कृत प्रत्यय
अ
- कर्तृवाचक संज्ञा : (ग्रह से) ग्राह, (चर् से) चर, (चुर् से) चोर, (दीप् से) दीप, (दिव् से) देव, (धृ से) धर, (नद् से) नद, (बुध् से) बुध, (रम् से) राम, (व्यध् से) व्याध, (सृप् से) सर्प, (स्मृ से) स्मर, (हृ से) हर।
- भाववाचक संज्ञा : (कम् से) काम, (क्री से) क्रय, (क्रुध् से) क्रोध, (क्षुभ् से) क्षोभ, (खिद् से) खेद, (ग्रिभ से) गर्भ, (चि से) चय (संचय), (जप् से) जप, (जि से) जय, (तप् से) तप / ताप, (तिज् से) तेज, (त्यज् से) त्याग, (त्रस् से) त्रास, (दह् से) दाह, (दुष से) दोष, (दृप् से) दर्प, (देश् से) देश, (द्विष् से) द्वेष, (नी से) नय, (नश् से) नाश, (पठ् से) पाठ, (प्रमुद् से) प्रमोद, (प्रविश् से) प्रवेश, (बुध् से) बोध, (भी से) भय, (भिद् से) भेद, (भुज् से) भोज, (भू से) भाव, (मुह् से) मोह, (रु से) रव, (लभ् से) लाभ, (लिख से) लेख, (लिप् से) लेप, (लुभ् से) लोभ, (वद् से) वाद, (विद् से) वेद, (सम् + तुष् → संतुष् से) संतोष
- टिप्पणी— अ संस्कृत के ‘अच्’ और ‘घञ्’ प्रत्यय से आया है।
अक
- कर्तृवाचक संज्ञा— (अंक् से) अंकक, (अधीक्ष् से) अधीक्षक, (अधि + आप् = अध्याप् से) अध्यापक, (आलुच् से) आलोचक, (उत्तिज् से) उत्तेजक, (कृ से) कारक, (क्षिप् से) क्षेपक, (गा/गै से) गायक, (ग्रह् से) ग्राहक, (हन् से) घातक, (चल् से) चालक, (छद् से) छादक, (छिद् से) छेदक, (जन् से) जनक, (तृ से) तारक, (दा से) दायक, (दीप् से) दीपक, (दृश से) दर्शक, (धृ से) धारक, (नृत् से) नर्तक, (नी से) नायक, (नश् से) नाशक, (निविश से) निवेशक, (निंद् से) निंदक, (निर् + ईक्ष् = निरीक्ष् से) निरीक्षक, (परि + ईक्ष् = परीक्ष् से) परीक्षक, (पच् से) पाचक, (पठ् से) पाठक, (पच् से) पाचक, (पू से) पावक, (पूज् से) पूजक, (प्रेर् से) प्रेरक, (भिद् से) भेदक, (भ्रम् से) भ्रामक, (मंथ से) मंथक, (मद् से) मादक, (मृ से) मारक, (मुच् से) मोचक, (मुद् से) मोदक, (मुष् से) मुषक, (यज् से) याजक, (युज् से) योजक, (रक्ष् से) रक्षक, (रिच् से) रेचक, (लिख् से) लेखक, (वच् से) वाचक, (वह् से) वाहक, (शिक्ष् से) शिक्षक, (शुष् से) शोषक, (श्रु से) श्रावक, (संपाद् से) संपादक, (सर्व + ईक्ष् = सर्वेक्ष् से) सर्वेक्षक, (साध् से) साधक, (स्मृ से) स्मारक
- विशेषण— (आ + कृष् → आकृष् से) आकर्षक, (द्युत् से) द्योतक, (परि + चर् → परिचय् से) परिचायक, (बुध् से) बोधक, (रुच् से) रोचक
- ‘अक’ संस्कृत के ‘ण्वुल्’ प्रत्यय से आया है।
- मुषक = मुष् + अक (ण्वुल्); मूषक = मूष + क (कन्)
- शिक्षक— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में (शिक्षा से) शिक्षक को तद्धितांत बताया गया है। परन्तु वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में इसे कृदंत बताया गया है— शिक्ष् (धातु) + अक (ण्वुल्) = शिक्षक। मीमांस् से बना मीमांसक भी कृदंत है न कि तद्धितांत, परन्तु कामताप्रसाद गुरु ने इसे भी तद्धितांत बताया है।
अत्
- वर्तमान कृदंत
- अर्थ— करता हुआ, होता हुआ
- (अद् से) अदत्, (अश् से) अश्नत्, (अस् से) असन्, (आप् से) आप्नुवत्, (इष् → इच्छ् से) इच्छत्, (कथ् से) कथयत्, (कृष् से) कर्षत्, (कृ से) कुर्वत्, (कृत् से) कृन्तत्, (क्री से) क्रीणत्, (गम् → गच्छ से) गच्छत्, (ग्रह् से) गृह्णत्, (चिन्त् से) चिन्तयत्, (चि से) चिन्वत्, (चुर् से) चोरयत्, (छिद् से) छिन्दत्, (जागृ से) जाग्रत्, (ज्ञा से) जानत्, (घ्रा जिघ्र से) जिघ्रत्, (जि से) जयत्, (हा से) जहत्, (जृ से) जीर्यत्, (तन् से) तन्वत्, (ताड् से) ताडयत्, (स्था → तिष्ठ से) तिष्ठत्, (तुद् से) तुदत्, (दंश् से) दंशत्, (दण्ड् से) दण्डयत्, (दा से) ददत्, (दिव् से) दीव्यत्, (दुह् से) दुहत्, (नी से) नयत्, (नश् से) नश्यत्, (नृत् से) नृत्यत्, (पच् से) पचत्, (दृश् → पश्च से) पश्यत्, (पत् से) पतत्, (पा → पिब् से) पिबत्, (पुष् से) पुष्यत्, (पूज् से) पूजयत्, (प्रच्छ् से) पृच्छत्, (प्री से) प्रीणत्, (भक्ष् से) भक्षयत्, (भुज् से) भुंजत्, (बंध् से) बध्नत्, (व्यध् से) बिध्यत्, (ब्रू से) ब्रवत्, (भिद् से) भिन्दत्, (भंज् से) भंजत्, (भ्रम् से) भ्रमत्/भ्राम्यत्, (मुच् से) मुंचत्, (मुष् से) मुष्णत्, (यज् से) यजत्, (इ से) यत्, (याच् से) याचत्, (युज् से) युञ्जत्, (रच् से) रचयत्, (रुद् से) रुदत्, (रुध् से) रुन्धत्, (वद् से) वदत्, (वप् से) वपत्, (वस् से) वसत्, (विद् से) विदत्, (भी से) विभ्यत्, (शक् से) शक्नुवत्, (शम् से) शाम्यत्, (शास् से) शासत्, (शुच् से) शोचत्, (श्रु से) शृण्वत्, (सिच् से) सिंचत्, (स्पृश् से) स्पृशत्, (स्पृह् से) स्पृहत्, (हन् से) हनत्, (ह्वे से) ह्वयत्
- अत् संस्कृत के ‘शतृ’ प्रत्यय से आया है।
- टिप्पणी— इस प्रत्यय का प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। तथापि जगत्, जगती (जगत् + ई), दमयंती (दम् + णिच् + शतृ + ई) आदि कई संज्ञाएँ मूल कृदंत हैं।
अन
- कर्तृवाचक संज्ञा : (दम् से) दमन (रिपुदमन), (नंद् से) नंदन, (निकन्द् से) निकन्दन, (पाल् से) पालन, (पू से) पावन, (मद् से) मदन, (मुह् से) मोहन, (रम् से) रमण, (रु से) रावण, (श्रु से) श्रवण, (साध् से) साधन, (सूद् से) सूदन (मधुसूदन)।
- भाववाचक संज्ञा : (अन् + अश् से) अनशन, (अनुसृ से) अनुसरण, (अभिसृ से) अभिसरण, (अन्विष् से) अन्वेषण, (अस् से) असन, (आ + राध् से) आराधन, (आ + रुह् से) आरोहण, (आस् से) आसन, (आसु से) आसवन, (उत् + स्था से) उत्थान, (कृ से) करण, (कृष् से) कर्षण, (क्रंद् से) क्रंदन, (क्षर् से) क्षरण, (खंड् से) खंडन, (खन् से) खनन, (गम् से) गमन, (ग्रह् से) ग्रहण, (चल् से) चलन, (चि से) चयन, (तृ से) तरण, (जीव् से) जीवन, (तुष से) तोषण, (दम् से) दमन, (दृश् से) दर्शन, (दह् से) दहन, (दा से) दान, (दुह् से) दोहन, (धृ से) धारण, (पठ् से) पठन, (पत् से) पतन, (पाठ् से) पाठन, (पा से) पान, (पाल् से) पालन, पुष् से पोषण, (प्र + दुष् से) प्रदूषण, (प्र + लुभ् से) प्रलोभन, (प्रहस् से) प्रहसन, (प्रेष् से) प्रेषण, (बंध् से) बंधन, (बुध् से) बोधन, (भाष् से) भाषण, (भू से) भवन, (भुज् से) भोजन, (मंथ् से) मंथन, (मन् से) मनन, (मिल् से) मिलन, (मृ से) मरण, (मुह् से) मोहन, (रक्ष् से) रक्षण, (रम् से) रमण, (शास् से) शासन, (शिक्ष् से) शिक्षण, (शी से) शयन, शुष् से शोषण, (श्रु से) श्रवण, (सह् से) सहन, (साध् से) साधन, (स्खल् से) स्खलन, (स्था से) स्थान, (स्पंद् से) स्पंदन, (हृ से) हरण, (हु से) हवन।
- करणवाचक संज्ञा— (चर् से) चरण, (नी से) नयन, (भूष् से) भूषण, (या से) यान, (वद् से) वदन, (वह् से) वहन
- अन संस्कृत के ‘ल्युट्’ प्रत्यय से आया है।
- ‘मोहन’ शब्द पर ध्यान दीजिए। यह भाववाचक और कर्तृवाचक दोनों श्रेणियों में आया है।
- मोहन – भाववाचक संज्ञा के रूप में; यहाँ मोहन का अर्थ है – ‘मोहित करने की प्रक्रिया या आकर्षण का भाव’, उदाहरण – उसकी वाणी में अद्भुत मोहन है।
- मोहन – कर्तृवाचक संज्ञा के रूप में; यहाँ मोहन व्यक्ति का नाम है— उदाहरण – मोहन आया।
- इसलिए एक ही शब्द दो या अधिक श्रेणियों में हो सकते हैं, यह उसके अर्थ और वाक्य प्रयोग पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ— मोहन, श्रवण, पालन, साधन इत्यादि।
अना
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अर्च् से) अर्चना, (अव + हेल् से) अवहेलना, (आ + राध् से) आराधना, (आलुच् से) आलोचना, (कम् से) कामना, (कल्प् से) कल्पना, (गण् से) गणना, (गवेष् से) गवेषणा, (घट् से) घटना, (घुष् से) घोषणा, (घृ से) घृणा, (तुल् से) तुलना, (तृष् से) तृष्णा, (धृ से) धारणा, (प्र + अर्थ से) प्रार्थना, (प्रे से) प्रेरण, (भर्त्स से) भर्त्सना, (भू से) भावना, (यत् से) यातना, (युज् से) योजना, (रच् से) रचना, (वंच् से) वंचना, (वंद् से) वंदना, (वस् से) वासना, (विद् से) वेदना, (विचर् से) विचारणा, (सूच् से) सूचना, (स्थाप् से) स्थापना।
- वास्तव में यह “अन” प्रत्यय ही का स्त्रीलिंग रूप है। ऐसे ही शब्द अन जुड़ने से बनते हैं; जैसे— अर्चन, वंदन, धारण, स्थापन, वंचन, विचारण इत्यादि।
अनीय
- क्रिया से विशेषण बनानेवाला
- अर्थ— करने योग्य
- (अंक् से) अंकनीय, (अप + ईक्ष् = अपेक्ष् से) अपेक्षणीय, (अभि + नंद् = अभिनंद् से) अभिनंदनीय, (अर्च् से) अर्चनीय, (अर्प से) अर्पणीय, (अ + सह् = असह् से) असहनीय, (आ + चर् = आचर् से) आचरणीय, (आ + दृ = आदृ से) आदरणीय, (आ + श्वस् = आश्वस् से) आश्वासनीय, (उप + ईक्ष् = उपेक्ष् से) उपेक्षणीय, (उल्लिख् से) उल्लेखनीय, (कथ् से) कथनीय, (कृ से) करणीय, (खंड् से) खंडनीय, (गुप् से) गोपनीय, (ग्रह् से) ग्रहणीय, (घ्रा से) घ्राणीय, (चिंत् से) चिंतनीय, (तृप् से) तर्पणीय, (त्यज् से) त्याजनीय, (दम् से) दमनीय, (दृश् से) दर्शनीय, (धृ से) धारणीय, (निंद् से) निंदनीय, (पच् से) पचनीय, (पठ् से) पठनीय, (पा से) पानीय, (पूज् से) पूजनीय, (पाल् से) पालनीय, (भक्ष् से) भक्षणीय, (भ्रम् से) भ्रमणीय, (मृ से) मरणीय, (मन् से) माननीय, (युज् से) योजनीय, (रक्ष् से) रक्षणीय, (रम् से) रमणीय, (लिख् से) लेखनीय, (वंट् से) वंटनीय, (वंद् से) वंदनीय, (वद् से) वदनीय, (वृ से) वरणीय, (वि + चर् → विचर् से) विचारणीय, (शम् से) शमनीय, (शिक्ष् से) शिक्षणीय, (शुच् से) शोचनीय, (श्रु से) श्रवणीय, (सम् + चल् → संचल् से) संचालनीय, (स्पृह् से) स्पृहणीय, (स्मृ से) स्मरणीय।
- अनीय संस्कृत के ‘अनीयर्’ प्रत्यय से आया है।
- टिप्पणी— ज्ञा + य (यत्) = ज्ञेय;
ज्ञानीय। हिन्दी का ‘सराहनीय’ शब्द इसी अनीय प्रत्यय से निर्मित है; सराहना (हिन्दी) + अनीय (संस्कृत प्रत्यय) → सराहनीय।
अस्
- विविध अर्थ में
- (ऋ से) उरस्, (छद् से) छंदस्, (तप् से) तपस्, (तम् से) तमस्, (तिज् से) तेजस्, (पय् से) पयस्, (वच् से) वचस्, (अज् → वय् से) वयस्, (शृ से) शिरस्) (सृ से) सरस
- अस् संस्कृत के ‘असुन्’ प्रत्यय से आया है।
आ
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अभिलष् से) अभिलाषा, (इष् → इच्छ् से) इच्छा, (ईर्ष्य् से) ईर्ष्या, (उष् से) उषा, (कथ् से) कथा, (क्रीड् से) क्रीड़ा, (क्षम् से) क्षमा, (गुह् से) गुहा, (चिन्त् से) चिन्ता, (तृष् से) तृषा, (दिश से) दिशा, (दीक्ष से) दीक्षा, निंद् से निंदा, (पीड् से) पीड़ा, (पूज् से) पूजा, (प्रशंस् से) प्रशंसा, (भाष् से) भाषा, (भिक्ष् से) भिक्षा, (भूष् से) भूषा, (मूर्च्छ् से) मूर्छा, (रक्ष् से) रक्षा, (वर्ष् से) वर्षा, (वांछ् से) वांछा, (व्यथ् से) व्यथा, (शिक्ष् से) शिक्षा, (शी से) शय्या, (शुभ से) शोभा, (श्रध् से) श्रद्धा, (सेव् से) सेवा, (हिंस् से) हिंसा।
- उपर्युक्त सभी शब्द स्त्रीलिंग है, अर्थात् यह (आ) स्त्रीलिंग बनानेवाला प्रत्यय है।
- यह संस्कृत का “टाप्” प्रत्यय है। इसमें ट् और प् दोनो का लोप होकर केवल ‘आ’ की मात्रा बचती है।
आलु
- विशेषण बनानेवाला
- अर्थ— वाला या युक्त
- (ईर्ष्य् से) ईर्ष्यालु, (क्रप् से) कृपालु, (तृष् से) तृषालु, (दय् से) दयालु, (शंक् से) शंकालु, (शी से) शयालु, (स्पृह् से) स्पृहयालु, (हिंस् से) हिंसालु
- आलु संस्कृत के ‘आलुच’ प्रत्यय से आया है।
- टिप्पणी— स्पृहयालु शब्द है,
स्पृहालुनहीं। स्पृहयालु = स्पृह् + अय (णिच्) + आलु (आलुच्)।
इ
- कर्तृवाचक संज्ञा
- (कु से) कवि, (हृ से) हरि
- इ संस्कृत के इन्/इण् प्रत्यय से आया है।
इ
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (कृष् से) कृषि, (गृ से) गिरि, (झट् से) झटि, (त्रुट् से) त्रुटि, (पण् से) पणि, (भज् से) भंगि, (बल् से) बलि, (राज् से) राजि, (रुच् से) रुचि, (लुंठ से) लुंठि, (वीच् से) वीचि, (शुच से) शुचि, (सृ से) सरि, (सुध से) सुधि।
- ये शब्द स्त्रीलिंग हैं।
इत्
- विशेषण बनानेवाला कृदंत / भूतकालिक कृदंत
- अर्थ— किया हुआ या हुआ
- (अंक् से) अंकित, (अभि + नंद् = अभिनंद् से) अभिनंदित, (उप + ईक्ष् = उपेक्ष् से) उपेक्षित, (कथ् से) कथित, (कुप् से) कुपित, (कूज् से) कूजित, (खंड् से) खंडित, (खाद् से) खादित, (चिंत् से) चिंतित, (छाद् से) छादित, (जन् से) जनित, (त्रुट् से) त्रुटित, (धृ से) धारित, (निंद से) निंदित, (पत् से) पतित, (प्र + कंप् = प्रकंप् से) प्रकंपित, (प्र + तड् = प्रतड् से प्रताड् से) प्रताड़ित, (प्र + तृ = प्रतर् से) प्रतारित, (प्रेर से) प्रेरित, (भक्ष् से) भक्षित, (मथ से) मथित, (मुद् से) मुदित, (याच् से) याचित, (रक्ष् से) रक्षित, (रूप् या रूह् से) रोपित, (लांछ् से) लांछित, (विज्ञाप् से) विज्ञापित, (विद् से) विदित, (शंक् से) शंकित, (शिक्ष् से) शिक्षित, (सिच् से) सिंचित, (स्थाप् से) स्थापित
- वस्तुतः ‘इत’ प्रत्यय दो प्रत्ययों के योग से बना है— इ (इट्) + त (क्त) = इत। उपर्युक्त शब्दों में त (क्त) के योग से इ (इट्) का आगम हुआ। इसे ही हिन्दी भाषा में ‘इत’ प्रत्यय मान लिया गया।
- शब्दों का निर्माण— अंक् (धातु) + इ (इट् का आगम) + त (क्त) = अंकित। खण्ड् (धातु) + इ (इट् का आगम) + त (क्त) = खण्डित। इसी तरह अन्य का भी निर्माण हुआ है।
- कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनको तद्धितांत और कृदंत दोनों सिद्ध किया जा सकता है; जैसे— अपच (संज्ञा) + इत (इतच्) = अपचित (तद्धितांत) अथवा अप (उपसर्ग) + चि (धातु) + त (क्त – कृत प्रत्यय) = अपचित (कृदंत)। हर्ष (संज्ञा) + इत (इतच्) = हर्षित (तद्धितांत) अथवा हृष् (धातु) + इ (इट् का आगम) + त (क्त) = हर्षित (कृदंत)।
इन् (हिन्दी में ई)
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (आरक्ष् से) आरक्षी, (उप + कृ से) उपकारी, (काम् से) कामी, (गुण् से) गुणी, (त्यज् से) त्यागी, (दृश से) दर्शी, (दुष् से) दोषी, (द्रुह् से) द्रोही, (द्विष् से) द्वेषी, पंडितभागी, पितृघाती, ब्रह्मवादी, (भुज् से) भोगी, (युज् से) योगी, (रुज् से) रोगी, (लुभ् से) लोभी, (वद् से) वादी, (सम् + यम् = संयम् से) संयमी, (सम् + नि + अस् = संन्यस् से) संन्यासी, (सह + चर = सहचर से) सहचारी, (स्था से) स्थायी, (स्पृश् से) स्पर्शी।
- टिप्पणी— संस्कृत में आरक्षिन्, कामिन् इत्यादि बनते हैं यही हिन्दी में आरक्षी, कामी इत्यादि हो जाते हैं, अर्थात् संस्कृत का ‘इन्’ का हिन्दी में ‘ई’ हो जाता है।
- पंडितभागी, पितृघाती, ब्रह्मवादी— पंडित (संज्ञा) + भज् (धातु) + इन् (णिन्) = पंडित + भागिन् → भागी = पंडितभागी। पितृ (संज्ञा) + हन् (धातु) + इन् (णिनि) = पितृ + घातिन् → घाती = पितृघाती। ब्रह्म (संज्ञा) + वद् (धातु) + इन् (णिनि) = ब्रह्म + वादिन् → वादी = ब्रह्मवादी। इन तीनों शब्दों में पहला पद (पंडित, पितृ, ब्रह्म) उपपद की तरह व्यवहार करते हैं और द्वितीय पद कृदंत हैं; इसलिए ये ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हुए, परन्तु विग्रह का ढंग बदलने से समास का प्रकार परिवर्तित हो जायेगा; जैसे— पितृघात का विग्रह ‘पिता का हत्यारा’ करने पर संबंध तत्पुरुष समास हो जायेगा। दूसरी ओर डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इन तीनों शब्दों को कृदंत शब्द माना गया है।
इष्णु
- विशेषण बनानेवाला। योगार्थक कर्तृवाचक
- अर्थ— योग्य, शाली
- (उद् + मद् = उन्मद् से) उन्मदिष्णु, (जन् से) जनयिष्णु, (जि से) जयिष्णु, (तप् से) तपिष्णु, (प्र + जन् = प्रजन् से) प्रजनिष्णु, (प्र + भू से) प्रभविष्णु, (बल् से) बलिष्णु, (याच् से) याचिष्णु, (यज् से) याजिष्णु, (रुच् से) रोचिष्णु, (वृत् से) वर्तिष्णु, (वृध् से) वर्धिष्णु, (सह् से) सहिष्णु
- इष्णु प्रत्यय संस्कृत के ‘इष्णुच्’ प्रत्यय से आया है।
- विशेष— विष्णु और स्थाणु में ‘नु’ प्रत्यय है। विष्णु = विष् + नु (नुक्) और स्थाणु = स्था + नु। जिष्णु (जि + गृत्स्नु) में ‘ष्णु’ प्रत्यय है। ‘नु’ और ‘ष्णु’ प्रत्यय ‘इष्णु’ के शेष भाग हैं। धृष् + नु (क्नु) = धृष्णु। शुष् + नु (क्नु) = शुष्णु।
इस्
- विविध अर्थ में
- (द्युत् से) ज्योतिस्, (हु से) हविस्
- हिन्दी में ‘स्’ का लोप करके केवल ज्योति, हवि लिखा जाता है।
उ
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (इष् → इच्छ् से) इच्छु (हितेच्छु), (भिक्ष् से) भिक्षु, (साध् से) साधु
उक्
- विशेषण या कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (इष् → इच्छ् से) इच्छुक, (कम् से) कामुक, (हन् से) घातुक, (जागृ से) जागरूक, (भू से) भावुक, (भिक्ष् + उक् से) भिक्षुक
उर
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (भंज् से) भंगुर, (भास् से) भासुर
- उर संस्कृत के ‘घुरच्’ प्रत्यय से आया है।
उस् (हिन्दी में उ)
- विविध अर्थ में / करणवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (आ + इ से) आयुस्, (चक्ष् से) चक्षुस्, (तन् से) तनुस्, (धन् से) धनुस्, (युज् से) यजुस् (यजुर्वेद), (वप् से) वपुस्, (वय् से) वयुस्
- वस्तुतः हिन्दी में यही क्रमशः आयु, चक्षु, तनु, धनु, यजु, वपु, वयु हो जाता है।
- उस् संस्कृत के ‘उसि’ प्रत्यय से आया है। यह धातु/क्रिया में ‘उस्’ बनकर जुड़ता है। (उसि → उस् → उ)
त / (क्त प्रत्यय)
- क्रिया से विशेषण बनानेवाला। भूतकालिक कृदंत
- (आप् से) आप्त, (वच् से) उक्त, (कथ् से) कथित, (कृ से) कृत, (ख्या से) ख्यात, (गम् से) गत, (गुप् से) गुप्त, (गुह् से) गूढ़, (ग्रस् से) ग्रस्त, (ग्रह् से) ग्रहीत, (च्यु से) च्युत, (जन् से) जात, (तप् से) तप्त, (तृप् से) तृप्त, (त्यज् से) त्यक्त, (त्रै → त्रा से) त्रात/त्राण, (दा से) दत्त, (दीप् से) दीप्त, (ध्यै → ध्या से) ध्यात, (ध्वंस् → ध्वस् से) ध्वस्त, (नश् से) नष्ट, (पूर से) पूर्ण, (भज् से) भक्त, (भू से) भूत, (मद् से) मत्त, (मृ से) मृत, (युज् से) युक्त, (रंज् → रज् से) रक्त, (लग् से) लग्न, (लिप् से) लिप्त, (विद् से) विदित, (वि + अस् = व्यस् से) व्यस्त, (शक् से) शक्त, (श्रु से) श्रुत, (सम् + भृ = संभृ से) संभृत, (सम् + आप् = समाप् से) समाप्त, (स्वप्/सुप् से) सुप्त, (हन् से) हत।
- त का ट होना— (कष् से) कष्ट, (दुष् से) दुष्ट, (दृश् से) दृष्ट, (धृष् से) धृष्ट, (नश् से) नष्ट, (पिष् से) पिष्ट, (पुष् से) पुष्ट, (भ्रंश् से) भ्रष्ट, (रुष् से) रुष्ट, (शास् → शिष् से) शिष्ट, (स्पश् से) स्पष्ट
- त का ण होना— (कृ से) कीर्ण (संकीर्ण), (क्षि से) क्षीण, (जृ से) जीर्ण, (पूर् से) पूर्ण, (रुज् से) रुग्ण।
- त का ध होना— (नह् से) नद्ध, (बन्ध् से) बद्ध, (बुध् से) बुद्ध, (रुध् से) रुद्ध, (लभ् से) लब्ध, (वृध् से) वृद्ध, (सिध् से) सिद्ध
- त का न होना— (अद् से) अन्न, (उद् + (उद् + विज् से) उद्विग्न, (खिद् से) खिन्न, (नज् से) नग्न, (भिद् से) भिन्न, (लग् से) लग्न, (ली से) लीन, (हा से) हीन
- किसी-किसी धातुओं में त और न दोनों प्रत्ययों के लगने से दो-दो रूप होते हैं— (पूर् से) पूरित, पूर्ण। (त्रा से) त्रात, त्राण
- त का क होना— (शुष् से) शुष्क
- त का म होना— (क्षै से) क्षाम
- त का व होना— (पच् से) पक्व
- कथित— वस्तुतः यह कथ् (धातु) + त (क्त) से बना है। संस्कृत में ‘कथ्’ और भूतकालिक ‘क्त’ प्रत्यय जुड़ने पर धातु और प्रत्यय के बीच में ‘इट् (इत्)’ का आगम होता है। कथ् + इ (इट्) + त (क्त) = कथित। यहाँ मुख्य प्रत्यय ‘त’ ही है, और ‘इ’ केवल उच्चारण और संधि नियमों के कारण बीच में जुड़ा है। परन्तु हिन्दी में सरलता के कारण ‘कथित’ शब्द को इत प्रत्यय (कथित = कथ् + इत) के अंतर्गत भी पाते हैं।
- कृष्ण— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘कृष्ण’ शब्द को ‘त’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है। परन्तु वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ शब्दकोश में कृष्ण शब्द को ‘नक्’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है, अर्थात् कृष्ण = कृष् + न (नक्), योग होने पर ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है। ध्यातव्य है कि विष्णु शब्द नुक् प्रत्यय से बना है और योग होने पर ‘नु’ का ‘णु’ हो जाता है, विष्णु = विष् + नु (नुक्)।
- यत्न— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘यत्न’ शब्द को ‘त’ और ‘न’ दोनों प्रत्यय से निर्मित बताया गया है। परन्तु वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ शब्दकोश में यत्न शब्द को ‘नङ्’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है, अर्थात् यत्न = यत् + न (नङ्)।
तृ (हिन्दी में ‘ता’)
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- हिन्दी में ‘ता’ हो जाता है।
- (अधि + इ से) अध्येता, (अनु + स्था = अनुष्ठा से) अनुष्ठाता, (अभि + नी से) अभिनेता, (उद्गा से) उद्गाता, (कृ से) कर्ता, (क्री से) क्रेता, (खन् से) खनिता, (गा/गै से) गाता, (जन् से) जनिता, (जन् से) जनयिता, (जि से) जेता, (ज्ञा से) ज्ञाता, (त्रा से) त्राता, (दा से) दाता, (धा से) धाता, (धृ/धार् से) धारयिता, (नि + यम् = नियम् से) नियंता, (नि + विद् से) निवेदयिता, (नी से) नेता, (पण् से) पणिता, (परि + नी से) परिणेता, (पा से) पाता, (पा से) पितृ → पिता, (प्र + नी से) प्रणेता, (प्रदा से) प्रदाता, (भुज् से) भोक्ता, (भृ से) भर्ता, (भ्राज् से) भ्राता, (मा से) मातृ → माता, (रच् से) रचयिता, (वच् से) वक्ता, (वि + क्री से) विक्रेता, (विद् से) वेत्ता, (श्रु से) श्रोता, (सम् + ग्रह् से) संग्रहीता, (सम् + विद् से) संवेदयिता, (स्तु से) स्तोता, (हन् से) हंता, (हु से) होता, (हृ से) हर्ता।
- स्त्रीलिंग बनाने के लिए हिंदी में ‘तृ’ प्रत्ययांत में ‘ई’ लगाते हैं, जिससे ‘त्री’ बनता है— अनुष्ठातृ – अनुष्ठात्री, अभिनेतृ – अभिनेत्री, उद्गातृ – उद्गात्री, कवयितृ – कवयित्री, कर्तृ – कर्त्री, क्रेतृ – केर्त्री, खनितृ – खनित्री, गातृ – गात्री, जनितृ – जनित्री, जनयितृ – जनयित्री, जेतृ – जेत्री, ज्ञातृ – ज्ञात्री, त्रातृ – त्रात्री, दातृ – दात्री, धातृ – धात्री, धारयितृ – धारयित्री, नियंतृ से नियंत्री, निवेदयितृ – निवेदयित्री, नेतृ – नेत्री, पणितृ – पणित्री, परिणेतृ – परिणेत्रा, प्रणेतृ – प्रणेत्री, प्रदातृ – प्रदात्री, भर्तृ – भर्त्री, भोक्तृ – भोक्त्री, रचयितृ – रचयित्री, वक्तृ – वक्त्री, विक्रेतृ – विक्रेत्री, वेत्तृ – वेत्री, श्रोतृ – श्रोत्री, संग्रहीतृ – संग्रहीत्री, संवेदयितृ – संवेदयित्री, स्तोतृ – स्तोत्री, हन्तृ – हन्त्री, होतृ – होत्री, हर्तृ – हर्त्री।
- नोट— यहाँ दो प्रकार के शब्द हैं— 1. धातु + तृ (तृच्) प्रत्यय = शब्द; जैसे- जन् + तृ = जनितृ (संस्कृत) → जनिता (हिन्दी)। 2. धातु + णिच् (अय्) + तृच् (तृ) प्रत्यय = धातु + अय् + तृ = धातु + यितृ = शब्द; जैसे- जन् + अय् (णिच्) + तृ = जनयितृ। इसी तरह- कवयितृ, धारयितृ, निवेदयितृ, रचयितृ, संवेदयितृ आदि बने हैं।
- विशेष— संस्कृत का अनुष्ठातृ, अभिनेतृ, उद्गातृ आदि हिन्दी में क्रमशः अनुष्ठाता, अभिनेता, उद्गाता आदि हो जाते हैं, अर्थात् ‘तृ’ का ‘ता’ हो जाता है। परन्तु हिन्दी में इन शब्दों का स्त्रीलिंग संस्कृत के शब्द ही लिए जाते हैं; जैसे— अनुष्ठात्री, अभिनेत्री, उद्गात्री आदि।
तव्य (तव्यत् प्रत्यय)
- विशेषण बनानेवाला
- (कृ से) कर्त्तव्य, (क्षम् से) क्षमतव्य, (गम् से) गन्तव्य, (गृह् से) गृहीतव्य, (जप् से) जपतव्य, (जि से) जेतव्य, (ज्ञा से) ज्ञातव्य, (त्यज् से) त्यक्तव्य, (दा से) दातव्य, (दृश से) द्रष्टव्य, (ध्यै → ध्या से) ध्यातव्य, (पठ् से) पठितव्य, (पत् से) पतितव्य, (पूज् से) पूजितव्य व पूजयितव्य, (प्र + आप् = प्राप् से) प्राप्तव्य, (भू से) भवितव्य, (भुज् से) भोक्तव्य, (मन् से) मन्तव्य, (युज् से) योक्तव्य, (वच् से) वक्तव्य, (वि + क्री = विक्री से) विक्रेतव्य, (श्रु से) श्रोतव्य, (स्ना से) स्नातव्य, (हन् से) हन्तव्य।
- पूजितव्य = पूज् + इट् (इ) + तव्यत् (तव्य) = पूज् + इ + तव्य; इसमें ‘इ’ का आगम। पूजयितव्य = पूज् + णिच् (इ) + इट् (इ) + तव्यत् (तव्य) = पूज् + अय + इ + तव्य; इसमें ‘य’ और ‘इ’ का आगम।
- इनमें से कई शब्द संज्ञा और विशेषण दोनों हैं (कर्त्तव्य, गन्तव्य, मन्तव्य, भवितव्य, वक्तव्य), कई केवल विशेषण हैं (क्षमतव्य, जेतव्य, ज्ञातव्य, त्यक्तव्य, दातव्य, द्रष्टव्य, ध्यातव्य, पठितव्य, पतितव्य, पूजितव्य, प्राप्तव्य, भोक्तव्य, योक्तव्य, विक्रेतव्य, श्रोतव्य, स्नातव्य, हन्तव्य)।
ति (क्तिन् प्रत्यय)
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (आ + कृ से) आकृति, (आ + वृ से) आवृति, (आ + हु से) आहुति, (कम् से) कान्ति, (कृ से) कृति, (कृत् से) कीर्ति, (क्रम् से) क्रांति, (ख्या से) ख्याति, (गम् से) गति, (च्यु से) च्युति, जाति (जन् से), (तृप् से) तृप्ति, (दीप् से) दीप्ति, (दृश् से) दृष्टि, (धृ से) धृति, (नम् से) नति, (नी से) नीति, (पुष् से) पुष्टि, (पूर् से) पूर्ति, (प्री से) प्रीति), (बुध् से) बुद्धि, (भी से) भीति, (भू से) भूति, (भृ से) भृति, (भ्रम् से) भ्रांति, मति (मन् से), यति (यम् से), (रम् से) रति, (री से) रीति, विश्रांति (वि + श्रम् से), (वृध् से) वृद्धि, (वृष् से) वृष्टि, (शक् से) शक्ति, शांति (शम् से), (श्रम् से) श्रांति, (श्रु से) श्रुति, (सु + स्वप् से) सुषुप्ति, (सृज् से) सृष्टि, (स्तु से) स्तुति, (स्था से) स्थिति, (स्मृ से) स्मृति
- कुछ नकारांत और मकारांत धातुओं के अंत्याक्षर का लोप; जैसे— क्षति (क्षण् + ति), गति (गम् + ति), नति (नम् + ति), मति (मन् + ति), यति (यम् + ति), रति (रम् + ति),
- कहीं-कहीं संधि-नियमों के कारण रूपांतर; जैसे— दृष्टि (दृश् + ति), बुद्धि (बुध् + ति), युक्ति (युज् + ति), (सृज् से) सृष्टि, स्थिति (स्था + ति)
- टिप्पणी— द्युति (द्युत् + इन्)। द्युत (दिव् + क्त)।
- कहीं-कहीं ‘ति’ के बदले ‘नि’ हो जाता है; जैसे— (ग्लै से) ग्लानि, (म्लै से) म्लानि, (हा से) हानि।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ग्लानि, हानि शब्दों में ‘नि’ प्रत्यय बताया गया है। परन्तु यह नि प्रत्यय क्तिन् से आया है, क्योंकि ति (क्तिन्) ग्लै, म्लै और हा में नि हो जाता है (क्तिन् → ति → नि)। शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ शब्दकोश में ग्लानि, योनि, हानि को ‘नि’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है।
त्र
- करणवाचक संज्ञा बनानेवाला
- संस्कृत में यह ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय है, यही संयोग पर ‘त्र’ हो जाता है।
- (अस् से) अस्त्र, (क्षि से) क्षेत्र, (नी से) नेत्र, (पा से) पात्र, (शस् से) शस्त्र, (शास् से) शास्त्र, (श्रु से) श्रोत। (संस्कृत में अस् + ष्ट्रन् = अस्त्रम्; यही हिन्दी में अस्त्र हो गया। ऐसे ही अन्य शब्द भी बने हैं।)
- किसी-किसी धातु में ‘त्र’ का ‘इत्र’ होता है— (खन् से) खनित्र, (चर् से) चरित्र, (पू से) पवित्र, (प्र + दीप् से) प्रदीपित्र, (लिख् से) लेखित्र, (वध् से) वधित्र, (विभिज् से) वैभाजित्र
त्रिम
- विशेषण
- (कृ से) कृत्रिम
न
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (तृष् से) तृष्णा, (दा से) दान, (प्रच्छ् → प्रश् से) प्रश्न, (भज् से) भग्न, (मज् से) मग्न, (यज् से) यज्ञ, (यत् से) यत्न, (याच् से) यांचा, (ली से) लीन, (स्वप् से) स्वप्न।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘न’ प्रत्यय को ‘त’ और ‘इत’ प्रत्यय का भिन्न रूप बताया गया है और इससे निर्मित ये उदाहरण दिये गये हैं— प्रश्न, भग्न, मग्न, यत्न, लीन, स्वप्न।
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘न’ से निर्मित ये उदाहरण मिलते हैं— तृष्णा, प्रश्न, यज्ञ, यत्न, यांचा, स्वप्न।
- शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ के अनुसार— तृष्णा : तृष् + न + टाप् किच्च; अर्थात् तृष् + न (नक्) + आ (टाप्) = तृष् + न → ण + आ = तृष्णा। दान : दा + अन् (ल्युट्) = दा + अन् → अन = दान। प्रश्न : प्रच्छ् → प्रश् + न (नङ्) = प्रश्न। मग्न : मस्ज् + त (क्त) = मस्ज् → मग् + त → न = मग्न। यज्ञ : यज् + (भावे) नङ् = यज् + न (नङ्) = यज् + न → ञ = यज्ञ। यत्न : यत् + (भावे) नङ् = यत् + न (नङ्) = यत्न। यांचा : याच् + न (नङ्) + आ (टाप्)। लीन : ली + त (क्त)। स्वप्न : स्वप् + न (नक्)।
- अर्थात् तृष्णा, प्रश्न, यज्ञ, यत्न, यांचा और स्वप्न ‘न’ प्रत्यय से निर्मित हैं, यह ‘न’ प्रत्यय ‘नक्’ और ‘नङ्’ से आया है। जबकि दान में ‘अन्’ (ल्युट्); मग्न और लीन में ‘त’ (क्त) प्रत्यय है।
नि
- ति (क्तिन्) → नि— (ग्लै से) ग्लानि, (म्लै) म्लानि, (हा से) हानि
- इ— (ध्वन् से) ध्वनि
- इ → नि (न का आगम)— (ज्ञा → जा ) जानि, (धू से) धूनि
- अनि → (धाव् से) धावनि, (यु से) योनि
- नि → (यु से) योनि
- त (क्त) → न— (म्लै से) म्लान
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ग्लानि, जानि, धावनि, धूनि, ध्वनि, म्लान, योनि और हानि शब्दों में ‘नि’ प्रत्यय बताया गया है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ शब्दकोश में ग्लानि, योनि, हानि को ‘नि’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है; परन्तु म्लान क्त प्रत्यय से, म्लानि क्तिन् प्रत्यय से, ध्वनि इ प्रत्यय से बताया गया है। वस्तुतः ग्लानि, म्लानि, हानि में नि प्रत्यय क्तिन् से आया है, क्योंकि ति (क्तिन्) ग्लै, म्लै और हा में नि हो जाता है (क्तिन् → ति → नि)।
| शब्द | धातु | प्रत्यय | ‘नि / न / अनि‘ होने का वास्तविक कारण |
| ग्लानि | ग्लै | क्तिन् (ति) | ‘ति’ को ‘नि’ आदेश हुआ। |
| म्लानि | म्लै | क्तिन् (ति) | ‘ति’ को ‘नि’ आदेश हुआ। |
| योनि | यु | नि | ‘यु’ धातु को गुण (यो) और ‘नि’ प्रत्यय होता है। |
| हानि | हा | क्तिन् (ति) | ‘ति’ को ‘नि’ आदेश हुआ। |
| जानि | ज्ञा | इ / इञ् | ‘ज्ञा’ को ‘जा’ आदेश हुआ तथा ‘इ/नि’ का योग हुआ। |
| धावनि | धाव् | अनि | धातु में सीधे ‘अनि’ प्रत्यय जुड़ा। |
| धूनि | धू | इ / नि | धातु को नुक् आगम या विशेष नत्व कार्य हुआ। |
| ध्वनि | ध्वन् | इ | धातु का अपना ‘न्’ है; उसमें ‘इ’ प्रत्यय सीधे जुड़ा (ध्वन् + इ)। |
| म्लान | म्लै | क्त (त) | भूतकालिक ‘क्त’ प्रत्यय के ‘त’ का ‘न’ आदेश हुआ। |
निष्कर्ष : संस्कृत में ‘नि’ जैसी ध्वनि दिखने वाले शब्दों के पीछे तीन अलग-अलग व्याकरणिक कारण होते हैं— एक – क्तिन् का ‘ति’ बदल कर ‘नि’ बना है (ग्लानि, म्लानि, हानि); दो – उणादि का साक्षात् ‘अनि/नि’ प्रत्यय लगा है (धावनि, योनि); तीन – धातु के अपने हलन्त ‘न्’ में केवल ‘इ’ प्रत्यय जुड़ा है (ध्वनि)।
मन्
- (कृ से) कर्म, (चर् से) चर्म, (छद् से) छद्म, (जन् से) जन्म, (दा से) दाम, (धा से) धाम, (बृह् से) ब्रह्म, (सि से) सीमा, (हि से) हेम
- मन् संस्कृत के ‘मनिन्’ प्रत्यय से आया है। कृ + मनिन् = कर्मन् → कर्म; इसी तरह अन्य का निर्माण होता है। सीमा : सि + मनिन् = सीमन् + आ (डाप्) = सीमा।
मान
- (ज्वल् से) जाज्वल्यमान, (दीप् से) देदीप्यमान, (यज् से) यजमान, (वृत् से) वर्तमान, (विद् से) विद्यमान, (वि + रज् से) विराजमान
- इसी के अनुकरण पर हिन्दी में चलायमान और शोभायमान शब्द बने हैं।
- मान संस्कृत के ‘शानच्’ प्रत्यय से आया है; शानच् प्रत्यय का शेष ‘आन’ होता है जो कहीं मान में बदलता है तो कहीं म (मुक्) का आगम होता है और मान बनता है।
य
- विशेषण बनानेवाला
- (अर्च् से) अर्च्य, (अर्थ् से) अर्थ्य, (ऋ + णिच् = अर्प् से) अर्प्य, (अर्ह् से) अर्ह्य, (ऋ से) आर्य, (ईर्ष्य् से) ईर्ष्य, (उप + ईक्ष् = उपेक्ष् से) उपेक्ष्य, (कम् से) काम्य, (कृ से) कार्य, (क्षम् से) क्षम्य, (खाद् से) खाद्य, (गण् से) गण्य, (गम् से) गम्य, (गै से) गेय, (चिंत् से) चिंत्य, (छिद् से) छेद्य, (जन् से) जन्य, (ज्ञा से) ज्ञेय, (तप् से) तप्य, (त्यज् से) त्याज्य, (दह् से) दह्य, (दा से) देय, (दृश् से) दृश्य, (धन् से) धन्य, (नम् से) नम्य, (निंद् से) निंद्य, (पठ् से) पाठ्य, (पाल् से) पाल्य, (पा से) पेय, (पूज् से) पूज्य, (प्र + आप् = प्राप् से) प्राप्य, (भक्ष् से) भक्ष्य, (भज् से) भाज्य, (भिद् से) भेद्य, (भुज् से) भोग्य और भोज्य, (मन् से) मन्य और मान्य, (युज् से) योग्य, (रम् से) रम्य, (हन् से) वध्य, (वच् से) वाच्य और वाक्य, (वि + धा से) विधेय, (वीर् से) वीर्य, (लक्ष् से) लक्ष्य, (लभ् से) लभ्य, (लिप् से) लेप्य, (वांछ् से) वांछ्य, (वच् से) वाच्य, (शास् से) शिष्य, (शुच् से) शोच्य, (शुध् से) शोध्य, (श्रु से) श्रव्य, (सम् + युज् से) संयोज्य, (सम् + वद् = संवाद् से) संवाद्य, (सम् + आप् = समाप् से) समाप्य, (साध् से) साध्य, (सह् से) सह्य।
- (ऋ से) आर्य, (गद् से) गद्य, (पद् से) पद्य, (लक्ष् से) लक्ष्य, (वच् से) वाक्य : धातु से संज्ञा
- (समीप से) सामीप्य, (सयुज् से) सायुज्य, (सरूप से) सारूप्य, (सलोक से) सालोक्य : भाववाचक संज्ञा
- यत् से य प्रत्यय— यह प्रायः उन धातुओं से लगता है जिनके अंत में स्वर होता है। इसमें ‘अ’ की वृद्धि नहीं होती, बल्कि ‘इ/उ’ को गुण होता है; जैसे— ज्ञेय, देय, पेय, श्रव्य, सह्य इत्यादि।
- यत् से य प्रत्यय— यह उन धातुओं में लगता है जिनके अन्त में ‘पवर्ग’ का व्यंजन हो और उपधा में ‘अ’ हो; जैसे— क्षम्य = क्षम् + य (यत्)
- ण्यत् से य प्रत्यय— यह उन धातुओं से लगता है जिनके अंत में ‘व्यंजन’ या ‘ऋ’ स्वर होता है। इसमें ‘अ’ का ‘आ’ (वृद्धि) हो जाता है; जैसे— आर्य, काम्य, कार्य, त्याज्य, पाठ्य, भेद्य, भाज्य, भोग्य, भोज्य, योग्य, लेप्य, वाच्य, शोच्य, शोध्य, समाप्य, साध्य इत्यादि।
- ण्यत् से य प्रत्यय— कुछ धातुओं में ‘ण्यत्’ लगने पर भी ‘अ’ का ‘आ’ नहीं होता; इसका कारण है कि धातु में ‘अ’ (लघु स्वर) के बाद संयुक्त व्यंजन हो तो उस लघु स्वर को ‘गुरु’ मान लिया जाता है; जैसे— अर्च्य = अर्च् + य (ण्यत्), यहाँ पर अर्च् = अ (लघु स्वर) + र् + च् = अ + र्च् (संयुक्त व्यंजन)। अर्थ्य, अर्प्य, अर्ह्य,
- ण्यत् से य प्रत्यय— यह तीसरी स्थिति है जहाँ पर धातु में स्वर के बाद संयुक्त व्यंजन तो है परन्तु स्वर पहले से ही दीर्घ है; जैसे— ईर्ष्य = ई (दीर्घ स्वर) + र् + ष् + य् = ई (दीर्घ स्वर) + र्ष्य् (संयुक्त व्यंजन)। खाद्य, नम्य, भक्ष्य, रम्य, लक्ष्य, लभ्य,
- क्यप् से य प्रत्यय— यह केवल कुछ गिनी-चुनी धातुओं से लगता है। इसमें न गुण होता है, न वृद्धि। शब्द अपने मूल रूप में रहता है या उसमें कुछ विशेष आदेश; जैसे— पूज्य, दृश्य, शिष्य इत्यादि।
- ष्यञ्/ण्य से य प्रत्यय— ये धातुओं से नहीं, बल्कि संज्ञा या विशेषण शब्दों से लगते हैं। ये ‘भाव’ को दर्शाते हैं। इसमें शब्द के पहले अक्षर की अनिवार्य वृद्धि होती है; जैसे— सायुज्य, सामान्य, साहित्य
| प्रत्यय | कहाँ लगता है? | प्रभाव | उदाहरण |
| यत् | स्वरांत धातु | गुण होता है | देय, पेय, श्रव्य |
| ण्यत् | व्यंजनांत धातु | वृद्धि (अ → आ) | पाठ्य, वाच्य, भाज्य |
| ण्यत् | ” | कोई बदलाव नहीं | अर्च्य, अर्थ्य, अर्प्य, |
| क्यप् | विशिष्ट धातु | कोई बदलाव नहीं | शिष्य, पूज्य, दृश्य |
| ष्यञ् | संज्ञा/विशेषण शब्द | आदि वृद्धि | सायुज्य, सामीप्य |
या
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (कृ से) क्रिया, (चर् से) चर्या, (छा से) छाया, (तपस् से) तपस्या, (तम् से) तमया, (मा से) माया, (मृग् से) मृगया, (विद् से) विद्या, (शी से) शय्या, (सम् +अस् से) समस्या।
- क्रिया = कृ + श, रिङ् आदेश, इयङ्। चर्या = चर् + यत् + टाप्। छाया = छा + य + टाप्। तपस्या = तपस् (तप् + असुन्) + य + टाप्। माया = मा + य + टाप्। मृगया (मृगं यात्यानया या घञर्थे क)। विद्या = विद् + य (क्यप्) + टाप्। शय्या = शी आधारे क्यप् + टाप्। समस्या = सम् + अस् + य (क्यप्) + टाप्।
- टिप्पणी— संस्कृत में ‘या’ कोई प्रत्यय नहीं है; वस्तुतः मूल प्रत्यय ‘य’ है जो ‘क्यप्’ या ‘यत्’ से आया है और इसी को स्त्रीलिंग बनाने के लिए ‘आ’ (टाप्) जोड़ा जाता है; जैसे— चर्या = चर् (धातु) + य (यत् प्रत्यय) + आ (टाप् स्त्रीलिंग प्रत्यय) = चर् + य + आ = चर् + या = चर्या। क्योंकि हिन्दी का स्वभाव विकासात्मक और सरल है, इसलिए हिंदी व्याकरण ने संस्कृत की जटिल क्यप्, यत्, टाप्, ङीप् जैसी प्रक्रियाओं को छोड़ दिया। हिन्दी के विद्वानों ने इन तत्सम शब्दों के अंत में समान ध्वनि ‘या’ को प्रत्यय मान लिया।
र
- विशेषण
- (नम् से) नम्र, (हिंस् से) हिंस्र
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘र्’ प्रत्यय बताया गया है।
रु
- कर्तृवाचक संज्ञा
- (दा से) दारु, (मि से) मेरु
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में दारु की व्युत्पत्ति ‘रु’ प्रत्यय से बतायी गयी है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत हिन्दी शब्दकोश’ में दारु की व्युत्पत्ति इस तरह बतायी गयी है— दारु (दीर्यते दॄ + उण्) = दॄ + उण् = द् + आर् (ॠ → ‘आर्’) + उ = दारु।
वर
- विशेषण
- (ईश् से) ईश्वर, (नश् से) नश्वर, (भास् से) भास्वर, (स्था से) स्थावर
- टिप्पणी— ‘वर’ प्रत्यय संस्कृत के ‘क्वरप्’ और ‘वरच्’ प्रत्यय से आया है। नश्वर में क्वरप् प्रत्यय का योग है और शेष में वरच् का। हिन्दी में अन्त के वर ध्वनि को देखकर ‘वर’ प्रत्यय को एक वर्ग मान लिया गया।
सा (स् + आ)
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (कित् से) चिकित्सा, (कृ से) चिकीर्षा, (हन् से) जिघांसा, (ज्ञा से) जिज्ञासा, (तम् से) तमसा, (पा से) पिपासा, (मन् से) मीमांसा, (यस् से) यासा, (लल्/लस् से) लालसा, (भास् से) विभासा, (मन् से) सौमनसा, (हिंस् से) हिंसा
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में “स् + आ” प्रत्यय माना गया है, इसे ही डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में “सा” प्रत्यय बताया गया है। परन्तु संस्कृत में “सा” प्रत्यय नहीं है, वस्तुतः “स” प्रत्यय है जो “सन्” प्रत्यय से आता है, इसी में ‘अ’ (अच्) और ‘आ’ (टाप्) जुड़कर “सा” बनता है। हिन्दी में अन्त में ‘सा’ ध्वनि-साम्य के कारण इसे प्रत्यय मान लिया गया है।
- वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत हिन्दी शब्दकोश’ के अनुसार— चिकित्सा (कित् + सन् + अ + टाप्), चिकीर्षा (कृ + सन् + अ + टाप्, द्वित्वम्), जिघांसा (हन् + सन् + अ + टाप्), जिज्ञासा (ज्ञा + सन् + अ + टाप्), तमसा (तम् + असुन् + टाप्), पिपासा (पा + सन् + अ + टाप्), मीमांसा (मन् + सन् + अ + टाप्), यासा (यस् + घञ् + टाप्), लालसा (लस् स्पृहायां यङ् लुक् भावे अ), विभासा (वि + भास् + अ + टाप्), हिंसा (हिंस् + अ + टाप्)
- सौमनसा 1. (सु + मनस् → सौमनस + टाप्)-तद्धितांत; 2. (सु + मन् + असुन् + अ + टाप्)-कृदंत।
तद्धित प्रत्यय
अ
- भाववाचक संज्ञा— आर्तव, कार्ष्ण, कौशल, गौरव, नैत्य, पौरुष, मार्दव, माध्य, मौन, यौन, यौवन, लाघव, शैशव, शौच, सांख्य, सौष्ठव।
- माध्य = मध्य + अ (अण्)। कृष्ण = कार्ष्ण + अ (अण्)। नैत्य = नित्य + अ (अण्)। मार्दव = मृदु + अ (अण्)। सांख्य = संख्या + अ (अण्)।
- अपत्यवाचक— काश्यप, कौरव, दौहित्र, पाण्डव, पार्थ, पार्वती, पौत्र, भार्गव, मानव, यादव, राघव, वासुदेव, सारस्वत, सौभद्र, सौमित्र
- टिप्पणी— सुभद्रा + एय = सौभद्रेय; सुभद्रा + अ = सौभद्र।
- अपत्य का अर्थ है— संतान। अपत्यवाचक का अर्थ है— वह संज्ञा जिससे किसी की संतान या वंशज होने का अर्थ मिले।
- स्थान से संबंधित— काश्मीर, मागध, माथुर, मैथिल, सौराष्ट्र
- देवता से संबंधित या गुणवाचक— ऐन्द्र, चांद्र, जैन, नैश, पार्थिव, बौद्ध, मानव, मारुत, रौद्र, वैष्णव, शाक्त, शैव, सौर
- जाननेवाला के अर्थ में— वैद्य, वैयाकरण
- यह संस्कृत के ‘अण्’ से आया है। ‘ण्’ का लोप हो जाता है और ‘अ’ के योग से शब्दों के आद्यक्षर के स्वर में वृद्धि होती है।
अक
- कर्तृवाचक संज्ञा
- (मीमांसा से) मीमांसक, (शिक्षा से) शिक्षक
- शिक्षक— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में मीमांसक और शिक्षक को तद्धितांत बताया गया है। परन्तु वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में इसे कृदंत बताया गया है— शिक्ष् (धातु) + अक (ण्वुल्) = शिक्षक। मीमांस् से बना मीमांसक भी कृदंत है न कि तद्धितांत, परन्तु कामताप्रसाद गुरु ने इसे भी तद्धितांत बताया है। वस्तुतः हिन्दी की प्रकृति सरलीकरण की रही है, इसलिए हिन्दी वैयाकरणों ने ऐसा माना है।
आ
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला
- (अज से) अजा, (अध्यक्ष से) अध्यक्षा, (अश्व से) अश्वा, (आचार्य से) आचार्या, (कृष्ण से) कृष्णा, (कोकिल से) कोकिला, (चटक से) चटका, (छात्र से) छात्रा, (तनुज से) तनुजा, (प्रिय से) प्रिया, (बाल से) बाला, (महाशय से) महाशया, (महोदय से) महोदया, (वृद्ध से) वृद्धा, (शिव से) शिवा, (शूद्र से) शूद्रा, (सदस्य से) सदस्या, (सुत से) सुता, (सुशील से) सुशीला
आत्
- क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (अधः से) अधस्तात्, (अर्थ् से) अर्थात्, अकस्मात् (
आकस्मात्), (तत् + पश्च से) तत्पश्चात्, (दुर्भाग्यवश से) दुर्भाग्यवशात्, (दैव से) दैवात्, (दैववश से) दैववशात्, (पश्च से) पश्चात्, (पुरस् से) पुरस्तात्, (बल से) बलात्, (भाग्यवश से) भाग्यवशात्, (विधिवश से) विधिवशात्, (संयोगवश से) संयोगवशात्, (हठ से) हठात् - अकस्मात् (क्रिया-विशेषण) : न कस्मात्, जब ‘न’ के बाद कोई व्यंजन आता है, तो ‘न’ के स्थान पर ‘अ’ हो जाता है; जैसे— न + कस्मात् → अ + कस्मात् = अकस्मात्। आकस्मात् (विशेषण): अकस्मात् + अण् = आकस्मात्। यह “नञ् तत्पुरुष समास” का उदाहरण है। अधस्तात् : अधस् + अस्तात् (दिशावाची प्रत्यय)। अर्थात् : अर्थ (प्रयोजन) + पंचमी विभक्ति (यानी ‘अर्थ से’)। तत्पश्चात् : तद् (वह) + पश्चात् (अव्यय)। दैवात् : दैव (भाग्य) + पंचमी विभक्ति (यानी ‘भाग्य से’)। दैववशात् : दैववश (भाग्य के अधीन) + पंचमी विभक्ति। पश्चात् : पश्च (पीछे) + अत्। पुरस्तात् : पुरस् (सामने/पूर्व) + अस्तात् (दिशावाची प्रत्यय)। बलात् : बल (शक्ति) + पंचमी विभक्ति। भाग्यवशात् : भाग्यवश + पंचमी विभक्ति। विधिवशात् : विधिवश + पंचमी विभक्ति। संयोगवशात् : संयोगवश + पंचमी विभक्ति। हठात् : हठ + पंचमी विभक्ति।
आनी
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग
- (इंद्र/इन्द्र से) इंद्राणी/इन्द्राणी, (क्षत्रिय से) क्षत्रियाणी, (भव से) भवानी, (मंत्र से) मंत्राणी, (रुद्र से) रुद्राणी, (शक्र से) शक्राणी, (शिव से) शिवानी, (शूद्र से) शूद्राणी।
आमह
- अर्थ— उसका पिता
- (पितृ से) पितामह, (मातृ से) मातामह
- ‘आमह’ संस्कृत के ‘डामहच्’ प्रत्यय से आया है।
आलु
- संज्ञा से विशेषण बनानेवाला
- (ईर्ष्या से) ईर्ष्यालु, (कृपा से) कृपालु, (तन्द्रा से) तन्द्रालु, (तृषा से) तृषालु, (तृष्णा से) तृष्णालु, (दया से) दयालु, (नि + द्रा = निद्रा से) निद्रालु, (लज्जा से) लज्जालु, (शंका से) शंकालु, (श्रद्धा से) श्रद्धालु, (संशय से) संशयालु, (हिंसा से) हिंसालु, (हृदय से) हृदयालु
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में उपर्युक्त शब्दों को क्रिया से बननेवाला कृदंत बताया है और साथ ही संज्ञा से विशेषण बननेवाला तद्धितांत भी बताया है; जैसे— कृपालु, तृषालु आदि। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में धातु से बना कृदंत बताया गया है और वे दो शब्द (दय् से दयालु, शी से शयालु) का उदाहरण देते हैं। वामन शिवराम आप्टे कृत संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश में दो तरह की व्युत्पत्ति मिलती है— एक : कृदंत शब्द हैं- ईर्ष्यालु, दयालु। दो : तद्धितांत शब्द हैं- तन्द्रालु, तृष्णालु, निद्रालु, लज्जालु, श्रद्धालु, संशयालु, हिंसालु, हृदयालु।
इ
- अपत्यवाचक
- (दशरथ से) दाशरथि, (मरुत् से) मारुति
- इ संस्कृत के ‘इञ्’ प्रत्यय से आया है।
- मारुत और मारुति— मारुत (मरुत् + अण्)- वायु से संबंधित। मारुति (मरुत् + इञ्) वायु का पुत्र अर्थात् हनुमान।
इक
- विशेषण बनानेवाला
- इक प्रत्यय संस्कृत के “ठक्/ठञ्” से आया है। इस प्रत्यय के लगने से “आदि-वृद्धि” होती है अर्थात् यह प्रत्यय मूल शब्द के आदि स्वर की वृद्धि करता है। यह वृद्धि कई तरह से होती है; जैसे— अ → आ, (इ/ई → ऐ), (उ/ऊ → औ), (ए → ऐ) और (ऋ → आर्)।
- आदि वृद्धि (अ → आ) : (अंग से) आंगिक, (अंतर् से) आंतरिक, (अधुना से) आधुनिक, (अधि + आत्मन् = अध्यात्म से) आध्यात्मिक, (अनुवंश से) आनुवंशिक, (अर्थ से) आर्थिक, (अलंकार से) आलंकारिक, (अक्षर से) आक्षरिक, (कर्म से) कार्मिक, (चरित्र से) चारित्रिक, (तंत्र से) तांत्रिक, (तत्/तद् + काल = तत्काल से) तात्कालिक, (तमस् से) तामसिक, (तर्क से) तार्किक, (दर्शन से) दार्शनिक, (धर्म से) धार्मिक, (नगर से) नागरिक, (पक्ष से) पाक्षिक, (परंपरा से) पारंपरिक, (परमार्थ से) पारमार्थिक, (परलोक से) पारलौकिक, (परिवार से) पारिवारिक, (परिश्रम से) पारिश्रमिक, (पशु से) पाशविक, (प्रकृति से) प्राकृतिक, (प्रदेश से) प्रादेशिक, (प्रमाण से) प्रामाणिक, (प्रयोग से) प्रायोगिक, (प्रारंभ से) प्रारंभिक, (प्रसंग से) प्रासंगिक, (मंत्र से) मांत्रिक, (मनस् से) मानसिक, (मर्म से) मार्मिक, (यंत्र से) यांत्रिक, (राजनय से) राजनयिक, (रजस् से) राजसिक, (रसायन से) रासायनिक, (वर्ण से) वार्णिक, (वर्ष से) वार्षिक, (शरीर से) शारीरिक, (संप्रति से) सांप्रतिक, (संवाद से) सांवादिक, (संशय से) सांशयिक, (संसार से) सांसारिक, (संस्कृति से) सांस्कृतिक, (संस्थान से) सांस्थानिक, (सत्त्व से) सात्त्विक, (सप्ताह से) साप्ताहिक, (समय से) सामयिक, (समाज से) सामाजिक, (समुद्र से) सामुद्रिक, (सर्वकाल से) सार्वकालिक, (सर्वजन से) सार्वजनिक, (सर्वत्र से) सार्वत्रिक, (सर्वदेश से) सार्वदेशिक, (सर्वनाम से) सार्वनामिक, (साहस से) साहसिक, (साहित्य से) साहित्यिक।
- आदि वृद्धि (इ/ई → ऐ) : (इतिहास से) ऐतिहासिक, (इच्छा से) ऐच्छिक, (जीव से) जैविक, (दिन से) दैनिक, (नीति से) नैतिक, (निमित्त से) नैमित्तिक,
(निमित से) नैमितिक, (न्याय से) नैयायिक, (पितृ से) पैतृक, (पिशाच से) पैशाचिक, (विकल्प से) वैकल्पिक, (विकार से) वैकारिक, (विकाल से) वैकालिक, (विकृत से) वैकृतिक, (विचार से) वैचारिक, (विज्ञान से) वैज्ञानिक, (विधान से) वैधानिक, (व्यक्ति से) वैयक्तिक, (विवाह से) वैवाहिक, (शिक्षण से) शैक्षणिक, (शिक्षा से) शैक्षिक, (सेना से) सैनिक - आदि वृद्धि (उ/ऊ → औ) : (उद्योग से) औद्योगिक, (उपन्यास से) औपन्यासिक, (पुराण से) पौराणिक, (बुद्धि से) बौद्धिक, (भूगोल से) भौगोलिक, (भूत से) भौतिक, (मुख से) मौखिक, (मूल से) मौलिक, (योग से) यौगिक, (लोक से) लौकिक
- आदि वृद्धि (ए → ऐ) : (देव से) दैविक, (देश से) दैशिक, (देह से) दैहिक, (रेखा से) रैखिक, (वेतन से) वैतनिक, (वेद से) वैदिक
- (औ → आव्) : (नौ से) नाविक
- आदि वृद्धि (ऋ → आर्) : (वृत्ति से) वार्त्तिक, (हृदय से) हार्दिक
- आदि और मध्य में वृद्धि : (अधिदेव से) आधिदैविक, (अधिभूत से) आधिभौतिक
- विशेष— (व्यक्ति से) वैयक्तिक, (व्यवसाय से) व्यावसायिक, (व्यवहार से) व्यावहारिक, (स्वभाव से) स्वाभाविक।
- ठक् और ठन् प्रत्यय : इन दोनों से शब्द के अन्त में ‘इक’ लगता है, परन्तु ठक् प्रत्यय से आदि-वृद्धि होती है, जबकि ठन् प्रत्यय से आदि-वृद्धि नहीं होती है। हिन्दी में प्रशासनिक शब्द प्रचलित हो गया है, कुछ विद्वानों ने इसकी व्याख्या प्रशासनिक (प्रशासन + ठन्) के रूप में की है, जबकि प्राशासनिक (प्रशासन + ठक्) शुद्धतम् है। (व्याकरण से) वैयाकरणिक बनता है, परन्तु व्याकरणिक का प्रचलन। (शृंगार से) शांर्गारिक बनता है लेकिन शृंगारिक का प्रचलन। (क्षण से) क्षणिक (क्षण + ठन्) यह शुद्ध है। प्रशासनिक, व्याकरणिक, शृंगारिक में ‘ठन्’ प्रत्यय ‘प्रयोग-सम्मत’ है। अर्थात् हिन्दी में इन्हें बिना वृद्धि के प्रचलित हो गये हैं, इसलिए वैयाकरणों ने इन्हें ‘ठन्’ प्रत्यय के पाले में डाल दिया ताकि इन्हें गलत न कहा जाए। क्षणिक में ‘ठन्’ प्रत्यय व्याकरण की दृष्टि से सही है, इसलिए यह आदि-वृद्धि के बिना ही शुद्ध है।
- ठन् से बने शब्द हैं— (क्षण से) क्षणिक, (दण्ड से) दण्डिक, (धन से) धनिक, (नौ से) नाविक, (पथ से) पथिक। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत हिन्दी शब्दकोश’ में— पथिक = पथ (पथिन्) + क (ष्कन्)।
- दण्डिक और दाण्डिक— दोनों दण्ड से बने हैं और दोनों सही हैं, परन्तु अर्थ भिन्न हैं। दण्ड + ठन् = दण्डिक, अर्थात् दण्डधारी। दण्ड + ठक् = दाण्डिक, अर्थात् दण्ड देनेवाला।
- राजनीतिक और राजनैतिक— (राजनीति + क) राजनीतिक (शुद्ध)।
राजनैतिक। - सांविधानिक और संवैधानिक— (संविधान + इक/ठक्) सांविधानिक (शुद्ध)।
संवैधानिक। - नीति से नैतिक और विधान से वैधानिक बनता है, इसीलिए राजनैतिक और संवैधानिक लिखने की त्रुटि हो जाती है। परन्तु राजनीतिक (शुद्ध) और सांविधानिक (शुद्ध) के स्थान पर राजनैतिक और संवैधानिक का प्रयोग धड़ल्ले से चल रहा है इसलिए हिन्दी में व्यावहारिक दृष्टि से इन्हें स्वीकार कर लिया गया है; फिरभी व्याकरणिक दृष्टि से राजनीतिक और सांविधानिक शुद्ध रूप हैं।
- तात्कालिक और तत्कालिक— तात्कालिक (शुद्ध) और
तत्कालिक
इका
- पुल्लिंग (-अक) से स्त्रीलिंग (-इका) बनानेवाला
- (अध्यापक से) अध्यापिका, (उपचारक से) उपचारिका, (गायक से) गायिका, (चटक से) चटिका, (नायक से) नायिका, (निदेशक से) निदेशिका, (परिचारक से) परिचारिका, (पाठक से) पाठिका, (प्रचारक से) प्रचारिका, (बालक से) बालिका, (याचक से) याचिका, (लेखक से) लेखिका, (शासक से) शासिका, (संचालक से) संचालिका, (संपादक से) संपादिका, (संशोधक से) संशोधिका, (सूचक से) सूचिका, (सेवक से) सेविका
इका
- लघुता / ऊनतावाची संज्ञा बनानेवाला प्रत्यय
- (कली से) कलिका, (गोला से) गोलिका, (जल से) जलिका, (जंघा से) जंघिका, (पुत्र से) पुत्रिका, (बालक से) बालिका, (मंच से) मंचिका, (मक्ष से) मक्षिका, (लता से) लतिका, (शूल से) शूलिका
- टिप्पणी— लघुता / ऊनतावाची और स्त्रीलिंग में भेद है। लघुता / ऊनतावाची अर्थ आधारित श्रेणी है, जबकि स्त्रीलिंग व्याकरण श्रेणी है। यह संयोग हो सकता है कि बहुत सारे लघुता शब्द स्त्रीलिंग भी हो और ऊनतावाची पुल्लिंग; परन्तु ऐसा सदैव नहीं होता। लघुतावाची शब्द किसी वस्तु या व्यक्ति को छोटे रूप में प्रस्तुत करता है। ऊनतावाची शब्द किसी वस्तु या व्यक्ति को बड़े या अधिक रूप में प्रस्तुत करता है। बालिका, मक्षिका लघुतावाची हैं और स्त्रीलिंग भी हैं। राजकुमार लघुतावाची है, परन्तु स्त्रीलिंग नहीं। वहीं माता, शक्ति, कुर्सी, नदी, गाय स्त्रीलिंग तो हैं, परन्तु लघुतावाची नहीं हैं। ——— कली और कलिका दोनों स्त्रीलिंग, परन्तु कलिका लघुतावाची भी है। गोला- पुल्लिंग, गोलिका- स्त्रीलिंग व लघुतावाची। जल- पुल्लिंग, जलिका- स्त्रीलिंग व लघुतावाची। जंघा, पुत्र, बालक, मक्ष, शूल – पुल्लिंग हैं, जबकि जंघिका, पुत्रिका, बालिका, मक्षिका और शूलिका स्त्रीलिंग व लघुतावाची। कली, लता – स्त्रीलिंग और कलिका, लतिका – स्त्रीलिंग व लघुतावाची।
इकी
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (उद्योग से) औद्योगिकी, (भिषज से) भैषिजकी, (भूत से) भौतिकी, (मानव से) मानविकी, (यंत्र से) यांत्रिकी, (रसायन से) रासायनिकी, (संख्या से) सांख्यिकी।
- ये स्त्रीलिंग शब्द हैं।
- मूल शब्द के आदि स्वर में वृद्धि-आदेश से ये शब्द बनते हैं।
इत
- संज्ञा से विशेषण
- (अंकुर से) अंकुरित, (अपच से) अपचित, (आतंक से) आतंकित, (आनंद से) आनंदित, (कंटक से) कंटकित, (कलंक से) कलंकित, (कुसुम से) कुसुमित, (खण्ड से) खण्डित, (गर्भ से) गर्भित, (गर्व से) गर्वित, (तरंग से) तरंगित, (दुःख से) दुःखित, (पंडा से) पंडित, (पल्लव से) पल्लवित, (पुलक से) पुलकित, (पुष्प से) पुष्पित, (प्रतिबिंब से) प्रतिबिंबित, (फल से) फलित, (मर्यादा से) मर्यादित, (हर्ष से) हर्षित।
- इत प्रत्यय संस्कृत के ‘इतच्’ प्रत्यय से आता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘इत’ प्रत्यय के अन्तर्गत टिप्पणी करते हैं कि— ‘ऊपर के शब्दों में बहुत से ऐसे हो सकते हैं जिनको कृदंत सिद्ध किया जा सकता है।’ इसीलिए खण्डित शब्द हमें इसी पुस्तक में कृदंत और तद्धितांत दोनों वर्गों में प्राप्त होता है।
- कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनको तद्धितांत और कृदंत दोनों सिद्ध किया जा सकता है; जैसे— अपच (संज्ञा) + इत (इतच्) = अपचित (तद्धितांत) अथवा अप (उपसर्ग) + चि (धातु) + त (क्त – कृत प्रत्यय) = अपचित (कृदंत)। हर्ष (संज्ञा) + इत (इतच्) = हर्षित (तद्धितांत) अथवा हृष् (धातु) + इ (इट् का आगम) + त (क्त) = हर्षित (कृदंत)।
- उपर्युक्त शब्दों का निर्माण— अंकुर + इत (इतच्) = अंकुरित, कंटक + इत (इतच्) = कंटकित, कलंक + इत (इतच्) = कलंकित, कुसुम + इत (इतच्) = कुसुमित, गर्भ + इत (इतच्) = गर्भित, तरंग + इत (इतच्) = तरंगित, दुःख + इत (इतच्) = दुःखित, पंडा + इत (इतच्) = पंडित, पल्लव + इत (इतच्) = पल्लवित, पुलक + इत (इतच्) = पुलकित। परन्तु पुष्प + त (क्त) = पुष्पित, प्रतिबिंब + क्विप् + क्त् = प्रतिबिंबित, प्रतिफलित, फलित, मर्यादित, हर्षित
इन् (हिन्दी में ई)
- संज्ञा से कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अभिमान से) अभिमानी, (अभिलाष से) अभिलाषी, (अर्थ से) अर्थी, (क्रोध से) क्रोधी, (ग्रंथ से) ग्रंथी, (तरंग से) तरंगिणी, (दंत से) दंती, (दुःख से) दुखी, (धन से) धनी, (पक्ष से) पक्षी, (पुष्कर से) पुष्करिणी, (बल से) बली, (भोग से) भोगी, (मान से) मानी, (योग से) योगी, (रोग से) रोगी, (वाद से) वादी, (विद्या + अर्थ से) विद्यार्थी, (शास्त्र से) शास्त्री, (साहस से) साहसी, (सुख से) सुखी, (हल से) हली, (हस्त से) हस्ती।
- तरंग + इन् (इनि) = तरंगिन्; तरंगिन् + ई (ङीप्) = तरंगिणी (स्त्रीलिंग)। पुष्कर + इन् (इनि) = पुष्करिन्; पुष्करिन् + ई (ङीप्) = पुष्करिणी (स्त्रीलिंग)।
- उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें कृदंत और तद्धितांत दोनों सिद्ध किया जा सकता है; जैसे— अभि (उपसर्ग) + मन् (धातु) + इन् (णिनि) = अभिमानिन् → अभिमानी (कृदंत)। अभिमान (संज्ञा) + इन् (इनि) = अभिमानिन् → अभिमानी (तद्धितांत)। अभि (उपसर्ग) + लष् (धातु) + इन् (णिनि) = अभिलाषिन् → अभिलाषी (कृदंत)। अभिलाषा (संज्ञा) + इन् (इनि) = अभिलाषिन् → अभिलाषी (तद्धितांत)।
- इसका प्रयोग ‘वाला’ का अर्थ देता है; जैसे— अभिमानी का अर्थ है, अभिमान वाला।
- ‘इन्’ संस्कृत के ‘इनि’ और ‘णिनि’ प्रत्यय से आया है। परन्तु इनमें भेद यह है कि ‘णिनि’ कृत प्रत्यय है, जबकि ‘इनि’ तद्धित। उदाहरणार्थ— दुष् (धातु) + इन् (णिनि) = दोषिन् → दोषी। बल (संज्ञा) + इन् (इनि) = बलिन् → बली।
- साहसी : डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में साहसी को कृदंत बताया गया है। साहसी की व्युत्पत्ति— सह् (धातु) + अस् (असि) = सहस् (संज्ञा); सहस् + अ (अण्) = साहस (संज्ञा); साहस (संज्ञा) + इन् (इनि) = साहसिन् → साहसी। अर्थात् साहसी तद्धितांत है, जबकि सहस् और साहस कृदंत हैं।
इन
- (फल से) फलिन, (मल से) मलिन, (वर्ह से) वर्हिण → वर्ही।
- फल् (धातु) + इन (इनच्) = फलिन; फल (संज्ञा) + इन् (इनि) = फलिन् → फली। मल् + इन (इनन्)। बर्ह् + इन (इनच्) = बर्हिण; बर्ह + इन् (इनि) = बर्हिन् → बर्ही।
इनी
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला
- (कामी से) कामिनी, (दुःखी से) दुखिनी, (नंदन से) नंदिनी, (प्रबोधी से) प्रबोधिनी, (प्रणयी से) प्रणयिनी, (प्रियवादी से) प्रियवादिनी, (फणी से) फणिनी, (भयनाशी से) भयनाशिनी, (भुजंग से) भुजंगिनी, (मोहन से) मोहनी, (मोदी से) मोदिनी, (यक्ष से) यक्षिणी, (मायावी से) मायाविनी, (रोगी से) रोगिणी, (वाजी से) वाजिनी, (वाहन से) वाहिनी, (विंध्यवासी से) विंध्यवासिनी, (विलासी से) विलासिनी, (विद्यार्थी से) विद्यार्थिनी, (शिखा से) शिखिनी, (सरोज से) सरोजिनी, (सर्प से) सर्पिणी, (सौभाग्यशाली से) सौभाग्यशालिनी, (स्वामी से) स्वामिनी
ई
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला
- (कवयिता से) कवयित्री, (किशोर से) किशोरी, (कुमार से) कुमारी, (कुम्भकार से) कुम्भकारी, (केवट से) केवटी, (गोप से) गोपी, (देव से) देवी, (नर्तक से) नर्तकी, (नर से) नारी, (पितामह से) पितामही, (पुत्र से) पुत्री, (ब्राह्मण से) ब्राह्मणी, (मातामह से) मातामही, (युवक से) युवती, (वाराह से) वाराही, (शूकर से) शूकरी, (सुंदर से) सुंदरी, (स्वामिन् से) स्वामिनी।
इम
- विशेषण बनानेवाला
- (अंतर) अंतरिम, (अग्र से) अग्रिम, (अंत से) अंतिम, (आदि से) आदिम, (पश्चात् से) पश्चिम
- रक्त से (रक्तिम), (स्वर्ण से) स्वर्णिम ?
- टिप्पणी— इम संस्कृत के ‘डिमच्’ प्रत्यय से आया है। डिमच् का जब किसी शब्द से योग होता है तब ‘ड’ और ‘च्’ का लोप हो जाता था और शेष बचा ‘इम’ शब्द से जुड़ता है; जैसे— अग्र + इम (डिमच्) = अग्रिम।
- पश्चात्— (पश्चात् से) पश्चिम— पश्चात् (अपर + अति, पश्चभावः)। अपर (आधार शब्द) + अस्ताति (प्रत्यय) = पश्च (अपर → पश्च) + आत् (अस्ताति → आत्) = पश्चात्।
- डिमिच् और इमनिच् — अग्र + इम (डिमच्) = अग्रिम। रक्त + इमन् (इमनिच्) → रक्तिमन् → रक्तिमा।
इमा
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अग्र से) अग्रिमा, (अणु से) अणिमा, (अम्ल से) अम्लिमा, (अरुण से) अरुणिमा, (गुरु से) गरिमा, (जड → जड़) जडिमा → जड़िमा, (तरुण से) तरुणिमा, (दीर्घ → द्राध् से) द्राधिमा, (धवल से) धवलिमा, (नील से) नीलिमा, (पूर्व से) पूर्विमा, (बधिर से) बधिरिमा, (भंग से) भंगिमा, (मंद से) मंदिमा, (मधुर से) मधुरिमा, (महत् से) महिमा, (मूक से) मूकिमा, (रक्त से) रक्तिमा, (लघु से) लघिमा, (लाल से) लालिमा, (बंक से) बंकिमा, (श्वेत से) श्वेतिमा, (हरित से) हरीतिमा।
- टिप्पणी— इमा प्रत्यय संस्कृत के ‘इमनिच्’ प्रत्यय से आया है, जब यह शब्द से जुड़ता है तो ‘इच्’ का लोप हो जाता है और ‘इमन्’ बनकर जुड़ता है, साथ ही आधार शब्द का अंतिम स्वर लुप्त हो जाता है; जैसे— अणु + इमन् (इमनिच्) = अण् + इमन् = अणिमन्; ‘अणिमन्’ मूल प्रातिपदिक है, इसका प्रयोग सीधे ही नहीं होता है, पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति, एकवचन में ‘न्’ का लोप और उपधा दीर्घ होकर यह ‘अणिमा’ बनता है। आसान शब्दों में— आधार शब्द में ‘इमनिच्’ प्रत्यय ‘इमा’ बनकर जुड़ता है और सीधे अणिमा बनता है, अणु + इमा (इमनिच्) = अणिमा।
इय और ईय
- संज्ञा से विशेषण बनानेवाला
- इय संस्कृत के ‘घ’ से और ईय ‘छ’ से आया है।
- घ → इय — (क्षत्र से) क्षत्रिय, (क्षेत्र से) क्षेत्रिय, (यज्ञ से) यज्ञिय, (श्रोत से) श्रोत्रिय
- छ → ईय — (आत्मन् से) आत्मीय, (आयुध से) आयुधीय, (ईश्वर से) ईश्वरीय, (उदर से) उदरीय, (चुंबक से) चुंबकीय,(जाति से) जातीय, (तद् से) तदीय, (युष्मद् → त्वत् से) त्वदीय, (देश से) देशीय, (नगर से) नगरीय, (नारद से) नारदीय, (पर्वत से) पर्वतीय, (पाणिनि से) पाणिनीय, (प्रकाशक से) प्रकाशकीय, (भवत् से) भवदीय, (भारत से) भारतीय, (अस्मद् → मत् से) मदीय, (रविवार से) रविवारीय, (रविवासर से) रविवासरीय, (राष्ट्र से) राष्ट्रीय, (लेखक से) लेखकीय, विभागीय, (शरद् से) शारदीय, (शासक से) शासकीय, (शास्त्र से) शास्त्रीय, (संघ से) संघीय, (संपादक से) संपादकीय
- छ → ईय — पर, राजन् और स्व में ईय प्रत्यय से पूर्व ‘क्’ का आगम होता है— (पर से) परकीय, (राजन् → राज से) राजकीय, (स्व से) स्वकीय
- (यज्ञ से) यज्ञिय (शुद्ध)। परन्तु यज्ञीय शब्द प्रचलित हो गया है। अष्टाध्यायी – “यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ”—5/1/71 – इसके अनुसार यज्ञ से यज्ञिय शब्द बनेगा। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में यज्ञिय (यज्ञ + इय) शब्द मिलता है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में यज्ञिय → यज्ञ + इय (घ) और यज्ञीय → यज्ञ + ईय (छ) दोनों मिलता है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी शब्दकोश’ और R. S. McGregor कृत ‘The Hindi-English Dictionary’ में यज्ञीय शब्द मिलता है।
- (राष्ट्र से) राष्ट्रिय या राष्ट्रीय— अष्टाध्यायी – “राष्ट्रावारपाराद् घखौ”—4/2/93 – इसके अनुसार राष्ट्रिय शुद्ध है और कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (राष्ट्रिय) ही सही माना गया है। परन्तु डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’, वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’, हिन्दी शब्द कोशों में राष्ट्रीय शब्द मिलता है; जबकि शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ कोश में राष्ट्रिय और राष्ट्रीय दोनों मिलता है। इस तरह हिन्दी में ‘राष्ट्रीय’ स्वीकार कर लिया गया है।
- (स्मरण से नहीं, स्मृ से) स्मरणीय : स्मृ + अनीयर् = स्मर् + अनीय = स्मरणीय; अतः स्मरणीय कृदन्त है। (दमन से नहीं, दम् से) दमनीय : दम् + अनीयर् = दम् + अनीय; अतः दमनीय कृदन्त है।
ईय (कीय)
- आत्मकीय, देवकीय, नाभिकीय, परकीय, राजकीय, वेणुकीय, स्वकीय
- छ से ईय— आत्मन् + क (कन् प्रत्यय) = आत्मक से आत्मकीय। देव + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) या देवक + ईय या देवकी + ईय = देवकीय। नाभि + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) = नाभिकीय। पर + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) = परकीय। राज (राजन्) + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) = राजकीय। वेणु + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) = वेणुकीय। स्व + क (कुक् का आगम) + ईय (छ) = स्वकीय।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘कीय’ को प्रत्यय मानते हुए उपर्युक्त उदाहरण दिये हैं। परन्तु संस्कृत भाषा में ‘कीय’ जैसा कोई प्रत्यय ही नहीं है। संस्कृत व्याकरण में कुछ परिस्थितियों में ‘ईय’ (छ) प्रत्यय के जुड़ने पर ‘क्’ (कुक्) का आगम होता है और यह क ही ईय से जुड़कर कीय (क् + ईय) बनकर ऐसे शब्दों का निर्माण करता है, इस तथ्य को हम वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में परकीय और स्वकीय शब्द-प्रविष्टि में देख सकते हैं। हिन्दी भाषा संस्कृत के सरलीकरण का परिणाम है, इस कारण से हिन्दी में हम कई प्रत्यय ऐसे पाते हैं जो शब्द के अन्त में जुड़े हैं उसे ही मान लिया गया है। परन्तु ऐसी स्थिति में वह हिन्दी का प्रत्यय होगा, न कि संस्कृत का।
इल
- विशेषण बनानेवाला
- अर्थ— वाला या युक्त
- यह (इल) संस्कृत के ‘इलच्’ प्रत्यय से आया है।
- (उदर से) उदरिल, (कुटि से) कुटिल, (जंघा से) जंघिल, (जटा से) जटिल, (तुंड से) तुंडिल, (तुंद से) तुंदिल, (धूम से) धूमिल (पंक से) पंकिल, (पिंड से) पिंडिल, (फेन से) फेनिल, (रोम से) रोमिल, (सर्प से) सर्पिल, (सिकता से) सिकतिल, (स्वप्न से) स्वप्निल।
- कुटिल : शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में (कुट् से) कुटिल; कुट् धातु है, इसलिए इस व्याख्या के अनुसार कुटिल कृदन्त हुआ।
इष्ठ
- विशेषण बनानेवाला
- (अल्प से) अल्पिष्ठ, (युवन् → कन् से) कनिष्ठ, (गुरु → गर् से) गरिष्ठ, (घन से) घनिष्ठ, (प्रशस्य → ज्य से) ज्येष्ठ, (अन्तिक → नेद से) नेदिष्ठ, (पापी से) पापिष्ठ, (बलिन्/बली से) बलिष्ठ, (भूमि से) भूमिष्ठ, (बहु → भू + यिट् = भू + य् से) भूयिष्ठ, (महत् → मह् से) महिष्ठ, (उरु → वर् से) वरिष्ठ, (प्रशस्य → श्र से) श्रेष्ठ, (स्वादु से) स्वादिष्ठ।
- इष्ठ संस्कृत के ‘इष्ठन्’ प्रत्यय से आता है।
- टिप्पणी— पाणिनीय व्याकरण के मूल शब्द में इष्ठन् प्रत्यय के योग पर कुछ शब्दों में अन्य शब्द का आदेश होता है, अर्थात् आ जाता है और तब इष्ठ प्रत्यय के योग से शब्द का निर्माण होता है; जैसे— (युवन् → कन् से) कनिष्ठ; इसमें युवन् शब्द से इष्ठन् प्रत्यय के योग होने पर वह (युवन्) कन् में बदल जाता है और तब कन् + इष्ठ से कनिष्ठ शब्द बनता है।
ईन
- विशेषण बनानेवाला
- ईन संस्कृत के ‘ख’ प्रत्यय से आया है।
- (अधि से) अधीन, (अर्वाच् से) अर्वाचीन, (काल से) कालीन, (कुल से) कुलीन, (ग्राम से) ग्रामीण, (नव से) नवीन, (पार से) पारीण, (प्राच् से) प्राचीन, (विश्वजन से) विश्वजनीन, (शाला से) शालीन, (सम्यच् से) समीचीन, (सर्वजन से) सार्वजनीन
- अर्वाचीन, अधीन, प्राचीन और समीचीन को कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘इन’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है।
- अधीन— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे ‘ईन’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में (अधि + इन से) अधीन को निर्मित बताया गया है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘हिन्दी-संस्कृत शब्दकोश’ में इसे ‘प्रादि समास’ बताया गया है। अधीन = अधि (उपसर्ग) + इन (संज्ञा); इसलिए इसे उपसर्ग निर्मित भी मान सकते हैं।
- प्रवीण— प्र + वीणा; यह शब्द उपसर्ग निर्मित है, न कि प्रत्यय से। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे ईन प्रत्यय से निर्मित बताया गया है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘हिन्दी-संस्कृत शब्दकोश’ में इसे ‘प्रादि बहुव्रीहि’ समास बताया गया है।
- क्षीण— क्षि (धातु) + (त) क्त प्रत्यय से बना है।
उल
- (मातृ से) मातुल
- उल संस्कृत के ‘डुलच्’ प्रत्यय से आया है।
एय
- यह संस्कृत के ‘ढक्’ प्रत्यय से आया है।
- अपत्यवाचक— (कद्रु से) काद्रवेय, (कृत्तिका से) कार्तिकेय, (कुन्ती से) कौन्तेय, (गंगा से) गांगेय, (दिति से) दैतेय, (पितृष्वसृ → पितृष्वसा से) पैतृष्वसेय, (भगिनी से) भागिनेय, (मातृष्वसृ → मातृष्वसा से) मातृष्वसेय, (मृकंडु / मृकण्डु से) मार्कंडेय / मार्कण्डेय, (राधा से) राधेय, (वृष्णि से) वार्ष्णेय, (विनता से) वैनतेय, (सुभद्रा से) सौभद्रेय
- अपत्य का अर्थ है— संतान। अपत्यवाचक का अर्थ है— वह संज्ञा जिससे किसी की संतान या वंशज होने का अर्थ मिले।
- टिप्पणी— सुभद्रा + एय (ढक्) = सौभद्रेय; सुभद्रा + अ (अण्) = सौभद्र (अधिक प्रचलित)। दिति + एय (ढक्) = दैतेय; दिति + य (ण्य) = दैत्य (अधिक प्रचलित)।
- विशेषण— (अग्नि से) आग्नेय, (अतिथि से) आतिथेय, (पथिन् से) पाथेय, (पुरुष से) पौरुषेय
- टिप्पणी— सभेय—
साभेय; अगर सभा में एय ढक् प्रत्यय से आयेगा तो साभेय बनेगा, परन्तु यह अशुद्ध है, हाँ केवल ढ से एय आये तो सभेय बनेगा। ढ से एय-आदेश होता है, ढक् में ‘क्’ आदि वृद्धि को करता है।
- टिप्पणी— सभेय—
- नगर या स्थान वाचक— (कच्छ से) काच्छेय, (कुण्डिन से) कौण्डिनेय, (तक्षशिला से) ताक्षशिलेय, (माहिष्मती से) माहिष्मतेय, (वाराणसी से) वाराणसेय, (शलातुर से) शालातुरेय
- टिप्पणी— शालातुरीय और शालातुरेय— शालातुरीय = शलातुर + ईय (छ)। शालातुरेय = शलातुर + एय (ढक्)।
क
- क संस्कृत के ‘कन्’ प्रत्यय से आया है।
- लघुता व ऊनतावाची संज्ञा— (नौ से) नौका, (पुत्र से) पुत्रक, (बाल से) बालक, (वृक्ष से) वृक्षक,
- टिप्पणी— नौका = नौ + क (कन्) + आ (टाप्)।
- समुदायवाचक संज्ञा— (अष्ट से) अष्टक, (दश से) दशक, (पंच से) पंचक, (सप्त से) सप्तक
कट
- उत्कट, निकट, प्रकट, विकट, संकट
- कट संस्कृत के ‘कटच्’ प्रत्यय से आया है। उपर्युक्त शब्दों में क्रमशः उद्, नि, प्र, वि और सम् उपसर्ग हैं।
- उत्कट = उद् + कटच्। निकट (नि समीपे कटति नि + कट् + अच्)। प्रकट = प्र + कट् + अच्। विकट = वि + कटच्। संकट (सम् + कटच्, सम् + कट् + अच् वा)
चित्
- क्रिया-विशेषण
- अर्थ— अनिश्चय
- (कथम् से) कथंचित्, (कदा से) कदाचित्, (किम् से) किंचित्, (के से) केचित्, (क्व से) क्वचित्
- टिप्पणी— कथम् → अर्थ- कैसे। कदा → अर्थ- कब। किम् → अर्थ- क्या। के → अर्थ- कौन सब। क्वा → अर्थ- कहाँ। इनमें से कदाचित् और किंचित् का प्रयोग संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में होता है, परन्तु केचित्, कथंचित् और क्वचित् का प्रयोग दुर्लभ है।
ठ
- विशेषण बनानेवाला
- (कर्मन् से) कर्मठ, (जृ → जरा से) जरठ।
- ‘ठ’ संस्कृत के ‘अठच्’ प्रत्यय से आया है।
तन
- कालवाची विशेषण बनानेवाला प्रत्यय
- (अद्य से) अद्यतन, (अधुना से) अधुनातन, चिरंतन, (नव से) नूतन, (पुरा से) पुरातन, (प्राच् से) प्राक्तन, (सदा से) सनातन, (सायम् से) सायंतन
- यह (तन) संस्कृत के ‘ट्यु’, ‘ट्युल्’ और ‘ष्ट्यु’ से आया है। वस्तुतः इन प्रत्ययों के लगने पर ‘त्’ (तुडागम) का आगम होता है और ‘ट्यु’, ‘ट्युल्’ और ‘ष्ट्यु’ से ‘अन’— अंततः “त् + अन = तन” बनकर आधार शब्द से युक्त होकर कालवाची विशेषण बनाते हैं।
- तन— ‘ट्यु’ या ‘ष्ट्यु’ या ‘ट्युल’ प्रत्यय जुड़ने पर तुट् का आगम होता; शब्द + तुट् (आगम) + ट्यु या ष्ट्यु या ट्युल (प्रत्यय) = शब्द + त् (उ व ट् का लोप) + यु (स्थिति अनुसार- ट्यु के ट् या ष्ट्यु के ष् व ट् या ट्युल के ट् व ल का लोप) = शब्द + त् + यु = शब्द + त् + अन (यु से अन का आदेश) = शब्द + त् + अन = शब्द + तन।
- अद्यतन (अद्य + तुट् + ष्ट्यु), अधुनातन (अधुना + तुट् + ट्युल्), चिरंतन (चिरम् + तुट् + ट्युल्),
- अद्यतन (अद्य + ष्ट्यु, तुट् च), अधुनातन (अधुना + तुट्-तुटच्), चिरंतन (चिरम् + ट्युल्, तुट् च), नूतन [नव + तनप् (त्नवा) नू आदेश], पुरातन (पुरा + ट्यु, तुटु), प्राक्तन (प्राच् + ट्यु, तुडागमः), प्रगेतन (प्रगे + ट्यु / ट्युल्, तुडागम), प्राह्णेतन (प्राह्ण + ट्यु, तुच्, नि॰ एत्वम्), सनातन (सदा + ट्युल, तुट्, नि॰ दस्य नः), सायंतन (सायम् + ट्युल्, तुच्)
- टिप्पणी— ‘ट्यु’ और ‘ष्ट्यु’ दोनों का परिणाम ‘तन’ होता है, परन्तु यह हमें स्पष्ट करता है कि स्त्रीलिंग बनाने के लिए ‘ई’ (ङीष्) प्रत्यय लगाना होगा या ‘आ’ प्रत्यय। ‘ष्ट्यु’ प्रत्यय से निर्मित शब्द में स्त्रीलिंग बनाने के लिए ‘ई’ (ङीष्) प्रत्यय लगता है; जैसे— अद्यतन = अद्य + त (तुट्) का आगम + ष्ट्यु, अद्यतन का स्त्रीलिंग अद्यतनी है।
तः (तस्)
- क्रिया-विशेषण बनानेवाला। रीतिवाचक बनानेवाला प्रत्यय
- (अंत से) अंततः, (अंश से) अंशतः, (अग्र से) अग्रतः, (अधिकांश से) अधिकांशतः, (अनिवार्य से) अनिवार्यतः, (अनुमान से) अनुमानतः, (अन्य से) अन्यतः, (आदि से) आदितः, (इतस् + ततस् से) इस्ततः, (एक से) एकतः, (एतद् से) इतः, (उदाहरण से) उदाहरणतः, (उभय से) उभयतः, (किम् से) कुतः, (तत्त्व से) तत्त्वतः, (तथ्य से) तथ्यतः, (तद् से) ततः, (नाम से) नामतः, (न्याय से) न्यायतः, (पर से) परतः, (पूर्ण से) पूर्णतः, (पूर्व से) पूर्वतः, (प्रत्यक्ष से) प्रत्यक्षतः, (प्रथम से) प्रथमतः, (प्रधान से) प्रधानतः, (प्रमाण से) प्रमाणतः, (प्रांत से) प्रांततः, (फल से) फलतः, (मुख्य से) मुख्यतः, (मूल से) मूलतः, (यद्/यत् से) यतः, (यथार्थ से) यथार्थतः, (वस्तु से) वस्तुतः, (विधि से) विधितः, (विभाग से) विभागतः, (विशेष से) विशेषतः, (व्यवहार से) व्यवहारतः, (सम्भव से) सम्भवतः, (सर्व से) सर्वतः, (साधारण से) साधारणतः, (सामान्य से) सामान्यतः, (सिद्धांत से) सिद्धांततः, (स्पष्ट से) स्पष्टतः, (स्व से) स्वतः, (स्वभाव से) स्वभावतः
- यह (तः) प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण से जुड़कर क्रिया-विशेषण शब्द का निर्माण करता है— संज्ञा से— अंत, अंश, फल, मूल, स्व इत्यादि। सर्वनाम से— किम्, तद्, यद्, एतद् इत्यादि। विशेषण से— पूर्ण, साधारण, स्पष्ट इत्यादि।
- टिप्पणी— वस्तुतः यह (तः) प्रत्यय संस्कृत के ‘तसिल्’ से आता है। तसिल् → तस् (इल् का लोप) → तर् (स् का रु/र् आदेश) → तः (शब्द के अंत का र् → ः/विसर्ग)। अर्थात् मुख्य + तसिल् → मुख्यतस् → मुख्यतर् → मुख्यतः।
- तः और तया : तः प्रत्यय का प्रयोग अपादान के अर्थ में होता है, जबकि तया प्रत्यय का प्रयोग करण के अर्थ में होता है। मूलतः – मूल (विशेषण) + तः (तसिल् → तस् → तः) अर्थात् पूर्णता से/पूर्ण होने के कारण; पूर्णतया – पूर्ण (विशेषण) + ता (भाववाचक) → पूर्णता (संज्ञा) + करण (तृतीया विभक्ति) → पूर्णतया अर्थात् पूर्णता के द्वारा/पूर्णता के साथ। मुख्यतः (मुख्य होने के कारण/से) और मुख्यतया (मुख्य रूप के द्वारा)। विशेषतः (विशेष होने के कारण) और विशेषतया (विशेषता के साथ)। सामान्यतः (सामान्य रूप से) और सामान्यतया (सामान्यता के साथ)। इत्यादि। हिन्दी के आधुनिक व्यावहारिक प्रयोग में आप इन दोनों में से किसी भी शब्द का चयन ‘पूरी तरह से’ के अर्थ में कर सकते हैं, दोनों ही शुद्ध और मानक हैं। लेकिन व्याकरण के स्तर पर यदि गहराई से देखा जाए, तो ‘पूर्णतः’ सीधे कार्य की सीमा को छूता है और ‘पूर्णतया’ कार्य के होने के माध्यम या भाव को प्रकट करता है।
तया
- क्रिया विशेषण बनानेवाला। रीतिवाचक
- (अधिकांश से) अधिकांशतया, (पूर्ण से) पूर्णतया, (प्रधान से) प्रधानतया, (प्रत्यक्ष से) प्रत्यक्षतया, (मुख्य से) मुख्यतया, (विशेष से) विशेषतया, (संक्षेप से) संक्षेपतया, (साधारण से) साधारणतया, (सामान्य से) सामान्यतया।
ता
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अक्षम से) अक्षमता, (अग्र से) अग्रता, (अधिक से) अधिकता, (अमर से) अमरता, (आत्मीय से) आत्मीयता, (आधुनिक से) आधुनिकता, (आवश्यक से) आवश्यकता, (उदार से) उदारता, (ऋणग्रस्तता से) ऋणग्रस्तता, (एकाग्र से) एकाग्रता, (एक से) एकता, (कटु से) कटुता, (कठिन से) कठिनता, (कठोर से) कठोरता, (कर्मठ से) कर्मठता, (कर्मण्य से) कर्मण्यता, (कवि से) कविता, (कृतज्ञ से) कृतज्ञता, (क्रूर से) क्रूरता, (क्षीण से) क्षीणता, (गंभीर से) गंभीरता, (गुरु से) गुरुता, (चंचल से) चंचलता, (चपल से) चपलता, (जन से) जनता, (ज्येष्ठ से) ज्येष्ठता, (तल्लीन से) तल्लीनता, (तीक्ष्ण से) तीक्ष्णता, (दानव से) दानवता, (दीन से) दीनता, (दुर्बल से) दुर्बलता, (दृढ़ से) दृढ़ता, (धीर से) धीरता, (धृष्ट से) धृष्टता, (नम्य से) नम्यता, (नवीन से) नवीनता, (नागरिक से) नागरिकता, (नास्तिक से) नास्तिकता, (निपुण से) निपुणता, (निर्लज्ज से) निर्लज्जता, (निष्क्रिय से) निष्क्रियता, (नीच से) नीचता, (नैतिक से) नैतिकता, (पवित्र से) पवित्रता, (पशु से) पशुता, (पूर्ण से) पूर्णता, (प्रगतिशील से) प्रगतिशीलता, (प्रतियोगी से) प्रतियोगिता, (बंधु से) बंधुता, (भावुक से) भावुकता, (मधुर से) मधुरता, (मनुष्य से) मनुष्यता, (मम् से) ममता, (मानव से) मानवता, (मित्र से) मित्रता, (मूर्ख से) मूर्खता, (मृदु से) मृदुता, (योग्य से) योग्यता, (रमणीय से) रमणीयता, (राष्ट्रीय से) राष्ट्रीयता, (रुग्ण से) रुग्णता, (रोचक से) रोचकता, (लघु से) लघुता, (लाक्षणिक से) लाक्षणिकता, (वक्र से) वक्रता, (विचित्र से) विचित्रता, (विमुख से) विमुखता, (विशाल से) विशालता, (विशेष से) विशेषता, (विषम से) विषमता, (वीर से) वीरता, (वैध से) वैधता, (व्याकुल से) व्याकुलता, (शत्रु से) शत्रुता, (संपन्न से) संपन्नता, (सफल से) सफलता, (सम से) समता, (समान से) समानता, (समीप से) समीपता, (सहाय से) सहायता, (सहिष्णु से) सहिष्णुता, (सहृदय से) सहृदयता, (सापेक्ष से) सापेक्षता, (सारग्राही से) सारग्राहिता, (सार्थक से) सार्थकता, (सूक्ष्म से) सूक्ष्मता, (स्वाधीन से) स्वाधीनता, (स्वार्थपर से) स्वार्थपरता, (हीन से) हीनता।
- ‘ता’ संस्कृत के – त (‘तल्’) + आ (‘टाप्’ स्त्रीलिंग प्रत्यय) = ता – से आया है, इसलिए ये शब्द स्त्रीलिंग हैं।
- ‘ता’ प्रत्यय अधिकतर विशेषण के साथ जुड़ता है। परन्तु थोड़े से संज्ञा पदों के साथ भी इसका योग होता है; जैसे— दानवता, नास्तिकता, पशुता, मनुष्यता, मानवता, मित्रता, शत्रुता, सहायता इत्यादि। साथ ही इससे कुछ समूहवाचक शब्द भी बनते हैं; जैसे— जनता, बंधुता इत्यादि।
ती
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला प्रत्यय
- -मान् या -वान् के स्थान पर -मती या -वती
- (गतिमान्/गतिवान् से) गतिमती/गतिवती, (गुणवान् से) गुणवती, (ज्ञानवान्) ज्ञानवती, (द्युतिमान्) द्युतिमती, (धीमान् से) धीमती, (प्रज्ञावान् से) प्रज्ञावती, (प्रतापवान् से) प्रतापवती, (बलवान् से) बलवती, (बुद्धिमान् से) बुद्धिमती, (भगवान् से) भगवती, (भाग्यवान् से) भाग्यवती, (मतिमान् से) मतिवती, (रूपवान् से) रूपवती, (लज्जावान् से) लज्जावती, (विद्यावान् से) विद्यावती, (विवेकवान् से) विवेकवती, (शक्तिमान् से) शक्तिमती, (शीलवान् से) शीलवती, (श्रद्धावान् से) श्रद्धावती, (श्रीमान् से) श्रीमती
त्य
- (अत्र से) अत्रत्य, (अमा से) अमात्य, (तत्र से) तत्रत्य, (दक्षिणा से) दाक्षिणात्य, (नि से) नित्य, (पश्चात् से) पाश्चात्य, (पुरस् से) पौरस्त्य
- त्य संस्कृत के त्यप् और त्यक् प्रत्यय से आया है। इनमें भेद यह है कि— त्यप् के योग से सीधे त्य जुड़ता है कोई आदि वृद्धि नहीं होती है, जैसे— अत्र + त्य (त्यप्) = अत्रत्य। जबकि त्यक् के योग से आदि वृद्धि होती है, जैसे— दक्षिण + त्य (त्यप्) = दाक्षिणात्य।
- टिप्पणी— इन शब्दों के अनुकरण पर
पाश्चिमात्यऔरपौर्वात्यशब्द हिन्दी में प्रचलित हुए परन्तु ये अशुद्ध हैं। - दक्षिण या दक्षिणा से दाक्षिणात्य— संस्कृत में दक्षिणा + त्यक् = दाक्षिणात्य (स्रोत— दक्षिणा-पश्चात्-पुरस्त्यक्- 4/2/98, अष्टाध्यायी)। हिन्दी की प्रकृति व्यावहारिक और सरलीकरण की है। संस्कृत में दक्षिणा का अर्थ है “दक्षिण दिशा में” और “ब्राह्मण या गुरु को दी जाने वाली भेंट” दोनो है। जबकि हिन्दी में दक्षिणा का अर्थ “ब्राह्मण या गुरु को दी जाने वाली भेंट” हो चुका है, इसीलिए हिन्दी के विद्वान कामताप्रसाद गुरु दक्षिण + त्य = दाक्षिणात्य बताते हैं।
- त्यप् से— अत्र + त्य (त्यप्), अमा + त्य (त्यप्), तत्र + त्य (त्यप्), नि + त्य (त्यप्),
- त्यक् से— दक्षिणा + त्य (त्यक्), पश्चात् + त्य (त्यक्), पुरस् + त्य (त्यक्)
त्र
- सर्वनाम और विशेषण से स्थानवाची क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (इदम् से) अत्र, (अन्य से) अन्यत्र, (एक से) एकत्र, (किम् से) कुत्र, (तद्/तत् से) तत्र, (पर से) परत्र, (पूर्व से) पूर्वत्र, (यद् से) यत्र, (यद्-तद् से) यत्र-तत्र, (सर्व से) सर्वत्र
- टिप्पणी— यह (त्र) संस्कृत के ‘त्रल्’ प्रत्यय से आया है। यह अधिकरण (सप्तमी विभक्ति) के अर्थ को प्रकट करता है, जिसका कारक चिह्न ‘में’ और ‘पर’ है।
त्व
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अमर से) अमरत्व, (अस्ति से) अस्तित्व, (आचार्य से) आचार्यत्व, (उत्तरदायी से) उत्तरदायित्व, (एक से) एकत्व, (कवि से) कवित्व, (काव्य से) काव्यत्व, (कृति से) कृतित्व, (गुरु से) गुरुत्व, (घन से) घनत्व, (जड़ से) जड़त्व, (तत् से) तत्त्व, (देव से) देवत्व, (द्वि से) द्वित्व, (द्विपत्नी से) द्विपत्नीत्व, (नारी से) नारीत्व, (नेता से) नेतृत्व, (पंगु से) पंगुत्व, (पशु से) पशुत्व, (पुत्र से) पुत्रत्व, (पुरुष से) पुरुषत्व, (प्रभु से) प्रभुत्व, (बन्धु से) बन्धुत्व, (ब्राह्मण से) ब्राह्मणत्व, (मनुष्य से) मनुष्यत्व, (महत् से) महत्त्व, (मातृ से) मातृत्व, (राजन् से) राजत्व, (लघु से) लघुत्व, (व्यक्ति से) व्यक्तित्व, (शिव से) शिवत्व, (शिष्य से) शिष्यत्व, (संपादक से) संपादकत्व, (सती से) सतीत्व, (स्त्री से) स्त्रीत्व, (सभापति से) सभापतित्व, (सम से) समत्व, (स्थायी से) स्थायित्व, (स्व से) स्वत्व, (हिन्दू से) हिन्दुत्व।
- ये शब्द पुल्लिंग हैं।
- त्व संस्कृत के ‘त्वल्’ प्रत्यय से आया है।
- ता और त्व— ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनमें ता और त्व दोनों प्रत्यय लगने से समान भाववाचक संज्ञा बनता है; जैसे— अमरता = अमर + ता (तल्) + आ (टाप्- स्त्रीलिंग)। अमरत्व = अमर + त्व (त्वल्)। इनमें भेद यह है कि ‘ता’ (तल् + टाप्) लगने से स्त्रीलिंग शब्द बनते हैं, जबकि ‘त्व’ लगने से पुल्लिंग शब्द बनते हैं। साथ ही ‘ता’ प्रत्यय अधिकतर विशेषण शब्दों के साथ लगते है, संज्ञा शब्दों के साथ कम; जबकि ‘त्व’ प्रत्यय अधिकतर संज्ञा शब्दों के साथ लगते है, विशेषण शब्दों के साथ कम।
था
- रीतिवाचक क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (अन्य से) अन्यथा, (तद् से) तथा, (पूर्व से) पूर्वथा, (यद् से) यथा, (सर्व से) सर्वथा।
- यह (‘था’) संस्कृत के ‘थाल्’ प्रत्यय से आया है।
- वृथा (वृ + थाल् किच्च)— वृथा (वृ धातु से बना), इसलिए यह कृदंत शब्द है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘वृथा’ को तद्धितांत बताया गया है।
- अवृथा (अ + वृ + था)— नञ् तत्पुरुष समास।
दा
- कालवाचक क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (किम् से) कदा, (तद् से) तदा, (यद् से) यदा, (सद् से) सदा, (सर्व से) सर्वदा
- टिप्पणी— दा प्रत्यय संस्कृत के ‘दाच्’ प्रत्यय से आया है।
धा
- विशेषण से प्रकारवाचक क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (एक से) एकधा, (त्रि से) त्रिधा, (दशन् → दश से) दशधा, (द्वि से) द्विधा, (नव से) नवधा, (बहु से) बहुधा, (शत से) शतधा।
- टिप्पणी— ‘धा’ प्रत्यय संस्कृत के ‘धाच्’ (प्रत्यय) से आया है।
धेय
- विशेषण
- (नाम से) नामधेय, (भाग से) भागधेय, (रूप से) रूपधेय
नी
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग
- (कुमुद से) कुमुदिनी, (पति से) पत्नी, (भिक्षु से) भिक्षुणी, (राजा) से राज्ञी
- टिप्पणी— ‘डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘नी’ प्रत्यय के योग से कुमुदनी, पत्नी, भिक्षुणी और राज्ञी शब्द का निर्माण बताया गया है। परन्तु ये शब्द अलग-अलग प्रत्यय के योग के परिणाम हैं। कुमुदिनी (
कुमुदनी) शब्द का निर्माण इनि प्रत्यय से हुआ है— कुमुद + इनि = कुमुदिनी। जब शब्द के अन्त में इ/ई/उ/ऊ जैसे स्वर होते हैं तो नुक् (न्) का आगम होता है— पत्नी = पति + ई (ङीप्) + नुक् (न् का आगम) = पत्नी = पति + न् + ई। भिक्षुणी = भिक्षु + ई (ङीप्) + नुक् (न् का आगम) = भिक्षु + न् + ई → ‘णत्व-विधान’ के कारण ‘न’ का ‘ण’ → भिक्षुणी। संस्कृत में राजन् (राजा) शब्द है; राज्ञी = राजन् + ई (ङीप्); यहाँ ज का अकारलोप और न् का ध्वनि परिवर्तन होकर ञ् हो जाता है → ज् + ञ = ज्ञ होता है, इस तरह ‘राज्ञी’ बनता है। हिन्दी भाषा में संस्कृत भाषा का सरलीकरण हुआ है। उपर्युक्त सभी शब्दों के अंत में ‘नी’ ध्वनि है इसलिए ‘डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इन शब्दों के निर्माण में सरलीकरण और ध्वनिसाम्य के आधार पर ‘नी’ प्रत्यय से बताया गया है।
म
- विशेषण
- (अधस् से) अधम, (आदि से) आदिम, (द्रु से) द्रुम, (मध्य से) मध्यम
- अधम— 1. अधस् (स् का लोप) + म = अधम; 2. अव् (धातु) + अम (प्रत्यय) = अध् (अव् → अध्, अधादेश) + अम = अधम। पहला प्रकार हिन्दी में सरलीकरण और व्यावहारिक व्युत्पत्ति को दर्शाता है, जबकि दूसरा संस्कृत के व्याकरण के अनुसार व्युत्पत्ति को दर्शाता है। पहला प्रकार की व्युत्पत्ति तद्धितांत है, जबकि दूसरा कृदंत है।
- आदिम— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और ‘डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में आदि में म प्रत्यय के योग से आदिम की व्युत्पत्ति बतायी गयी है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में आदिम = आदि + इम (डिमच्) = आद् (इ का लोप) + इम, की व्युत्पत्ति बतायी गयी है।
- चरम = चर् + अम (अमच् प्रत्यय, च् का लोप)
- परम = पर (मूल शब्द) + मा (धातु) + क (प्रत्यय, क प्रत्यय के होने से धातु के आ का लोप) = पर + म।
मत्-मान् / वत्-वान्
- विशेषण बनानेवाला
- मतुप् प्रत्यय से मत्-मान् और वत्-वान् आते हैं।
- अर्थ— वाला या युक्त
- नियम : ‘-वत्’ / ‘-वान्’ (म → व) : जब मूल शब्द के अन्त में या अंतिम अक्षर से पूर्व (उपधा) ‘अ’ या ‘आ’ स्वर आये तो ‘म’ का ‘व’ हो जाता है— धन + मतुप् = धनवान् (धन शब्द के ‘न’ में ‘अ’ स्वर, इसलिए ‘म’ का ‘व’ हो गया)। विद्या + मतुप् = विद्यावान् (विद्या शब्द के अंत में ‘आ’ स्वर, इसलिए ‘म’ का ‘व’ हो गया)। यदि आधार शब्द के अन्त में या उपधा में ‘म’ हो तो भी ‘म’ का ‘व’ हो जाता है— किम् + मतुप् = किंवान् (किम् शब्द के अन्त में ‘म’ इसलिए ‘म’ का ‘व’ हो गया)। लक्ष्मी + मतुप् = लक्ष्मीवान् (लक्ष्मी शब्द के उपधा में ‘म’ इसलिए ‘म’ का ‘व’ हो गया)।
- नियम : ‘-मत्’ / ‘-मान्’ (म यथावत्) : जब मूल शब्द के अंत में ‘अ’ या ‘आ’ स्वर के स्थान पर कोई अन्य स्वर (इ, ई, उ, ऊ) हो तब ‘म’ सुरक्षित रहता है— शक्ति + मतुप् = शक्तिमान् (शक्ति में ‘इ’ स्वर, इसलिए ‘म’ सुरक्षित)। श्री + मतुप् = श्रीमान् (श्री में ‘ई’ स्वर, इसलिए ‘म’ सुरक्षित)।
- मत्/मान् (म यथावत्) : (अंशु से) अंशुमान्, (आयुस् से) आयुष्मान्, (कीर्ति से) कीर्तिमान्, (गो से) गोमान्, (तंतु से) तंतुमान्, (धी से) धीमान्, (नीति से) नीतिमान् (
नीतिवान्), (प्रज्ञा से) प्रज्ञावान्, (बुद्धि से) बुद्धिमान् (बुद्धिवान्), (भक्ति से) भक्तिमान्, (भ्रांति से) भ्रांतिमान्, (मति से) मतिमान्, (मूर्ति से) मूर्तिमान्, (वृद्धि से) वृद्धिमान्, (शक्ति से) शक्तिमान्, (श्री से) श्रीमान्, (स्फूर्ति से) स्फूर्तिमान्। वस्तुतः मतुप् प्रत्यय के योग से -वत् अन्त वाले शब्द निर्मित होते हैं; जैसे— अंशु + मत् (मतुप्) = अंशुमत् – ‘संस्कृत’ शब्दकोश में हमें यही शब्द प्राप्त होते हैं; ‘-मत्’ लगे हुए शब्द प्रातिपादिक होते हैं; अंशुमत् प्रातिपादिक हैं। लिंग की दृष्टि से अंशुमत् नपुंसकलिंग है, अंशुमान् पुल्लिंग और अंशुमती स्त्रीलिंग है। इसी तरह अन्य शब्दों के नपुंसकलिंग, पुल्लिंग और स्त्रीलिंग हैं। ‘-मत्’ प्रत्यय-युक्त शब्द संस्कृत शब्दकोशों में प्राप्त होते हैं हिन्दी में नहीं। हिन्दी भाषा में सरलीकरण की प्रक्रिया में ‘-मत्’ प्रत्यय-युक्त शब्द को छोड़कर आगे बढ़ जाती है और उसमें अंशुमान् (पुल्लिंग) और अंशुमती (स्त्रीलिंग) शब्द मिलते हैं।
| आधार शब्द | नपुंसकलिंग | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
| अंशु | अंशुमत् | अंशुमान् | अंशुमती |
| आयुस् | आयुष्मत् | आयुष्मान् | आयुष्मती |
| कीर्ति | कीर्तिमत् | कीर्तिमान् | कीर्तिमती |
| गो | गोमत् | गोमान् | गोमती |
| तंतु | तंतुमत् | तंतुमान् | तंतुमती |
| धी | धीमत् | धीमान् | धीमती |
| नीति | नीतिमत् | नीतिमान् | नीतिमती |
| बुद्धि | बुद्धिमत् | बुद्धिमान् | बुद्धिमती |
| भक्ति | भक्तिमत् | भक्तिमान् | भक्तिमती |
| भ्रांति | भ्रांतिमत् | भ्रांतिमान् | भ्रांतिमती |
| मति | मतिमत् | मतिमान् | मतिमती |
| मूर्ति (मूर्त्ति) | मूर्तिमत् (मूर्त्तिमत्) | मूर्तिमान् (मूर्त्तिमान्) | मूर्तिमती (मूर्त्तिमती) |
| वृद्धि | वृद्धिमत् | वृद्धिमान् | वृद्धिमती |
| शक्ति | शक्तिमत् | शक्तिमान् | शक्तिमती |
| श्री | श्रीमत् | श्रीमान् | श्रीमती |
| स्फूर्ति | स्फूर्तिमत् | स्फूर्तिमान् | स्फूर्तिमती |
- अंशुमत् = अंशु + मतुप् (विशेषण), अंशुमान् (पुल्लिंग), आयुष्मत् = आयुस् + मतुप् (विशेषण), धीमत् = धी + मतुप् (विशेषण), बुद्धिमान् = बुद्धि + ?, बुद्धिमत् = बुद्धि + मतुप् (विशेषण), भक्तिमत् = भक्ति + मतुप् (विशेषण), भ्रांतिमत् = भ्रांति + मतुप् (विशेषण), श्रीमत् = श्री + मतुप् (विशेषण), स्फूर्तिमत् = स्फूर्ति + मतुप् (विशेषण)
- अपवाद— कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें ‘यवादिगण’ कहा गया है। सामान्य नियमानुसार यदि शब्द के अन्त या उपधा में अ/आ हो तो म का व हो जाता है और इसके इतर होने पर म सुरक्षित रहता है। यव + मतुप् =
यववान्(यव के अन्त में अ है) होना चाहिए, परन्तु यवमान् सही है। ये अपवाद ही यवादिगण माने गये हैं। - विकासवान् और विकासमान् : (विकास से) विकासवान् (संस्कृत में, व्याकरण के अनुसार) विकासमान् (हिन्दी में, अपवाद)
- लक्ष्मीवान्— लक्ष्मी + मतुप् =
लक्ष्मीमान्(अन्त में ई है) होना चाहिए, परन्तु यदि अन्त या उपधा में म हो तो म का व हो जाता है, इसलिए लक्ष्मीवान् सही है। - ‘-वत्’ / ‘-वान्’ (म → व) : (आस्था से) आस्थावान्, (ऐश्वर्य से) ऐश्वर्यवान्, (क्रोध से) क्रोधवान्, (गुण से) गुणवान्, (चरित्र से) चरित्रवान्, (ज्ञान से) ज्ञानवान्, (तेजस् → तेज से) तेजस्वान् → तेजवान्, (दया से) दयावान्, (द्रव्य से) द्रव्यवान्, (धन से) धनवान्, (धर्म से) धर्मवान्, (निष्ठा से) निष्ठावान्, (प्रताप से) प्रतापवान्, (प्रयत्न से) प्रयत्नवान्, (प्राण से) प्राणवान्, (बल से) बलवान्, (भाग्य से) भाग्यवान्, (भोग से) भोगवान्, (मान से) मानवान्, (मूल्य से) मूल्यवान्, (मेधा से) मेधावान्, (रूप से) रूपवान्, (लज्जा से) लज्जावान्, (विचार से) विचारवान्, (वित्त से) वित्तवान्, (विद्या से) विद्यावान्, (विवेक से) विवेकवान्, (वीर्य से) वीर्यवान्, (शिखा से) शिखावान्, (शील से) शीलवान्, (हिम से) हिमवान्
- गुण + वत् (मतुप् प्रत्यय) = गुणवत् (नपुंसकलिंग)→ गुणवान् (पुल्लिंग) → गुणवती (स्त्रीलिंग)। अन्य शब्द भी इसी तरह बनेंगे। तेजस् + मतुप् (मस्य वः) = तेजस्वत्, तेजोवत्। द्रव्य + मतुप् = द्रव्यवत्। प्रताप + मतुप्, (वत्यम्) = प्रतापवत्। बल + मतुप्, (वत्यम्) = बलवत्। भग + मतुप्, (वत्यम्) = भगवत्। भाग्य + मतुप्, (वत्यम्) = भाग्यवत्। भोग + मतुप्, (वत्यम्) = भोगवत्। मेधा + मतुप्, (वत्यम्) = मेधावत्। रूप + मतुप्, (वत्यम्) = रूपवत्। वित्त + मतुप्, (वत्यम्) = वित्तवत्। विद्युत् + मतुप्, (वत्यम्) = विद्युत्वत्। वीर्य + मतुप्, (वत्यम्) = वीर्यवत्। हिम + मतुप्, (वत्यम्) = हिमवत्।
| आधार शब्द (प्रातिपादिक) | नपुंसकलिंग | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
| आस्था | आस्थावत् | आस्थावान् | आस्थावती |
| ऐश्वर्य | ऐश्वर्यवत् | ऐश्वर्यवान् | ऐश्वर्यवती |
| क्रोध | क्रोधवत् | क्रोधवान् | क्रोधवती |
| गुण | गुणवत् | गुणवान् | गुणवती |
| चरित्र | चरित्रवत् | चरित्रवान् | चरित्रवती |
| ज्ञान | ज्ञानवत् | ज्ञानवान् | ज्ञानवती |
| तेज | तेजवत् | तेजवान् | तेजवती |
| दया | दयावत् | दयावान् | दयावती |
| द्रव्य | द्रव्यवत् | द्रव्यवान् | द्रव्यवती |
| धन | धनवत् | धनवान् | धनवती |
| धर्म | धर्मवत् | धर्मवान् | धर्मवती |
| निष्ठा | निष्ठावत् | निष्ठावान् | निष्ठावती |
| प्रताप | प्रतापवत् | प्रतापवान् | प्रतापवती |
| प्रयत्न | प्रयत्नवत् | प्रयत्नवान् | प्रयत्नवती |
| प्राण | प्राणवत् | प्राणवान् | प्राणवती |
| बल | बलवत् | बलवान् | बलवती |
| भग | भगवत् | भगवान् | भगवती |
| भाग्य | भाग्यवत् | भाग्यवान् | भाग्यवती |
| भोग | भोगवत् | भोगवान् | भोगवती |
| मान | मानवत् | मानवान् | मानवती |
| मूल्य | मूल्यवत् | मूल्यवान् | मूल्यवती |
| मेधा | मेधावत् | मेधावान् | मेधावती |
| रूप | रूपवत् | रूपवान् | रूपवती |
| लज्जा | लज्जावत् | लज्जावान् | लज्जावती |
| वित्त | वित्तवत् | वित्तवान् | वित्तवती |
| विचार | विचारवत् | विचारवान् | विचारवती |
| विद्या | विद्यावत् | विद्यावान् | विद्यावती |
| विवेक | विवेकवत् | विवेकवान् | विवेकवती |
| वीर्य | वीर्यवत् | वीर्यवान् | वीर्यवती |
| शिखा | शिखावत् | शिखावान् | शिखावती |
| शील | शीलवत् | शीलवान् | शीलवती |
| हिम (बर्फ) | हिमवत् | हिमवान् | हिमवती |
| हेम (स्वर्ण) | हेमवत् | हेमवान् | हेमवती |
| हैम (स्वर्ण/बर्फ का) ? | हैमवत् | हैमवान् | हैमवती |
- द्रव्यवान् और द्रव्यमान : द्रव्यवान् = द्रव्य + मतुप् (प्रत्यय); अर्थ- द्रव्य (धन/सम्पत्ति) वाला; विशेषण। द्रव्यमान = द्रव्य + मान (संज्ञा); अर्थ- द्रव्य (पदार्थ) की मात्रा (मान), भौतिक-विज्ञान का पारिभाषिक शब्द; संज्ञा। द्रव्यमान एक समास शब्द है, विग्रह- द्रव्यमान = द्रव्य का मान (माप) – तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास।
मय (मयट् प्रत्यय)
- विशेषण बनानेवाला
- अर्थ— प्राचुर्य, व्याप्त; विकार
- (अग्नि से) अग्निमय, (अनुराग से) अनुरागमय, (अन्न से) अन्नमय, (अमृत से) अमृतमय, (आभा से) आभामय, (कंटक से) कंटकमय, (करुणा से) करुणामय, (कष्ट से) कष्टमय, (काव्य से) काव्यमय, (काष्ठ से) काष्ठमय, (कृष्ण से) कृष्णमय, (गरिमा से) गरिमामय, (चित् से) चिन्मय, (जल से) जलमय, (ज्योतिस् से) ज्योतिर्मय, (ज्ञान से) ज्ञानमय, तत् से तन्मय, (तपस् से) तपोमय, (तमस् से) तमोमय, (तेजस् से) तेजोमय, (दया से) दयामय, (धातु से) धातुमय, (पद्य से) पद्यमय, (ब्रह्म से) ब्रह्ममय, (भक्ति से) भक्तिमय, (मधु से) मधुमय, (मनस् से) मनोमय, (मांस से) मांसमय, (राम से) राममय, (रहस्य से) रहस्यमय, (रूप से) रूपमय, (विष्णु से) विष्णुमय, (शांति से) शांतिमय, (शिव से) शिवमय, (शोभा से) शोभामय, (संकट से) संकटमय, (सत् से) सन्मय, (सुख से) सुखमय।
य
- संज्ञा/विशेषण → भाववाचक संज्ञा – (शब्द + ष्यञ्) : (एकपति से) ऐकपत्य (
ऐक्यपत्य), (एकमत से) ऐकमत्य (ऐक्यमत्य), (एकाग्र से) ऐकाग्र्य, (एक से) ऐक्य, (एकात्म से) ऐकात्म्य, (ईश्वर से) ऐश्वर्य, (उग्र से) औग्र्य, (उचित से) औचित्य, (ओज से) औजस्य, (उज्ज्वल से) औज्ज्वल्य, (उत्कण्ठा से) औत्कण्ठ्य, (उत्कर्ष से) औत्कर्ष्य, (उत्सुक से) औत्सुक्य, (उदार से) औदार्य, (उदासीन से) औदासीन्य, (उदास से) औदास्य, (उद्धत से) औद्धत्य, (उन्नत से) औन्नत्य, (उष्ण से) औष्ण्य, (उष्म से) औष्म्य, (कठिन से) काठिन्य, (कातर से) कातर्य, (कपट से) कापट्य, (कर्कश से) कार्कश्य, (कृपण से) कार्पण्य, (कृश से) कार्श्य, (गंभीर से) गांभीर्य, (गृहस्थ से) गार्हस्थ्य, (चंचल से) चांचल्य, (चतुर से) चातुर्य, (चोर से) चौर्य, (तत्पर से) तात्पर्य, (तदात्म से) तादात्म्य, (तरुण से) तारुण्य, (देह से) दैह्य, (दूत से) दौत्य, (द्विगुण से) द्वैगुण्य, (द्विधा से) द्वैध्य, (द्विराज्य से) द्वैराज्य, (द्विविध से) द्वैविध्य, (धीर से) धैर्य, (धीवत् से) धैवत्य, (धूर्त से) धौर्त्य, (नट से) नाट्य, (निकट से) नैकट्य, (निपुण से) नैपुण्य, (निभृत से) नैभृत्य, (नियत से) नैयत्य, (निरपेक्ष से) नैरपेक्ष्य, (निरर्थ से) नैरर्थ्य, (निराश से) नैराश्य, (नीरुज से) नैरुज्य, (निर्गुण से) नैर्गुण्य, (निर्मल से) नैर्मल्य, (निर्लज्ज से) नैर्लज्ज्य, (निवेद से) नैवेद्य, (निश्चल से) नैश्चल्य, (निश्चित से) नैश्चित्य, (निष्कर्म से) नैष्कर्म्य, (निष्ठुर से) नैष्ठुर्य, (निष्ठ से) नैष्ठ्य, (पंडित से) पांडित्य, (प्रकट से) प्राकट्य, (प्रकाम से) प्राकाम्य, (प्रखर से) प्राखर्य, (प्रगल्भ से) प्रागल्भ्य, (प्रचण्ड से) प्राचण्ड्य, (प्रचुर से) प्राचुर्य, (प्रधान से) प्राधान्य, (प्रबल से) प्राबल्य, प्रामाण्य, (प्रमाद से) प्रामाद्य, (ब्राह्मण से) ब्राह्मण्य, (मंगल से) मांगल्य, (मणिक से) माणिक्य, (मधुर से) माधुर्य, (लवण से) लावण्य, (वणिज से) वाणिज्य, (वार्द्धक से) वार्द्धक्य, (विचित्र से) वैचित्र्य, (विधवा से) वैधव्य, (विपरीत से) वैपरीत्य, (विमनस् से) वैमनस्य, (विलक्षण से) वैलक्षण्य, (विलोम से) वैलोम्य, (शिथिल से) शैथिल्य, (शिला से) शैल्य, (शूर से) शौर्य, (सखि से) साख्य, (सदृश से) सादृश्य, (समर्थ से) सामर्थ्य, (समान से) सामान्य, (सम से) साम्य, (सम्राज से) साम्राज्य, (सयुज से) सायुज्य, (सारथि से) सारथ्य, (सरूप से) सारूप्य, (सलोक से) सालोक्य, (सहाय से) साहाय्य, (सहित से) साहित्य, (सेनापति से) सैनापत्य, (सुख से) सौख्य, (सुगन्ध से) सौगन्ध्य, (सुजन से) सौजन्य, (सूत से) सौत्य, (सोदर से) सौदर्य, (सुन्दर से) सौन्दर्य, (सुहृद् से) सौहार्द्य, (स्वस्थ से) स्वास्थ्य। - भाववाचक संज्ञा (शब्द + यक्) : (अधिपति + यक् से) आधिपत्य, (दंपती + यक् से) दांपत्य
- काव्य – इस शब्द के व्युत्पत्ति की दो तरह व्याख्या की जा सकती है— एक : कव् + ण्यत् = काव्य; दो : कवि + ष्यञ् = काव्य। पहली व्याख्या (कव्) से काव्य कृदंत होगा और दूसरी व्याख्या से काव्य तद्धितांत।
- गार्हपत्य = गृहपति + य (ञ्य), ‘गृहपतिना संयुक्ते ञ्यः’ (अष्टाध्यायी- 4/4/90)। मद्य = मद् + य – कृदंत है। माद्य = मद्/मद + य (ण्य) – कृदंत/तद्धितांत है।
- वीर्य = वीर् + य (यत्) – वीर्य कृदंत है।
- सख्य या साख्य— शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में हमें दोनों प्राप्त होता है : सख्य (सख्युर्भावः यत्), अर्थात् सखि + य = सख्य। साख्य = सखि + य (ष्यञ्)। पाणिनि कृत अष्टाध्यायी के अनुसार — ‘सख्युर्यः’ (अष्टाध्यायी 5/1/126) — अर्थात् सखि + य = सख्य। हिन्दी शब्दकोशों में हमें सख्य शब्द प्राप्त होता है, डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’; The Oxford : Hindi-English Dictionary (R. S. McGregor)। विश्लेषण— सख्य और साख्य दोनों में आधार शब्द ‘सखि’ में ‘य’ प्रत्यय के योग से निर्मित है। सामान्य नियमानुसार धातु में य के लिए यत् प्रत्यय और संज्ञा/विशेषण में य के लिए ष्यञ् प्रत्यय लगता है। यत् प्रत्यय से य लगने पर आदि वृद्धि नहीं होगी और सख्य बनेगा, परन्तु समस्या यह है कि सखि धातु नहीं संज्ञा है, तो यत् प्रत्यय कैसे लगेगा? दूसरी स्थिति में सखि में ष्यञ् प्रत्यय से य जुड़ने पर साख्य शब्द सिद्ध होगा और व्याकरणिक दृष्टि से यह शुद्ध भी है। परन्तु हम संस्कृत और हिन्दी दोनों में सख्य शब्द पाते हैं, यहीं पर अष्टाध्यायी का सूत्र स्थिति स्पष्ट करता है— ‘सख्युर्यः’ (अष्टाध्यायी 5/1/126) — अर्थात् सखि + य = सख्य, अर्थात् सख्य शब्द सही है और य प्रत्यय को प्रत्यय माना गया है, परन्तु यह यत् से आया या ष्यञ् से यह नहीं बताया गया। एक अन्य सूत्र ‘सख्यशिश्वीति भाषायाम्’ (अष्टाध्यायी 4/1/62) स्थिति स्पष्ट कर देता है— इसका अर्थ है कि— सख्य और शिश्वी लौकिक संस्कृत में इसी प्रकार मान्य (निपातित) किए गये हैं। अतः सखि से सख्य शुद्ध है।
- सौहार्द्य और सौहार्द— सुहृद् + य (ष्यञ्) = सौहार्द्य। सुहृद् + अ (अण्) = सौहार्द (हिन्दी में प्रचलित)। दोनों शुद्ध।
- ‘ष्यञ्’ प्रत्यय— ष्यञ् प्रत्यय में से ‘ष्’ और ‘ञ्’ की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। मूल शब्द के अंत में केवल ‘य’ शेष बचता है। इस प्रत्यय के योग से शब्द में दो बदलाव होते हैं— एक : आदिवृद्धि (प्रथम स्वर में बदलाव) – अ/आ → आ, इ/ई/ए → ऐ, उ/ऊ/ओ → औ, ऋ →आर्; दो : अंतिम स्वर का लोप – मूल शब्द के अंतिम स्वर का लोप हो जाता है और ‘य’ जुड़ जाता है।
य
- अपत्यवाचक संज्ञा— (अदिति से) आदित्य, (कुटिल से) कौटिल्य, (गर्ग से) गार्ग्य, (चणक से) चाणक्य, (जमदग्नि से) जामदग्न्य, (दिति से) दैत्य, (पुलस्ति) पौलस्त्य, (वत्स से) वात्स्य, (शंडिल से) शांडिल्य
- कौटिल्य और चाणक्य = चणक + य (यञ्)। कौटिल्य = कुटिल + य (ष्यञ्) — कुटिल को विशेषण माने तो कौटिल्य भाववाचक संज्ञा है; कुटिल को गोत्र माने तो कौटिल्य अपत्यवाचक संज्ञा है।
- टिप्पणी— ‘ण्य’ → ‘य’ : (अदिति + ण्य) आदित्य, (दिति + ण्य) दैत्य। ‘यञ्’ → य’ (गर्ग + यञ्) गार्ग्य, (जमदग्नि + यञ्) जामदग्न्य, (पुलस्ति + यञ्) पौलस्त्य, (वत्स + यञ्) वात्स्य, (शंडिल + यञ्) शांडिल्य।
य
- अर्थ— का, सम्बन्धित
- संज्ञा → विशेषण— (ओष्ठ से) ओष्ठ्य, (कंठ से) कंठ्य, (तालु से) तालव्य, (दंत/दन्त से) दंत्य/दन्त्य, न्याय्य, (मूर्धा/मूर्धन् से) मूर्धन्य।
- यह य संस्कृत के ‘यत्’ प्रत्यय से आया है। इसके जुड़ने से अंत्य स्वर का लोप होता है और ‘य’ जुड़ जाता है।
य
- अर्थ— का, सम्बन्धित
- सम्बन्धवाचक— (अकर्मन् से) अकर्मण्य, (अन्त/अंत से) अन्त्य/अंत्य, (आदि से) आद्य, (उदीची से) उदीच्य, (ग्राम से) ग्राम्य, (चतुर्मास से) चातुर्मास्य (हिन्दी-चौमासा), (धान से) धान्य, (प्रतीची से) प्रतीच्य, (परलोक से) पारलोक्य, (मुख से) मुख्य, (मूल से) मूल्य (यथातथ से) यथातथ्य, (संध्या से) सांध्य, (सेना से) सैन्य
- यत् प्रत्यय— अकर्मन् + यत्। अन्त/अंत + यत्। आदि + यत्। उदीची + यत्। ओष्ठ + यत्। कंठ + यत्। ग्राम + यत्। तालु + यत्। दन्त + यत्। धान + यत्। न्याय + यत्। प्रतीची + यत्। परलोक + यत्। मुख + यत्। मूल + यत्। यथातथ + यत्। संध्या = संधि + यत् + टाप्।
- ण्य् प्रत्यय— चतुर्मास् + ण्य्।
- अण् प्रत्यय— सांध्य = संध्या + अण्।
- ञय प्रत्यय— सेना + ञय।
- धन या धान से धान्य : कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार धन से धान्य बना है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ के अनुसार धान + यत् = धान्य।
- सभ्य— सभा + य; शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ के अनुसार सभ्य (सभायां साधुः यत्), अर्थात् य यत् प्रत्यय से आया है। वहीं अष्टाध्यायी में सूत्र है— ‘सभाया यः’ (४/४/१०५), अर्थात् यहाँ केवल य प्रत्यय की बात की गयी है।
र
- विशेषण या गुणवाचक बनानेवाला
- (कुंज से) कुंजर, (नग से) नगर, (पांडु से) पांडुर, (मधु से) मधुर, (मुख से) मुखर
ल
- विशेषण या गुणवाचक बनानेवाला
- यह संस्कृत के ‘लच्’ प्रत्यय से आया है।
- (मंजु से) मंजुल, (मांस से) मांसल, (वत्स से) वत्सल, (शीत से) शीतल, (श्याम से) श्यामल
वत्
- सर्वनाम + वत् → अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण— (तद् से) तद्वत्, (यद् से) यावत्, यावत्-तावत्— ये वत् (वतुप्) प्रत्यय से आया है।
- तुल्य के अर्थ में— (आत्मन् से) आत्मवत्, पितृवत्, पुत्रवत्, (पूर्व + वर्ति) पूर्ववत्, मातृवत्, मित्रवत्, यंत्रवत्, (यथा + वति) यथावत्, विधिवत्, शत्रुवत्।— तुल्य के अर्थ में ‘वत्’ प्रत्यय का प्रयोग होता है और यह संस्कृत के ‘वति’ प्रत्यय से आया है।
- आत्मन् + मतुप् (युक्त के अर्थ में) = आत्मवत् (नपुंसकलिंग) → आत्मवान् (पुल्लिंग) → आत्मवती (स्त्रीलिंग)। आत्मन् + वति (तुल्य के अर्थ में) = आत्मवत् (अव्यय)।
- टिप्पणी— संस्कृत में मतुप्, वतुप् और वति तीनों से ‘वत्’ आता है, परन्तु उनका कार्य अलग-अलग होता है : मतुप् → वत् : यह युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता है; जैसे— आस्थावत्, आस्थावान्, आस्थावती। वतुप् → वत् : सर्वनाम के साथ जुड़कर अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण बनाता है; जैसे— यावत्। वति → वत् : यह तुल्य का अर्थ देता है; जैसे— पितृवत्। परन्तु हिन्दी भाषा व्यावहारिक और सरलीकरण के चरण से आयी है इसलिए हिन्दी में तीन प्रत्यय प्रचलित हुए— 1. मान् (आयुष्मान्) 2. वान् (गुणवान्) और 3. ‘वत्’ (पितृवत्)। अर्थात् जो अन्त में जुड़ा उसे ही प्रत्यय मान लिया गया। इसी तरह स्त्रीलिंग बनाने के लिए ती (मती और वती) प्रत्यय का प्रयोग होता है।
वल
- विशेषण
- (ऊर्जस् से) ऊर्जस्वल, (कृषि से) कृषीवल, (दंत से) दंतावल, (रजस् से) रजस्वल → रजस्वला (स्त्रीलिंग), (शिखा से) शिखावल
- कृषीवल और दंतावल में दीर्घीकरण हुआ है। रजस्वला = रजस्वल + आ (ङीष्-स्त्रीलिंग प्रत्यय)।
- वल संस्कृत के ‘वलच्’ प्रत्यय से आया है।
विन् (हिन्दी में ‘वी’)
- विशेषण बनानेवाला
- (ऊर्जस् से) ऊर्जस्वी, (ओजस् से) ओजस्वी, (तपस् से) तपस्वी, (तमस् से) तमस्वी, (तेजस् से) तेजस्वी, (पयस् से) पयस्वी, (मनस् से) मनस्वी, (माया से) मायावी, (मेघा से) मेधावी, (यशस् से) यशस्वी, (वर्चस् से) वर्चस्वी।
- टिप्पणी— यह (वी) संस्कृत के ‘विनि’ प्रत्यय से आया है। यह ‘विनि’ योग के समय ‘विन्’ हो जाता है और हिन्दी में ‘वी’; जैसे— ऊर्जस् + विन् (विनि) = ऊर्जस्विन् (संस्कृत) → ऊर्जस्वी (हिन्दी)। उपर्युक्त शब्दों का स्त्रीलिंग बनाने के लिए संस्कृत का ‘ङीप्’ (ई) प्रत्यय जोड़ा जाता है; जैसे— पयस्विन् + ई (ङीप्) = पयस्विनी। मायाविन् + ई (ङीप्) = मायाविनी। मायाविन् (मूल शब्द या प्रातिपादिक); मायावी (पुल्लिंग); मायाविनी (स्त्रीलिंग)।
व्य
- संबंधवाचक
- (पितृ से) पितृव्य, (भ्रातृ से) भ्रातृव्य
- ‘व्य’ संस्कृत के ‘व्यत्’ प्रत्यय से आया है।
श
- अर्थ— वाला, युक्त
- (कर्क से) कर्कश, (रोमन् → रोम से) रोमश, (लोमन् → लोम से) लोमश
- टिप्पणी— रोमन् और लोमन् में श प्रत्यय के योग से न् का लोप हो जाता है। ‘श’ प्रत्यय के निर्मित शब्द कम हैं, इसके स्थान पर ‘वाला या युक्त’ अर्थ के लिए ‘मतुप्’ (वान्/मान्) और ‘इन्’ (ई) प्रत्यय का प्रयोग अधिक होता है।
शः
- रीतिवाचक क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (अक्षर से) अक्षरशः, (अग्र से) अग्रशः, (अल्प से) अल्पशः, (कोटि से) कोटिशः, (क्रम से) क्रमशः, (खंड से) खंडशः, (नित्य से) नित्यशः, (प्राय से) प्रायशः, (बहु से) बहुशः, (भूय से) भूयशः, (शत से) शतशः, (शब्द से) शब्दशः, (सर्व से) सर्वशः, (सहस्र से) सहस्रशः।
- शः प्रत्यय संस्कृत के ‘शस्’ प्रत्यय से आया है।
- प्र + अय् + अस् (असुन्) = प्रायस् → प्रायशः या प्राय + शः (शस्) = प्रायशः
सात्
- क्रिया-विशेषण बनानेवाला
- (अग्नि से) अग्निसात्, (आत्मन् से) आत्मसात्, (जल से) जलसात्, (धूलि से) धूलिसात्, (भूमि से) भूमिसात्, (भस्म से) भस्मसात्, (राजन् से) राजसात्, (स्वप्न से) स्वप्नसात्
- आत्मन् + सात् (साति) = आत्मसात्।
विशेष
कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में कुछ ऐसे शब्दों की सूची दी हुई है जिन्हें उपसर्ग या प्रत्यय की तरह प्रयोग किया जाता है, उनके अनुसार— “यद्यपि इन शब्दों का स्वतंत्र अर्थ होता है जिसके कारण इन्हें शब्द कहते हैं, तथापि इनका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है।” इन शब्दों की सूची देते हुए वे लिखते हैं कि— “जिन शब्दों के पूर्व * यह चिह्न लगा है उनका प्रयोग बहुधा प्रत्ययों के समान होता है।”
- तारांकित (*) शब्द— अधीन, अंतर, अन्वित, अध्यक्ष, अतीत, अनुरूप, अनुसार, अभिमुख, अर्थ, अर्थी, आक्रांत, आतुर, आकुल, आचार, आत्म, आपन्न, आर्त्त, आशय, आस्पद, उत्तर, गत, गम्य, ग्रस्त, घात, चिंतक, जन्य, जाल, धर्म, नाशक, निष्ठ, पर, परायण, बुद्धि, भाव, भेद, युत, रहित, रूप, शील, शून्य, शूर, साध्य, हत, हर, हीन
- अतारांकित शब्द— अपह, अर्ह, आवह, आढ्य, कर, कार, कालीन, ग, गम, घ्न, चर, ज, जीवी, ज्ञ, दर्शी, द, दायक, दायी, धर, धार, शाली, स्थ
- अन्य शब्द— आगत, आगम, आगार, आत्मक, इतर, कल्प, कारी, गृह, जनक, तम (तमप्), तर (तरप्), परक, पुर, पूर्वक, प्रद, बद्ध, वाद, वादी, विषयक, संगत
अधीन
- अधीन एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो वह ‘समास-निर्मित-शब्द’ के उदाहरण होंगे— दैवाधीन, पराधीन, भाग्याधीन, स्वाधीन। विग्रह— पराधीन → पर के अधीन (सम्बन्ध तत्पुरुष समास)। इसी तरह अन्य शब्दों का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
अंतर (अन्तर)
- अर्थांतर, एकांतर, छिद्रांतर, जन्मांतर, पाठांतर, मतांतर, मध्यांतर, युगांतर, रूपांतर, (सम् से) समांतर, (समान से) समानांतर, समयांतर।
- टिप्पणी— अंतर स्वयं में एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा— देशांतर = देश (विशेष्य) + अंतर (विशेषण) कर्मधारय समास (विशेष्यपूर्वपद)। इसी तरह समांतर = सम् (उपसर्ग) + अंतर ‘उपसर्ग-निर्मित-शब्द’ का उदाहरण है। परन्तु डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में अंतर को भाववाचक संज्ञा बनानेवाला तद्धित प्रत्यय माना गया है।
अन्वित
- आशान्वित, क्रोधान्वित, गुणान्वित, दुःखान्वित, दोषान्वित, भयान्वित, महिमान्वित, मोहान्वित, रागान्वित, रोषान्वित, लोभान्वित, व्यथान्वित, व्यसनान्वित, शोभान्वित, हर्षान्वित
- टिप्पणी— अन्वित स्वतंत्र शब्द है : R. S. McGregor ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’, डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ और श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में अन्वित को विशेषण शब्द बताया गया है, अर्थात् यह स्वतंत्र शब्द है। इसका अर्थ है- (से) युक्त, (से) सम्पन्न। व्युत्पत्ति- अन्वित = अन् (उपसर्ग) + इ (इण्-धातु) + त (क्त-प्रत्यय)। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में अन्वित को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसको (अन्वित) को उस सूची में रखा गया है जो स्वतंत्र शब्द है, परन्तु इनका प्रयोग बहुत कम होता है। वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में इसका प्रत्यय की सूची में उल्लेख ही नहीं है। कुल मिलाकर अन्वित एक स्वतंत्र शब्द है और इसके किसी शब्द से योग पर समास बनेगा न कि प्रत्यय वाले शब्द।
- आशान्वित (आशा + अन्वित); दोनों स्वतंत्र शब्द हैं, इसलिए समास के उदाहरण; विग्रह- आशान्वित = आशा से युक्त, तत्पुरुष (करण) समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
| शब्द | विग्रह | समास |
| आशान्वित | आशा से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| क्रोधान्वित | क्रोध से भरा हुआ | तत्पुरुष (करण) |
| गुणान्वित | गुणों से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| दुःखान्वित | दुःख से भरा हुआ | तत्पुरुष (करण) |
| दोषान्वित | दोषों से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| भयान्वित | भय से व्याप्त | तत्पुरुष (करण) |
| महिमान्वित | महिमा से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| मोहान्वित | मोह से ग्रस्त | तत्पुरुष (करण) |
| रागान्वित | राग/प्रेम से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| रोषान्वित | रोष (गुस्से) से भरा | तत्पुरुष (करण) |
| लोभान्वित | लोभ से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| व्यथान्वित | व्यथा (पीड़ा) से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| व्यसनान्वित | व्यसन (बुरी लत) से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| शोभान्वित | शोभा से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
| हर्षान्वित | हर्ष (प्रसन्नता) से युक्त | तत्पुरुष (करण) |
अतीत
- कालातीत, गुणातीत, आशातीत, स्मरणातीत
- व्युत्पत्ति— अति (उपसर्ग) + इ (धातु) + क्त (प्रत्यय) = अतीत। अर्थात् ‘अतीत’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— कालातीत = काल से अतीत (परे) (अपादान तत्पुरुष समास)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
अध्यक्ष
- कोशाध्यक्ष, दानाध्यक्ष, सभाध्यक्ष
- व्युत्पत्ति— अधि (उपसर्ग) + अक्ष् + अच् (प्रत्यय) = अध्यक्ष। अर्थात् ‘अध्यक्ष’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— विभागाध्यक्ष = विभाग का अध्यक्ष (सम्बन्ध तत्पुरुष समास)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
अनुरूप
- आज्ञानुरूप, गुणानुरूप, मत्यानुरूप (मति-अनुरूप), योग्यतानुरूप
- व्युत्पत्ति— अनु + रूप = अनुरूप। अर्थात् ‘अनुरूप’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— आज्ञानुरूप = आज्ञा के अनुरूप (अनुसार) (अव्ययीभाव समास)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
अनुसार
- आज्ञानुसार, इच्छानुसार, कर्मानुसार, धर्मानुसार, भाग्यानुसार, समयानुसार
- व्युत्पत्ति— अनु + सृ + घञ् = अनुसार। अर्थात् ‘अनुरूप’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— आज्ञानुसार = आज्ञा के अनुसार (अव्ययीभाव समास)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
अपह
- क्लेशापह, तमोपह, दुःखापह, दूषणपह, मानापह, शोकापह, सुखापह
- टिप्पणी— व्युत्पत्ति : अप (उपसर्ग) + हा (धातु) + ड (कृत प्रत्यय) = अपह (विशेषण)। अर्थ- नष्ट करना, दूर करना। अर्थात् ‘अपह’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा।
- अपह (कृदंत) का स्वतंत्र-रूप से प्रयोग नहीं मिलता है, जैसा कि हमें ज्ञात है कि अगर कृदंत शब्द समास का ‘उत्तरपद’ हो तो वह ‘उपपद-तत्पुरुष-समास’ का उदाहरण होगा।
अभिमुख
- दक्षिणाभिमुख, पूर्वाभिमुख, मरणाभिमुख
- व्युत्पत्ति— अभि + मुख = अभिमुख। अर्थात् ‘अभिमुख’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा।
अर्थ
- धर्मार्थ, संमत्यर्थ, प्रीत्यर्थ, समालोचनार्थ
- व्युत्पत्ति— ऋ + थ (थन्) = अर्थ। अर्थात् ‘अर्थ’ एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा।
अर्थी
- अर्थ— चाहने वाला, इच्छुक
- (धन से) धनार्थी, (मान से) मानार्थी, (यश से) यशार्थी, (लाभ से) लाभार्थी, (विद्या से) विद्यार्थी, (शिक्षा से) शिक्षार्थी, (सम्मान से) सम्मानार्थी, (सुख से) सुखार्थी।
- टिप्पणी— व्युत्पत्ति— अर्थ् + ई (इनि) = अर्थी (अर्थिन्)। वस्तुतः यह स्वतंत्र शब्द है। इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— धनार्थी = धन का अर्थी (इच्छुक), ‘सम्बन्ध तत्पुरुष समास’। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
अर्ह
- अर्थ— योग्य, पाने योग्य
- अर्थार्ह, दंडार्ह, पूजार्ह, भिक्षार्ह, भोगार्ह, मानार्ह, बाधार्ह, वरार्ह, विचारार्ह, शुल्कार्ह, स्तोत्रार्ह
- अर्ह— स्वतंत्र शब्द है। व्युत्पत्ति- अर्ह् (धातु) + अ (अच्) = अर्ह। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे (अर्ह) को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (अर्ह) ऐसा स्वतंत्र शब्द बताया गया है जिसका हिन्दी में स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम मिलता है, इसलिए इसे प्रत्यय की सूची में सम्मिलित किया गया है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में प्रत्यय के अन्तर्गत इसका विवरण नहीं है। प्रसिद्ध हिन्दी शब्दकोशों- श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’- में इसे (अर्ह) विशेषण बाताया गया है, अर्थात् स्वतंत्र शब्द है। इसलिए व्याकरण की दृष्टि से अर्ह जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से संयुक्त होकर नया शब्द बनायेगा तो वह समास के अन्तर्गत आयेगा न कि प्रत्यय से निर्मित शब्द।
- अर्थार्ह = अर्थ + अर्ह; अर्थ (धन) के योग्य; तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास। दंडार्ह = दंड + अर्ह; दंड के योग्य; तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह किया जा सकता है।
| शब्द | विग्रह | समास |
| अर्थार्ह | धन के योग्य (या अर्थपूर्ण होने के योग्य) | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| दंडार्ह | दंड के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| पूजार्ह | पूजा के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| भिक्षार्ह | भिक्षा के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| भोगार्ह | भोग (उपभोग) के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| मानार्ह | मान-सम्मान के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| बाधार्ह | बाधा या विरोध के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| वरार्ह | वर (श्रेष्ठता) या वरदान के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| विचारार्ह | विचार करने के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| शुल्कार्ह | शुल्क के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
| स्तोत्रार्ह | स्तुति या स्तोत्र के योग्य | तत्पुरुष (सम्बन्ध) समास |
आकुल
- चिंताकुल, प्रेमाकुल, भयाकुल, शोकाकुल
- व्युत्पत्ति— आ + कुल् + क = आकुल। अर्थ— घबराया हुआ, विक्षुब्ध, उद्विग्न। यह एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— भयाकुल = भय से आकुल, ‘करण तत्पुरुष समास’। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
आक्रांत
- क्षुधाक्रांत, चिंताक्रांत, दुःखाक्रांत, पदाक्रांत, भयाक्रांत, रोगाक्रांत, व्यथाक्रांत, व्यसनाक्रांत
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आक्रांत’ को अर्धप्रत्यय माना गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आक्रांत’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा गया है कि इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से बहुत कम मिलता है, इसलिए इसे प्रत्यय की सूची में शामिल किया गया है। वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आक्रांत’ का उल्लेख प्रत्यय के अंतर्गत नहीं मिलता है। प्रसिद्ध हिन्दी शब्दकोशों- श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’; R. S. McGregor द्वारा सम्पादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’- में इसे (आक्रांत) विशेषण बाताया गया है, अर्थात् स्वतंत्र शब्द है। इसलिए व्याकरण की दृष्टि से आक्रांत जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से संयुक्त होकर नया शब्द बनायेगा तो वह समास के अन्तर्गत आयेगा न कि प्रत्यय से निर्मित शब्द।
- व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + क्रम् (धातु) + त (क्त-प्रत्यय) = आक्रांत।
- क्षुधाक्रांत = क्षुधा + आक्रांत; विग्रह- क्षुधा से व्याकुल (आक्रांत); तत्पुरुष (करण) समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास को पहचाना जा सकता है।
- व्यसनाक्रांत और व्यसनातिक्रांत— व्यसनाक्रांत = व्यसन + आक्रांत; व्यसन से आक्रांत; तत्पुरुष (करण) समास। व्यसनातिक्रांत = व्यसन + अतिक्रांत; व्यसन को अतिक्रांत (पार किया हुआ); तत्पुरुष (कर्म) समास।
| शब्द | विग्रह | समास |
| क्षुधाक्रांत | भूख (क्षुधा) से व्याकुल (आक्रांत) | तत्पुरुष (करण) समास |
| चिंताक्रांत | चिंता से घिरा हुआ (आक्रांत) | तत्पुरुष (करण) समास |
| दुःखाक्रांत | दुःख से दबा (आक्रांत) | तत्पुरुष (करण) समास |
| पदाक्रांत | पैरों से कुचला (आक्रांत) | तत्पुरुष (करण) समास |
| भयाक्रांत | भय से आक्रांत (व्याप्त) | तत्पुरुष (करण) समास |
| रोगाक्रांत | रोग से ग्रस्त | तत्पुरुष (करण) समास |
| व्यथाक्रांत | व्यथा (पीड़ा) से आक्रांत (व्याकुल) | तत्पुरुष (करण) समास |
| व्यसनाक्रांत | व्यसन (बुरी लत) से आक्रांत | तत्पुरुष (करण) समास |
आगत
- अर्थ— को आया हुआ, से आया हुआ
- अभ्यागत, क्रमागत, गतागत, गृहागत, तथागत, दायागत, दूरागत, देवागत, नवागत, प्रत्यागत, वंशागत, शरणागत, स्वागत
- टिप्पणी— आगत स्वयं ही स्वतंत्र शब्द है। व्युत्पत्ति- आ (उपसर्ग) + गम् (धातु) + त (क्त-प्रत्यय) = आगत। इसलिए इसका संयोग जब किसी शब्द से होगा तो यह समास शब्द बनायेगा न कि प्रत्ययवत् व्यवहार करेगा। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आगत’ को अर्धप्रत्यय’ बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में आगत का उल्लेख प्रत्यय के अन्तर्गत नहीं प्राप्त होता है। प्रसिद्ध हिन्दी शब्दकोशों- श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’; R. S. McGregor द्वारा सम्पादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’- में इसे (आगत) विशेषण बाताया गया है, अर्थात् स्वतंत्र शब्द है। इसलिए व्याकरण की दृष्टि से आगत जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से संयुक्त होकर नया शब्द बनायेगा तो वह समास के अन्तर्गत आयेगा न कि प्रत्यय से निर्मित शब्द।
- दूरागत- दूर से आगत (आया हुआ), अपादान तत्पुरुष समास। गृहागत- गृह को आगत कर्म तत्पुरुष समास। शरणागत- शरण में आगत (आया हुआ), अधिकरण तत्पुरुष समास। अभ्यागत- अभि (सम्मुख) से आगत (आया हुआ), करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
आगम
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला तद्धित प्रत्यय
- अर्थ— आगमन, आना, प्रकट होना
- वस्तुतः यह स्वतंत्र शब्द है। परन्तु हिन्दी में इनका स्वतंत्र प्रयोग नहीं मिलता अथवा कम (दुर्लभ) है। कुछ विद्वान इसे समास के अंतर्गत रखते है तो कुछ अर्धप्रत्यय मानते हैं।
- कुसुमागम, जलदागम, धनागम, पुष्पागम, मेधागम, योगागम, वर्णागम, वर्षागम, वित्तागम, विद्यागम, समागम, हिमागम।
- टिप्पणी— समागम (सम् + आगम), उपसर्ग-निर्मित शब्द है। शेष में तत्पुरुष समास है।
आगार
- अधिकरण (अर्थात् पात्र या स्थान) बोधक संज्ञा बनानेवाला प्रत्यय
- आगार स्वयं में स्वतंत्र शब्द है। आगार संस्कृत के ‘आगारम्’ से आया है। इसकी व्युत्पत्ति इस तरह है— आ (उपसर्ग) + गृ (धातु) + अण् (प्रत्यय) = आ + गर (ऋ से अर) + अ (अण्) = आ + गार।
- अभिलेखागार, कारागार, कोषागार, ग्रंथागार, पुस्तकागार, प्रेक्षागार, भंडारागार, यज्ञागार, वस्त्रागार, शयनागार, शीतागार, सूतिकागार, स्नानागार
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में आगार-निर्मित शब्दों को प्रत्यय के अंतर्गत समाहित किया गया है। परन्तु ये सभी समास के अंतर्गत आते हैं; जैसे— अभिलेखागार = अभिलेखों का भंडार (तत्पुरुष समास)। ऐसे ही अन्य शब्दों का विग्रह किया जा सकता है।
आचार
- अत्याचार, कुलाचार, ग्रामाचार, देशाचार, पत्राचार, पापाचार, भ्रष्टाचार, भिक्षाचार, मंगलाचार, मिथ्याचार, लोकाचार, वामाचार, शिष्टाचार, सदाचार, सिद्धांताचार, स्वेच्छाचार, स्वेराचार।
- व्युत्पत्ति— आ + चर् + घञ् = आचार। अर्थ— आचरण, व्यवहार, कार्य। वस्तुतः यह स्वतंत्र शब्द है, इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा।
- टिप्पणी— अत्याचार (अति + आचार), यह उपसर्ग निर्मित शब्द है। कुलाचार, ग्रामाचार, देशाचार, पत्राचार, पापाचार, भिक्षाचार, लोकाचार, वामाचार, सिद्धांताचार में तत्पुरुष समास है। भ्रष्टाचार, मिथ्याचार, शिष्टाचार, सदाचार, स्वेराचार कर्मधारय समास है। मंगलाचार दोनो है क्योंकि इसका विग्रह ‘मंगल का आचरण’ करने पर तत्पुरुष होगा, जबकि ‘मंगल (शुभ) आचार (आचरण/कार्य)’ विग्रह करने पर कर्मधारय समास होगा।
आतुर
- कामातुर, चिंतातुर, प्रेमातुर, मदनातुर
- व्युत्पत्ति— आ + अत् + उरच् = आतुर। अर्थ— (रोग से) ग्रस्त, प्रभावित, पीड़ित, व्याकुल। यह एक स्वतंत्र शब्द है इसलिए यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनाएगा। विग्रह— कामातुर = काम से पीड़ित, ‘करण तत्पुरुष समास’। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
आत्मक
- अर्थ— मय, युक्त
- अभावात्मक, आदर्शात्मक, आदेशात्मक, ऋणात्मक, एकात्मक, कलात्मक, खंडनात्मक, गद्यात्मक, चित्रात्मक, चिदात्मक (चेतना से युक्त), धनात्मक, निश्चयात्मक, प्रतीकात्मक, पद्यात्मक, भावनात्मक, रक्षात्मक, रचनात्मक, रसात्मक, व्यंगात्मक, व्याख्यात्मक, हिंसात्मक
- टिप्पणी— श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ के अनुसार- ‘यह शब्द अकेले नहीं आता, केवल यौगिक बनाने के काम में किसी शब्द के अंत में आता है।’ डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में इसे (आत्मक) स्पष्ट रूप से प्रत्यय बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘Hindi-English Dictionary’ में इसे संज्ञा बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आत्मक’ को अर्धप्रत्यय माना गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आत्मक’ का उल्लेख प्रत्यय के अंतर्गत नहीं प्राप्त होता है। व्युत्पत्ति— (शब्द) आत्मन् + कन् (प्रत्यय) = आत्मक। व्याकरण की दृष्टि से ‘आत्मक’ स्पष्ट रूप से स्वतंत्र शब्द है। इसलिए इसके योग से समास शब्द बनेंगे, न कि प्रत्यय से बने शब्द। हाँ यह अवश्य है कि हिन्दी में ‘आत्मक’ शब्द का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं प्राप्त होता है। इसलिए यह कह सकते हैं कि यह ‘प्रत्ययवत्’ व्यवहार करता है। विग्रह— अभावात्मक- जिसका स्वरूप अभाव जैसा है, वह; बहुव्रीहि समास। आदर्शात्मक- जो आदर्श को ही अपना आधार मानता है; बहुव्रीहि समास। आदेशात्मक- जिसका स्वभाव केवल ‘आदेश’ देना है; बहुव्रीहि समास। ऋणात्मक- जिसका स्वरूप ऋण है; बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
| शब्द | विग्रह | समास |
| अभावात्मक | जिसका स्वरूप ‘अभाव’ जैसा है। | बहुव्रीहि समास |
| आदर्शात्मक | जो ‘आदर्श’ को ही अपना आधार या स्वरूप मानता है। | बहुव्रीहि समास |
| आदेशात्मक | जिसका स्वभाव केवल ‘आदेश’ देना है। | बहुव्रीहि समास |
| ऋणात्मक | जिसका स्वरूप ‘ऋण’ है। | बहुव्रीहि समास |
| एकात्मक | जिसका स्वरूप ‘एक’ है। | बहुव्रीहि समास |
| कलात्मक | जिसमें ‘कला’ ही उसका मुख्य स्वरूप है। | बहुव्रीहि समास |
| खंडनात्मक | जिसका कार्य/स्वभाव केवल ‘खंडन’ करना है। | बहुव्रीहि समास |
| गद्यात्मक | जिसका स्वरूप ‘गद्य’ शैली का है। | बहुव्रीहि समास |
| चित्रात्मक | जिसमें ‘चित्र’ ही मुख्य आधार है। | बहुव्रीहि समास |
| चिदात्मक | जिसका स्वरूप ‘चेतना’ है। | बहुव्रीहि समास |
| धनात्मक | जिसका स्वरूप ‘धन’ है। | बहुव्रीहि समास |
| निश्चयात्मक | जिसका स्वरूप पूरी तरह ‘निश्चित’ है। | बहुव्रीहि समास |
| प्रतीकात्मक | जो केवल एक ‘प्रतीक’ के रूप में है। | बहुव्रीहि समास |
| पद्यात्मक | जिसका स्वरूप ‘पद्य’ शैली का है। | बहुव्रीहि समास |
| भावनात्मक | जिसका आधार या स्वरूप ‘भावना’ है। | बहुव्रीहि समास |
| रक्षात्मक | जिसका उद्देश्य या स्वरूप ‘रक्षा’ करना है। | बहुव्रीहि समास |
| रचनात्मक | जिसका स्वरूप ‘निर्माण’ करने वाला है। | बहुव्रीहि समास |
| रसात्मक | जिसमें ‘रस’ ही मुख्य तत्व या स्वरूप है। | बहुव्रीहि समास |
| व्यंग्यात्मक | जिसका स्वरूप ‘व्यंग्य’ प्रधान है। | बहुव्रीहि समास |
| व्याख्यात्मक | जिसका स्वरूप केवल ‘विवरण’ देना है। | बहुव्रीहि समास |
| हिंसात्मक | जिसका स्वभाव या स्वरूप ‘हिंसा’ करना है। | बहुव्रीहि समास |
आत्मा
- अदीनात्मा, क्षुद्रात्मा, जितात्मा, धर्मात्मा, धृतात्मा, नष्टात्मा, पवित्रात्मा, पुण्यात्मा, पूतात्मा, प्रज्ञात्मा, प्रसन्नात्मा, भग्नात्मा, यतात्मा, मुक्तात्मा, मूढ़ात्मा, युद्धात्मा, व्यक्तात्मा, शुद्धात्मा, संयतात्मा, संशयात्मा, सुकृतात्मा, स्थिरात्मा। इन शब्दों में उत्तर-पद आत्मा है।
- आत्म-घात, आत्म-ज्ञान, आत्म-त्याग, आत्म-श्लाघा, आत्म-संयम, आत्म-समर्पण, आत्म-स्तुति, आत्म-हत्या, आत्म-हित। इन शब्दों में पूर्व-पद आत्मा है।
- व्युत्पत्ति— अत् + मन् (मनिण्-प्रत्यय) = आत्मन् (आत्मा)। आत्मा स्वयं एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए जब यह किसी शब्द से जुड़ेगा तो समास शब्द बनायेगा।
- विग्रह— अदीनात्मा– जिसकी आत्मा अदीन है; बहुव्रीहि समास। आत्म-घात– स्वयं (आत्मा) का घात; सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अदीनात्मा | जिसकी आत्मा दीन/कमजोर नहीं है | बहुव्रीहि समास |
| क्षुद्रात्मा | जिसकी आत्मा क्षुद्र है | बहुव्रीहि समास |
| जितात्मा | जिसने अपनी आत्मा (इन्द्रियों) को जीत लिया है | बहुव्रीहि समास |
| धर्मात्मा | धर्म ही है आत्मा (स्वभाव) जिसकी, वह | बहुव्रीहि समास |
| धृतात्मा | धीर है आत्मा जिसकी, वह | बहुव्रीहि समास |
| नष्टात्मा | जिसकी बुद्धि (विवेक) नष्ट हो गया है | बहुव्रीहि समास |
| परमात्मा | 1. वह आत्मा जो परम (सर्वोच्च) है 2. परम आत्मा | 1. बहुव्रीहि समास 2. कर्मधारय समास |
| पवित्रात्मा | जिसकी आत्मा पवित्र है। | बहुव्रीहि समास |
| पुण्यात्मा | जिसकी आत्मा पुण्यमयी है | बहुव्रीहि समास |
| पूतात्मा | जिसकी आत्मा पवित्र (पूत) है | बहुव्रीहि समास |
| प्रज्ञात्मा | जिसका स्वरूप केवल बुद्धि/ज्ञान (प्रज्ञा) ही है | बहुव्रीहि समास |
| प्रसन्नात्मा | जिसकी आत्मा (मन) प्रसन्न है | बहुव्रीहि समास |
| भग्नात्मा | जिसका आत्मबल टूट (भग्न) गया हो | बहुव्रीहि समास |
| महात्मा | 1. महान है आत्मा जिसकी, वह 2. महान आत्मा | 1. बहुव्रीहि समास 2. कर्मधारय समास |
| मुक्तात्मा | जिसकी आत्मा (सांसारिक बंधनों से) मुक्त है | बहुव्रीहि समास |
| मूढ़ात्मा | जिसकी बुद्धि (आत्मा) मूर्खता से भरी है | बहुव्रीहि समास |
| यतात्मा | जिसका अपनी आत्मा/मन पर नियंत्रण है | बहुव्रीहि समास |
| युक्तात्मा | जिसका मन परमात्मा या योग में लगा हुआ है | बहुव्रीहि समास |
| युद्धात्मा | वह जो युद्ध स्वभाव वाला हो | बहुव्रीहि समास |
| व्यक्तात्मा | जिसका स्वरूप प्रकट (व्यक्त) है | बहुव्रीहि समास |
| शुद्धात्मा | जिसकी आत्मा पवित्र हो | बहुव्रीहि समास |
| संयतात्मा | जिसकी आत्मा पूरी तरह संयमित (संयत) है | बहुव्रीहि समास |
| संशयात्मा | जिसका स्वभाव हमेशा संदेह करने वाला है | बहुव्रीहि समास |
| सुकृतात्मा | वह जो सुकृत करता हो | बहुव्रीहि समास |
| स्थिरात्मा | जिसकी चित्त या बुद्धि (आत्मा) स्थिर है | बहुव्रीहि समास |
आपन्न
- कष्टापन्न, खेदापन्न, जीविकापन्न, दुःखापन्न, दोषापन्न, शरणापन्न, संकटापन्न, संशयापन्न, सुखापन्न, स्थानापन्न
- व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + पद् (धातु) + क्त (प्रत्यय) = आपन्न। आपन्न एक स्वतंत्र शब्द है। कष्टापन्न- कष्ट को आपन्न (प्राप्त); कर्मतत्पुरुष समास।इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आपन्न’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आपन्न’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आपन्न’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों में ‘आपन्न’ को विशेषण माना गया है— श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’। व्याकरण की दृष्टि से आपन्न जब किसी अन्न स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो समास शब्द निर्मित होगा न कि प्रत्यय शब्द।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| कष्टापन्न | कष्ट को प्राप्त (आपन्न) | कर्मतत्पुरुष समास |
| खेदापन्न | खेद (दुःख) को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| जीविकापन्न | जीविका को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| दुःखापन्न | दुःख को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| दोषापन्न | दोष को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| शरणापन्न | शरण को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| संकटापन्न | संकट को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| संशयापन्न | संशय को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| सुखापन्न | सुख को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
| स्थानापन्न | स्थान को प्राप्त | कर्मतत्पुरुष समास |
आलय
- अधिकरण (अर्थात् पात्र या स्थान) बोधक संज्ञा
- आलय स्वयं में स्वतंत्र शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति इस तरह है— आ (उपसर्ग) + ली (धातु) + अच् (प्रत्यय) = आ + ल + अच् = आ + लय।
- औषधालय, चिकित्सालय, छात्रालय, देवालय, पुस्तकालय, प्रतीक्षालय, मंत्रालय, मुद्रणालय, भोजनालय, वाचनालय, विद्यालय, शौचालय, सूचनालय
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में आगार-निर्मित शब्दों को प्रत्यय के अंतर्गत समाहित किया गया है। परन्तु ये सभी समास के अंतर्गत आते हैं; जैसे— औषधालय = औषधियों का आलय (तत्पुरुष समास)। ऐसे ही अन्य शब्दों का विग्रह किया जा सकता है।
आवह
- गुणावह, दुःखावह, दोषावह, फलावह, भयावह, लज्जावह, वियोगावह, शुभावह, संशयावह, सुखावह, हितावह
- व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + वह् (धातु) + अच् (प्रत्यय) = आवह। आवह एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— भयावह = भय के द्वारा त्रास लाने वाला, करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आवह’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आवह’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है, और हिन्दी में इसका प्रयोग बहुधा प्रत्यय जैसा होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आवह’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोश में डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में ‘आवह’ मिलता ही नहीं है। श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में ‘आवह’ को संज्ञा बताया गया है। संस्कृत शब्दकोश शिवराम वामन आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में ‘आवह’ को विशेषण माना गया है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| गुणावह | गुणों के द्वारा (उत्कर्ष) लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| दुःखावह | दुःख से (दुःख को) लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| दोषावह | दोष से युक्त स्थिति लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| फलावह | फल (परिणाम) के द्वारा लाभ लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| भयावह | भय के द्वारा त्रास लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| लज्जावह | लज्जा के द्वारा संकोच लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| वियोगावह | वियोग के द्वारा पीड़ा लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| शुभावह | शुभ (कल्याण) के द्वारा मंगल लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| संशयावह | संशय (संदेह) के द्वारा दुविधा लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| सुखावह | सुख के द्वारा आनंद लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
| हितावह | हित (भलाई) के द्वारा लाभ लाने वाला | करण तत्पुरुष समास |
आर्त्त/आर्त
- आर्त्त और आर्त दोनों सही है। इसलिए कामार्त्त और कामार्त दोनो सहीं है, इसी तरह अन्य को भी समझना चाहिए।
- कामार्त्त, क्षुधार्त्त, तृषार्त्त, दुःखार्त्त, प्रहारार्त्त, भयार्त्त, रुजार्त्त, रोगार्त्त, व्यसनार्त्त, शीतार्त्त, शोकार्त्त, हिमार्त्त
- व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + ऋ (धातु) + क्त (प्रत्यय) = आर्त्त/आर्त। आर्त एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— कामार्त्त- काम से पीड़ित (आर्त); करण तत्पुरुष समास।इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आर्त’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आर्त्त’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आर्त’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों में ‘आर्त’ को विशेषण माना गया है— श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’। व्याकरण की दृष्टि से आर्त जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो सामासिक शब्द निर्मित होगा न कि प्रत्यय शब्द।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| कामार्त | काम से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| क्षुधार्त | क्षुधा (भूख) से आर्त | करण तत्पुरुष समास |
| तृषार्त | तृषा (प्यास) से आर्त | करण तत्पुरुष समास |
| दुःखार्त | दुःख से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| प्रहारार्त | प्रहार से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| भयार्त | भय से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| रुजार्त | रुजा (रोग) से आर्त | करण तत्पुरुष समास |
| रोगार्त | रोग से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| व्यसनार्त | व्यसन से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| शीतार्त | शीत (ठंड) से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| शोकार्त | शोक से पीड़ित | करण तत्पुरुष समास |
| हिमार्त | हिम (बर्फ/शीत) से आर्त | करण तत्पुरुष समास |
आशय
- आमाशय, क्षुद्राशय, जलाशय, नीचाशय, रक्ताशय, सदाशय, महाशय
- व्युत्पत्ति— आ + शी + अच् = आशय। अर्थ— पात्र, आधार; अर्थ, प्रयोजन, इरादा। आशय एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए जब यह किसी अन्य शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— सत् (अच्छा) आशय (इरादा), कर्मधारय समास। जलाशय— जल का आश्रय-स्थान (आशय), सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान कर सकते हैं।
आस्पद
- उपहासास्पद, करुणास्पद, कारुण्यास्पद, घृणास्पद, तस्यास्पद, दोषास्पद, ध्यानास्पद, निंदास्पद, लज्जास्पद, विवादास्पद, श्रद्धास्पद, संदेहास्पद, हास्यास्पद
- व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + पद् (धातु) + घ (प्रत्यय); सुट् च = आ + स् (सुट् का आगम) + पद + घ = आस्पद। अर्थ— पात्र, स्थान, प्रतिष्ठा। आस्पद एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— उपहासास्पद- उपहास का पात्र; सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आस्पद’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आस्पद’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आस्पद’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’— में ‘आस्पद’ को संज्ञा शब्द बताया गया है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| उपहासास्पद | उपहास का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| करुणास्पद | करुणा का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| कारुण्यास्पद | करुणा/दया का आधार | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| घृणास्पद | घृणा का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| दोषास्पद | दोष का आधार | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| ध्यानास्पद | ध्यान का केंद्र/आधार | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| निंदास्पद | निंदा का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| लज्जास्पद | लज्जा का विषय | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| विवादास्पद | विवाद का विषय | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| श्रद्धास्पद | श्रद्धा का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| संदेहास्पद | संदेह का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| हास्यास्पद | हँसी का पात्र | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
आढ्य
- अन्नाढ्य, गंधाढ्य, गुणाढ्य, जलाढ्य, तेजाढ्य, दुग्धाढ्य, धनाढ्य, पुष्पाढ्य, फलाढ्य, बलाढ्य, बीजाढ्य, पुण्याढ्य, प्रज्ञाढ्य, मदाढ्य, मोदाढ्य, रत्नाढ्य, रसाढ्य, वनाढ्य, वसाढ्य, वित्ताढ्य, विद्याढ्य, वीर्याढ्य, हर्षाढ्य, हेमाढ्य
- टिप्पणी— व्युत्पत्ति— आढ्य = आ (उपसर्ग) + ध्यै (धातु) + क (प्रत्यय)। अर्थात् स्वतंत्र शब्द है। इसलिए व्याकरण की दृष्टि से ‘आढ्य’ जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से संयुक्त होकर नया शब्द बनायेगा तो वह समास के अन्तर्गत आयेगा न कि प्रत्यय से निर्मित शब्द। गंधाढ्य (गंध + आढ्य) = गंध (सुगंध) से युक्त (भरपूर); जैसे- चंदन, नारंगी; यह तत्पुरुष (करण) समास का उदाहरण है। गुणाढ्य (गुण + आढ्य) = गुणों से सम्पन्न; तत्पुरुष (करण) समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आढ्य’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आढ्य’ को ऐसा स्वतंत्र शब्द बाताया है जिसका प्रयोग बहुधा प्रत्यय के समान होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आढ्य’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। प्रसिद्ध हिन्दी शब्दकोशों- श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’; डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’; R. S. McGregor द्वारा सम्पादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’- में इसे (आढ्य) विशेषण बाताया गया है, अर्थात् स्वतंत्र शब्द है। इसलिए व्याकरण की दृष्टि से ‘आढ्य’ जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से संयुक्त होकर नया शब्द बनायेगा तो वह समास के अन्तर्गत आयेगा न कि प्रत्यय से निर्मित शब्द। गंधाढ्य (गंध + आढ्य) = गंध (सुगंध) से युक्त (भरपूर); जैसे- चंदन, नारंगी; यह तत्पुरुष (करण) समास का उदाहरण है। गुणाढ्य (गुण + आढ्य) = गुणों से सम्पन्न; तत्पुरुष (करण) समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
इतर
- अर्थ— भिन्न, दूसरा
- आर्येतर, इतरेतर, उत्तरेतर, काव्येतर, धर्मेतर, न्यायेतर, पूर्वेतर, प्रथमेतर, मनेतर, मानवेतर, लोकेतर, वेदेतर, शिक्षणेतर, शीतेतर, संविधानेतर, सहजेतर, सत्येतर, साहित्येतर, हिन्दीतर
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इतर को प्रत्यय मानकर कई उदाहरण दिये गये हैं। परन्तु इतर एक स्वतंत्र शब्द है, अतः इससे जब अन्य शब्द का योग होगा तो वह समास का उदाहरण होगा, न कि प्रत्यय निर्मित शब्दों का; जैसे— आर्येतर (आर्य + इतर) = आर्यों से इतर (भिन्न)। इतरेतर (इतर + इतर) = इतर से इतर अर्थात् परस्पर भिन्न। उत्तरेतर (उत्तर + इतर) = उत्तर से इतर। काव्येतर (काव्य + इतर) = काव्य से इतर। धर्मेतर (धर्म + इतर) = धर्म से इतर। न्यायेतर (न्याय + इतर) = न्याय से इतर। पूर्वेतर (पूर्व + इतर) = पूर्व से इतर (भिन्न)। प्रथमेतर (प्रथम + इतर) = प्रथम से इतर। मनेतर (मन + इतर) = मन से इतर। मानवेतर (मानव + इतर) = मानव से इतर। लोकेतर (लोक + इतर) = लोक से इतर। वेदेतर (वेद + इतर) = वेद से इतर। शिक्षणेतर (शिक्षण + इतर) = शिक्षण से इतर। शीतेतर (शीत + इतर) = शीत से इतर। संविधानेतर (संविधान + इतर) = संविधानेतर। सत्येतर (सत्य + इतर) = सत्य से इतर। सहजेतर (सहज + इतर) = सहज से इतर अर्थात् स्वाभाविक से भिन्न। सत्येतर (सत्य + इतर) = सत्य से इतर। साहित्येतर (साहित्य + इतर) = साहित्य से इतर। हिन्दीतर (हिन्दी + इतर) = हिन्दी से इतर। ये सभी शब्द तत्पुरुष (अपादान) समास के उदाहरण हैं।
उत्तर
- भोजनोत्तर, मरणोत्तर, लोकोत्तर
- व्युत्पत्ति— उद् + तरप् = उत्तर। अर्थ— उत्तर दिशा; बाद का, परे। यह एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य शब्द युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। विग्रह— लोकोत्तर = लोक से उत्तर (परे), अपादान तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
कर
- अहितकर, कल्याणकर, लाभकर, सुखकर, स्वास्थ्यकर, हानिकर, हितकर।
- व्युत्पत्ति— क (कृ) + तरप् = कर। अर्थ— जो करता या कराता है। यह एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य शब्द युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। ‘कर’ सार्थक तो हैं, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है वरन् प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद बनता है। ऐसे शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण होते हैं।
कल्प
- कल्प स्वतंत्र शब्द है, यह (कल्प) ‘कृप्’ धातु से बना है। कल्प = कृप् + अच्, घञ् वा
- ऋषिकल्प, कविकल्प, कुमारकल्प, मृतकल्प, विद्वत्कल्प
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में कल्प से निर्मित कई शब्दों का उदाहरण देते हुए इसे (कल्प) ‘लघुता या ऊनतावाची संज्ञा बनानेवाला प्रत्यय’ बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में भी इसे ऊनतावाचक बताया गया है। परन्तु कल्प से निर्मित ये शब्द कर्मधारय समास के उदाहरण हैं न कि प्रत्यय निर्मित हैं। जैसे— ऋषिकल्प = ऋषि के समान (उपमेय-उपमान कर्मधारय समास)। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह किया जा सकता है।
कार
- कर्तृवाचक संज्ञा → कथाकार, कर्मकार, कलाकार, कुंभकार, कृतिकार, गीतकार, ग्रंथकार, चर्मकार, चाटुकार, चित्रकार, टीकाकार, नाटककार, पंजिकाकार, पत्रकार, पद्यकार, भाष्यकार, मणिकार, मूर्तिकार, रूपांतरकार, लेखाकार, वास्तुकार, वार्ताकार, शिल्पकार, संगीतकार, साहित्यकार, स्मृतिकार, स्वर्णकार।
- भाववाचक संज्ञा → अंगीकार, बलात्कार, स्वीकार।
- अंग + ई (च्वी – आगम) + कार = अंगीकार, बलात् + कार = बलात्कार, स्व + ई (च्वी – आगम) + कार = स्वीकार
- व्युत्पत्ति— क (कृ) + अ (अण्/घञ्) = कार। अर्थ— निर्माता, रचयिता, कर्ता। यह एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य शब्द युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। ‘कार’ सार्थक तो हैं, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है वरन् प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद बनता है। ऐसे शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण होते हैं।
कारी
- विशेषण और कर्तृवाचक संज्ञा
- (आक्रमण से) आक्रमणकारी, (कल्याण से) कल्याणकारी, (कार्य से) कार्यकारी, (क्रांति से) क्रांतिकारी, (त्राण से) त्राणकारी, (दमन से) दमनकारी, (परिवर्तन से) परिवर्तनकारी, परोपकारी, (पाप से) पापकारी, प्रभावकारी, (योजना से) योजनाकारी, (विप्लव से) विप्लवकारी, (षड्यंत्र से) षड्यंत्रकारी, हितकारी।
- उपर्युक्त शब्दों में कुछ कर्तृवाचक संज्ञा हैं, कुछ विशेषण हैं और कुछ दोनों हैं— कर्तृवाचक संज्ञा – आक्रमणकारी, क्रांतिकारी, योजनाकारी, विप्लवकारी, षड्यंत्रकारी; विशेषण – कल्याणकारी, दमनकारी, परिवर्तनकारी, प्रभावकारी, हितकारी; दोनों है – कार्यकारी, त्राणकारी, परोपकारी।
- व्युत्पत्ति— कारी शब्द ‘कृ’ धातु से निर्मित एक ऐसा स्वतंत्र कृदंत शब्द है जिसका प्रयोग स्वतंत्ररूप से प्रयोग नहीं होता है, ऐसे में उपर्युक्त शब्द ‘उपपद-तत्पुरुष-समास’ के उदाहरण हैं।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘कारी’ को कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला प्रत्यय बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में ‘कारी’ को विशेषण बनानेवाला प्रत्यय माना गया है। लेकिन कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘कारी’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है।
कालीन
- अंतःकालीन (अंतर्कालीन), अल्पकालीन, ग्रीष्मकालीन, चिरकालीन, जन्मकालीन, दीर्घकालीन, पुराकालीन, पूर्वकालीन, प्राक्कालीन, प्रातःकालीन, बहुकालीन, मध्यकालीन, शीतकालीन, समकालीन, सायंकालीन
- व्युत्पत्ति— काल (शब्द) + ईन (ख-प्रत्यय) = कालीन। अर्थ— काल (समय) का, काल संबंधी। कालीन एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— अंतःकालीन- अंत के समय का; सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘कालीन’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘कालीन’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है, और इसका प्रयोग बहुधा प्रत्यय के समान होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘कालीन’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’— में ‘कालीन’ को विशेषण शब्द बताया गया है। ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि— ‘यह शब्द समस्त पद के अंत में आता है, अकेला व्यवहार में नहीं आता।’
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अंतःकालीन | अंतः (बीच) के समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| अल्पकालीन | थोड़े समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| ग्रीष्मकालीन | ग्रीष्म काल (गर्मी) का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| चिरकालीन | बहुत पुराने समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| जन्मकालीन | जन्म के समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| दीर्घकालीन | लंबे समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| पुराकालीन | प्राचीन काल का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| पूर्वकालीन | पहले के समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| प्राक्कालीन | पूर्व काल का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| प्रातःकालीन | प्रातः काल (सुबह) का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| बहुकालीन | बहुत समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| मध्यकालीन | मध्य काल (बीच के समय) का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| शीतकालीन | शीत काल (ठंड) का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| समकालीन | समान समय का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
| सायंकालीन | सायं काल (शाम) का | सम्बन्ध तत्पुरुष समास |
ग
- अग, उरग, खग, तुरग, दुर्ग, नग, विहग
- व्युत्पत्ति— गै + क = ग। अर्थ— जानेवाला, गतिमान होनेवाला। इसलिए जब यह किसी अन्य शब्द युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। ‘ग’ सार्थक तो हैं, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है वरन् प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद बनता है। ऐसे शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण होते हैं।
गत
- आत्मगत, कंठगत, जातिगत, दृष्टिगत, परंपरागत, प्रतिमागत, भूमिगत, तथ्यगत, मनोगत, रूढ़िगत, विदेशगत, व्यक्तिगत, शब्दगत, शय्यागत, स्वरूपगत, स्वर्गगत, हस्तगत, हृदयगत
- गतवैभव, गतायु, गतश्री
- व्युत्पत्ति— गम् (धातु) + त (क्त-प्रत्यय) = गत। अर्थ— गया हुआ, बीता हुआ; स्थित, प्राप्त। गत एक स्वतंत्र शब्द है। अर्थात् व्याकरण की दृष्टि से गत किसी अन्य शब्द से जुड़कर समस्त पद निर्मित करता है। विग्रह— आत्मगत- आत्मा (स्वयं) में स्थित; अधिकरण तत्पुरुष समास। कंठगत- कंठ को गया हुआ; कर्म तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है। गतश्री- चली गयी है श्री (लक्ष्मी या कांति) जिसकी वह; बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास की पहचान कर सकते हैं।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘गत’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। स्वयं डॉ॰ हरदेव बाहरी की इसी कृति में गत से निर्मित कई शब्दों को समास के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है, अर्थात् ये स्वयं ही विरोधाभासी विचार दे रहे हैं। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘गत’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है, और वे गत को उपसर्ग और प्रत्यय दोनों के समान प्रयोग करते हुए उदाहरण देते हैं— उपसर्ग : गतवैभव, गतायु, गतश्री; प्रत्यय : मनोगत, दृष्टिगत, कंठगत, व्यक्तिगत। कामताप्रसाद गुरु भी गत से निर्मित शब्द को समास के अंतर्गत शामिल करते हैं, अर्थात् ये स्वयं ही विरोधाभासी विचार दे रहे हैं। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘गत’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’— में ‘गत’ को विशेषण शब्द बताया गया है। ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि— ‘समस्त पद के आदि में यह शब्द ‘गया हुआ’, ‘रहित’ ‘शून्य’ का अर्थ देता है और अंत में प्राप्त, ‘आया हुआ’, ‘पहुँचा हुआ’ का अर्थ देता है। जैसे— गतप्राण, गतायु, तथा कंठगत, कुक्षिगत।’
गम
- अगम, अधिगम, आगम, खगम, तुरोगम, दुरधिगम, दुर्गम, दूरंगम, दिवंगम, विस्मयंगम, संगम, सुगम, हृदयंगम
- व्युत्पत्ति— गम् (धातु) + अ (अप्-प्रत्यय) = गम। अर्थ— प्रवेश, पहुँच, गुजर, पैठ। गम एक स्वतंत्र शब्द है। अर्थ— चलने वाला।
- उपर्युक्त सूची में कुछ शब्द उपसर्ग निर्मित हैं, तो कुछ सामासिक शब्द हैं—
- उपसर्ग से निर्मित शब्द— अगम = अ (उपसर्ग) + गम। अधिगम = अधि (उपसर्ग) + गम। आगम = आ (उपसर्ग) + गम। सुगम = सु (उपसर्ग) + गम। दुर्गम = दुर् (उपसर्ग) + गम। संगम = सम् (उपसर्ग) + गम।
- सामासिक शब्द— खगम = ख (आकाश) में गमन करने वाला; उपपद तत्पुरुष। तुरोगम = तीव्र गति से चलने वाला। दुरधिगम = जिसे समझना या प्राप्त करना बहुत कठिन हो। दूरंगम = दूर तक जानेवाला। दिवंगम = स्वर्ग को जानेवाला। परलोकगम = परलोक को जाने वाला (मृत्यु को प्राप्त)। भुजंगम = जो भुजा (टेढ़ी चाल) से चलता है (साँप)। विस्मयंगम = जो विस्मय करनेवाला हो। विहंगम = जो आकाश में गमन करता है (पक्षी)। हृदयंगम = जो हृदय को छू लेने वाला या मनमोहक हो। ये सभी ‘उपपद तत्पुरुष’ के उदाहरण हैं। समाधिगम = भली-भाँति समझना, पूर्ण ज्ञान या उपलब्धि; प्रादि तत्पुरुष (उपसर्ग युक्त)।
- परलोकगम्— पर + लोक + गम्, इसमें पर विशेषण है, लोक संज्ञा और गम् धातु, यहाँ कोई प्रत्यय नहीं लगा है, इसलिए यह समास पद माना जायेगा, हाँ यदि परलोकगमन होता तो यह अन् (ल्युट्) प्रत्यय से और अगर परलोकगम होता तो अ (घञ्) प्रत्यय से बनता और प्रत्यय निर्मित शब्द (कृदंत) होता, परलोकगम् में तत्पुरुष समास है। भुजंगम— भुज् + गम् + खच्, मुम्, इसमें भुज् और गम् धातु है, खच्, मुम् प्रत्यय है, इसलिए यह कृदंत शब्द है। विहंगम— विहायसा गच्छति— गम् + खच्, मुम्, विहंगम कृदंत का शब्द है। संगम— सम् + गम् + अप्/अ, सम्-उपसर्ग, गम्-धातु और अप् (अ)-प्रत्यय है, इसलिए यह कृदंत शब्द है, यद्यपि इसमें सम्- उपसर्ग भी है, तो उपसर्ग निर्मित भी है। समाधिगम— इसमें समाधि- सम् + आ + धा + कि- से मिलकर बना है और यह अर्थात् समाधि अब ‘उपपद’ की तरह कार्य कर रहा, इस तरह समाधिगम = समाधि (उपपद) + गम् (धातु) + अप्/अ (प्रत्यय), इसलिए यह (समाधिगम) कृदंत शब्द है। सुगम— सु (उपसर्ग) + गम् (धातु) + अप्/अ (प्रत्यय)। हृदयंगम— हृदय + गम् + खच्, मुम्, कृदंत शब्द।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘गम’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘गम’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है, और इसका प्रयोग बहुधा प्रत्यय के समान होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘गम’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ दोनों में ‘गम’ शब्द दिया ही नहीं है। श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’— में ‘गम’ को संज्ञा शब्द बताया गया है।
गम्य
- अगम्य, अधिगम्य, ज्ञानगम्य, ध्यानगम्य, बुद्धिगम्य, बोधगम्य, विचारगम्य, श्रुतिगम्य, सुखगम्य
- व्युत्पत्ति— गम् (धातु) + य (यत्-प्रत्यय) = गम्य। अर्थ— प्रवेश होने योग्य। गम्य एक स्वतंत्र शब्द है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘गम्य’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘गम्य’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘गम्य’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘गम्य’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः गम्य जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा।
- उपर्युक्त शब्दों की दो श्रेणियाँ हैं— उपसर्ग या प्रत्यय से निर्मित शब्द और सामासिक शब्द।
- अगम्य = अ (उपसर्ग) + गम् (धातु) + य (यत्-प्रत्यय); अ (उपसर्ग) + गम्य (शब्द) → उपसर्ग से निर्मित शब्द। अगम (शब्द) + य (यत्-प्रत्यय) → प्रत्यय से निर्मित शब्द। अधिगम्य = अधि (उपसर्ग) + गम् (धातु) + य (यत्-प्रत्यय); अधि (उपसर्ग) + गम्य (शब्द) → उपसर्ग से निर्मित शब्द। अधिगम (शब्द) + य (यत्-प्रत्यय) → प्रत्यय से निर्मित शब्द।
- ज्ञानगम्य, ध्यानगम्य, बुद्धिगम्य, बोधगम्य, विचारगम्य, श्रुतिगम्य, सुखगम्य → सामासिक शब्द।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| ज्ञानगम्य | ज्ञान के द्वारा समझने योग्य | करण तत्पुरुष समास |
| ध्यानगम्य | ध्यान के द्वारा समझने योग्य | करण तत्पुरुष समास |
| बुद्धिगम्य | बुद्धि के द्वारा समझने योग्य | करण तत्पुरुष समास |
| बोधगम्य | बोध (समझ) के द्वारा गम्य | करण तत्पुरुष समास |
| विचारगम्य | विचार के द्वारा गम्य | करण तत्पुरुष समास |
| श्रुतिगम्य | श्रुति (कानों/वेदों) के द्वारा गम्य | करण तत्पुरुष समास |
| सुखगम्य | सुख के द्वारा गम्य | करण तत्पुरुष समास |
गृह
- गृह स्वयं में स्वतंत्र शब्द है। शब्द ग्रह् धातु से बना है।
- अर्थ— घर, भवन
- अतिथिगृह, गर्भगृह, गुप्तगृह, पितृगृह, प्रतीक्षागृह, प्रसवगृह, प्रसूतिगृह, प्रेक्षागृह, राजगृह, लतागृह, लाक्षागृह, विद्यागृह, विलासगृह, विलासगृह, विश्रामगृह, स्नानगृह।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में गृह से निर्मित कई शब्दों का उदाहरण देते हुए इसे (गृह) ‘अधिकरण (पात्र और स्थान) बोधक संज्ञा बनानेवाला बताया गया है। वहीं दूसरी और कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में दो उदाहरण मिलते हैं- विद्यागृह और पितृगृह; इन दोनों को तत्पुरुष समास के अन्तर्गत रखा गया है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना में राजगृह शब्द मिलता है और उसे तत्पुरुष समास के तहत रखा गया है। इसलिए गृह से निर्मित उपर्युक्त शब्द समास के उदाहरण हैं।
ग्रस्त
- अभावग्रस्त, आपदाग्रस्त, ऋणग्रस्त, कीटग्रस्त, कुंठाग्रस्त, क्षतिग्रस्त, ग्रहग्रस्त, चिंताग्रस्त, जराग्रस्त, दंगाग्रस्त, दुर्घटनाग्रस्त, प्रदूषणग्रस्त, बाढ़ग्रस्त, भयग्रस्त, भ्रष्टाचारग्रस्त, रोगग्रस्त, वादग्रस्त, विवादग्रस्त, व्याधिग्रस्त, शय्याग्रस्त, शापग्रस्त, शोकग्रस्त, सूखाग्रस्त
- व्युत्पत्ति— ग्रस् (धातु) + त (क्त-प्रत्यय) = ग्रस्त। अर्थ— पीड़ित। ‘ग्रस्त’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ग्रस्त जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अभावग्रस्त- अभाव से ग्रस्त (पीड़ित); करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘ग्रस्त’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘ग्रस्त’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘ग्रस्त’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘ग्रस्त’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः ग्रस्त जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अभावग्रस्त- अभाव से ग्रस्त (पीड़ित); करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अभावग्रस्त | अभाव से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| आपदाग्रस्त | 1. आपदा से ग्रस्त 2. आपदा द्वारा ग्रस्त है जो वह (स्थान) | 1. करण तत्पुरुष समास 2. बहुव्रीहि समास |
| ऋणग्रस्त | ऋण से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| कीटग्रस्त | कीटों (कीड़ों) से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| कुंठाग्रस्त | कुंठा से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| क्षतिग्रस्त | क्षति से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| ग्रहग्रस्त | ग्रह से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| चिंताग्रस्त | चिंता से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| जराग्रस्त | जरा (बुढ़ापे) से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| दंगाग्रस्त | 1. दंगों से ग्रस्त (प्रभावित) 2. दंगों द्वारा ग्रस्त है जो वह (शहर) | 1. करण तत्पुरुष समास 2. बहुव्रीहि समास |
| दुर्घटनाग्रस्त | दुर्घटना से ग्रस्त (प्रभावित) | करण तत्पुरुष समास |
| प्रदूषणग्रस्त | प्रदूषण से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| बाढ़ग्रस्त | 1. बाढ़ से ग्रस्त (प्रभावित) 2. बाढ़ द्वारा ग्रस्त (प्रभावित) है जो वह (क्षेत्र) | 1. करण तत्पुरुष समास 2. बहुव्रीहि समास |
| भयग्रस्त | भय से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| भ्रष्टाचारग्रस्त | भ्रष्टाचार से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| रोगग्रस्त | रोग से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| वादग्रस्त | वाद (तर्क/मुकदमे) से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| विवादग्रस्त | विवाद से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| व्याधिग्रस्त | व्याधि (रोग) से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| शय्याग्रस्त | 1. शय्या (बिस्तर) पर पड़ा हुआ 2. शय्या (बिस्तर) को प्राप्त कर लिया है जिसने, वह (रोगी) | 1. अधिकरण तत्पुरुष समास 2. बहुव्रीहि समास |
| शापग्रस्त | शाप (श्राप) से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| शोकग्रस्त | शोक से ग्रस्त | करण तत्पुरुष समास |
| सूखाग्रस्त | 1. सूखे से ग्रस्त प्रभावित 2. सूखे द्वारा ग्रस्त है जो वह (प्रदेश) | 1. करण तत्पुरुष समास 2. बहुव्रीहि समास |
घात
- अंगघात, आत्मघात, आशाघात, गोघात, पशुघात, पक्षघात, प्राणघात, पितृघात, मातृघात, मित्रघात, विश्वासघात, शत्रुघात, शिशुघात।
- व्युत्पत्ति— हन् (धातु) + णिच् (प्रत्यय) + घञ् (प्रत्यय) = घात। अर्थ— मारा जाना, हत्या। घात स्वयं पूर्ण शब्द है। शिशुघात = शिशु की हत्या; सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
घ्न
- कफघ्न, कृतघ्न, कृमिघ्न, गुरुघ्न, जंतुघ्न, दोषाघ्न, धर्मघ्न, पापाघ्न, पामघ्न, पितृघ्न, पित्तघ्न, पुण्यघ्न, प्रणघ्न, प्राणघ्न, बालघ्न, ब्राह्मणघ्न, भ्रूणघ्न, मातृघ्न, मित्रघ्न, वातघ्न, विषघ्न, व्रतघ्न, शूलघ्न, शत्रुघ्न, स्त्रीघ्न
- व्युत्पत्ति— हन् (धातु) + क (प्रत्यय) = घ्न। अर्थ— वध करनेवाला; विनाशक; दूर करनेवाला; चिकित्सक। ‘घ्न’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘घ्न’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— कृतघ्न- किए हुए उपकार (कृत) को न माननेवाला; उपपद तत्पुरुष समास। क्योंकि जब उत्तरखंड स्वयं में सार्थक तो हो, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत न होता हो और वह (उत्तरखंड) कृदंत हो तो वह उपपद तत्पुरुष समास पद बनता है। क्योंकि ‘घ्न’ सार्थक और कृदंत है लेकिन स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता इसलिए उपर्युक्त शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हैं।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘घ्न’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘घ्न’ को स्वतंत्र शब्द मानते हुए यह कहा है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है, और इसका प्रयोग बहुधा प्रत्यय के ही समान होता है। परन्तु समास खण्ड में कामताप्रसाद गुरु अपनी इसी कृति में यह भी लिखते हैं कि जब उत्तरखंड स्वयं में सार्थक तो हो, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत न होता हो और वह (उत्तरखंड) कृदंत हो तो वह समस्त पद बनता है; वे कई उदाहरण देते हैं, जिसमें ‘घ्न’ से निर्मित ‘कृतघ्न’ शब्द भी सम्मिलित है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘घ्न’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोश— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में ‘घ्न’ का उल्लेख ही नहीं है। श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘घ्न’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः ‘घ्न’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— कृतघ्न- किए हुए उपकार (कृत) को न माननेवाला; उपपद तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| कफघ्न | कफ को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| कृतघ्न | किए हुए उपकार (कृत) को न मानने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| कृमिघ्न | कृमियों (कीड़ों) को मारने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| गुरुघ्न | गुरु की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| जंतुघ्न | जंतुओं (कीटाणुओं) को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| दोषाघ्न | दोषों को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| धर्मघ्न | धर्म का नाश करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| पापाघ्न | पापों को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| पामघ्न | पाम (त्वचा रोग/खाज) को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| पितृघ्न | पिता की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| पित्तघ्न | पित्त को शांत/नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| पुण्यघ्न | पुण्यों का नाश करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| प्रणघ्न | प्रण (वचन) को तोड़नेवाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| प्राणघ्न | प्राणों को हरने वाला (घातक) | उपपद तत्पुरुष समास |
| बालघ्न | बालक की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| ब्राह्मणघ्न | ब्राह्मण की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| भ्रूणघ्न | भ्रूण की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| मातृघ्न | माता की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| मित्रघ्न | मित्र की हत्या या विश्वासघात करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| वातघ्न | वात (वायु विकार) को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| विषघ्न | विष को नष्ट करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| व्रतघ्न | प्रतिज्ञा (व्रत) को तोड़नेवाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| शूलघ्न | शूल (दर्द) को मिटाने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| शत्रुघ्न | शत्रुओं का नाश करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| स्त्रीघ्न | स्त्री की हत्या करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
चर
- अनुचर, अंतरिक्षचर, खेचर, गगनचर, गुप्तचर, जलचर, थलचर, दिवाचर, नभचर, निशाचर, निशिचर, परिचर, बालचर, वनचर, सहचर।
- व्युत्पत्ति— चर् (धातु) + अच् (प्रत्यय) = चर। चर स्वयं पूर्ण शब्द है। अर्थ— चलने-फिरनेवाला, विचरनेवाला। अर्थात् ‘चर’ एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— अनुचर = अनु (पीछे-पीछे) चलनेवाला; चर ऐसा कृदंत है जिसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता इसलिए यह ‘उपपद तत्पुरुष समास’ का उदाहरण है। निशाचर और निशिचर इसमें विग्रह करने का आधार पर समास बदल जायेगा— 1. चर (कृदंत, स्वतंत्र प्रयोग नहीं), ‘उपपद तत्पुरुष समास’; 2. रात (निशा/निशि) में विचरण करनेवाला ‘अधिकरण तत्पुरुष समास’; 3. रात (निशा/निशि) में विचरण करनेवाला अर्थात् राक्षस ‘बहुव्रीहि समास’। इसी तरह अन्य शब्दों का विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है। हाँ चर को आधार मानकर विग्रह करेंगे तो चर से निर्मित उपर्युक्त सभी शब्दों में ‘उपपद तत्पुरुष समास’ होगा।
- अनुचर— अनु + चर, अनु उपसर्ग है, इसलिए इसे उपसर्ग निर्मित शब्द मान सकते हैं। अंतरिक्षचर, खेचर— इसे कामताप्रसाद गुरु कृत हिन्दी व्याकरण में अलुक् तत्पुरुष माना गया है। गगनचर, गुप्तचर, जलचर, थलचर, दिवाचर, नभचर, निशाचर, निशिचर, परिचर, बालचर, वनचर, सहचर।
- टिप्पणी— चर से निर्मित इन शब्दों के व्युत्पत्ति की व्याख्या को लेकर वैयाकरणों में मतभेद तो है ही साथ ही वे अपने मत पर ही स्थिर नहीं रह पाते। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ये लिखा है— “४५९. जब तत्पुरुष समास का दूसरा पद ऐसा कृदंत होता है जिसका स्वतंत्र उपयोग नहीं हो सकता, तब उस समास को उपपद समास कहते हैं, जैसे, ग्रंथकार, तटस्थ, जलद, उरग, कृतघ्न, कृतज्ञ, नृप। जलधर, पापहर, जलचर आदि उपपद समास नहीं हैं, क्योकि इनमें जो धर, हर और चर कृदंत हैं उनका प्रयोग अन्यत्र स्वतंत्रतापूर्वक होता है।” इसके ऊपर के परिच्छेद (४५८) में वे खेचर को अलुक् तत्पुरुष समास बताते हैं। दूसरे स्थान पर वे लिखते हैं— “४३६. ऊपर लिखे प्रत्ययों के सिवा संस्कृत में कई एक शब्द ऐसे हैं जो समास में उपसर्ग अथवा प्रत्यय के समान प्रयुक्त होते हैं। यद्यपि इन शब्दों में स्वतंत्र अर्थ रहता है जिसके कारण इन्हें शब्द कहते हैं, तथापि इनका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। इसलिए इन्हें यहाँ उपसर्गों और प्रत्ययों के साथ लिखते हैं।” साथ ही वे कुछ उदाहरण देते हैं और यह संकेत करते हैं कि “जिन शब्दों के पूर्व (*) यह चिह्न है उनका प्रयोग बहुधा प्रत्ययों ही के समान होता है।” अब “*चर” तारांकित करते हुए उनसे निर्मित शब्दों का उदाहरण देते हैं— *चर— जलचर, निशाचर, खेचर, अनुचर आदि देते हैं। यही विरोधाभास हमें डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में भी मिलता है। समास वाले अध्याय में वे निशिचर शब्द को अलुक् तत्पुरुष के अन्तर्गत रखते हैं, जलचर को उपपद तत्पुरुष के अन्तर्गत रखते हैं। वहीं प्रत्यय वाले खण्ड में चर प्रत्यय निर्मित ढेरों उदाहरण देते हैं— “अनुचर, अंतरिक्षचर, खेचर, गगनचर, गुप्तचर, जलचर, थलचर, दिवाचर, नभचर, निशाचर, निशिचर, परिचर, बालचर, वनचर, सहचर।”
चिंतक
- लाभचिंतक, शुभचिंतक, हितचिंतक
- व्युत्पत्ति— चिंत् (धातु) + अक (ण्वुल्) = चिंतक। अर्थ— चिंतन करनेवाला, विचारक। यह एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए जब यह किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— शुभ का चिंतक; कर्म तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
जनक
- आपत्तिजनक, आशाजनक, उत्तेजनाजनक, करुणाजनक, क्लेशजनक, खेदजनक, चिंताजनक, दुःखजनक, भयजनक, लज्जाजनक, विस्मयजनक, शंकाजनक, संतोषजनक, सुखजनक
- व्युत्पत्ति— जन् (धातु) + णिच् (प्रत्यय) + ण्वुल् (प्रत्यय) = जनक। अर्थ— जन्मदाता, उत्पादक । ‘जनक’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘जनक’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘जनक’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘जनक’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः ‘जनक’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— आपत्तिजनक- 1. आपत्ति को उत्पन्न करनेवाला, कर्म तत्पुरुष समास; 2. आपत्ति (के द्वारा/से) उत्पन्न होनेवाला, करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास पहचाना जा सकता है।
जन्य
- अज्ञानजन्य, इन्द्रियजन्य, क्रोधजन्य, धर्मजन्य, प्रेमजन्य, वियोगजन्य, विरहजन्य, विरागजन्य, स्पर्शजन्य
- व्युत्पत्ति— जन् (धातु) + ण्यत् (प्रत्यय) या जन् (धातु) + णिच् (प्रत्यय) + यत् (प्रत्यय) = जन्य। अर्थ— से उत्पन्न, जनित। ‘जन्य’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘जन्य’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अज्ञानजन्य- अज्ञान से उत्पन्न, करण तत्पुरुष। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘जन्य’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (जन्य) को ऐसा स्वतंत्र शब्द माना गया है जिसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘जन्य’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हाँ यह भी कहा है ‘जन्य’ समास का पद है परन्तु तद्धित-प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होता है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘जन्य’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः ‘जन्य’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अज्ञानजन्य- अज्ञान से उत्पन्न, करण तत्पुरुष। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अज्ञानजन्य | अज्ञान से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| इन्द्रियजन्य | इन्द्रियों से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| क्रोधजन्य | क्रोध से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| धर्मजन्य | धर्म से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| प्रेमजन्य | प्रेम से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| वियोगजन्य | वियोग से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| विरहजन्य | विरह से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| विरागजन्य | विराग (वैराग्य) से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
| स्पर्शजन्य | स्पर्श से उत्पन्न | करण तत्पुरुष समास |
ज
- अंडज, अंत्यज, अंबुज, अंहुज, अग्रज, अनुज, अब्ज, उद्भिज, कुलज, क्षत्रियज, जलज, जारज, द्विज, धर्मज, पंकज, पिण्डज, पित्तज, पूर्वज, मलयज, वंशज, वारिज, स्वेदज।
- व्युत्पत्ति— जन् + ड = ज। यह ‘जन्’ धातु से आया है और हिन्दी में इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं होता है। अर्थ— उत्पन्न। वस्तुतः ‘ज’ से निर्मित ये शब्द ‘उपपद तत्पुरुष’ के उदाहरण हैं। क्योंकि ‘ज’ सार्थक कृदंत शब्द तो है, परन्तु भाषा में इसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता है।
जाल
- कर्मजाल, जगजाल, प्रेमजाल, मायाजाल, शब्दजाल
- व्युत्पत्ति— जल् + ण = जालम् → जाल। अर्थ— जाला, पाश। यह एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए जब यह किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— कर्मजाल 1. कर्म का जाल (सम्बन्ध तत्पुरुष समास); 2. कर्म रूपी जाल/कर्म ही है जाल (रूपक कर्मधारय समास)। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
जीवी
- आयुधजीवी, कष्टजीवी, कृषिजीवी, क्षणजीवी, जलजीवी, धनजीवी, धान्यजीवी, परजीवी, बुद्धिजीवी, मसिजीवी, वनजीवी, शस्त्रजीवी, शिल्पजीवी, श्रमजीवी, सुराजीवी।
- व्युत्पत्ति— जीव् (धातु) + इनि/इन् (णिन्) (प्रत्यय) = जीविन् → जीवी। जीवी स्वयं पूर्ण शब्द है। वस्तुतः संस्कृत में यह जीविन् (जीव् + इनि) है और यही हिन्दी में जीवी शब्द बनता है। अर्थ— जीविका से अपना निर्वाह करनेवाला। यह एक स्वतंत्र शब्द है, इसलिए जब यह किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— श्रमजीवी = श्रम से जीनेवाला, करणतत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
- टिप्पणी— डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में एक शब्द दिया है— “श्रमजीवी”, इसको करणतत्पुरुष मानते हुए विग्रह इस तरह करते हैं : श्रमजीवी – श्रम से जीनेवाला। इस आधार पर ये सब तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं। परन्तु डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे (जीवी) को अर्धप्रत्यय मानते हुए जीवी निर्मित शब्दों को प्रत्यय-निर्मित शब्द बताया गया है। इसी तरह कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में जीवी से निर्मित शब्दों को प्रत्यय-निर्मित शब्द बताते हुए चार उदाहरण देते हैं- श्रमजीवी, धनजीवी, कष्टजीवी, क्षणजीवी।
ज्ञ
- अभिज्ञ, कृतज्ञ, दुःखज्ञ, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, मर्मज्ञ, राजनीतिज्ञ, विशेषज्ञ, विज्ञ, वेदज्ञ, शास्त्रज्ञ, सर्वज्ञ, सुखज्ञ
- व्युत्पत्ति— ज्ञा (धातु) + क = ज्ञ। अर्थ— जाननेवाला। वस्तुतः ज्ञ से निर्मित ये शब्द ‘उपपद तत्पुरुष’ के उदाहरण हैं। क्योंकि ‘ज्ञ’ सार्थक (कृदंत) शब्द तो है परन्तु भाषा में इसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता है, और यह एक प्रत्यय के समान व्यवहृत होता है।
तम / (तमप्)
- विशेषण से विशेषण (उत्तमावस्था) बनानेवाला
- (अंतर से) अंतरतम, (अधिक से) अधिकतम, (आधुनिक से) आधुनिकतम, (उच्च से) उच्चतम, (कठिन से) कठिनतम, (कठोर से) कठोरतम, (गुरु से) गुरुतम, (घोर से) घोरतम, (दृढ़ से) दृढ़तम, (नवीन से) नवीनतम, (निकट से) निकटतम, (निम्न से) निम्नतम, (प्रिय से) प्रियतम, (बृहत् से) बृहत्तम, (महत् से) महत्तम, (मृदु से) मृदुतम, (लघु से) लघुतम, विशेषण से विशेषण (उत्तमावस्था) बनानेवाला
- (अंतर से) अंतरतम, (अधिक से) अधिकतम, (आधुनिक से) आधुनिकतम, (उच्च से) उच्चतम, (कठिन से) कठिनतम, (कठोर से) कठोरतम, (गुरु से) गुरुतम, (घोर से) घोरतम, (दृढ़ से) दृढ़तम, (नवीन से) नवीनतम, (निकट से) निकटतम, (निम्न से) निम्नतम, (प्रिय से) प्रियतम, (बृहत् से) बृहत्तम, (महत् से) महत्तम, (मृदु से) मृदुतम, (लघु से) लघुतम, विशेषण से विशेषण (उत्तमावस्था) बनानेवाला
- (अंतर से) अंतरतम, (अधिक से) अधिकतम, (आधुनिक से) आधुनिकतम, (उच्च से) उच्चतम, (कठिन से) कठिनतम, (कठोर से) कठोरतम, (गुरु से) गुरुतम, (घोर से) घोरतम, (दृढ़ से) दृढ़तम, (नवीन से) नवीनतम, (निकट से) निकटतम, (निम्न से) निम्नतम, (प्रिय से) प्रियतम, (बृहत् से) बृहत्तम, (महत् से) महत्तम, (मृदु से) मृदुतम, (लघु से) लघुतम,
(श्रेष्ठ से) श्रेष्ठतम, (समीप से) समीपतम, (सरल से) सरलतम, (सुंदर से) सुंदरतम - टिप्पणी— विशेषण की तुलनावस्था के लिए तम (तमप्) प्रत्यय का प्रयोग होता है। विशेषण की तीन अवस्थाएँ हैं— मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था। मूलावस्था में मूल-शब्द होता है; जैसे— अधिक। उत्तरावस्था में मूल-शब्द + तर (तरप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतर। उत्तमावस्था मूल-शब्द + तम् (तमप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतम। संस्कृत भाषा में विशेषणों की तुलनावस्था बताने के लिए ‘तर’ और ‘तम’ के अतिरिक्त ‘ईयस्’ (ईयसुन्) और ‘इष्ठ’ (इष्ठन्) प्रत्यय का भी प्रयोग होता है। हिन्दी में उत्तमावस्था (इष्ठ प्रत्यय) वाले शब्द प्रचलित हो गये हैं; जैसे— कनिष्ठ, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, श्रेष्ठ इत्यादि। इन शब्दों की मूलावस्था— अल्प/युवन्, वृद्ध/प्रशस्य, वृद्ध/उरु और प्रशस्य क्रमशः है। इन शब्दों की उत्तमावस्था— कनीयस्, ज्यायस्, वर्षीयस् और श्रेयस् क्रमशः है। परन्तु हिन्दी में ईयस् (ईयसुन्) प्रत्यय वाले शब्द अप्रचलित हैं। अर्थात् इष्ठ अंत वाले शब्द पहले से ही उत्तमावस्था में हैं अतः उनमें तर और तम जोड़ना अशुद्ध हैं; जैसे— श्रेष्ठ को
श्रेष्ठतरऔरश्रेष्ठतमलिखना अशुद्ध है। परन्तु हमें फिरभी श्रेष्ठतम शब्द शब्दकोशों में प्राप्त हुआ— The oxford : Hindi-English Dictionary (R. S. McGregor), राजपाल : हिन्दी शब्दकोश (डॉ॰ हरदेव बाहरी)।, (समीप से) समीपतम, (सरल से) सरलतम, (सुंदर से) सुंदरतम - टिप्पणी— विशेषण की तुलनावस्था के लिए तम (तमप्) प्रत्यय का प्रयोग होता है। विशेषण की तीन अवस्थाएँ हैं— मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था। मूलावस्था में मूल-शब्द होता है; जैसे— अधिक। उत्तरावस्था में मूल-शब्द + तर (तरप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतर। उत्तमावस्था मूल-शब्द + तम् (तमप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतम। संस्कृत भाषा में विशेषणों की तुलनावस्था बताने के लिए ‘तर’ और ‘तम’ के अतिरिक्त ‘ईयस्’ (ईयसुन्) और ‘इष्ठ’ (इष्ठन्) प्रत्यय का भी प्रयोग होता है। हिन्दी में उत्तमावस्था (इष्ठ प्रत्यय) वाले शब्द प्रचलित हो गये हैं; जैसे— कनिष्ठ, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, श्रेष्ठ इत्यादि। इन शब्दों की मूलावस्था— अल्प/युवन्, वृद्ध/प्रशस्य, वृद्ध/उरु और प्रशस्य क्रमशः है। इन शब्दों की उत्तमावस्था— कनीयस्, ज्यायस्, वर्षीयस् और श्रेयस् क्रमशः है। परन्तु हिन्दी में ईयस् (ईयसुन्) प्रत्यय वाले शब्द अप्रचलित हैं। अर्थात् इष्ठ अंत वाले शब्द पहले से ही उत्तमावस्था में हैं अतः उनमें तर और तम जोड़ना अशुद्ध हैं; जैसे— श्रेष्ठ को
श्रेष्ठतरऔरश्रेष्ठतमलिखना अशुद्ध है। परन्तु हमें फिरभी श्रेष्ठतम शब्द शब्दकोशों में प्राप्त हुआ— The oxford : Hindi-English Dictionary (R. S. McGregor), राजपाल : हिन्दी शब्दकोश (डॉ॰ हरदेव बाहरी)। (समीप से) समीपतम, (सरल से) सरलतम, (सुंदर से) सुंदरतम - टिप्पणी— विशेषण की तुलनावस्था के लिए तम (तमप्) प्रत्यय का प्रयोग होता है। विशेषण की तीन अवस्थाएँ हैं— मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था। मूलावस्था में मूल-शब्द होता है; जैसे— अधिक। उत्तरावस्था में मूल-शब्द + तर (तरप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतर। उत्तमावस्था मूल-शब्द + तम् (तमप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतम। संस्कृत भाषा में विशेषणों की तुलनावस्था बताने के लिए ‘तर’ और ‘तम’ के अतिरिक्त ‘ईयस्’ (ईयसुन्) और ‘इष्ठ’ (इष्ठन्) प्रत्यय का भी प्रयोग होता है। हिन्दी में उत्तमावस्था (इष्ठ प्रत्यय) वाले शब्द प्रचलित हो गये हैं; जैसे— कनिष्ठ, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, श्रेष्ठ इत्यादि। इन शब्दों की मूलावस्था— अल्प/युवन्, वृद्ध/प्रशस्य, वृद्ध/उरु और प्रशस्य क्रमशः है। इन शब्दों की उत्तमावस्था— कनीयस्, ज्यायस्, वर्षीयस् और श्रेयस् क्रमशः है। परन्तु हिन्दी में ईयस् (ईयसुन्) प्रत्यय वाले शब्द अप्रचलित हैं। अर्थात् इष्ठ अंत वाले शब्द पहले से ही उत्तमावस्था में हैं अतः उनमें तर और तम जोड़ना अशुद्ध हैं; जैसे— श्रेष्ठ को
श्रेष्ठतरऔरश्रेष्ठतमलिखना अशुद्ध है। परन्तु हमें फिरभी श्रेष्ठतम शब्द शब्दकोशों में प्राप्त हुआ— The oxford : Hindi-English Dictionary (R. S. McGregor), राजपाल : हिन्दी शब्दकोश (डॉ॰ हरदेव बाहरी)।
तर / (तरप्)
- विशेषण से विशेषण (उत्तरावस्था) बनानेवाला
- (अग्र से) अग्रतर, (अधिक से) अधिकतर, (अन्य से) अन्यतर, (उच्च से) उच्चतर, (कठिन से) कठिनतर, (गुरु से) गुरुतर, (घोर से) घोरतर, (दृढ़ से) दृढ़तर, (निकट से) निकटतर, (निम्न से) निम्नतर, (प्रिय से) प्रियतर, (मृदु से) मृदुतर, (लघु से) लघुतर, (बृहत् से) बृहत्तर, (महत् से) महत्तर, (लघु से) लघुतर,
(श्रेष्ठ से) श्रेष्ठतर, (सरल से) सरलतर - टिप्पणी— विशेषण की तुलनावस्था के लिए तर (तरप्) प्रत्यय का प्रयोग होता है। विशेषण की तीन अवस्थाएँ हैं— मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था। मूलावस्था में मूल-शब्द होता है; जैसे— अधिक। उत्तरावस्था में मूल-शब्द + तर (तरप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतर। उत्तमावस्था मूल-शब्द + तम् (तमप्) प्रत्यय; जैसे— अधिकतम। संस्कृत भाषा में विशेषणों की तुलनावस्था बताने के लिए ‘तर’ और ‘तम’ के अतिरिक्त ‘ईयस्’ (ईयसुन्) और ‘इष्ठ’ (इष्ठन्) प्रत्यय का भी प्रयोग होता है। हिन्दी में उत्तमावस्था (इष्ठ प्रत्यय) वाले शब्द प्रचलित हो गये हैं; जैसे— कनिष्ठ, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, श्रेष्ठ इत्यादि। इन शब्दों की मूलावस्था— अल्प/युवन्, वृद्ध/प्रशस्य, वृद्ध/उरु और प्रशस्य क्रमशः है। इन शब्दों की उत्तमावस्था— कनीयस्, ज्यायस्, वर्षीयस् और श्रेयस् क्रमशः है। परन्तु हिन्दी में ईयस् (ईयसुन्) प्रत्यय वाले शब्द अप्रचलित हैं। अर्थात् इष्ठ अंत वाले शब्द पहले से ही उत्तमावस्था में हैं अतः उनमें तर और तम जोड़ना अशुद्ध हैं; जैसे— श्रेष्ठ को
श्रेष्ठतरऔरश्रेष्ठतमलिखना अशुद्ध है। परन्तु हमें फिरभी श्रेष्ठतम शब्द शब्दकोशों में प्राप्त हुआ— The oxford : Hindi-English Dictionary (R. S. McGregor), राजपाल : हिन्दी शब्दकोश (डॉ॰ हरदेव बाहरी)।
दर्शी
- अंतर्दर्शी, आकाशदर्शी, आत्मदर्शी, कालदर्शी, क्षुद्रदर्शी, छिद्रदर्शी, तत्त्वदर्शी, दीर्घदर्शी, दूरदर्शी, परदर्शी, पापदर्शी, प्रत्यक्षदर्शी, प्रियदर्शी, भविष्यदर्शी, सर्वदर्शी, सूक्ष्मदर्शी, स्वप्नदर्शी
- व्युत्पत्ति— दृश् (धातु) + इनि/इन् (णिन्) (प्रत्यय) = दर्शिन् → दर्शी। दर्शी शब्द संस्कृत में दर्शिन् से आया है। अर्थ— देखनेवाला, साक्षात्कार करनेवाला; यंत्र। अर्थात् स्वतंत्र शब्द माना गया है और इनका समास-विग्रह भी कर सकते हैं, जिनमें से अधिकांश शब्द कर्मधारय समास के उदाहरण हैं; जैसे— स्वप्नदर्शी = स्वप्न देखनेवाला, इसमें विशेष्य (स्वप्न) और विशेषण (दर्शी) सम्बन्ध है। दूरदर्शी = दूर देखनेवाला, कर्मधारय समास; परन्तु दूरदर्शी = दूर देखनेवाला यंत्र, बहुव्रीहि समास। सूक्ष्मदर्शी = सूक्ष्म देखनेवाला यंत्र, बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह किया जा सकता है।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘दर्शी’ शब्द को बहुधा प्रत्यय की भाँति प्रयोग करनेवाला माना गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में दर्शी निर्मित कई शब्द देते हुए इन्हें अर्धप्रत्यय निर्मित शब्द माना गया है। परन्तु शब्दकोशों में ‘दर्शी’ शब्द को विशेषण माना गया है, अर्थात् स्वतंत्र शब्द माना गया है और इनका समास-विग्रह भी कर सकते हैं, जिनमें से अधिकांश शब्द कर्मधारय समास के उदाहरण हैं; जैसे— स्वप्नदर्शी = स्वप्न देखनेवाला, इसमें विशेष्य (स्वप्न) और विशेषण (दर्शी) सम्बन्ध है। दूरदर्शी = दूर देखनेवाला, कर्मधारय समास; परन्तु दूरदर्शी = दूर देखनेवाला यंत्र, बहुव्रीहि समास। सूक्ष्मदर्शी = सूक्ष्म देखनेवाला यंत्र, बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का भी विग्रह किया जा सकता है।
द
- जलद, दुःखद, धनद, नर्मदा (स्त्रीलिंग), मोक्षद, वारिद, सुखद।
- व्युत्पत्ति— दा + क = द। अर्थ— देनेवाला। ‘द’ स्वयं में सार्थक और कृदंत तो हैं, पर स्वतंत्र रूप से भाषा में व्यवहृत नहीं होता है वरन् प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होकर समस्त पद बनता है; इसलिए यह ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हैं।
दायक / दायी
- दायक— (आनंद से) आनंददायक, (उत्तर से) उत्तरदायक, (ऋण से) ऋणदायक, (कष्ट से) कष्टदायक, (गुण से) गुणदायक, (जीवन से) जीवनदायक, (त्रास से) त्रासदायक, (दुःख से) दुःखदायक, (धन से) धनदायक, (पीड़ा से) पीड़ादायक, (फल से) फलदायक, (बहु से) बहुदायक, (भय से) भयदायक, (मंगल से) मंगलदायक, (लाभ से) लाभदायक, (वर से) वरदायक, (शांति से) शांतिदायक, (सुख से) सुखदायक। ये सभी ‘उपपद तत्पुरुष’ के उदाहरण हैं।
- दायक— दा (धातु) + य (युक्) का आगम + अक (ण्वुल्) = दायक। अर्थ— देनेवाला।
- विग्रह— आनंददायक – आनंद देनेवाला, इसी तरह अन्य का विग्रह किया जा सकता है। दायक से निर्मित इन शब्दों को स्त्रीलिंग बनाने के लिए दायक से दायिका कर देते हैं; जैसे— आनंददायिका, ऋणदायिका इत्यादि।
- दायी— (आनंद से) आनंददायी, (उत्तर से) उत्तरदायी, (ऋण से) ऋणदायी, (कष्ट से) कष्टदायी, (गुण से) गुणदायी, (जीवन से) जीवनदायी, (त्रास से) त्रासदायी, (दुःख से) दुःखदायी, (धन से) धनदायी, (पीड़ा से) पीड़ादायी, (फल से) फलदायी, (बहु से) बहुदायी, (भय से) भयदायी, (मंगल से) मंगलदायी, (लाभ से) लाभदायी, (वर से) वरदायी, (शांति से) शांतिदायी, (सुख से) सुखदायी। ‘उपपद तत्पुरुष’ के उदाहरण हैं।
- दायी— दा (धातु) + य (युक्) का आगम + इन् (णिन्/णिनि) = दायिन् → दायी। अर्थ— स्वभाव से देनेवाला।
- विग्रह— आनंददायी – स्वभाव से आनंद देनेवाला या आनंद प्रदान करना जिसका स्वभाव हो, इसी तरह अन्य का विग्रह किया जा सकता है। दायी से निर्मित इन शब्दों को स्त्रीलिंग बनाने के लिए दायी से दायिनी कर देते हैं; जैसे— आनंददायिनी, ऋणदायिनी इत्यादि।
- दायक और दायी— दोनों कृदंत हैं। इनसे निर्मित शब्द ‘उपपद तत्पुरुष’ हैं। ‘उपपद तत्पुरुष’ तब बनते हैं जब उत्तरपद कृदंत हो और उनका प्रयोग स्वतंत्र न मिलता है।
- वस्तुतः यह प्रत्यय नहीं है। इसके योग से समास शब्द बनेगा। परन्तु हिन्दी भाषा में ये प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होने लगा है।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में के अनुसार कुछ ऐसे शब्द हैं जो स्वतंत्र हैं, परन्तु हिन्दी भाषा में उनका प्रयोग स्वतंत्र नहीं होता, और वे प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होते हैं, उसी सूची में दायक और दायी भी है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में दायक/दायी को एक साथ देते हुए इन्हें विशेषण बनानेवाला तद्धित प्रत्यय कहा गया है।
धर
- गंगाधर, गदाधर, गिरिधर, चंद्रधर, चक्रधर, जगतीधर, जलधर, छत्रधर, दंडधर, धरणीधर, धराधर, धाराधर, पक्षधर, पयोधर, परशुधर, पृथ्वीधर, फणधर, महीधर, मुरलीधर, वंशीधर, श्रीधर, हलधर।
- व्युत्पत्ति— धृ (धातु) + अच् (प्रत्यय) = धर। अर्थ— धारण करनेवाला। शब्दकोशों में इसे स्पष्टरूप से समास बनानेवाला शब्द बताया गया है— जैसे; गंगाधर = गंगा को धारण करने वाला (कर्मधारय समास); गंगा को धारण करने वाला, अर्थात् शिव (बहुव्रीहि समास)। गदाधर = गदा धारण करने वाला (कर्मधारय), गदा धारण करने वाला अर्थात् विष्णु (बहुव्रीहि)। इसी तरह अन्य का भी समास-विग्रह किया जा सकता है।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘धर’ शब्द को अर्धप्रत्यय मानते हुए इससे निर्मित कई शब्दों के उदाहरण दिये गये हैं। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘धर’ शब्द को बहुधा प्रत्यय की भाँति प्रयोग करनेवाला माना गया है। परन्तु शब्दकोशों में इसे स्पष्टरूप से समास बनानेवाला शब्द बताया गया है— जैसे; गंगाधर = गंगा को धारण करने वाला (कर्मधारय समास); गंगा को धारण करने वाला, अर्थात् शिव (बहुव्रीहि समास)। गदाधर = गदा धारण करने वाला (कर्मधारय), गदा धारण करने वाला अर्थात् विष्णु (बहुव्रीहि)। इसी तरह अन्य का भी समास-विग्रह किया जा सकता है।
| शब्द | विग्रह | समास | समास |
| गंगाधर | गंगा को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शिवजी) |
| गदाधर | गदा धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (विष्णुजी) |
| गिरिधर | गिरि को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण) |
| चंद्रधर | चन्द्र को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शिवजी) |
| चक्रधर | चक्र धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण, विष्णुजी) |
| जगतीधर | जगती (पृथ्वी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शेषनाग, पर्वत) |
| जलधर | जल को धारण करने वाला (मेघ) | कर्मधारय | बहुव्रीहि अर्थ सम्भव |
| छत्रधर | छत्र धारण करने वाला | कर्मधारय | — |
| दंडधर | दण्ड धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (राजा) |
| धरणीधर | धरणी (पृथ्वी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शेषनाग, पर्वत) |
| धराधर | धरा (पृथ्वी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शेषनाग, पर्वत) |
| धाराधर | धारा (जलधारा) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (बादल) |
| पक्षधर | पक्ष (समर्थन) धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (पंख वाला = पक्षी) |
| पयोधर | पयः (जल) धारण करने वाला (मेघ) | कर्मधारय | बहुव्रीहि (स्तन) |
| परशुधर | परशु (कुल्हाड़ी) धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (परशुराम) |
| पृथ्वीधर | पृथ्वी को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शेषनाग, पर्वत) |
| फणधर | फण (फन) धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (नाग) |
| महीधर | मही (पृथ्वी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (पर्वत) |
| महीधर | मही (पृथ्वी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (शेषनाग, पर्वत) |
| मुरलीधर | मुरली (बाँसुरी) धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण) |
| वंशीधर | वंशी (बाँसुरी) धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण) |
| श्रीधर | श्री (लक्ष्मी) को धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (विष्णुजी) |
| हलधर | हल धारण करने वाला | कर्मधारय | बहुव्रीहि (बलराम) |
धार
- कर्णधार, सूत्रधार
- व्युत्पत्ति— धृ + णिच् + अच् = धार। अर्थ— सम्भालने वाला, धारण करने वाला, सहारा देनेवाला। यह स्वतंत्र कृदंत शब्द है, इसलिए यह जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— कर्णधार – 1. पतवार (कर्ण) धारण करनेवाला, उपपद तत्पुरुष समास; 2. पतवार धारण करनेवाला अर्थात् मार्गदर्शक या नाविक, बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
धर्म
- कुलधर्म, जातिधर्म, पुत्रधर्म, प्रजाधर्म, राजधर्म, सेवाधर्म
- धर्मच्युत, धर्मभ्रष्ट
- व्युत्पत्ति— धृ + मन् = धर्म। अर्थ— कर्त्तव्य, आचार। धर्म एक स्वतंत्र शब्द है और इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से प्राप्त होता है, इसलिए यह जब किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनेगा। विग्रह— 1. कुलधर्म – कुल का धर्म, सम्बन्ध तत्पुरुष समास। सेवाधर्म – सेवा ही है धर्म, कर्मधारय समास। 2. धर्मच्युत – धर्म से च्युत, अपादान तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
नाशक
- कफनाशक, कृमिनाशक, धननाशक, विघ्नविनाशक
- व्युत्पत्ति— नश् + णिच् + ण्वुल् = नाशक। अर्थ— विध्वंशक, नाश करनेवाला। विग्रह— कृमिनाशक – 1. कफ नाश करनेवाला, उपपद तत्पुरुष समास; 2. कफ को नष्ट करनेवाला, कर्म तत्पुरुष समास। विघ्नविनाशक – विघ्न का विनाशक है जो अर्थात् गणेशजी, बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
निष्ठ
- आत्मनिष्ठ, ईश्वरनिष्ठ, एकनिष्ठ, कर्मनिष्ठ, कर्त्तव्यनिष्ठ, ज्ञाननिष्ठ, तपोनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, ध्याननिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ, योगनिष्ठ, राजनिष्ठ, वस्तुनिष्ठ, संस्कृतनिष्ठ, सत्यनिष्ठ
- व्युत्पत्ति— नि (उपसर्ग) + स्था (धातु) + क (प्रत्यय) = निष्ठा। अर्थ— विश्वास करनेवाला; लगा रहनेवाला। ‘निष्ठ’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘निष्ठ’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— आत्मनिष्ठ- आत्मा में स्थित (निष्ठ), अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘निष्ठ’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (निष्ठ) को ऐसा स्वतंत्र शब्द माना गया है जिसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘निष्ठ’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘निष्ठ’ शब्द को विशेषण माना गया है। अतः ‘निष्ठ’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— आत्मनिष्ठ- आत्मा में स्थित (निष्ठ), अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| आत्मनिष्ठ | आत्मा में निष्ठ (स्थित) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ईश्वरनिष्ठ | ईश्वर में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| एकनिष्ठ | एक में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| कर्त्तव्यनिष्ठ | कर्त्तव्य में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ज्ञाननिष्ठ | ज्ञान में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| तपोनिष्ठ | तप में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| धर्मनिष्ठ | धर्म में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ध्याननिष्ठ | ध्यान में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ब्रह्मनिष्ठ | ब्रह्म में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| योगनिष्ठ | योग में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| राजनिष्ठ | राज्य/राजा में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| वस्तुनिष्ठ | वस्तु में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| संस्कृतनिष्ठ | संस्कृत में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सत्यनिष्ठ | सत्य में निष्ठ | अधिकरण तत्पुरुष समास |
पर
- चिंतापर, तत्पर, दैवपर, धर्मपर, नियमपर, सत्यपर, स्त्रीपर, सुखपर, स्वार्थपर
- व्युत्पत्ति— पृ (धातु) + अप् (प्रत्यय), कर्तरि अच् वा = पर। अर्थ— आश्रित, आधारित, प्रवृत्त, लीन, तत्पर। ‘पर’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘पर’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— चिंतापर- चिंता में पर (लीन/मग्न); अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘पर’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (पर) को ऐसा स्वतंत्र शब्द माना गया है जिसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘पर’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में पर को प्रत्यय बताया गया है; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में प्रवृत्त, लीन और तत्पर के अर्थ में इसे सामासिक शब्द में प्रयुक्त होना बताया गया है। अतः ‘पर’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— चिंतापर- चिंता में पर (लीन/मग्न); अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| चिंतापर | चिंता में पर (लीन/मग्न) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| तत्पर | तद् (उस कार्य) में पर (लगा हुआ) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| दैवपर | दैव (भाग्य) पर निर्भर | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| धर्मपर | धर्म में पर (अडिग/प्रधान) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| नियमपर | नियम में पर (स्थित) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सत्यपर | सत्य में पर (अडिग) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| स्त्रीपर | स्त्री में पर (आसक्त) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सुखपर | सुख में पर (लीन/केंद्रित) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| स्वार्थपर | स्वार्थ में पर (लीन/डूबा हुआ) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
परक
- अध्यात्मपरक, आत्मपरक, ऐहिकतापरक, चिंतापरक, तथ्यपरक, तर्कपरक, रचनापरक, शिक्षापरक, सौंदर्यपरक, स्वार्थपरक
- व्युत्पत्ति— पर + क (प्रत्यय) = परक। अर्थ— ‘से संबंधित’, ‘पर आधारित’, ‘के स्वरूप वाला’ या ‘की प्रधानता वाला’। ‘परक’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘परक’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘परक’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में ‘परक’ को प्रत्यय बताया गया है; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में परक का पृथक समावेश नहीं मिलता है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में परक को विशेषण माना गया है। अतः ‘परक’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— तथ्यपरक- तथ्य पर आधारित, अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अध्यात्मपरक | अध्यात्म पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| आत्मपरक | आत्म (स्वयं) पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ऐहिकतापरक | ऐहिकता (सांसारिकता) पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| चिंतापरक | चिंता पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| तथ्यपरक | तथ्य पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| तर्कपरक | तर्क पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| रचनापरक | रचना (निर्माण) पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| शिक्षापरक | शिक्षा पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सौंदर्यपरक | सौंदर्य पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| स्वार्थपरक | स्वार्थ पर आधारित | अधिकरण तत्पुरुष समास |
परायण
- अर्थपरायण, ईश्वरपरायण, कर्त्तव्यपरायण, धर्मपरायण, नीतिपरायण, न्यायपरायण, प्रेमपरायण, भक्तिपरायण, विषयपरायण, सत्यपरायण, सेवापरायण, स्वार्थपरायण
- व्युत्पत्ति— पर + अयन = परायण। अर्थ— ‘लगा हुआ, ‘अति आसक्त, ‘निरत’, ‘लीन’ या ‘निष्ठा’। ‘परायण’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘परायण’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— धर्मपरायण- धर्म में परायण (निष्ठा), अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘परायण’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘परायण’ को ऐसा स्वतंत्र शब्द माना गया है जिसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम मिलता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘परायण’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में ‘परायण’ को विशेषण बताया गया है; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में ‘परायण’ को विशेषण और संज्ञा दोनों श्रेणियों में रखा गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’— में ‘परायण’ को विशेषण माना गया है। अतः ‘परायण’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— धर्मपरायण- धर्म में परायण (निष्ठा), अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| अर्थपरायण | अर्थ (धन) में परायण | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| कर्त्तव्यपरायण | कर्त्तव्य में परायण (निष्ठा) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| ईश्वरपरायण | ईश्वर में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| धर्मपरायण | धर्म में परायण (निष्ठा) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| नीतिपरायण | नीति (नियमों) में परायण | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| न्यायपरायण | न्याय में परायण | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| प्रेमपरायण | प्रेम में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| भक्तिपरायण | भक्ति में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| विषयपरायण | विषयों (इन्द्रिय सुखों) में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सत्यपरायण | सत्य में परायण (निष्ठा) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सेवापरायण | सेवा में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| स्वार्थपरायण | स्वार्थ में परायण (लीन) | अधिकरण तत्पुरुष समास |
पुर
- पुर स्वतंत्र शब्द है। यह ‘पृ’ धातु से बना है।
- उदयपुर, अंतःपुर, जनकपुर, नागपुर, प्रेतपुर, भोजपुर, मणिपुर, यमपुर, राजपुर, हस्तिनापुर, शृंगवेरपुर, इंद्रपुरी, जनकपुरी
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में पुर से निर्मित कई शब्दों का उदाहरण देते हुए इसे (पुर) ‘अधिकरण (पात्र और स्थान) बोधक संज्ञा बनानेवाला बताया गया है।
- उपर्युक्त में से अधिकांश तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं। उदयपुर का विग्रह “(राणा) उदय (सिंह) का नगर” – सम्बन्ध तत्पुरुष अथवा “(राणा) उदय (सिंह) द्वारा (बसाया गया) पुर” – करण तत्पुरुष। इसी तरह अन्य का भी विग्रह किया जा सकता है। हाँ ‘अंतःपुर’ में अंतः उपसर्ग है, इसलिए यह उपसर्ग निर्मित शब्द है। यह बात स्वयं डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में मिलती है, वे अंतः से निर्मित कई उदाहरण देते हैं। साथ ही अंतर् (अंतः) को कामताप्रसाद कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में भी उपसर्ग माना गया है।
पूर्वक
- पूर्वक स्वतंत्र शब्द है। (संज्ञा से क्रिया-विशेषण)
- आग्रहपूर्वक, आदरपूर्वक, आनंदपूर्वक, उत्साहपूर्वक, औचित्यपूर्वक, कुशलपूर्वक, दयापूर्वक, दृढ़तापूर्वक, ध्यानपूर्वक, नम्रतापूर्वक, निश्चयपूर्वक, न्यायपूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक, यत्नपूर्वक, युक्तिपूर्वक, विचारपूर्वक, विधिपूर्वक, शपथपूर्वक, शांतिपूर्वक, शिष्टतापूर्वक, श्रद्धापूर्वक, सहृदयतापूर्वक, सुखपूर्वक, सुगमतापूर्वक, सुविधापूर्वक, हठपूर्वक।
- टिप्पणी— व्युत्पत्ति : पूर्व + क (कन् प्रत्यय) = पूर्वक। यह (पूर्वक) एक स्वतंत्र शब्द है, यह शब्द के साथ संयुक्त होकर समास शब्द बनायेगा न कि प्रत्यय निर्मित शब्द। यह शब्द से संयुक्त होकर ‘साथ’ या ‘सहित’ का अर्थ देता है; जैसे— आदरपूर्वक – आदर के साथ। पूर्वक से निर्मित उपर्युक्त शब्द ‘अव्ययीभाव समास’ से उदाहरण हैं। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में हमें विरोधाभासी मत मिलता है— पूर्वक से निर्मित शब्द को जहाँ एक ओर अव्ययीभाव समास बताया गया है और कृपापूर्वक, ध्यानपूर्वक, श्रद्धापूर्वक के उदाहरण भी दिये गये हैं; वहीं -पूर्वक को प्रत्यय मानकर क्रिया-विशेषण बनानेवाला प्रत्यय बताया गया है और ढेरों उदाहरण दिये गये हैं। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ में -पूर्वक को प्रत्यय मारकर आदरपूर्वक का उदाहरण दिया गया है। वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश’ में पूर्ण शब्द मानते हुए समास के अन्त में लगनेवाला माना गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘पूर्वक’ का प्रत्यय के अंतर्गत विवरण नहीं मिलता है।
प्रद
- आरोग्यप्रद, आनंदप्रद, कष्टप्रद, कामप्रद, खेदप्रद, जीवनप्रद, ज्ञानप्रद, दुःखप्रद, फलप्रद, भयप्रद, मंगलप्रद, मोक्षप्रद, मोदप्रद, लाभप्रद, शांतिप्रद, शिक्षाप्रद, संतोषप्रद, सिद्धिप्रद, सुखप्रद, स्वास्थ्यप्रद
- व्युत्पत्ति— प्र (उपसर्ग) + दा (धातु) + क (प्रत्यय) = प्रद। अर्थ— ‘देने वाला’ या ‘प्रदान करने वाला’। ‘प्रद’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘प्रद’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। साथ ही इसी कृति में बाहरी जी इससे निर्मित शब्द को ‘उपपद तत्पुरुष’ समास भी बताते हैं। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘प्रद’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ में ‘प्रद’ को विशेषण बताया गया है; श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में ‘प्रद’ को विशेषण बताया गया है और कहा गया है कि ‘इस शब्द का प्रयोग सदा यौगिक शब्दों के अंत में होता है।’ R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘प्रद’ को प्रत्यय मानते हुए कहा गया है कि यह संज्ञा से जुड़कर विशेषण बनाता है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘प्रद’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। इससे निर्मित शब्द उपपद तत्पुरुष के उदाहरण है, हाँ विग्रह के आधार पर तत्पुरुष के अन्य भेद भी सकते हैं। विग्रह— सुखप्रद- कष्ट प्रदान करनेवाला (उपपद तत्पुरुष समास); सुख को प्रदान करनेवाला (कर्म तत्पुरुष समास)। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| आरोग्यप्रद | आरोग्य प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| आनंदप्रद | आनंद प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| कष्टप्रद | कष्ट प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| कामप्रद | काम (कामनाओं) को पूरा करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| खेदप्रद | खेद (अफसोस) उत्पन्न करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| जीवनप्रद | जीवन प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| ज्ञानप्रद | ज्ञान प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| दुःखप्रद | दुःख प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| फलप्रद | फल (परिणाम) प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| भयप्रद | भय प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| मंगलप्रद | मंगल (कल्याण) प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| मोक्षप्रद | मोक्ष प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| मोदप्रद | मोद (हर्ष) प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| लाभप्रद | लाभ प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| शांतिप्रद | शांति प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| शिक्षाप्रद | शिक्षा प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| संतोषप्रद | संतोष प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| सिद्धिप्रद | सिद्धि प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| सुखप्रद | सुख प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
| स्वास्थ्यप्रद | स्वास्थ्य प्रदान करने वाला | उपपद तत्पुरुष समास |
बद्ध
- अंजलिबद्ध, करबद्ध, कोष्ठबद्ध, क्रमबद्ध, छंदबद्ध, नियमबद्ध, पंक्तिबद्ध, प्रतिज्ञाबद्ध, प्रेमबद्ध, योजनाबद्ध, लिपिबद्ध, लेखबद्ध, वचनबद्ध, शृंखलाबद्ध, श्रेणीबद्ध, श्लोकबद्ध, संघबद्ध, सीमाबद्ध, सूत्रबद्ध
- व्युत्पत्ति— बन्ध् (धातु) + क्त (प्रत्यय) = बद्ध। अर्थ— जिसकी क्रिया, गति, व्यवहार आदि परिमित व व्यवस्थित हो। ‘बद्ध’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बद्ध’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘बद्ध’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’, श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘बद्ध’ को विशेषण बताया गया है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘बद्ध’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अंजलिबद्ध- अंजलि (जुड़े हुए हाथ) से बद्ध; करण तत्पुरुष समास। कोष्ठबद्ध- कोष्ठ (पेट/आंत) में बद्ध; अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह करण तत्पुरुष समास | समास |
| अंजलिबद्ध | अंजलि (जुड़े हुए हाथ) से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| करबद्ध | करों (हाथों) से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| कोष्ठबद्ध | कोष्ठ (पेट/आंत) में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| क्रमबद्ध | क्रम से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| छंदोबद्ध | छंदों से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| नियमबद्ध | नियमों से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| पंक्तिबद्ध | पंक्ति में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| प्रतिज्ञाबद्ध | प्रतिज्ञा से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| प्रेमबद्ध | प्रेम से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| योजनाबद्ध | योजना से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| लिपिबद्ध | लिपि में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| लेखबद्ध | लेख (लिखावट) में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| वचनबद्ध | वचन से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| शृंखलाबद्ध | शृंखला से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| श्रेणीबद्ध | श्रेणियों में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| श्लोकबद्ध | श्लोकों में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| संघबद्ध | संघ में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
| सीमाबद्ध | सीमा से बद्ध | करण तत्पुरुष समास |
| सूत्रबद्ध | सूत्रों में बद्ध | अधिकरण तत्पुरुष समास |
बुद्धि
- धर्मबुद्धि, पापबुद्धि, पुण्यबुद्धि
- बुद्धिबल, बुद्धिहीन
- व्युत्पत्ति— बुध् + क्तिन् = बुद्धि। अर्थ— ज्ञान, प्रज्ञा, समझ। ‘बुद्धि’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘बुद्धि’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— धर्मबुद्धि – धर्म (रत) बुद्धि, कर्मधारय समास। बुद्धिबल – 1. बुद्धि का बल (सम्बन्ध तत्पुरुष समास); 2. बुद्धि ही है बल (कर्मधारय समास)। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
भाव
- कार्य-कारण-भाव, प्रेमभाव, बंधुभाव, बिंब-प्रतिबिंब-भाव, मित्रभाव, शत्रुभाव, स्त्रीभाव
- व्युत्पत्ति— भू + घञ् = भाव। अर्थ— होना, सत्ता, अस्तित्व; स्थिति, अवस्था। ‘भाव’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘भाव’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— प्रेमभाव – प्रेम का भाव, सम्बन्ध तत्पुरुष समास। कार्य-कारण-भाव (दो समास) – कार्य और कारण में द्वन्द्व समास; कार्य और कारण का सम्बन्ध (भाव) सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
भेद
- अभेद, अर्थ-भेद, पाठ-भेद, बुद्धिभेद, मतभेद
- भेद-दर्शी, भेद-दृष्टि, भेदपूर्ण, भेद-बुद्धि, भेदभाव, भेदवादी
- व्युत्पत्ति— भिद् + घञ् = भाव। अर्थ— अंतर, प्रकार, रहस्य। ‘भेद’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘भेद’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अभेद – नञ् तत्पुरुष समास। अर्थ-भेद – अर्थ का भेद, सम्बन्ध तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
मात्र
- अर्थ— केवल, सिर्फ
- अंगुलिमात्र, अणुमात्र, एकमात्र, किंचिन्मात्र, क्षणमात्र, तिलमात्र, नाममात्र, पलमात्र, पुरुषमात्र, बालमात्र, लेशमात्र, साक्षिमात्र
- टिप्पणी— व्युत्पत्ति : मा + त्र (त्रन् प्रत्यय) = मात्र। ‘मात्र’ एक स्वतंत्र शब्द है, अतएव इससे निर्मित शब्द भी समास के उदाहरण हैं, संस्कृत भाषा में इसे ‘मयूरव्यंसकादि’ तत्पुरुष समास माना गया है। परन्तु हिन्दी में ‘मात्र’ का व्यवहार प्रत्ययवत् है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे प्रत्यय माना गया है।
युत
- अयुत, धर्मयुत, श्रीयुत
- व्युत्पत्ति— यु + क्त = युत (
युत्)। अर्थ— से युक्त या सहित, सम्मिलित। ‘युत’ एक स्वतंत्र शब्द है। अतः ‘युत’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अयुत – न युत, नञ् तत्पुरुष समास। धर्मयुत – धर्म से युत, करण तत्पुरुष समास। श्रीयुत— श्री से युत, करण तत्पुरुष समास।
रहित
- क्रमरहित, गुणरहित, चिंतारहित, ज्ञानरहित, धनरहित, धैर्यरहित, प्रेमरहित, भावरहित, मूल्यरहित, विवेकरहित, वीर्यरहित, संस्काररहित, सत्त्वरहित
- व्युत्पत्ति— रह् कर्मणि क्त; रह् (धातु) + क्त (प्रत्यय) = रहित। अर्थ— विहीन, अभाव। ‘रहित’ एक स्वतंत्र शब्द है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘रहित’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— गुणरहित- गुण से रहित; करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बद्ध’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। अपनी इसी कृति में बाहरी जी रहित से निर्मित ‘धनरहित’ को करण तत्पुरुष मानते हैं, यह विरोधाभासी है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘रहित’ को ऐसा शब्द बताया गया है जिसका प्रयोग स्वतंत्ररूप से बहुत कम होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘रहित’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’, श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘रहित’ को विशेषण बताया गया है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘रहित’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— गुणरहित- गुण से रहित; करण तत्पुरुष समास। ‘से’ कारक चिह्न करण और अपादान दोनों का है। ‘से रहित’ को अलगाव के अर्थ में लेने पर अपादान तत्पुरुष समास होगा, साधन के अभाव के रूप में अर्थ करेंगे तो करण तत्पुरुष समास होगा। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| क्रमरहित | क्रम से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| गुणरहित | गुणों से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| चिंतारहित | चिंता से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| ज्ञानरहित | ज्ञान से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| धनरहित | धन से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| धैर्यरहित | धैर्य से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| प्रेमरहित | प्रेम से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| भावरहित | भाव से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| मूल्यरहित | मूल्यों से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| विवेकरहित | विवेक से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| वीर्यरहित | वीर्य (शक्ति/तेज) से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| संस्काररहित | संस्कारों से रहित | करण तत्पुरुष समास |
| सत्त्वरहित | सत्त्व (सार/प्राण) से रहित | करण तत्पुरुष समास |
रूप
- अनुरूप, अग्निरूप, देवरूप, नररूप, मायारूप, वायुरूप
- व्युत्पत्ति— रूप् + क, भावे अच् वा = रूप। अर्थ— आकृति, स्वभाव, प्रकार। ‘रूप’ एक स्वतंत्र शब्द है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘रूप’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— अनुरूप – गुण से रहित; अव्ययीभाव समास। अग्निरूप – अग्नि रूप (सदृश्य या जैसा); कर्मधारय समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
वाद
- भाववाचक संज्ञा
- (अद्वैत से) अद्वैतवाद, (अहिंसा से) अहिंसावाद, (अध्यात्म से) अध्यात्मवाद, आतंकवाद, (आदर्श से) आदर्शवाद, (उपयोगिता से) उपयोगितावाद, (एकेश्वर = एक + ईश्वर से) एकेश्वरवाद, (एकदेव से) एकदेववाद, (गाँधी से) गाँधीवाद, (जाति से) जातिवाद, (द्वैत से) द्वैतवाद, (न्याय से) न्यायवाद, (पलायन से) पलायनवाद, (पूँजी से) पूँजीवाद, (प्रगति से) प्रगतिवाद, (प्रतीक से) प्रतीकवाद, (प्रतिक्रिया से) प्रतिक्रियावाद, प्रयोगवाद, ब्राह्मणवाद, (भाग्य से) भाग्यवाद, (भौतिक से) भौतिकवाद, भोगवाद, (मानवता से) मानवतावाद, (माया से) मायावाद, (यथार्थ से) यथार्थवाद, (रहस्य से) रहस्यवाद, (राष्ट्र) राष्ट्रवाद, (विकास से) विकासवाद, व्यक्तिवाद, समाजवाद, (सामंत से) सामंतवाद, (साम्य से) साम्यवाद, (साम्राज्य से) साम्राज्यवाद।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘वाद’ को प्रत्यय मानते हुए इससे निर्मित ढेरों उदाहरण दिये गये हैं। परन्तु वाद स्वयं में स्वतंत्र शब्द है, इसका प्रमाण हमें कई मानक पुस्तकों से प्राप्त होता है— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में वाद और वादी दोनों का उल्लेख प्रत्यय के रूप में नहीं प्राप्त होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में वाद और वादी दोनों का उल्लेख प्रत्यय के रूप में नहीं प्राप्त होता है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल: हिन्दी शब्दकोश’ में वाद को स्वतंत्र शब्द माना गया है, इसे संस्कृत का शब्द मानते हुए संज्ञा (पुल्लिंग) बताते हुए अर्थ दिया गया है। R. S. McGregor कृत ‘Oxford : Hindi-English Dictionary’ में वाद को संस्कृत का संज्ञा (पुल्लिंग) शब्द मानकर अर्थ दिया है। श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में वाद को संस्कृत का संज्ञा (पुल्लिंग) शब्द मानकर अर्थ दिया है। इसलिए इसका (वाद) योग किसी स्वतंत्र शब्द से होने पर निर्मित शब्द समास का उदाहरण होगा न कि प्रत्यय-निर्मित शब्द का।
- व्युत्पत्ति— वाद = वद् + अ (घञ्-प्रत्यय); अर्थ— सिद्धांत या विचार। वाद से निर्मित ये सभी शब्द तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं। अद्वैतवाद = अद्वैत का सिद्धांत (वाद); सम्बंध तत्पुरुष। अहिंसावाद = अहिंसा का सिद्धांत (वाद); सम्बंध तत्पुरुष। इसी तरह अन्य का भी विग्रह किया जा सकता है।
| सामासिक पद (शब्द) | समास-विग्रह | समास का नाम |
| अद्वैतवाद | अद्वैत का वाद (सिद्धांत) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| अहिंसावाद | अहिंसा का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| अध्यात्मवाद | अध्यात्म का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| आतंकवाद | आतंक का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| आदर्शवाद | आदर्श का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| उपयोगितावाद | उपयोगिता का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| एकेश्वरवाद | एक ईश्वर का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| एकदेववाद | एक देव का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| गाँधीवाद | गाँधी का वाद (विचारधारा) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| जातिवाद | जाति का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| द्वैतवाद | द्वैत का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| न्यायवाद | न्याय का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| पलायनवाद | पलायन का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| पूँजीवाद | पूँजी का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| प्रगतिवाद | प्रगति का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| प्रतीकवाद | प्रतीक का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| प्रतिक्रियावाद | प्रतिक्रिया का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| प्रयोगवाद | प्रयोग का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| ब्राह्मणवाद | ब्राह्मण का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भाग्यवाद | भाग्य का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भौतिकवाद | भौतिक का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भोगवाद | भोग का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| मानवतावाद | मानवता का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| मायावाद | माया का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| यथार्थवाद | यथार्थ का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| रहस्यवाद | रहस्य का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| राष्ट्रवाद | राष्ट्र का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| विकासवाद | विकास का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| व्यक्तिवाद | व्यक्ति का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| समाजवाद | समाज का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| सामंतवाद | सामंत का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| साम्यवाद | साम्य का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| साम्राज्यवाद | साम्राज्य का वाद | सम्बन्ध तत्पुरुष |
वादी
- विशेषण
- अनीश्वरवादी, अहिंसावादी, आशावादी, आतंकवादी, तथ्यवादी, न्यायवादी, प्रत्यक्षवादी, बुद्धिवादी, ब्राहमणवादी, भाग्यवादी, भोगवादी, भौतिकवादी, मायावादी, यथार्थवादी, समाजवादी, साम्यवादी, सिद्धान्तवादी, स्पष्टवादी
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में वादी को प्रत्यय मानते हुए इससे निर्मित ढेरों उदाहरण दिये गये हैं। परन्तु वादी स्वयं में स्वतंत्र शब्द है, इसलिए इसका योग किसी स्वतंत्र शब्द से होने पर निर्मित शब्द समास का उदाहरण होगा न कि प्रत्यय-निर्मित शब्द का।
- व्युत्पत्ति— वद् + इन् (णिनि प्रत्यय) = वादिन् → वादी; अर्थ— मतानुयायी, माननेवाला, मत-समर्थक
| सामासिक पद | समास-विग्रह | समास का नाम |
| अनीश्वरवादी | अनीश्वरवाद का समर्थक (वादी) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| अहिंसावादी | अहिंसावाद का समर्थक/अनुयायी (वादी) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| आशावादी | आशावाद (विचार) को माननेवाला | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| आतंकवादी | आतंकवाद को माननेवाला | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| तथ्यवादी | तथ्य का वादी (समर्थक) | उपपद तत्पुरुष |
| न्यायवादी | न्याय का वादी (समर्थक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| प्रत्यक्षवादी | प्रत्यक्ष का वादी (समर्थक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| बुद्धिवादी | बुद्धि का वादी (समर्थक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| ब्राह्मणवादी | ब्राह्मणवाद का समर्थक (वादी) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भाग्यवादी | भाग्य का वादी (समर्थक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भोगवादी | भोग का वादी (समर्थक) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| भौतिकवादी | भौतिकवाद का अनुयायी (वादी) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| मायावादी | मायावाद (सिद्धांत) का समर्थक (वादी) | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| यथार्थवादी | यथार्थवाद का समर्थक | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| समाजवादी | समाजवाद का समर्थक | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| साम्यवादी | साम्यवाद का अनुयायी | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| सिद्धान्तवादी | सिद्धांतवाद का अनुयायी | सम्बन्ध तत्पुरुष |
| स्पष्टवादी | स्पष्ट बोलने वाला (स्पष्टं वदति इति) | उपपद तत्पुरुष |
विद् / वेत्ता
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- हिंदी में ‘प्रत्यय-सदृश’ प्रयोग
- अर्थ— विशेषज्ञ, पंडित। विद् – जाननेवाला। वेत्ता – गहन ज्ञाता/विशेषज्ञ
- अर्थवेत्ता, इतिहासविद्, इतिहासवेत्ता, कलाविद्, जीवाणुविद्, तत्त्वविद्, तत्त्ववेत्ता, धर्मवेत्ता, नीतिविद्, न्यायवेत्ता, प्राच्यवेत्ता, भाषाविद्, मंत्रविद्, विधिवेत्ता, वेदवेत्ता, शास्त्रविद्, शास्त्रवेत्ता
- टिप्पणी— संस्कृत भाषा में विद् और वेत्ता दोनों स्वतंत्र शब्द हैं, प्रत्यय नहीं। इसलिए इतिहासविद् (इतिहास + विद्) या इतिहासवेत्ता (इतिहास + वेत्ता) जैसे शब्द समास के उदाहरण हैं, प्रत्यय के नहीं। हिन्दी भाषा में विद् और वेत्ता का स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता, वरन् ‘प्रत्यय-सदृश’ प्रयोग होता है। यह शब्द न होकर एक शब्दांश की तरह प्रयुक्त होकर प्रत्यय की तरह व्यवहृत होकर नये-नये शब्द निर्माण में सहायक है। इसलिए हिन्दी में हम कहीं-कहीं व्यावहारिक दृष्टि से विद् व वेत्ता को प्रत्यय के अंतर्गत वर्गीकृत पाते हैं। परन्तु पारम्परिक (रूपात्मक) दृष्टि से ये विद् और वेत्ता प्रत्यय नहीं हैं।
विषयक
- कलाविषयक, धर्मविषयक, नीतिविषयक, परिवहनविषयक, प्रमाणविषयक, युद्धविषयक, विधिविषयक, साहित्यविषयक, स्वास्थ्यविषयक
- व्युत्पत्ति— विषय (वि + सि + अच्) + क (प्रत्यय) = विषयक। अर्थ— ‘से संबंधित’, ‘के बारे में’ या ‘के विषय वाला’। ‘विषयक’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बद्ध’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘विषयक’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘विषयक’ को विशेषण बताया गया है; जबकि श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में ‘विषयक’ को अव्यय माना गया है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘विषयक’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— धर्मविषयक- धर्म से सम्बंधित, करण तत्पुरुष समास; धर्म के विषय में (संबंधित), अधिकरण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
शाला
- शाला स्वतंत्र शब्द है। शाला = शाल् + अच् + टाप्।
- अर्थ— भवन, कक्ष, प्रकोष्ठ
- अतिथिशाला, अश्वशाला, कार्यशाला, गोशाला, चित्रशाला, धर्मशाला, नाट्यशाला, पाठशाला, प्रयोगशाला, भोजनशाला, मधुशाला, यज्ञशाला, व्यायामशाला, शिल्पशाला, शिशुशाला
- टिप्पणी— ये शब्द तत्पुरुष समास के उदाहरण है, न कि प्रत्यय निर्मित। पाठशाला का विग्रह ‘पाठ की शाला’ (सम्बन्ध तत्पुरुष) अथवा ‘पाठ के लिए शाला’ (सम्प्रदान तत्पुरुष)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करके समास को पहचाना जा सकता है।
शील
- कर्मशील, दानशील, धर्मशील, पंचशील, पुण्यशील, विचारशील, सहनशील
- व्युत्पत्ति— शील् + अच् = शील। अर्थ— स्वभाव, चरित्र, सद्गुण। ‘शील’ एक स्वतंत्र शब्द है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘शील’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— कर्मशील – कर्म ही है शील (स्वभाव) जिसका; कर्मधारय समास। पंचशील – पांच शीलों (आचरणों) का समाहार; द्विगु समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
शाली
- ऐश्वर्यशाली, गौरवशाली, प्रतिभाशाली, प्रभावशाली, बलशाली, बुद्धिशाली, भाग्यशाली, महत्त्वशाली, वीर्यशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली, सत्त्वशाली
- व्युत्पत्ति— शाला + इनि (प्रत्यय) = शालिन् → शाली। अर्थ— युक्त, सहित। शाली एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— गौरवशाली = गौरव से युक्त- तत्पुरुष समास (करण)। यदि शाल् (धातु) + इनि (प्रत्यय) = शालिन् → शाली, अर्थात् यह कृदंत हुआ; इस अर्थ में इससे निर्मित शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हुए। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह किया जा सकता है।
- श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में इसको विशेषण मानते हुए स्पष्टरूप से कहा गया है कि युक्त और सहित के अर्थ में ‘प्रायः समास में प्रयुक्त’; वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी’ में इसको विशेषण मानते हुए ‘बहुधा समास के अन्त में’ प्रयुक्त माना गया है; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ में इसे विशेषण बताया गया है; डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में यह (शाली) प्रत्यय की सूची में नहीं मिलता है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में इसे (शाली) प्रत्यय मानकर कई उदाहरण दिये हैं; कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में पहले स्पष्टीकरण दिया गया है कि ‘संस्कृत में कई ऐसे शब्द हैं, जो उपसर्ग अथवा प्रत्यय की तरह प्रयुक्त होते हैं। यद्यपि इन शब्दों का स्वतंत्र अर्थ रहता है, जिसके कारण इन्हें शब्द कहते हैं, तथापि इनका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है।’ साथ ही शब्दों की एक लम्बी सूची देते हैं और कहते हैं कि ‘जिन शब्दों के पूर्व * चिह्न लगा है उनका प्रयोग बहुधा प्रत्ययों ही के समान होता है।’ ‘शाली’ शब्द सूची में शामिल है और तारांकित (*) है। हिन्दी में शाली का प्रयोग स्वतंत्र रूप से न के बराबर है। शब्दों के साथ निरंतर प्रयोग के कारण यह ‘प्रत्ययवत्’ व्यवहार करने लगा है। लेकिन व्याकरण की दृष्टि से इसके अन्य शब्द के साथ संयोग से समास शब्द निर्मित होते हैं; जैसे— गौरवशाली = गौरव से युक्त- तत्पुरुष समास (करण)। यदि शाल् (धातु) + इनि (प्रत्यय) = शालिन् → शाली, अर्थात् यह कृदंत हुआ; इस अर्थ में इससे निर्मित शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हुए। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह किया जा सकता है। प्रतिभाशालिन् (प्रातिपादिक) → प्रतिभाशाली (पुल्लिंग) → प्रतिभाशालिनी (स्त्रीलिंग)। अन्य शब्दों को भी इसी तरह स्त्रीलिंग बनाया जा सकता है।
शून्य
- अर्थशून्य, ज्ञानशून्य, दयाशून्य, द्रव्यशून्य
- शून्यदृष्टि, शून्यमय, शून्यहृदय
- व्युत्पत्ति— शून + यत् = शून्य। अर्थ— रिक्त, एकान्त, विहीन। शून्य एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— अर्थशून्य = अर्थ से शून्य – तत्पुरुष समास (अपादान)। शून्यमय = शून्य से मय (युक्त) – तत्पुरुष समास (करण)। शून्यहृदय = शून्य है हृदय जिसका वह – बहुव्रीहि समास। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
शूर
- आरम्भशूर, कर्मशूर, दानशूर, रणशूर, शब्दशूर
- व्युत्पत्ति— शूर् + अच् = शून्य। अर्थ— पराक्रमी, वीर; प्रवीण; बढ़ा-चढ़ाकर। शूर एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— आरम्भशूर = आरम्भ में शूर – तत्पुरुष समास (अधिकरण)। कर्मशूर = कर्म में शूर – तत्पुरुष समास (अभिकरण)। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
संगत
- असंगत, जातिसंगत, तर्कसंगत, न्यायसंगत, युक्तिसंगत, विधिसंगत, विधिसंगत, विसंगत, शास्त्रसंगत, सर्वसंगत, सुसंगत
- व्युत्पत्ति— सम् (उपसर्ग) + गम् (धातु) + क्त (प्रत्यय) = संगत। अर्थ— ‘मिला हुआ’, ‘उपयुक्त’, ‘अनुरूप’, ‘साथ चलनेवाला’। ‘संगत’ एक स्वतंत्र शब्द है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बद्ध’ को अर्धप्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘संगत’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोशֺ’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’— में ‘संगत’ को विशेषण बताया गया है; जबकि श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में ‘संगत’ को विशेषण और संज्ञा माना गया है। शब्द रचना की दृष्टि से ‘संगत’ जब किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तब सामासिक शब्द का निर्माण होगा न कि प्रत्यय शब्द बनेगा। विग्रह— असंगत- असंगत, नञ् तत्पुरुष समास। तर्कसंगत- जाति से संगत, करण तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करते हुए समास पहचाना जा सकता है।
| सामासिक पद | विग्रह | समास |
| असंगत | न संगत | नञ् तत्पुरुष समास |
| जातिसंगत | जाति से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| तर्कसंगत | तर्क से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| न्यायसंगत | न्याय से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| युक्तिसंगत | युक्ति से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| विधिसंगत | विधि से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| विसंगत | विशेष रूप से जो संगत न हो | नञ् तत्पुरुष समास |
| शास्त्रसंगत | शास्त्र से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| सर्वसंगत | सर्व (सब) से संगत | करण तत्पुरुष समास |
| सुसंगत | सु (अच्छी तरह) से संगत | करण तत्पुरुष समास |
साध्य
- कष्टसाध्य, द्व्यसाध्य, यत्नसाध्य
- व्युत्पत्ति— साध् + णिच् + यत् = साध्य। अर्थ— किये जाने योग्य, साधन के योग्य। साध्य एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— कष्टसाध्य = कष्ट (कठिनाई) से साध्य (किया हुआ) – तत्पुरुष समास (करण)। इसी तरह अन्य शब्दों का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
स्थ
- अंकस्थ, अंतस्थ, आत्मस्थ, उदरस्थ, कंठस्थ, गृहस्थ, तटस्थ, ध्यानस्थ, प्रकृतिस्थ, मार्गस्थ, स्वस्थ, हृदयस्थ
- व्युत्पत्ति— स्था + क = स्थ। अर्थ— किये जाने योग्य, साधन के योग्य। साध्य एक स्वतंत्र कृदंत शब्द है। ऐसे कृदंत शब्द जो स्वतंत्र रूप से व्यवहृत नहीं होते वे अन्य शब्द के उत्तर में जुड़कर ‘उपपद तत्पुरुष समास’ बनाते हैं। हाँ यदि इसे इस तरह विग्रह किया जाये – हृदयस्थ – हृदय में स्थित, तो अधिकरण तत्पुरुष समास होगा।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘स्था’ को बहुधा प्रत्यय के समान प्रयुक्त होनेवाला माना गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी-शब्दकोश’ में ‘स्था’ को प्रत्यय बताया गया है। दूसरी ओर वामन शिवराम आप्टे कृत ‘संस्कृत-हिन्दी-शब्दकोश’ में ‘स्था’ को ‘समास के अन्त में प्रयुक्त’ होनेवाला बताया गया है।
हत
- हतप्रभ, हतबुद्धि, हतभाग्य, हतवीर्य, हतश्री, हताश
- व्युत्पत्ति— हन् + क्त = स्थ। अर्थ— वध किया गया; वंचित, रहित। हत एक स्वतंत्र शब्द है। विग्रह— हतश्री – श्री (वैभव) से हत (रहित), तत्पुरुष समास (अपादान)। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
हर / हरण / हर्ता / हारक / हारी
- हरण के अर्थ में—
- कष्टहर, जीवनहर, दुःखहर (दुःखहरन), पापहर, मनहर (मनोहर), रोगहर, विघ्नहर, सुखहर
- अपहरण, कन्या-हरण, ज्वर-हरण, पाप-हरण, प्राण-हरण, वस्त्र-हरण, सीता-हरण
- अपहर्ता, दोषहर्ता, दुःखहर्ता
- वातहारक
- तापहारी, श्रमहारी
- घर / स्थान के अर्थ में— खंडहर, (छूत से) छुतहर, नैहर, (पिता अर्थात् पी से) पीहर
- टिप्पणी— नैहर- ज्ञातिगृह (संस्कृत) का तद्भव रूप। पीहर- पितृगृह (संस्कृत) का तद्भव रूप।
- व्युत्पत्ति— हर (संस्कृत, विशेषण)— हृ + अ (अच्) = हर। हरण (संस्कृत, संज्ञा)— हृ + ल्युट् = हरण। हर्ता (संस्कृत, विशेषण)— हृ + तृच् = हर्तृ → हर्ता। हारक (संस्कृत, विशेषण)— हृ + ण्वुल् = हारक। हारी (संस्कृत, विशेषण)— हृ + णिनि = हारिन् → हारी। ये सभी स्वतंत्र शब्द हैं।
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘हर’ को ऐसा स्वतंत्र शब्द माना गया है, जिसका स्वतंत्र प्रयोग बहुत कम होता है। यह टिप्पणी वे ‘संस्कृत’ प्रत्यय के अन्तर्गत देते हैं और इसी के तहत “हर्ता, हारक और हारी’ को भी शामिल कर लेते हैं और उदाहरण देते हैं— पापहर, रोगहर, दुःखहर, दोषहर्ता, श्रमहारी, तापहारी, वातहारक। यही विद्वान ‘हर’ को हिन्दी प्रत्यय के अन्तर्गत भी सम्मिलित करते हैं और कई उदाहरण देते हैं— (घर के अर्थ में) कठहरा, खंडहर, नैहर, पीहर। वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘हर’ को हिन्दी-प्रत्यय माना गया है और उससे निर्मित शब्द ‘छुतहर’ का उदाहरण दिया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में हर से निर्मित मनोहर शब्द को कर्म-तत्पुरुष माना गया है। हिन्दी शब्दकोशों में हर को प्रत्यय नहीं माना गया है— इसके कई अर्थ मिलते हैं; 1. हर (फारसी, विशेषण)- अर्थ, प्रत्येक, इससे कई शब्द बनते हैं, जैसे— हर-एक, हरकारा। 2. हर (हिन्दी-बोली, संज्ञा)- अर्थ, हल। 3. हर (संस्कृत, संज्ञा)- अर्थ, शिव। 4. हर (संस्कृत, विशेषण)- अर्थ, हरण करनेवाला— इससे कई शब्द बनते हैं, जैसे— रोगहर, पापहर। इस तरह शब्द निर्माण की दृष्टि से विचार करने पर ‘हर’ एक स्वतंत्र शब्द है अतएव जब यह किसी स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो सामासिक शब्द बनेगा; जैसे— मनोहर अर्थात् मन को हरने वाला (कर्मतत्पुरुष समास); इसी तरह रोगहर, पापहर इत्यादि का भी विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
हीन
- अंगहीन, उत्साहहीन, कर्महीन, बुद्धिहीन, कुलहीन, गुणहीन, धनहीन, मतिहीन, विद्याहीन, शक्तिहीन
- हीनकर्म, हीनज, हीनबुद्धि, हीनकुल, हीनमति, हीनयान, हीनयोनि, हीनावस्था
- व्युत्पत्ति— हा + क्त, तस्य नः इत्वम् = ही (हा → ही) + न (क्त → त → न) = हीन। अर्थ— रहित, वंचित। विग्रह— अंगहीन – अंग से हीन (वंचित), अपादान तत्पुरुष समास। हीनकर्म – हीन कर्म, कर्मधारय समास। हीनज – हीन जन्मा (ज, कृदंत जिसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता), उपपद तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान कर सकते हैं।
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