-धागे का आविष्कार। जिस योग्यता, प्रवृत्ति अथवा प्रेरणा के बल पर आग का व सुई-धागे का आविष्कार हुआ, वह है व्यक्ति विशेष की संस्कृति; और उस संस्कृति द्वारा जो आविष्कार हुआ, जो चीज़ उसने अपने तथा दूसरों के लिए आविष्कृत की, उसका नाम है सभ्यता। एक संस्कृत व्यक्ति किसी नयी चीज़ की खोज करता है; किन्तु उसकी संतान को वह खोज अपने पूर्वज से अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति की बुद्धि ने अथवा उसके विवेक ने किसी भी नए तथ्य का दर्शन किया, वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है और उसकी संतान जिसे अपने पूर्वज से वह वस्तु अनायास ही प्राप्त हो गई है, वह अपने पूर्वज की भाँति सभ्य भले ही बन जाए, संस्कृत नहीं कहला सकता। एक आधुनिक उदाहरण लें। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया। वह संस्कृत मानव था। आज के युग का भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से तो परिचित है ही; लेकिन उसके साथ उसे और भी अनेक बातों का ज्ञान प्राप्त है जिनसे शायद न्यूटन अपरिचित ही रहा। ऐसा होने पर भी हम आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी को न्यूटन की अपेक्षा अधिक सभ्य भले ही कह सकें, पर न्यूटन जितना संस्कृत नहीं कह सकते। आग के आविष्कार में कदाचित् भूख एक प्रेरणा रही। सुई-धागे के आविष्कार में शायद शीतोष्ण से बचने तथा शरीर को सजाने की प्रवृत्ति का विशेष हाथ रहा। अब कल्पना कीजिए उस आदमी की जिसका पेट भरा है, जिसका तन ढँका है; लेकिन जब वह खुले आकाश के नीचे सोया हुआ रात के जगमगाते तारों को देखता है, तो उसको केवल इसलिए नींद नहीं आती क्योंकि वह यह जानने के लिए परेशान है कि आखिर यह मोती भरा थाल क्या है? पेट भरने और तन ढँकने की इच्छा मनुष्य की संस्कृति की जननी नहीं है। पेट भरा और तन ढँका होने पर भी ऐसा मानव जो वास्तव में संस्कृत है, निठल्ला नहीं बैठ सकता। हमारी सभ्यता का एक बड़ा अंश हमें ऐसे संस्कृत आदमियों से ही मिला है, जिनकी चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रधान रहा है, किन्तु उसका कुछ हिस्सा हमें मनीषियों से भी मिला है जिन्होंने तथ्य-विशेष को किसी भौतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर की सहज संस्कृति के ही कारण प्राप्त किया है। रात के तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी हमारे आज के ज्ञान का ऐसा ही प्रथम पुरस्कर्ता था। (558 शब्द)
हल—
उत्तर— 1
(a) श्रमिक कौन होता है?
जो व्यक्ति किसी भी प्रकार की आर्थिक क्रिया में संलग्न होता है— चाहे उसे नियोक्ता से भुगतान मिले या वह स्व‑नियोजित हो—उसे श्रमिक कहा जाता है। अस्थायी रूप से काम पर न आने वाले और मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वाले लोग भी श्रमिक माने जाते हैं।
(b) सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
किसी देश में एक वर्ष के दौरान उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य उसका सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहलाता है।
(c) भारत में रोज़गार की प्रकृति कैसी है?
भारत में रोज़गार की प्रकृति बहुमुखी है—
- कुछ लोगों को पूरे वर्ष काम मिलता है।
- कुछ को केवल कुछ महीनों के लिए। अधिकांश मज़दूरों को उचित मज़दूरी नहीं मिलती और सभी आर्थिक कार्यों में लगे लोगों को रोज़गार में शामिल माना जाता है।
(d) किन महिलाओं को श्रमिक नहीं माना जाता है?
जो महिलाएँ खाना बनाने, पानी लाने, ईंधन बीनने और खेतों में काम करती हैं, परंतु उन्हें नकद, अनाज या किसी भी रूप में भुगतान नहीं मिलता, उन्हें श्रमिक वर्ग में शामिल नहीं किया जाता। अर्थशास्त्री इन महिलाओं को भी श्रमिक मानने का आग्रह करते हैं।
(e) भारत में श्रमिक जनसंख्या अनुपात क्या है?
वर्ष 2011–12 में भारत की कुल श्रमशक्ति लगभग 473 मिलियन आँकी गई थी, जिसमें से तीन‑चौथाई (75%) श्रमिक ग्रामीण क्षेत्र के थे। पुरुषों की भागीदारी अधिक है; ग्रामीण श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी लगभग एक‑तिहाई, जबकि शहरी क्षेत्रों में लगभग 20% है।
उत्तर – 2
सारांश—
सभ्यता और संस्कृति ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग बहुत होता है, पर अर्थ अक्सर स्पष्ट नहीं होता। आग और सुई‑धागे जैसे आविष्कार बताते हैं कि किसी वस्तु को खोजने की अंतःप्रेरणा, योग्यता और विवेक संस्कृति है, जबकि उस खोज से प्राप्त उपलब्धि सभ्यता कहलाती है। आविष्कारक संस्कृत व्यक्ति होता है, क्योंकि उसकी बुद्धि नई वस्तु या सिद्धांत को जन्म देती है; पर उसकी संतान उस उपलब्धि को सहज रूप से पाकर केवल सभ्य बनती है, संस्कृत नहीं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा, इसलिए वह संस्कृत व्यक्ति था; जबकि आज का विद्यार्थी अधिक ज्ञान रखते हुए भी उतना संस्कृत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह ज्ञान उसे पूर्वजों से सहज रूप में मिला है।
कुछ आविष्कार भूख, सुरक्षा या सजावट जैसी भौतिक प्रेरणाओं से हुए, पर मानव सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा उन मनीषियों से मिला है जिनकी जिज्ञासा भौतिक कारणों से परे थी। ऐसे संस्कृत व्यक्ति, जिनकी चेतना तारों को देखकर भी उत्तर खोजने को व्याकुल हो उठती थी, मानव ज्ञान के वास्तविक पुरस्कर्ता रहे हैं। इस प्रकार सभ्यता वह है जो हमें प्राप्त होती है और संस्कृति वह है जो हम स्वयं रचते हैं। (186 शब्द)
UPPSC (Mains)
सामान्य हिन्दी – 2025
प्रश्न – 1 : निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
भारतीय समाज की शक्ति का स्रोत उसका पारिवारिक जीवन है। अनेक परिवर्धनों के बीच में परिवार की यह दृढ़ शक्ति बारंबार उभरती हुई दिखाई पड़ती है। परिवार की इस शक्ति का विघटन किसी भी प्रकार समाज के लिए हितकारी नहीं हो सकता। भारतीय-परिवार सामाजिक जीवन के क्षेत्र में मूल्यवान प्रयोग है, उसे सब तरह से बढ़ाना, पल्लवित और पुष्पित करना आवश्यक है। आजकल के संक्रांति काल में तो परिवार के संगठन को और भी सुसंस्कृत करना आवश्यक है। कुल-संस्कृति का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘रामायण’ है। जैसे भारतीय संस्कृति का प्रतीक कुल है, वैसे ही भारतीय साहित्य की विशिष्ट कृति ‘रामायण’ है। धर्म तत्त्व परिवार के प्रत्येक सदस्य के समक्ष कर्तव्य का संदेश लाता है। माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन, जाति-बंधु, जिनका परिवार से नाता होता है, वे सब कर्तव्य के ऋण से बँधे होते हैं। कर्तव्य द्वारा व्यक्ति सेवा का मार्ग अपनाता है। कर्तव्य-भावना का ही दूसरा नाम यज्ञीय भावना है। जहाँ व्यक्ति दूसरे के लिए अपने स्वार्थ और सुख का समर्पण करता है, उस जीवन को स्वर्ग कहते हैं। महान् ग्रंथ जो आदर्श सिखाते हैं, उनकी भावना यही है। परिवार के प्रेममय वातावरण में सब सदस्य अपने कर्तव्य को पहचानकर उसका पालन करते हैं। दूसरों से छीन-झपटकर अपने लिए कुछ प्राप्त करने की बात वे मन में नहीं लाते । यही पारिवारिक जीवन का रस है। जहाँ एक व्यक्ति दूसरे की सहायता और सेवा करने की बात सोचता है, वही आदर्श स्थिति स्वर्ग है। इसके विपरीत जब हम प्रत्येक वस्तु को अपने स्वार्थ की दृष्टि से देखते हैं और अधिकार की बात कहकर केवल पाने या लेने की इच्छा रखते हैं, तो हमारे उस आचरण से संघर्ष और विरोध उत्पन्न हो जाता है। उस तनाव की स्थिति में जो न हो जाए, थोड़ा है।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए। (5)
(ख) कर्तव्य-भावना क्यों उपयोगी है? (5)
(ग) गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20)
प्रश्न – 2 : निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गरीबी हमारा मानसिक रोग है। यदि आप इस रोग से पीड़ित हैं अथवा इस रोग के शिकार हैं, तो अपने मानसिक भाव को बदल दीजिए। दुःख-दरिद्रता तथा लाचारी के विचार मन में लाने के स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, स्वाधीनता तथा आनंद के विचारों से अपने मानस-क्षेत्र को प्रकाशित कीजिए। फिर यह देखकर आपके आश्चर्य का पार न रहेगा कि आपकी उन्नति कितने जोरों से हो रही है।
हमें विजय और सफलता पूर्णतया मन की वैज्ञानिक प्रक्रिया से प्राप्त होती है। जो मनुष्य समृद्धिशाली और सौभाग्यशाली होता है उसका यह अखण्ड विश्वास होता है कि वह समृद्धिशाली और सौभाग्यशाली हो रहा है। उसे अपनी कमाने की योग्यता पर विश्वास रहता है। वह अपने समय को गरीबी की बातों तथा विचारों में नहीं गँवाता। दरिद्रता से लड़खड़ाता हुआ नहीं चलता। वह अपनी शक्ति को उस वस्तु की ओर मोड़ता है, जिसके लिए कोशिश कर रहा है तथा जिसकी प्राप्ति में उसका पूरा विश्वास एवं दृढ़ निश्चय है। देश में ऐसे गरीब लोग हैं, जो अपनी गरीबी से अर्ध-संतुष्ट हो गए हैं और जिन्होंने उसके विकराल पंजों से निकलने का प्रयत्न ही छोड़ दिया है। अब वे चाहे कितना ही कठिन परिश्रम करें, उन्होंने तो अपनी आशा खो दी है — स्वाधीनता प्राप्त करने की उमंग नष्ट कर दी है।
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। (5)
(ख) गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने का क्या आशय है? (5)
(ग) गद्यांश का संक्षेपण (एक-तिहाई शब्दों में) कीजिए। (20)
हल—
उत्तर— 1 (क) – गद्यांश का आशय
भारतीय समाज का वास्तविक आधार और शक्ति हमारा पारिवारिक जीवन है। परिवार केवल सदस्यों का समूह नहीं है, बल्कि यह कर्त्तव्य, त्याग और परस्पर सेवा-भाव का केंद्र है। रामायण जैसे महान ग्रंथ हमें पारिवारिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करना सिखाते हैं। जब परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अधिकारों की बजाय दूसरों के प्रति अपने कर्त्तव्योंऔर त्याग पर ध्यान देता है, तो जीवन में सुख और शांति (स्वर्ग जैसा वातावरण) बनी रहती है। इसके विपरीत जब लोग स्वार्थी होकर केवल पाने और छीनने की होड़ में लग जाते हैं, तो समाज में तनाव और संघर्ष पैदा होता है। इसलिए आज के दौर में परिवार की इस शक्ति को बचाए रखना और मजबूत बनाना बेहद जरूरी है।
उत्तर— 1 (ख) – कर्तव्य-भावना का उपयोग
कर्तव्य-भावना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है—
- सेवा और त्याग का मार्ग – यह व्यक्ति को केवल अपने बारे में न सोचकर दूसरों की सहायता और सेवा करने के लिए प्रेरित करती है।
- पारिवारिक एवं सामाजिक सामंजस्य – जब परिवार के सभी सदस्य (माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि) अपने-अपने कर्त्तव्यों को पहचानकर उनका पालन करते हैं, तो आपसी प्रेम और सहयोग बढ़ता है।
- स्वार्थ और संघर्ष से बचाव – कर्त्तव्य-भावना व्यक्ति को दूसरों का हक छीनने से रोकती है और समाज को तनाव व आपसी विरोध से बचाती है।
- यज्ञीय (पवित्र) जीवन – अपने सुख और स्वार्थ को दूसरों के लिए समर्पित करना ही ‘यज्ञीय भावना’ है, जो जीवन को आदर्श और सुखद बनाती है।
उत्तर— 1 (ग) – रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
जहाँ व्यक्ति ……… विरोध उत्पन्न हो जाता है।
व्याख्या –
सच्चा ‘स्वर्ग’ किसी भौगोलिक स्थान पर नहीं, बल्कि हमारे विचारों और आचरण से बनता है। जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, इच्छाओं और सुख-सुविधाओं का त्याग दूसरों की भलाई के लिए करता है, तो वही पारिवारिक या सामाजिक वातावरण ‘स्वर्ग’ बन जाता है। ऐसी स्थिति में आपसी प्रेम और सौहार्द्र का वातावरण होता है।
इसके विपरीत यदि मनुष्य का दृष्टिकोण केवल स्वार्थी हो जाए और वह हर जगह केवल अपने ‘अधिकारों’ की बात करे तथा दूसरों से केवल प्राप्त करने या छीनने की कोशिश करे तो रिश्तों में दरार आ जाती है। यह स्वार्थी आचरण परिवार और समाज में आपसी टकराव, मनमुटाव और भारी तनाव पैदा करता है।
उत्तर — 2 (क)
शीर्षक : ‘सकारात्मक सोच और समृद्धि’ अथवा ‘गरीबी : मानसिकता और समाधान’ अथवा ‘गरीबी : एक मानसिक स्थिति और उसका समाधान’
उत्तर — 2 (ख) – गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने का आशय
गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने’ का आशय उस मानसिक स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति अपनी अभावग्रस्त और कठिन परिस्थितियों को ही अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेता है। ऐसे लोग गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करना छोड़कर अपनी उन्नति की आशा खो बैठते हैं और परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं।
उत्तर — 2 – (ग) गद्यांश का संक्षेपण
गरीबी वास्तव में एक मानसिक स्थिति है। दुःख और दरिद्रता के विचारों को त्यागकर यदि मन को सुख, समृद्धि और आत्म-विश्वास से भरा जाए तो सफलता निश्चित मिलती है। सफल मनुष्य अपनी योग्यता पर विश्वास रखता है और नकारात्मक विचारों में समय नष्ट करने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। इसके विपरीत जो लोग अपनी गरीबी को नियति मानकर प्रयास छोड़ देते हैं वे कभी प्रगति नहीं कर पाते। (72 शब्द)
सामान्य हिन्दी – 2024
प्रश्न – 1 : निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सही प्रकार का समाजीकरण होने पर समाज के सदस्य सामाजिक नियमों के अनुरूप व्यवहार करते हैं। यदि गलत समाजीकरण हो जाता है तो विपथगामी व्यवहार में वृद्धि होती है। इसलिए समाजीकरण के दायित्व से संबंधित जो व्यक्ति होते हैं उन पर सामाजिक नियंत्रण का बहुत बड़ा दायित्व होता है। बॉटोमोर के अनुसार शिक्षा बच्चे के प्रारम्भिक समाजीकरण का सबसे दृढ़ आधार है। शैक्षिक व्यवस्था नैतिक विचारों को स्पष्ट करके और केतु का बौद्धिक विकास करके सामाजिक नियमन में योगदान देती है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को विभिन्न इकाइयों से परिचित करवाना है। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक महत्त्व ही नहीं, अपितु उसकी व्यावहारिक उपयोगिता भी है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य जहाँ व्यक्ति को दबावपूर्ण ढंग से सामाजिक नियमों मानने के लिए बाध्य करते हैं, वहाँ शिक्षा उसे स्वतः आत्म-विश्लेषण द्वारा अप्रभावात्मक ढंग से सामाजिक नियमों का पालन करने की प्रेरणा देती है। एक तो समाजीकरण हमें करणीय व्यवहार की जानकारी कराता है, दूसरे विपथगामी व्यवहार की निंदा की भी हमसे अपेक्षा रखता है। अतः करणीय व्यवहार के बीच संतुलन रखकर समाजीकरण, जो शिक्षा का एक भाग है, समाज में सबसे बडी नियंत्रक शक्ति के रूप में कार्य करता है। समाजीकरण हमें अव्यवस्था की अत्यन्त विषम स्थिति से बचाकर सामान्य रूप से सामाजिक क्रियाओं के संचालन में सहायक होता है। परिणामस्वरूप सामाजिक नियंत्रण बना रहता है। शिक्षा का सामाजिक नियंत्रण से दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य हमारे जीवन में ज्ञान का विकास करना है। जब हममें ज्ञान का विकास होगा तब हम इस स्थिति में होंगे कि अच्छे-बुरे, उचित अनुचित की पहचान कर सकें। जब हम उचित को अनुचित से अलग कर लेंगे तब हम अनुचित व्यवहार को जीवन से हटा देंगे तथा उचित व्यवहार का प्रयोग करेंगे। उचित व्यवहार वही होगा जो सामाजिक मानदण्डों के अनुरूप है। अतः हम ज्ञान के विकास के साथ उचित व्यवहार को समझेंगे तथा उसका पालन करेंगे जिससे सामाजिक नियंत्रण स्वतः बना रहेगा। शिक्षा हमें तर्क प्रदान करती है तथा भावुक, अतार्किक एवं व्यक्तिपरक निर्णयों से मुक्त होने की प्रेरणा देती है। इसलिए हम देखते हैं कि एक अशिक्षित व्यक्ति आवेश में आकर कुछ भी अहित कर बैठता है, जबकि शिक्षित व्यक्ति कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी धैर्यपूर्वक निर्णय लेकर अपने विवेक का परिचय देता है। संक्षेप में, शिक्षा व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण सिखाती है। चूँकि व्यक्ति समाज की इकाई है, अतः व्यक्ति के स्तर पर नियंत्रण रहने से सामाजिक नियंत्रण तो स्वतः हो जाता है।
(क) उपरिलिखित गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए। (5)
(ख) समाजीकरण के लिए सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधन से शिक्षा क्यों भिन्न है? (5)
(ग) गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। (20)
प्रश्न – 2 :
सहयोग से ही जीवन है, स्पर्धा तो अन्ततः विनाश और मृत्यु की ओर ले जाती है। हम अपने साथ अन्य को भी ले, यदि वह पिछड़ जाता है तो उसकी मदद करें। यदि हम सभी परस्पर यह भाव अपनाते हैं तो हम एक-दूसरे के संकट में साथी बनकर एक दूसरे को बचाएंगे और विकास के मार्ग पर एक-दूसरे को प्रोत्साहित करेंगे। सहयोग की इस प्रक्रिया में ही जीवन सुरक्षित है। यदि हम अपना ही स्वार्थ सामने रखकर अन्य की टाँग खींचते हुए स्वयं को ही आगे बढ़ाएँगे तो यह स्पर्धा होगी और यह स्पर्धा एक-दूसरे को खिलाफ करते हुए आपस में लड़ने-भिड़ने और अन्ततः एक-दूसरे का विनाश करने का कारण बनेगी। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध अपने-अपने साम्राज्य, उपनिवेश तथा व्यापार को बढ़ाने के संघर्ष का परिणाम थे जिसमें व्यापक नरसंहार हुआ। वस्तुतः स्पर्धा मानव संस्कृति के लिए विनाश का मार्ग है। व्यक्तियों एवं राष्ट्रों के बीच आपसी सहयोग से ही मानव संस्कृति सुरक्षित है। वर्तमान में यह जो भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण का नारा है, वह विकसित देशों के आर्थिक साम्राज्य को बढ़ाने का नवीनतम अभियान है जिसमें विकसित देशों के आपसी हित भी टकरा रहे हैं तथा जिसमें नए विश्व संकट की आशंकाएँ उभर रही हैं।
उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। (5)
(ख) स्पर्धा और सहयोग में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (5)
(ग) गद्यांश का संक्षेपण (लगभग एक-तिहाई शब्दों में) कीजिए। (20)
हल—
उत्तर— 1 (क)
समाजीकरण आजीवन चलने वाली वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने समाज के नियमों, मूल्यों और व्यवहारों को सीखते हुए उनके अनुसार आचरण करने लगता है। इन नियमों को न मानने पर व्यक्ति समाज या समूह के सामान्य या स्वीकृत मानदंडों से हट जाता है। सही प्रकार का समाजीकरण सामाजिक सामंजस्य और स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
शिक्षा, समाजीकरण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री बॉटोमोर का मानना है कि शिक्षा व्यक्ति की नैतिक सोच को विकसित करने के साथ ही उसे आत्मनियंत्रण और अनुशासन भी सिखाती है। शिक्षा व्यक्ति के बौद्धिक, भावनात्मक और नैतिक विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा के माध्यम से, व्यक्ति न केवल ज्ञान और कौशल प्राप्त करता है, बल्कि सामाजिक रूप से स्वीकार्य और संतुलित तरीके से व्यवहार करना भी सीखता है।
शिक्षा व्यक्ति की तार्किक सोच और निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करने में मदद करती है, जिसके माध्यम से व्यक्ति उचित और अनुचित के मध्य अंतर करना सीखता है। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति को आत्म नियंत्रित बनाती है और समाज को सुचारू रूप से संचालित करने में सहायक होती है।
उत्तर — 1 (ख)
शिक्षा समाजीकरण के लिए सामाजिक नियंत्रण का एक विशेष और महत्त्वपूर्ण साधन है क्योंकि यह व्यवस्थित, औपचारिक और जानबूझकर किया जाता है, जबकि अन्य सामाजिक नियंत्रण के साधन अनौपचारिक और सामान्य हो सकते हैं।
शिक्षा और सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधनों के बीच भिन्नताएँ :
(क) शिक्षा विविध शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से औपचारिक रूप में प्रदान की जाती है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधन, जैसे कि परिवार, समुदाय, और मीडिया, अनौपचारिक और सहज होते हैं।
(ख) शिक्षा जानबूझकर समाजीकरण के उद्देश्य से प्रदान की जाती है, जबकि सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधन अनजाने में या पारंपरिक रूप में काम करते हैं।
(ग) शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य ज्ञान और कौशल प्रदान करना है, लेकिन इसका एक महत्त्वपूर्ण पहलू समाजीकरण भी है, जिसके अंतर्गत सामाजिक मानदंडों, मूल्यों और व्यवहारों को सिखाना शामिल है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधनों का मुख्य लक्ष्य सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना और विचलन को रोकना है।
(घ) शिक्षा एक योजनानुसार व्यवस्थित की गयी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत एक पाठ्यक्रम, शिक्षक और मूल्यांकन प्रणाली होती है। सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधनों में कोई औपचारिक संरचना नहीं होती है।
(ङ) शिक्षा का दायित्व आमतौर पर शिक्षकों और संस्थानों पर होता है, जबकि सामाजिक नियंत्रण के अन्य साधनों का दायित्व पूरे समाज पर होता है।
उत्तर — 1 (ग)
इसलिए हम देखते हैं कि ……………………. स्वतः हो जाता है।
व्याख्या— शिक्षा व्यक्ति को अपने आवेगों और भावनाओं पर नियंत्रण रखने में मदद करती है, जिससे वह भली-भाँति सोच-समझकर निर्णय लेता है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त करता है, जिसकी सहायता से वह अपने जीवन में स्थिरता और संतुलन बनाए रख सकता है। शिक्षा व्यक्ति को विवेक की महत्ता सिखाती है, जिससे वह सही और गलत के बीच का अंतर समझ पाता है। इससे व्यक्ति अपने निर्णय लेते समय नैतिकता और मूल्यों को ध्यान में रखता है और समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका निभा पाता है। अब चूँकि व्यक्ति समाज की इकाई है और वह व्यक्ति शिक्षित होकर स्वयं पर नियंत्रण रखता है तो सामाजिक नियंत्रण भी स्वतः ही हो जाता है।
उत्तर — 2 (क)
शीर्षक : “स्पर्धा और सहयोग” या “सहयोग का महत्त्व”
उत्तर — 2 (ख)
स्पर्धा और सहयोग में अंतर :
स्पर्धा और सहयोग दो अलग-अलग मानवीय दृष्टिकोण हैं—
- स्पर्धा में, व्यक्ति या समूह एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जबकि सहयोग में वे एक साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करते हैं।
- स्पर्धा में प्रायः एक दूसरे को हराने की भावना होती है, जबकि सहयोग में एक दूसरे की मदद करने और समर्थन करने की भावना होती है।
- जहाँ स्पर्धा विभाजन और विनाश की ओर लेकर जाती है वहीं सहयोग सामाजिक और सांस्कृतिक स्थायित्व का आधार बनता है।
- सहयोग व्यक्तियों में परस्पर विश्वास और एकता को बढ़ाकर समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
उत्तर — 2 (ग)
संक्षेपण :
सहयोग से जीवन है, जबकि स्पर्धा में विनाश और मृत्यु। पारस्परिक सहयोग में जीवन की सुरक्षा है और विकास की संभावना भी है। नकारात्मक स्पर्धा विनाश का कारण बनती है। इसी मानसिकता से विश्व युद्धों में व्यापक जन-धन-हानि हुई। इसलिए सहयोग में ही मानव संस्कृति का भविष्य सुरक्षित है। वैश्वीकरण और उदारीकरण जैसे नारे भी विकसित देशों के स्वार्थ-पूर्ति के साधन हैं जिससे नवीन विश्व संकट की आशंकाएँ उत्पन्न हो रही हैं। (72 शब्द)
