कृत प्रत्यय
अ
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (उबालना से) उबाल, (काटना से) काट, (खीझना से) खीझ, (खेलना से) खेल, (घेरना से) घेर, (चमकना से) चमक, (चीखना से) चीख, (छाँटना से) छाँट, (जाँचना से) जाँच, (जीतना से) जीत, (ढालना से) ढाल, (दमकना से) दमक, (नापना से) नाप, (पहचानना से) पहचान, (पहुँचना से) पहुँच, (पुकारना से) पुकार, (पेरना से) पेर, (फूटना से) फूट, (बोलना से) बोल, (भूलना से) भूल, (मटकना से) मटक, (माँगना से) माँग, (मापना से) माप, (मारना से) मार, (लटकना से) लटक, (लूटना से) लूट, (समझना से) समझ, (सीखना से) सीख, (हारना से) हार। संयुक्त शब्द हैं— (उछलना-कूदना से) उछल-कूद, (खेलना-कूदना से) खेल-कूद, (चीरना-फाड़ना से) चीर-फाड़, भूल-चूक, (देखना-भालना से) देख-भाल, (रोकना-टोकना से) रोक-टोक, (डाँटना-डपटना से) डाँट-डपट, (मापना-तौलना से) माप-तौल, (काटना-छाँटना से) काट-छाँट इत्यादि।
- किसी-किसी उपान्त्य ह्रस्व ‘इ’ और ‘उ’ का गुणादेश हो जाता है; जैसे— (झुकना से) झोक, (मिलना से) मेल, (लिखना से) लेख, (हिलना से) हेल। संयुक्त शब्द हैं— (मिलना-जुलना से) मेल-जोल, (हिलना-मिलना से) हेल-मेल
- कहीं-कहीं धातु में उपान्त्य में ‘अ’ का वृद्धि होती है; जैसे— (अड़ना से) आड़, (चलना से) चाल, (फटना से) फाट, (बढ़ना से) बाढ़, (लगना से) लाग
- कहीं-कहीं धातु के अन्त्य के ‘ना’ का केवल ‘आ’ हटकर ‘न’ कर देते हैं; जैसे— (गाना से) गान, (देना से) देन, (लेना से) लेन। संयुक्त शब्द हैं— (खाना-पीना से) खान-पान, (वृंद गाना से) वृंद-गान, (लेना-देना से) लेन-देन
- यह प्रत्यय ‘आकारांत’ धातुओं/क्रियाओं में जोड़ा जाता है। “हिन्दी व्याकरण” में इस प्रत्यय का नाम “शून्य” लिखा गया है, जिसका अर्थ है कि धातु में कुछ नहीं जोड़ा जाता और उसीका प्रयोग भाववाचक संज्ञा के समान होता है। हिन्दी में प्रायः क्रिया से “-ना” हटा देने से जो बचता है वह भाववाचक संज्ञा होता है; जैसे— लूटना → लूट।
- क्रिया → विशेषण— (घटना से) घट, (बढ़ना से) बढ़, (भरना से) भर
- क्रिया → पूर्वकालिक कृदंत अव्यय— (चलना से) चल, (जाना से) जा, (देखना से) देख। प्राचीन हिन्दी कविता में इस अव्यय का ‘इकारांत’ रूप पाया जाता है; जैसे— (उठना से) उठि, (देखना से) देखि, (फेंकना से) फेकि। स्वरांत धातुओं के साथ ‘इ’ का बहुधा ‘य’ का आदेश पाया जाता है; जैसे— खाय, गाय।
अक्कड़
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (कूदना से) कुदक्कड़, (घूमना से) घुमक्कड़, (चूकना से) चुक्कड़, (पीना से) पियक्कड़, (बूझना से) बुझक्कड़, (भूलना से) भुलक्कड़।
- टिप्पणी— उपर्युक्त शब्दों में प्रायः स्वर का ‘ह्रस्वीकरण’ हुआ है; जैसे— कूदना + अक्कड़ = कुदक्कड़ (ऊ → उ)।
अंत / अन्त
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (उचाना → उच् से) उचंत, (कूटना से) कुटंत, (गढ़ना से) गढ़ंत, (पीटना से) पिटंत, (पढ़ना से) पढ़ंत, (फलना से) फलंत, (भिड़ना से) भिड़ंत, (रटना से) रटंत, (लगना से) लगंत, (लड़ना से) लड़ंत, (लूटना से) लुटंत, (लिपटना से) लिपटंत।
अंतू
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा
- (घूमना से) घुमंतू, (रटना से) रटंतू
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘तू‘ प्रत्यय के अंतर्गत घुमंतू शब्द दिया गया है।
अन
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (अकड़ना से) अकड़न, (उलझना से) उलझन, (ऐंठना से) ऐंठन, (कुढ़ना से) कुढ़न, (खाना-पीना से) खान-पान, खींच-तान, (गलना से) गलन, (चलना से) चलन, (चुभना से) चुभन, (जलना से) जलन, (टूटना से) टूटन, (तड़पना से) तड़पन, (तुरपना से) तुरपन, (थकना से) थकन, (देना से) देन, (धड़कना से) धड़कन, (बटोरना से) बटोरन, (फिसलना से) फिसलन, (बिछाना से) बिछावन, (लगना से) लगन, लेन, (लेना-देना से) लेन-देन, (सिहरन से) सिहरन, (सूजना से) सूजन।
- (बिछाना से) बिछावन—
- अन और आवन
- तर्क : यहाँ मूल क्रिया ‘बिछाना’ की धातु ‘बिछा’ है। जब इसमें ‘अन’ जुड़ता है, तो शब्द ‘बिछावन’ बनता है।
- प्रक्रिया : यहाँ ‘व’ का आगम (अतिरिक्त जुड़ाव) संधि या उच्चारण की सुगमता के लिए होता है।
- उदाहरण : जैसे ‘सुहा’ + ‘अन’ = सुहावन, ‘लुभा’ + ‘अन’ = लुभावन।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ और ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में ‘अन’ प्रत्यय दिया गया है। जबकि डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ और कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसी को ‘न’ प्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु लिखते हैं— “न प्रत्यय संस्कृत के अन कृदन्त प्रत्यय से निकला है।” R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में ‘अन’ प्रत्यय दिया है और उससे निर्मित चलन, जामन, भोजन और सूजन शब्द के उदाहरण दिये गये हैं।
- क्रिया → करणवाचक संज्ञा
- (जमाना से) जामन, (झाड़ना से) झाड़न, (बेलना से) बेलन
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘अन’ प्रत्यय दिया गया है। इसी तरह डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में इसे ‘न’ प्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसी को ‘न’ प्रत्यय कहा गया है। साथ ही वे लिखते हैं— “न प्रत्यय संस्कृत के अन कृदन्त प्रत्यय से निकला है।”
आ
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (उतारना से) उतारा, (काढ़ना से) काढ़ा, (खटकना से) खटका, (घेरना से) घेरा, (चूमना से) चूमा, (छापना से) छापा, (जोड़ना से) जोड़ा, (झगड़ना से) झगड़ा, (झटकना से) झटका, (झुकना से) झुका, (झोंकना से) (झोंका), (तोड़ना से) तोड़ा, (धकियाना / धक्का देना) धक्का, (धचकना से) धचका, (धड़कना से) धड़का, (फेरना से) फेरा, (रगड़ना से) रगड़ा, (लचकना से) लचका, (सूखना से) सूखा।
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— किसी-किसी धातु के उपान्त्य स्वर में गुणादेश; जैसे— (टूटना से) टोटा, (मिलना से) मेला
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में चटाका (चटाखा) और ठहाका ‘आ’ और ‘आका’ प्रत्यय दोनों के अन्तर्गत मिलता है। (चटकना से) चटाका (चटाखा), (ठहकना से) ठहाका
आ
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा— अंग + रख (रखना) → अंगरखा, कठ (काठ) + फोड़ (फोड़ना) → कठफोड़ा, गाँठ + कट (काटना) → गँठकटा, घुड़ (घोड़ा) + चढ़ (चढ़ना) → घुड़चढ़ा, दे (देना) + वा (आ) → देवा, नक (नाक) + चढ़ (चढ़ना) → नकचढ़ा, नाम + ले (लेना) → नामलेवा, भाड़ + भूँज (भूँजना) → भड़भूँजा, मन + चला (चलना) → मनचला, मिठ (मीठा) + बोल (बोलना) → मिठबोला, ले (लेना) + वा (आ) → लेवा।
- समास में ‘आ’ प्रत्यय के योग से कई कर्तृवाचक संज्ञाएँ बनती हैं।
- अंगरखा – वस्तुवाचक संज्ञा। शेष कर्तृवाचक संज्ञा हैं।
| शब्द | मूल शब्द / धातु | प्रत्यय |
| अंगरखा | अंग + रख (रखना) | आ / –ा |
| कठफोड़ा | कठ (काठ) + फोड़ (फोड़ना) | आ / –ा |
| गँठकटा | गाँठ + कट (काटना) | आ / –ा |
| घुड़चढ़ा | घुड़ (घोड़ा) + चढ़ (चढ़ना) | आ / –ा |
| देवा | दे (देना) + वा (आ) | आ / –ा |
| नकचढ़ा | नक (नाक) + चढ़ (चढ़ना) | आ / –ा |
| नामलेवा | नाम + ले (लेना) | आ / –ा |
| भड़भूँजा | भाड़ + भूँज (भूँजना) | आ / –ा |
| मनचला | मन + चला (चलना) | आ / –ा |
| मिठबोला | मिठ (मीठा) + बोल (बोलना) | आ / –ा |
| लेवा | ले (लेना) + वा (आ) | आ / –ा |
आ
- क्रिया → भूतकालिक कृदंत— (कटना से) कटा, (काटना से) काटा, (खड़ा होना से) खड़ा, (खुलना से) खुला, (खींचना से) खींचा, (गड़ना से) गड़ा, (चढ़ना से) चढ़ा, (जलना से) जला, (ढलना से) ढला, (देना से) दिया, (धोना से) धोया, (पड़ना से) पड़ा, (फटना से) फटा, (बनाना से) बनाया, (बीतना से) बीता, (बैठना से) बैठा, (भूलना से) भूला, (मरना से) मरा, (मरना से) मुआ-लोकभाषा में, (लेना से) लिया, (सिलना से) सिला, (सूखना) सूखा
- देना + आ = दे + आ = देआ → दिया। धोना + आ = धो + आ = धोआ → धोया। लेना + आ = ले + आ = लेआ → लिया।
- क्रिया → भूतकालिक कृदंत (संयुक्त शब्द)— (गलना-सड़ना से) गला-सड़ा, (टूटना-फूटना से) टूटा-फूटा, (भूलना-भटकना से) भूला-भटका
आ
- क्रिया → करणवाचक संज्ञा— (घेरना से) घेरा, (झूलना से) झूला, (झारना से) झारा, (ठेलना से) ठेला, (पोंछना से) पोंछा, (पोतना से) पोता, (फाँसना से) फाँसा
आई
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा। दो प्रकार— 1. कार्य का भाव, 2. कार्य का पारिश्रमिक।
- कार्य का भाव— (उतरना से) उतराई, (काढ़ना से) कढ़ाई, (कातना से) कताई, (कसना से) कसाई, (खुदना/खोदना से) खुदाई, (गोड़ना से) गुड़ाई, (चढ़ना से) चढ़ाई, (चरना से) चराई, (चीरना से) चिराई, (छाँटना से) छँटाई, (छापना से) छपाई, (जोतना → जुतना से) जुताई, (ढालना से) ढलाई, (ढोना से) ढुलाई, (दिखना से) दिखाई, (धुनना से) धुनाई, (धोना → धुलना से) धुलाई, (निराना से) निराई, (पढ़ना से) पढ़ाई, (पीसना से) पिसाई, (पेरना से) पेराई, (बनवाना से) बनवाई, (बुनना से) बुनाई, (भूनना से) भुनाई, (मढ़ना से) मढ़ाई, (मढ़वाना से) मढ़वाई, (रँगना से) रँगाई, (रोना से) रुलाई, (लड़ना से) लड़ाई, (लादना से) लदाई, (लिखना से) लिखाई, (समाना से) समाई, (सिलना से) सिलाई, (सुनना से) सुनाई, (सुनवाना से) सुनवाई, (हँसना से) हँसाई।
- कार्य का पारिश्रमिक— (उतारना से) उतराई, (कढ़ाना से) कढ़ाई, (कताना से) कताई, (कमाना से) कमाई, (कसना से) कसाई, (खिलाना से) खिलाई, (खुदाना से) खुदाई, (खुदवाना से) खुदवाई, (गोड़ना से) गुड़ाई, (चढ़ाना से) चढ़ाई, (चराना से) चराई, (चीरना से) चिराई, (चिरवाना से) चिरवाई, (छाँटना से) छँटाई, (छपाना से) छपाई, (छपवाना से) छपवाई, (जोतना → जुताना से) जुताई, (ढालना से) ढलाई, (ढोना/ढुलाना से) ढुलाई, (दिखाना से) दिखाई, (धुनना से) धुनाई, (धोना → धुलाना से) धुलाई, (निराना से) निराई, (पढ़ाना से) पढ़ाई, (पिसाना से) पिसाई, (पेराना से) पेराई, (बनवाना से) बनवाई, (बुनना से) बुनाई, (बुनवाना से) बुनवाई, (भूनना से) भुनाई, (भुनवाना से) भुनवाई, (मढ़ाना से) मढ़ाई, (मढ़वाना से) मढ़वाई, (रँगना से) रँगाई, (रँगवाना से) रँगवाई, (लदाना से) लदाई, (लिखाना से) लिखाई, (सिलाना से) सिलाई, (सिलवाना से) सिलवाई, (सुनाना से) सुनाई, (सुनवाना से) सुनवाई
- टिप्पणी— रुलाई, लड़ाई, समाई, हँसाई पारिश्रमिक वर्ग में नहीं आते, ये केवल क्रिया से बनी भाववाचक संज्ञाएँ हैं, जो कार्य, स्थिति और मनोभाव को दर्शाती हैं।
- कुछ मूल क्रियाएँ अपने मूल रूप में ही कार्य और पारिश्रमिक दोनों का बोध कराती हैं; जैसे— कसना, ढालना। जबकि कुछ में प्रेरणार्थक क्रिया बनने पर पारिश्रमिक का अर्थ स्पष्ट होता है; जैसे— उतारना, लिखाना।
- इस प्रत्यय से कार्य और कार्य की पारिश्रमिक दोनों के अर्थ व्यक्त होते हैं; जैसे— कताई से कातने का कार्य और कातने की मजदूरी।
- ‘आना से अवाई’ और ‘जाना से जवाई’ भाववाचक संज्ञाएँ ‘क्रिया के व्यापार के अर्थ में’ बनती हैं।
आऊ
- क्रिया → विशेषण— (अगुआना से) अगाऊ, (आना से) आऊ, (आना-जाना से) आऊ-जाऊ, (उठाना से) उठाऊ, (उड़ाना से) उड़ाऊ, (उपजाना से) उपजाऊ, (कमाना से) कमाऊ, (काम-चलाना से) काम-चलाऊ, (गँवाना से) गँवाऊ, (गिराना से) गिराऊ, (चलना/चलाना से) चलाऊ, (जलना/जलाना से) जलाऊ, (जूझना से) जुझाऊ, (टिकना से) टिकाऊ, (दिखना/दिखाना से) दिखाऊ, (फिसलाना से) फिसलाऊ, (बिकाना से) बिकाऊ, (भड़काना से) भड़काऊ।
- अगाऊ— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में अगुआना (क्रिया) से अगाऊ का निर्माण बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में आगे (क्रिया-विशेषण) से अगाऊ शब्द का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में आगा (संज्ञा) से अगाऊ का निर्माण बताया गया है। डॉ॰ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में अग्र (संस्कृत) → अग्ग (प्राकृत) → आगा (हिन्दी), का विकास बताया गया है और इसी आगा में आऊ प्रत्यय के योग से अगाऊ बना है।
- क्रिया → योग्यता के अर्थ में— इस प्रत्यय (आऊ) को कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में योग्यता के अर्थ में प्रयोग बताया गया है; जैसे— (गिरना से) गिराऊ, (चलना से) चलाऊ, (जलना से) जलाऊ, (टिकना से) टिकाऊ, (दिखना से) दिखाऊ, (बिकना से) बिकाऊ।
- क्रिया → कर्तृवाचक— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार ‘आऊ’ प्रत्यय किसी-किसी धातु को कर्तृवाचक शब्द बनाता है— (खाना से) खाऊ, (उड़ाना से) उड़ाऊ, (जुझाना से) जुझाऊ
- टिप्पणी— कोई भी प्रत्यय आधार शब्द (धातु/क्रिया) में लगता है। आधार शब्द हमेशा अकर्मक क्रिया का मूल रूप (धातु) ही होता है। हिन्दी में प्रायः आधार क्रिया धातु में ‘ना’ जोड़ने से प्राप्त होता है; उड़ + ना → उड़ना। अगर इसी में आना जोड़ दे तो प्रेरणार्थक क्रिया प्राप्त होता है; उड़ + आना → उड़ाना। उड़ + आऊ → उड़ाऊ (विशेषण)। यहाँ ‘उड़’ मूल धातु है। व्याकरणिक संरचना में ‘उड़ना’ को ही आधार क्रिया माना जाता है क्योंकि अन्य सभी रूप इसी के अर्थ में वृद्धि या परिवर्तन करके बनाये गये हैं।
- संज्ञा → विशेषण— (पंडित-संज्ञा से) पंडिताऊ
अंकू, आक, आका, आकू
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा
- (उड़ना से) उड़ंकू, उड़ाक, उड़ाकू, (तैरना से) तैराक, तैराकू, (दौड़ना से) दौड़ाक, (पढ़ना से) पढ़ाकू, (पैरना से) पैराक, (लड़ना से) लड़ंकू, लड़ाक, लड़ाका, लड़ाकू।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में “अंकू, आक, आकू” को एक साथ देकर कर्तृवाचक बनानेवाला कृत प्रत्यय बताया गया है। इसी तरह डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में “आक और आका” को, जबकि डॉ॰ हरदेव बाहरी की ही कृति ‘हिन्दी शब्दकोश’ में “आक और आकू” कर्तृवाचक बनानेवाला कृत प्रत्यय बताया गया है। अर्थात् अंकू, आक, आका और आकू से क्रिया से कर्तृवाचक संज्ञा बनता है; जैसे— उड़ना : (उड़ना और आक से) उड़ाक, (उड़ना और आकू से) उड़ाकू और (उड़ना और अंकू से) उड़ंकू। लड़ना : (लड़ना और अंकू से) लड़ंकू, (लड़ना और आक से) लड़ाक, (लड़ना और आका से) लड़ाका, (लड़ना और आकू से) लड़ाकू।
- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ही ‘गौण और फुटकर विशेषण प्रत्यय’ के अन्तर्गत ‘कू’ प्रत्यय से उड़ंकू और लड़ाकू शब्द के निर्माण का उदाहरण मिलता है। परन्तु कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘कू’ प्रत्यय नहीं मिलता है।
आन
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (उठना से) उठान, (उड़ना से) उड़ान, (उफनना से) उफान, (कटना से) कटान, (कातना से) कतान, (कूदना से) कुदान, (चलना से) चलान, (चलाना से) चालान, (चूना से) चुआन, (झपटना से) झपटान, (ढलना से) ढलान, (थकना से) थकान, (दौड़ना से) दौड़ान, (धँसना से) धँसान, (निपटना से) निपटान, (पीसना से) पिसान, (बेचना से) बेचान, (भुगतना से) भुगतान, (मिलना से) मिलान, (मुस्कराना / मुस्काना से) मुस्कान, (रगड़ना से) रगड़ान, (रूझना से) रुझान, (सम से) समान, (लगना/लगाना से) लगान, (लौटना से) लौटान, (सड़ना से) सड़ान।
- यह प्रत्यय दशा या स्थिति का बोध देता है।
आप
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (जलना से) जलापा, (पूजना से) पुजापा, (मिलना से) मिलाप
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आप’ प्रत्यय के अन्तर्गत जलना से जलापा और पूजना से पुजापा का निर्माण बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आपा’ प्रत्यय के अंतर्गत जला से जलापा और पूजा से पुजापा का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में जला से जलापा का निर्माण बताया गया है।
आव
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- अटकाव, अलगाव, उतराव, उलझाव, कटाव, कसाव, घिराव, (घूमना से) घुमाव, (चढ़ना से) चढ़ाव, चुनाव, (छिड़कना से) छिड़काव, छिपाव, (जमना से) जमाव, झुकाव, टकराव, टपकाव, टिकाव, ठहराव, डुबाव, तनाव, थकान, दबाव, दुराव, दोहराव, (पड़ना से) पड़ाव, पथराव, फैलाव, (बचना से) बचाव, बदलाव, बनाव, बरताव, (बहना से) बहाव, बिखराव, रख-रखाव, रुझाव, (रुकना से) रुकाव, (लगना से) लगाव, सजाव, सुझाव, सुलगाव
- (अटकना से) अटकाव, (अलग करना/अलगाना से) अलगाव, (उतरना से) उतराव, (उलझना से) उलझाव, (काटना से) कटाव, (कसना से) कसाव, (घेरना से) घिराव, (घूमना से) घुमाव, (चढ़ना से) चढ़ाव, (चुनना से) चुनाव, (छिड़कना से) छिड़काव, (छिपना/छिपाना से) छिपाव, (जमना/जमाना से) जमाव, (झुकना से) झुकाव, (टकराना से) टकराव, (टपकना से) टपकाव, (टिकना से) टिकाव, (ठहरना से) ठहराव, (डूबना/डुबाना से) डुबाव, (तनना से) तनाव, (थकना से) थकान, (दबना/दबाना से) दबाव, (दूर होना/दुराना से) दुराव, (दोहराना से) दोहराव, (पड़ना से) पड़ाव, (पत्थर मारना/पथराना से) पथराव, (फैलना से) फैलाव, (बचना/बचाना से) बचाव, (बदलना से) बदलाव, (बनना/बनाना से) बनाव, (बरताव करना/बरतना से) बरताव, (बहना से) बहाव, (बिखरना से) बिखराव, (रखना-रखवाना से) रख-रखाव, (रुझना/रीझना से) रुझाव, (रुकना से) रुकाव, (लगना/लगाना से) लगाव, (सजना/सजाना से) सजाव, (सूझना/सुझाना से) सुझाव, (सुलगना/सुलगाना से) सुलगाव
आवट
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (कसना से) कसावट, (कहना से) कहावत, (घिसना से) घिसावट, (जमना से) जमावट, (झुकना से) झुकावट, (थकना से) थकावट, (दिखना से) दिखावट, (फैलना से) फैलावट, (बनना से) बनावट, (बुनना से) बुनावट, (मिलना/मिलाना से) मिलावट, (रुकना से) रुकावट, (लगना से) लगावट, (लिखना से) लिखावट, (सजना/सजाना से) सजावट।
- ये शब्द स्त्रीलिंग हैं।
- टिप्पणी— कमाता प्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में मिलना से मिलावट, सजना से सजावट और कहना से कहावत का निर्माण बाताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में मिलाना से मिलावट, सजाना से सजावट के निर्माण का संकेत मिलता है।
आवना
- क्रिया → विशेषण
- (डराना से) डरावना, (पाना → पा से) पावना, (लुभाना से) लुभावना, (सुहाना से) सुहावना।
- (भी → भय से) भयावना— भय = भी + अ (अय्) = भे + अ = (भे = भ् + ए) → (भ् + अय्) + अ = भय। अर्थ— डरने की क्रिया या डरने का भाव। भय संज्ञा है, इसलिए भय (संज्ञा) + आवना (प्रत्यय) = भयावना, तद्धितांत होगा। इसी तर्क को अपनाते हुए डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में ‘आवना’ प्रत्यय को ‘संज्ञा से विशेषण’ बनानेवाला मानते हुए कई उदाहरण दिये गये हैं; जैसे— डरावना, भयावना, लुभावना और सुहावना। लेकिन कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आवना’ को कृत प्रत्यय बताया गया है।
आवा
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (चढ़ाना से) चढ़ावा, (चलना/चलाना से) चलावा, (छलना से) छलावा, (छुड़ाना से) छुड़ावा, (डराना से) डरावा, (दिखाना से) दिखावा, (पछताना से) पछतावा, (पहनना/पहरना/पहिरना से) पहनावा/पहरावा/पहिरावा, (बढ़ाना से) बढ़ावा, (बहकाना से) बहकावा, (बहलाना से) बहलावा, (बुलाना से) बुलावा, (भुलाना से) भुलावा
आस
- क्रिया → भाववाचक (या इच्छार्थक) संज्ञा
- (ऊँघना से) उँघास, (चुदना/चोदना से) चुदास, (निकलना से) निकास, (पादना से) पदास, (पीना से) प्यास, (बुलाना से) बुलास, (मूतना से) मुतास, (रोना से) रोआस, (हगना से) हगास।
- इस प्रत्यय का अर्थ है ‘इच्छा’ या ‘आशा’।
आहट
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (अचकचाना से) अचकचाहट, (उकताहट से) उकताहट, (उकसाना से) उकसाहट, (कुलबुलाना से) कुलबुलाहट, (खड़खड़ाना से) खड़खड़ाहट, (खुजलाना से) खुजलाहट, (गड़गड़ा से) गड़गड़ाहट, (गुर्राना से) गुर्राहट, (घड़घड़ाना से) घड़घड़ाहट, (घबराना से) घबराहट, (घरघराना से) घरघराहट, (चिल्लाना से) चिल्लाहट, (चुलबुलाना से) चुलबुलाहट, (छटपटाना से) छटपटाहट, (जगमगाना से) जगमगाहट, (टकराना से) टकराहट, (टिमटिमाना से) टिमटिमाहट, (तिलमिलाना से) तिलमिलाहट, (थरथराना से) थरथराहट, (धकधकाना से) धकधकाहट, (फुसफुसाना से) फुसफुसाहट, (बिलबिलाना से) बिलबिलाहट, (बौखलाना से) बौखलाहट, (भनभनाना से) भनभनाहट, (भिनभिनाना से) भिनभिनाहट, (लड़खड़ाना से) लड़खड़ाहट, (सकपकाना से) सकपकाहट, (सरसराना से) सरसराहट, (सुरसुराना से) सुरसुराहट, (हकलाना से) हकलाहट, (हिचकिचाना से) हिचकिचाहट।
- टिप्पणी— ‘आहट’— 1. स्वतंत्र शब्द है, जो संस्कृत के ‘आघट्टयति’ से आया है। 2. हिन्दी में यह प्रत्यय भी है जो बहुधा अनुकरणात्मक शब्दों में प्रयुक्त होता है।
इयल
- क्रिया → विशेषण
- (अड़ना से) अड़ियल, (पड़ना से) पड़ियल, (बढ़ना से) बढ़ियल, (मरना से) मरियल, (सड़ना से) सड़ियल।
ई
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (काटना से) कटनी, (कहना से) कही, (घुड़कना से) घुड़की, (चाटना से) चटनी, (चटकना से) चुटकी, (छाँटना से) छँटनी, (झपकना से) झपकी, (झाँकना से) झाँकी, (थपकना से) थपकी, (धमकाना से) धमकी, (धुकधुकाना से) धुकधुकी, (धुनकना से) धुनकी, (फाँकना से) फँकी, (बोलना से) बोली, भभकी, (मरना से) मरी, (सिसकना से) सिसकी, (हिचकना से) हिचकी, (हँसना से) हँसी।
- क्रिया → करणवाचक संज्ञा— (गाँसना से) गाँसी, (चिमटना से) चिमटी, (टाँकना से) टाँकी, (फाँसना से) फाँसी, (रेतना से) रेती
इया
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा— (जड़ना से) जड़िया, (गढ़ना से) गढ़िया, (धुनना से) धुनिया, (नाचना से) नचनिया, (नियारना से) नियारिया, (लखना) से लखिया
- टिप्पणी— एड़, गंजा/गाँजा, डाक, नौसिख, भंग/भाँग— ये सभी शब्द संज्ञा हैं, इसलिए इनसे निर्मित (एड़ी, गंजेड़ी, डाकिया, नौसिखिया, भँगेड़ी) शब्द कृदंत नहीं हैं। परन्तु कहीं-कहीं इन्हें कृदंत माना गया है, इसका कारण है कि रूप-साम्य और प्रत्यय-सदृश व्यवहार (डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’— इसमें ऐसा ही है)।
- एड़ + ई = एड़ी। गाँजा + एड़ी = गँजेड़ी। भाँग + एड़ी = भँगेड़ी। डाक + इया = डाकिया। नौसिख (नौ + सीख → सिख) + इया = नौसिखिया। इस तरह ये शब्द तद्धितांत हैं।
- क्रिया → विशेषण— (घटना से) घटिया, (बढ़ना से) बढ़िया
उआ
- क्रिया → संज्ञा— (काटना से) कटुआ, (खभरना से) खभरुआ, (टसकना से) टसुआ, (बटना से) बटुआ → बटुवा
- टिप्पणी— ‘उआ’ और ‘उवा’— हिन्दी में जब दो स्वर (जैसे ‘उ’ और ‘आ’) पास-पास आते हैं, तो उच्चारण को सुगम बनाने के लिए उनके बीच में ‘व’ की ध्वनि स्वतः आ जाती है। इसे व्याकरण में ‘श्रुति-मूलक व’ कहते हैं। क्षेत्रीय प्रभाव— पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) और बिहार की बोलियों (भोजपुरी, मगही) में ‘उआ’ का उच्चारण ‘उवा’ के रूप में बहुत अधिक होता है; जैसे— मछुआ → मछुवा, गेहुँआ → गेहुँवा। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’; कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘उआ’ प्रत्यय मिलता है। ‘उआ’ का प्रयोग वांछनीय है, परन्तु जो शब्द ‘व’ (उवा) के साथ रूढ़ हो गये हैं वो स्वीकारा कर लिए गये हैं; जैसे— (बटना से) बटुवा।
ऊ
- क्रिया → कर्तृवाचक— (उतरना/उतारना से) उतारू, (ऐंठना से) ऐंठू, (कमाना से) कमाऊ, (काटना से) काटू, (खाना से) खाऊ, (चलना से) चालू, (ताड़ना से) ताड़ू, (दबना से) दब्बू, (बिगाड़ना से) बिगाड़ू, (भगना/भागना से) भग्गू, (मारना से) मारू, (रटना से) रट्टू, (लगना से) लागू
- क्रिया → करणवाचक— (झाड़ना से) झाड़ू
- टिप्पणी— (चलना से) चलाऊ; चल + आऊ = चलाऊ। (चलाना से) चलाऊ; चला + ऊ = चलाऊ। ?
- आऊ या ऊ भ्रम ?
ए
- क्रिया → अव्यय (क्रिया-विशेषण)— (देखना से) देखे, (निकालना से) निकाले, (पाना से) पाये, (लेना से) लिये, (समेटना से) समेटे
एरा
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा— (कमाना से) कमेरा, (लिखना से) लिखेरा, (लुनना से) लुनेरा, (लूटना से) लुटेरा।
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (निबटाना से) निबटेरा, (बसना से) बसेरा
ऐया
- (काटना से) कटैया, (परोसना से) परोसैया, (बचाना से) बचैया, (बसना से) बसैया, (भरना से) भरैया, (लड़ना से) लड़ैया
- इस प्रत्यय का प्रयोग प्राचीन हिन्दी में अधिक है, अब इसके स्थान पर ‘वैया’ प्रत्यय का प्रयोग होता है।
ऐत
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा
- (चढ़ना से) चढ़ैत, (फेंकना से) फिकैत, (लड़ना से) लड़ैत
ओड़ / ओड़ा (ओर / ओरा)
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा
- (काठ + फोड़ना = कठ + फोड़ा से) कठफोड़ा, (चखना से) चखोड़ा, (चटना से) चटोर, चटोरा, (पत्थर + फोड़ना = पत्थर + फोड़ा से) पत्थरफोड़ा, (पादना से) पदोड़ा, (भागना से) भगोड़ा, (हँसना से) हँसोड़, हँसोड़ा।
औता / औती
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (कसना से) कसौटी, (चढ़ाना से) चढ़ौती, (चुकाना से) चुकौता, चुकौती, (चुनना से) चुनौती, (छुड़ाना से) छुड़ौती, (फिराना से) फिरौती, (मनाना से) मनौती, (समझाना से) समझौता
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में फिरौती और मनौती को ‘औती’ और ‘ती’ प्रत्यय दोनों के अंतर्गत दिया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘औती’ प्रत्यय से ’मनौती’ का निर्माण बताया गया है।
औना / औनी / आवनी
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा— (खेलना से) खिलौना, (ओढ़ना सो) उढ़ौना, (बिछाना से) बिछौना।
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (कहना से) कहानी, (उदाना से) उदौनी, (छाना से) छावनी, (ठहरना से) ठहरौनी, (पहराना से) पहरौनी, पहरावनी, (पीसना से) पिसौनी, (मीचना से) मिचौनी। संयुक्त शब्द— (आँख-मीचना से) आँख-मिचौनी
- उड़ाना शब्द से सम्भवतः उदाना बना है (उड़ाना → उदाना) + औनी = उदौनी।
- कहानी— कह (कहना) + औनी या आवनी = कहौनी या कहावनी → कहानी।
औवल
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (बनना से) बनौवल, (बूझना से) बुझौवल, (भूलना से) भुलौवल, (मोचना से) मिचौवल
क
- क्रिया → भाववाचक, स्थानवाचक संज्ञा— (फाड़ना से) फाटक, (बैठना से) बैठक
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा— (जाँचना से) जाँचक, (घालना से) घालक, (घोलना से) घोलक, (मारना से) मारक
- टिप्पणी— किसी-किसी अनुकरणात्मक मूल अव्यय के आगे ‘क’ प्रत्यय के योग से ‘धातु’ भी बनते हैं; जैसे— खड़, धड़, धम और खट में ‘क’ प्रत्यय के योग से क्रमशः खड़क, धड़क, धमक और खटक धातु का निर्माण होता है और इसी में ‘ना’ के योग से क्रिया बनती है। इसका विवरण इस तरह है— (खड़ + क से) खड़क (धातु) → खड़कना (क्रिया)। (धड़ + क से) धड़क (धातु) → धड़कना (क्रिया)। (धम + क से) धमक (धातु) → धमकना (क्रिया)। (खट + क से) खटक (धातु) → खटकना (क्रिया)।
कर, के, करके
- ये प्रत्यय सभी धातुओं में लगते है और इनके योग से अव्यय बनते हैं। इन तीनों में ‘कर’ का प्रयोग अधिक होता है और गद्य में प्रायः इसी का प्रयोग होता है। इन प्रत्ययों के योग से निर्मित अव्यय ‘पूर्वकालिक कृदंत’ कहलाते हैं और इनका प्रयोग प्रायः क्रिया-विशेषण के समान तीनों कालों में किया जाता है। ‘पूर्वकालिक कृदंत’ का प्रयोग बहुधा ‘संयुक्त क्रियाओं’ के निर्माण में किया जाता है; जैसे— देकर, जाकर, दौड़ करके इत्यादि।
- टिप्पणी— किसी-किसी की सम्मति में ‘कर’ और ‘करके’ प्रत्यय नहीं है, वरन् स्वतंत्र शब्द हैं। इसी विचार से वे लोग ‘चलकर’ शब्द को ‘चल कर’ (अलग-अलग) लिखते है।
का
- (छीलना से) छिलका, (फूलना से) फुलका
की
- (डूबना से) डुबकी, (फिरना से) फिरकी, (फूटना से) फुटकी, (बैठना से) बैठकी
गी
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (देना से) देनगी
त
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (खपना से) खपत, (पड़ना से) पड़त, (बचना से) बचत, (रँगना से) रंगत
- टिप्पणी— रंग और रँगना दोनों से रँगत बना है। रंग संज्ञा है और रँगना क्रिया, रंग से त के मेल में त तद्धित प्रत्यय होगा जबकि रंगना से त के मेल को कृत प्रत्यय कहा जायेगा। इसीलिए कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में रंगत शब्द कृत और तद्धित दोनों वर्ग में रखा गया है।
ता
- वर्तमान कृदंत— (आना से) आता, (गाना से) गाता, (चलना-पुरजा से) चलता-पुरजा, (उड़ना से) उड़ता, (उगना से) उगता, (खाना-पीना से) खाता-पीता, (खेलना से) खेलता, (जलना से) जलता, (जाना से) जाता, (डरना से) डरता, (ढलना से) ढलता, (तैरना से) तैरता, (देखना से) देखता, (नाचना से) नाचता, (बहता से) बहता, (भागना से) भागता, (मरना से) मरता, (रमना से) रमता, (रेंगना से) रेंगता, (सोना से) सोता, (हँसना से) हँसता
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ऐसे शब्दों को ‘आ’ प्रत्यय ने निर्मित ‘वर्तमान कृदंत’ बताया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ऐसे शब्दों का निर्माण ‘ता’ प्रत्यय से निर्मित बताया गया है और ये धातुओं से संयुक्त होकर ‘वर्तमानकालिक कृदंत’ बताया है, जिनका प्रयोग ‘विशेषण’ के समान होता है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आ’ प्रत्यय को भूतकाल का और ‘ता’ प्रत्यय को वर्तमानकाल का प्रत्यय बताया गया है।
ती
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा
- (गिनना से) गिनती, (घटना से) घटती, (चढ़ना से) चढ़ती, (चलना से) चलती, (चुकना से) चुकती, (झड़ना से) झड़ती, (पड़ना से) पड़ती, (पाना से) पावती, (फबना से फबती, (फलना से) फलती, (फुरना से) फुरती, (बढ़ना से) बढ़ती, (बोलना से) बोलती, (भरना से) भरती, (सुहाना से) सुहाती
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में फिरौती और मनौती को ‘औती’ और ‘ती’ प्रत्यय दोनों के अंतर्गत दिया गयी है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘औती’ प्रत्यय से ’मनौती’ का निर्माण बताया गया है। [(फिराना से) फिरौती, (मनाना से) मनौती]
तू
- क्रिया → विशेषण
- (पालना से) पालतू
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘तू’ प्रत्यय से घुमंतू, पालतू और फालतू के उदाहरण दिये गये हैं। वस्तुतः घूमना + अंतू = घुमंतू; पालना + तू = पालतू। परन्तु फालतू शब्द अरबी (शब्द) और हिन्दी (प्रत्यय) के योग से बना है— फाज़िल (अरबी) → फाल + तू = फालतू।
ते
- क्रिया → अपूर्ण क्रिया-द्योतक कृदंत का निर्माण
- (खोजना से) खोजते, (चाहना से) चाहते, (देखना से) देखते, (पढ़ना से) पढ़ते, (रहना से) रहते, (लिखना से) लिखते, (सुनना से) सुनते, (सोचना से) सोचते
- टिप्पणी— 1. ‘ते’ प्रत्यय क्रिया की निरंतरताया आदत को दर्शाता है; जैसे— मुझे आपको खोजते कई घंटे हो गये। 2. ‘ते’ प्रत्यय से निर्मित शब्द कभी-कभी संज्ञा के ठीक पहले आकर उसकी विशेषता भी बताते हैं; जैसे—‘पढ़ते हुए बच्चे’ या ‘बढ़ते कदम’। 3. ‘ते’ प्रत्यय से निर्मित शब्द को जब दो बार लिखा जाता है, तो ये ‘क्रिया-विशेषण’ की तरह कार्य करते हैं; जैसे— ‘वह चलते-चलते थक गया।’ यहाँ ‘चलते’ क्रिया के होने का ढंग बता रहा है।
न
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (कहना से) कहन, (खाना-पीना से) खान-पान, (चलना से चलन), (ब्याना से) ब्यान, (मुसकाना से) मुसकान, (मुसक्याना से) मुसक्यान, (मुस्काना से) मुस्कान, (लेना-देना से) लेन-देन, (सीना से) सीयन (सीवन)
- क्रिया → करणवाचक संज्ञा— (जमाना से) जामन, (झाड़ना से) झाड़न, (बेलना से) बेलन
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘न’ प्रत्यय कहा गया है। साथ ही वे लिखते हैं— “न प्रत्यय संस्कृत के अन कृदन्त प्रत्यय से निकला है।” डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में इसे ‘न’ प्रत्यय बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘अन’ प्रत्यय दिया गया है।
ना
- क्रिया → कर्मवाचक संज्ञा— खाना से खाना (भोज्य पदार्थ), गाना से गाना (गीत), बोलना से बोलना (बात)
- क्रिया → करणवाचक संज्ञा— (ओढ़ना से) ओढ़ना, (कसना से) कसना, (घोटना से) घोटना, (बेलना से) बेलना।
- किसी-किसी धातु का आद्य स्वर ह्रस्व हो जाता है; जैसे— (कूटना से) कुटना, (छानना से) छनना, (बाँधना से) बँधना
- क्रिया → विशेषण— उड़ना (उड़नेवाला), रोना (रोनेवाला, रोनीसूरत), लदना (बैल), (सेवना → सेव से) सेना, हँसना (हँसनेवाला)
- क्रिया → अधिकरणवाचक— झिरना, पालना, रमना
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘ना’ के संबन्ध में कहा गया है कि— “इस प्रत्यय के योग से क्रियार्थक, कर्मवाचक और करणवाचक संज्ञाएँ बनती हैं। हिंदी में इस कृदंत से धातु का निर्देश करते हैं; जैसे— बोलना, लिखना, देना, खाना इत्यादि।” आगे वे लिखते हैं कि— “संस्कृत के ‘अन’ प्रत्ययांत कृदंतों से हिंदी में कई ना प्रत्ययांत कृदंत निकले हैं, पर ऐसा भी जान पड़ता है कि संस्कृत से केवल ‘अन’ प्रत्यय लेकर उसे ‘न’ कर लिया गया है, क्योंकि यह प्रत्यय उर्दू संस्कृत शब्दों में भी लगा दिया जाता है और हिंदी के दूसरे शब्दों में भी जोड़ा जाता है; जैसे— उर्दू शब्द : (बदल से) बदलना, (गुजर से) गुजरना, (दाग से) दागना, (गर्म से) गर्माना। हिंदी शब्द : (अलग से) अलगाना, (अपना से) अपनाना, (लाठी से) लठियाना, (रिस से) रिसाना इत्यादि।”
नी
- क्रिया → भाववाचक संज्ञा— (कटना से) कटनी, (करना से) करनी, (छँटना से) छँटनी, (बोना से) बोनी, (भरना से) भरनी, (मरना से) मरनी।
- करणवाचक संज्ञा— (अलगना / अलगाना से) अलगनी, (ओटना से) ओटनी, (ओढ़ना से) ओढ़नी, (कतरना से) कतरनी, (कुरेदना से) कुरेदनी, (खुरचना से) खुरचनी, (खोदना से) खोदनी, (गरजना से) गरजनी, (छानना से) छननी, छलनी, (जपना से) जपनी, (ढकना से) ढकनी, (धौंकना से) धौंकनी, (फूँकना से) फुँकनी, (बटोरना से) बटोरनी, (लिखना से) लेखनी, (सुमरना से) सुमरनी, (सुमिरना से) सुमिरनी।
- कर्मवाचक— (चाटना से) चटनी, (सूँघना से) सुँघनी, कहानी।
- विशेषण— (कहना से) कहनी, (सुनना से) सुननी।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में कहानी शब्द औनी और नी दोनों प्रत्यय अंतर्गत पाते हैं।
वाँ
- क्रिया → विशेषण— (उठाना से) उठावाँ, (उमेठना से) उमेठवाँ, (कटना से) कटवाँ, (कतरना से) कतरवाँ, (चुनना से) चुनवाँ, (जुड़ना से) जुड़वाँ, (जोड़ना से) जोड़वाँ, (टूटना से) टुटवाँ, (ढलना से) ढलवाँ, (ढालना से) ढालवाँ, (पीटना से) पिटवाँ
वाला
- क्रिया — कर्तृवाचक विशेषण और संज्ञा
- आनेवाला, करनेवाला, कहनेवाला, खानेवाला, गानेवाला, चाहनेवाला, जानेवाला, झपटनेवाला, झूलनेवाला, टूटनेवाला, ठहरनेवाला, ठेलनेवाला, डरनेवाला, ढकेलनेवाला, ढोनेवाला, डालनेवाला, तैरनेवाला, थामनेवाला, देनेवाला, धोनेवाला, नाचनेवाला, बोलनेवाला, पानेवाला, फैलनेवाला, बोलनेवाला, मरनेवाला, मिलनेवाला, भरनेवाला, रखनेवाला, रहनेवाला, रोकनेवाला, लानेवाला, लूटनेवाला, लेनेवाला, सोनेवाला।
- इस प्रत्यय के लगने से शब्द के अंत्य का ‘आ’ परिवर्तित होकर ‘ए’ हो जाता है; जैसे— आना + वाला = आनेवाला, करना + वाला = करनेवाला। इसी तरह अन्य में भी परिवर्तन हुआ है।
वैया
- (खाना से) खवैया, (गाना से) गवैया, (चलना से) चलवैया, (छाना से) छवैया, (देना से) दिवैया, (रखना से) रखवैया
- टिप्पणी— यह (‘वैया’) ‘ऐया’ प्रत्यय का पर्याय और ‘वाला’ प्रत्यय का समानार्थी है। इसका प्रयोग ‘एकाक्षरी’ धातुओं के साथ अधिक होता है।
सार (उर्दू)
- हिन्दी (क्रिया) + सार (प्रत्यय)— (चलना से) चलनसार, (मिलना से) मिलनसार
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘मिलनसार’ को कृदंत बताया गया है। परन्तु शब्दकोशों— में चलनसार और मिलनसार तद्धितांत है, क्योंकि चलन (संज्ञा) + सार = चलनसार; मिलन (संज्ञा) + सार = मिलनसार; मिलता है।
हर / हरा / हार / हारा
- ‘हार’ वाला के अर्थ में— (खेना से) खेवनहार, (जानना से) जानहार, (मरना से) मरनहार, (रखना से) राखनहार, (होना से) होनहार
- (खनना से) खनहर
- (रोना से) रोवनहारा
हा
- क्रिया → कर्तृवाचक संज्ञा
- (काटना से) कटहा, (चराना से) चरवाहा, (मारना से) मरकहा
तद्धित प्रत्यय
अक्कड़
- कर्तृवाचक संज्ञा बनानेवाला
- (कक्का से) कक्कड़, (तुक से) तुक्कड़, (फक से) फक्कड़, (भूख से) भुक्खड़
आ
- संज्ञा → विशेषण— (खार से) खारा, (चाह से) चहेता, (जेठ से) जेठा, (झूठ से) झूठा, (ठंड से) ठंडा, (चौमुख से) चौमुखा, (तिखूँट से) तिखूँटा, (प्यार से) प्यारा, (प्यास से) प्यासा, (भूख से) भूखा, (महँगाई से) महँगा, (मैल से) मैला, (लंबी टाँग से) लमटंगा, (साठ से) साठा
- संज्ञा → भाववाचक संज्ञा— (चूर से) चूरा, (डेर से) डेरा, (बजाज से) बजाजा, (बोझ से) बोझा, (रेल से) रेला, (सराफ से) सराफा।
- (खट से) खटका, (छाप से) छापा, (जोड़ से) जोड़ा, (झोंक से) झोंका, (ठेल से) ठेला, (धड़क से) धड़का
- नोट— यहाँ यह ध्यातव्य है कि खटका, छापा, झोंका, ठेला, धड़का इत्यादि क्रमशः खटकना, छापना, जोड़ना, झोंकना, ठेलना, धड़कना से भी निर्मित होता है। ऐसी स्थिति में यह कृदंत होगा। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में खटका, छापा, धड़का शब्द ‘आ’ प्रत्यय से बने कृदंत और तद्धितांत दोनों वर्ग में मिलते हैं। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में (छापना से) छापा, (जोड़/जोड़ना से) जोड़ा, (झोंकना से) झोंका, (धड़कना से) धड़का मिलता है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘जोड़ा’ शब्द को हम कृदंत और तद्धितांत दोनों के अन्तर्गत पाते है, अर्थात् जोड़ना/जोड़ + आ = जोड़ा। कामताप्रसाद गुरु के अनुसार (छापना से) छापा, (झुकना से) झोंका; अर्थात् कृदंत हैं।
- संयुक्त विशेषण— अच्छा-खासा, दुबला-पतला, भरा-पूरा, हट्टा-कट्टा, हरा-भरा
- अच्छा-खासा- अच्छा + खासा (खास + आ); अच्छा हिन्दी शब्द है और खास अरबी शब्द है। दुबला-पतला- दुबला संस्कृत के दुर्बल से आया है और पतला प्रकृत के पत्तल से। हट्टा-कट्टा- हट्टा (हृष्ट → हट्ट) + कट्टा (काष्ठ → काठ) = (हट्ट + आ) + (कट्ट + आ)।
- भरा-पूरा- भरना + पूर (पूर्ण) = (भर + आ) + (पूर + आ)। हरा-भरा- हरा (हरित) + भरा (भरना) = (हर + आ) + (भर + आ)। इन दोनों में ‘भरा’ भरना (क्रिया) से बना है, जबकि पूरा और हरा संस्कृत के पूर्ण एवं हरित से आया है। पूर्ण एवं हरित विशेषण हैं, जबकि भरना क्रिया, इसलिए भरा-पूरा और हरा-भरा में कृदंत और तद्धितांत दोनों शब्दों का योग है।
- अनादर या दुलार के अर्थ में— (ठाकुर से) ठाकुरा, (बलदेव से) बलदेवा, (शंकर से) शंकरा
- रामचरितमानस और पुरानी कविताओं में मात्रा पूर्ति के लिए— (चौगान से) चौगाना, (जहान से) जहाना, (दिन से) दिना, (नाम से) नामा, (रजनीचर से) रजनीचरा, (हंस से) हंसा
- पदार्थों की स्थूलता को दर्शाने हेतु पदार्थ-वाचक शब्दों में— (घड़ी से) घड़ा (गुस्से या विनोद में), (चिमटी से) चिमटा, (लकड़ी से) लकड़ा
- स्त्रीलिंग → पुल्लिंग
- ‘आ’ प्रत्यय का प्रयोग ‘ईकारांत’ स्त्रीलिंग संज्ञाओं को पुल्लिंग बनाने में किया जाता है; जैसे— लड़की-लड़का, काकी-काका, बकरी-बकरा इत्यादि।
- ‘आ’ प्रत्यय का प्रयोग ‘अकारांत’ स्त्रीलिंग संज्ञाओं को पुल्लिंग बनाने में किया जाता है; जैसे— (भेड़ + आ से) भेड़ा, (भैंस + आ से) भैंसा
- (द्वार से) द्वारा— द्वारा का अर्थ दरवाजा होता है, लेकिन आ प्रत्यय के योग से निर्मित ‘द्वारा’ अव्यय है। परन्तु इसका अर्थ दरवाजा और स्थल भी होता है; जैसे— गुरुद्वारा। साथ ही मात्रा-पूर्ति हेतु भी दरवाजा, मार्ग और स्थल के अर्थ में इसका प्रयोग होता है; जैसे— ‘साधन धाम मोच्छ करि द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥’
आँ
- स्थानवाचक क्रिया-विशेषण
- (कौन से) कहाँ, (जो से) जहाँ, (तद् → त से) तहाँ, (यह से) यहाँ, (वह से) वहाँ
आइँद / आयँध
- भाववाचक संज्ञा
- (कपड़ा से) कपड़ाइँद, (घिन से) घिनाइँद, (महक → मघ से) मघाइँद, (सड़ा से) सड़ाइँद/सड़ायँद
- वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में इसे ‘आयँध’ प्रत्यय कहा गया है और कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आइँद’ प्रत्यय कहा गया है।
आइन
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग
- (चौधरी से) चौधराइन, (चौबे से) चौबाइन, (ठाकुर से) ठकुराइन, (दूबे से) दुबाइन, (नाई से) नाइन, (पंडा से) पंडाइन, (पंडित से) पंडिताइन, (बनिया से) बनियाइन, (बाबू से) बबुआइन, (मिसिर से) मिसिराइन, (लाला से) ललाइन, (सुकुल से) सुकुलाइन, (सुखदायी से) सुखदायिन, (हलवाई से) हलवाइन।
आई
- विशेषण/संज्ञा → भाववाचक संज्ञा
- (अगुआ से) अगुआई, (ऊँचा से) ऊँचाई, (कड़ा से) कड़ाई, (खट्टा से) खटाई, (गहरा से) गहराई, (गोल से) गोलाई, (चतुर से) चतुराई, (चिकना से) चिकनाई, (चौड़ा से) चौड़ाई, (ठंडा से) ठंडाई, (ठाकुर से) ठकुराई, (ढीठ से) ढिठाई, (ढीला से) ढिलाई, (पंडित से) पंडिताई, (बनिया से) बनियाई, (बुरा से) बुराई, (भला से) भलाई, (महँगा से) महँगाई, (मीठा से) मिठाई, (लंबा से) लंबाई, (लाल से) ललाई, (सच्चा से) सच्चाई, (साफ से) सफाई, (सीधा से) सिधाई।
- नोट— अगुआ, ठाकुर (संज्ञा)। पंडित (संज्ञा और विशेषण दोनों)।
- आई प्रत्यय से कुछ ‘जातिवाचक संज्ञाएँ’ भी बनती है, अर्थात् इससे उन वस्तुओं का बोध होता है जिनमें वह धर्म पाया जाता है; जैसे— मिठाई से पेड़ा, बर्फी, लड्डू आदि का बोध; ठंडाई – भाँग का बोध इत्यादि। इसके उदाहरण हैं— मिठाई, खटाई, चिकनाई, ठंडाई इत्यादि।
- आई प्रत्यय कभी-कभी संस्कृत के ‘ता’ प्रत्यायांत भाववाचक संज्ञाओं में भूल से जोड़ दिया जाता है; जैसे—
मूर्खताई,कोमलताई,शूरताई,जड़ताई। ये शब्द गलत हैं क्योंकि ‘ता’ और ‘आई’ दोनों भाववाचक संज्ञा बनाते हैं और ऐसा करने पर द्वित्व दोष होगा।मित्रताईगलत है; मित्रता (मित्र + ता) और मिताई (मित्र → मीत + आई) सही है।
आनंद
- गड़बड़ानंद, गोलमालानंद, मेडकानंद, विवेकानंद
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे तद्धित प्रत्यय के अंतर्गत दिया गया है। व्युत्पत्ति— आ (उपसर्ग) + नंद् (धातु) + अ (घञ्) = आनंद। आनंद एक स्वतंत्र शब्द है। इसलिए जब यह किसी अन्य स्वतंत्र शब्द से जुड़ेगा तो ‘समास-निर्मित-शब्द’ का निर्माण करेगा। विग्रह— गड़बड़ानंद = गड़बड़ में ही आता है आनंद जिसे, वह – बहुव्रीहि समास। गोलमालानंद = गोलमाल (हेराफेरी या गड़बड़ी) करने में ही आता है आनंद जिसे, वह – बहुव्रीहि समास। मेडकानंद = मेंढक की तरह फुदकने या टर्राने में ही आता है आनंद जिसे अथवा मेंढक जैसा स्वभाव ही है जिसका आनंद, वह – बहुव्रीहि समास। विवेकानंद = विवेक और आनंद ही है स्वरूप जिनका, अर्थात् वह विशेष संन्यासी (स्वामी विवेकानंद) – बहुव्रीहि समास।
आऊ
- विशेषण— (आगे से) अगाऊ, (घर से) घराऊ, (पंडित से) पंडिताऊ
- संज्ञा— (बाट से) बटाऊ
- अगाऊ— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में अगुआना (क्रिया) से अगाऊ का निर्माण बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में आगे (क्रिया-विशेषण) से अगाऊ शब्द का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में आगा (संज्ञा) से अगाऊ का निर्माण बताया गया है। डॉ॰ श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में अग्र (संस्कृत) → अग्ग (प्राकृत) → आगा (हिन्दी), का विकास बताया गया है और इसी आगा में आऊ प्रत्यय के योग से अगाऊ बना है।
आका
- भाववाचक संज्ञा
- (कड़ से) कड़ाका, (खट से) खटाका, (खड़ से) खड़ाका, (चट से) चटाका, (छट से) छटाका, (छन से) छनाका, (छप से) छपाका, (झट से) झटाका, (झड़ से) झड़ाका, (झम से) झमाका, (टुन से) टुनाका, (ठन से) ठनाका, (ठहा से) ठहाका, (तड़ से) तड़ाका, (धड़ से) धड़ाका, (धम से) धमाका, (धप्प/धप से) धप्पाका/धपाका, (पट से) पटाका, (पड़ से) पड़ाका, (फट से) फटाका, (भड़ से) भड़ाका, (सड़ से) सड़ाका, (सन से) सनाका।
- मूल शब्द अधिकतर ध्वन्यात्मक हैं। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार— अनुकरणवाचक शब्दों से इस प्रत्यय (आका) के द्वारा भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं। इस तरह अधिकतर निर्मित शब्द अनुकरणात्मक ध्वनिबोधक संज्ञा हैं।
आटा
- अनुकरणात्मक ध्वनिबोधक संज्ञा
- अर्राटा, घर्राटा, झपाटा, फर्राटा, भर्राटा, सर्राटा
- आटा और आका प्रत्यय समानार्थी हैं।
आन
- विशेषण → भाववाचक संज्ञा
- (ऊँचा से) उँचान/ऊँचान, (चौड़ा से) चौड़ान, (नीचा से) निचान, (घमस से) घमासान, (लंबा से) लंबान।
आना
- अधिकरण (पात्र या स्थान) बोधक संज्ञा
- (अहिर से) अहिराना, (उड़िया से) उड़ियाना, (कोइरी से) कोइराना, (कुम्हार/कोंहार से) कुम्हराना/कोंहराना, (घर से) घराना, (चौधरी से) चौधराना, (तिलंग से) तिलंगाना, (राजपूत से) राजपूताना, (तुरक से) तुरकाना, (नौकर से) नौकराना, (पायँ से) पैताना, सिरहाना, (हिंदू से) हिंदुआना
आनी
- पुल्लिंग → स्त्रीलिंग
- (खत्री/खतरी से) खतरानी/खत्राऩी, (चौधरी से) चौधरानी, (जेठ से) जेठानी, (ठाकुर से) ठकुरानी, (तुरक/तुर्क से) तुरकानी/तुर्कानी, (देवर से) देवरानी, (नौकर से) नौकरानी, (पंडित से) पंडितानी, (पुरोहित से) पुरोहितानी, (मुगल से) मुगलानी, (मुल्ला से) मुल्लानी, (मेहतर से) मेहतरानी, (सेठ से) सेठानी।
- आइन और आनी— चौधरी : चौधराइन (आइन प्रत्यय); चौधरानी (आनी प्रत्यय)। ठाकुर : ठकुराइन (आइन प्रत्यय); ठकुरानी (आनी प्रत्यय)। पंडित : पंडितानी (आनी प्रत्यय); पंडिताइन (आइन प्रत्यय)। पुरोहित : (इन प्रत्यय); पुरोहितानी (आनी प्रत्यय)।
- विशेष— वस्तुतः ‘आनी’ प्रत्यय संस्कृत का है।
आयत
- भाववाचक संज्ञा
- (अपना से) अपनायत, (तीसरा से) तिसरायत, (तिहाई से) तिहायत, (पंच से) पंचायत, (बहुत से) बहुतायत
आर
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा— (कुम्भ से) कुम्हार, (चाम से) चमार, (लोहा से) लोहार, (सूप से) सुआर, (सोना से) सुनार।
- टिप्पणी— हिन्दी का ‘आर’ प्रत्यय संस्कृत के ‘कार’ प्रत्यय (शब्द) का अपभ्रंश है; जैसे— कुम्भकार (कुम्भ + कार) → कुम्हार (कुम्भ + आर); भ → ह, कार → आर। इसी तरह चर्मकार → चमार। लौहकार → लोहार। सूपकार → सुआर। स्वर्णकार → सुनार।
- उच्चारण में अन्तर के कारण कुम्हार/कोंहार, लोहार/लुहार, सुनार/सोनार मिलते हैं।
- संज्ञा → विशेषण— (गाँव से) गँवार, (दूध से) दुधार
आरा / आरी / आड़ी
- कर्तृवाचक संज्ञा— (कोठा से) कोठारी, (खेल से) खिलाड़ी, (घास से) घसियारा, (पूजा से) पुजारी, (बनिज से) बनिजारा → बनजारा, (भीख से) भिखारी, (माटी से) मटियारा, (हत्या से) हत्यारा
- टिप्पणी— कोष्ठक → कोठा।
- भाववाचक संज्ञा— (छूट से) छुटकारा, (निपट से) निपटारा
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में छूट (संज्ञा) से छुटकारा का निर्माण बताया गया है। जबकि R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में छूटना और निपटना से क्रमशः छुटकारा और निपटारा का निर्माण बताया गया है।
- वस्तुतः ये तीनों (आरा/आरी/आड़ी) आर के पर्याय प्रत्यय हैं।
आल / आला
- (कृपा से) कृपाल, (चक से) चकला, (जौ से) जौआला, (दाढ़ी/डाढ़ी से) दढ़ियल/डढ़ियल, (दया से) दयाल, (भाठा से) भठियाल, (लाठी से) लठियाल,
- टिप्पणी— कामताप्रसाद कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार— डाढ़ी + अल = डढ़ियल। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी शब्दकोश’ के अनुसार— दाढ़ी + इयल = दढ़ियल।
- संस्कृत के ‘आलय’ प्रत्यय का ‘आल’— गंगाल, घड़ियाल, दिवाला, ननिहाल, पनारा/पनाला, (शिव से) शिवाला, (ससुर से) ससुराल
- टिप्पणी— (श्वसुर + आलय = श्वसुरालय), इसी तरह शिवालय से शिवाला हो गया।
आली
- (दीया या दिया से) दीवाली/दिवाली
- आली संस्कृत के ‘आवली’ का अपभ्रंश है; जैसे— (दीप + आवली = दीपावली) → (दीया + आली = दीवाली)
आलू
- संज्ञा → विशेषण— (झगड़ा से) झगड़ालू, (डर से) डरालू, (ढाल से) ढालू, (लाज से) लजालू, (शरम/शर्म से) शरमालू/शर्मालू, (सज से) सजालू।
- क्रिया → विशेषण— (चलना से) चालू, (झगड़ना से) झगड़ालू, (सजाना से) सजालू। ऐसी स्थिति में ये कृदंत।
- ऊ प्रत्यय से भी— चाल से चालू, ढाल से ढालू
- टिप्पणी— शरम/शर्म- फारसी शब्द। (झगड़ से) झगड़ालू— इसे वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में कर्तृवाचक कृदंत-विशेषण अर्थात् क्रिया से निर्मित बताया गया है। कहीं-कहीं हमें आलु और आलू दोनों का प्रयोग मिलता है; जैसे— शर्मालु और शर्मालू।
- R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ के अनुसार— चलना या चाल से चालू
आवट
- भाववाचक संज्ञा
- (आम से) अमावट, (माघ → माह से) महावट
- अमावट (संस्कृत में- आम्रावर्त = आम्र + आवर्त), महावट (संस्कृत में- मघावृष्टि)
आवना
- संज्ञा से विशेषण बनानेवाला
- डरावना, भयावना, लुभावना, सुहावना।
- (भी → भय से) भयावना— भय = भी + अ (अय्) = भे + अ = (भे = भ् + ए) → (भ् + अय्) + अ = भय। अर्थ— डरने की क्रिया या डरने का भाव। भय संज्ञा है, इसलिए भय (संज्ञा) + आवना (प्रत्यय) = भयावना, तद्धितांत होगा। इसी तर्क को अपनाते हुए डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में ‘आवना’ प्रत्यय को ‘संज्ञा से विशेषण’ बनानेवाला मानते हुए कई उदाहरण दिये गये हैं; जैसे— डरावना, भयावना, लुभावना और सुहावना। लेकिन कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आवना’ को कृत प्रत्यय बताया गया है।
आस
- विशेषण → भाववाचक संज्ञा
- (खट्टा से) खटास, (नींद से) निदास/निंदास, (मीठा से) मिठास।
- भड़ास (भड़ विशेषण नहीं है, परन्तु भड़ास भाववाचक संज्ञा है)
आसा
- (मुण्ड → मूँड़ से) मुँड़ासा, (मुँह से) मुँहासा
आहट
- भाववाचक संज्ञा
- (कड़कड़ से) कड़कड़ाहट, (कड़वा से) कड़वाहट, (किचकिच से) किचकिचाहट, (खड़खड़ से) खड़खड़ाहट, (गरम से) गरमाहट, (चिकना से) चिकनाहट, (चुलबुल से) चुलबुलाहट, (जगमग से) जगमगाहट, (धकधक से) धकधकाहट, (नीला से) नीलाहट, (मुरमुर से) मुरमुराहट, (लसलस से) लसलसाहट।
इन
- पुल्लिंग → स्त्रीलिंग
- अहिरिन, चमारिन, जुलाहिन, धोबिन, पुजारिन, भिखारिन, लुहारिन।
- (अहीर से) अहीरिन, (कुँजड़ा से) कुँजड़िन, (कुम्हार) कुम्हारिन, (खेलाड़ी से) खेलाड़िन, (गँजेड़ी से) गँजेड़िन, (ग्वाला से) ग्वालिन, (जुलाहा से) जुलाहिन, (तँबोली से) तँबोलिन, (तेली से) तेलिन, (दुलहा से) दुलहिन, (धोबी से) धोबिन, (नाग से) नागिन, (नाती से) नातिन, (पड़ोसी से) पड़ोसिन, (बाघ से) बाघिन, (भंगी से) भंगिन, (भगत से) भगतिन, (भिखारी से) भिखारिन, (भिखमंगा से) भिखमंगिन, (मछुआ से) मछुइन, (महराज से) महराजिन, (माली से) मालिन, (मालिक से) मालिकिन, (यहूदी से) यहूदिन, (लोहार से) लोहारिन, (वियोग से) वियोगिन, (साथी से) साथिन, (सँपेरा से) सँपेरिन, (साँप से) साँपिन, (सुनार से) सुनारिन, (हत्यारा से) हत्यारिन
- टिप्पणी— अहीर : अहिरिन/अहीरिन। कुँजड़ा : कुँजड़िन (इन प्रत्यय); कुँजड़ी (ई प्रत्यय)। पठान : पठानी (सही), पठानिन (गलत)।
इया
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा— (आढ़त से) आढ़तिया, (कीर्तन से) कीर्तनिया, (गपोड़ा से) गपोड़िया, (गाडर से) (गड़रिया), (जंजाल से) जंजालिया, (झंझट से) झंझटिया, (ढोलक से) ढोलकिया, (दिवाला से) दिवालिया, (दुख से) दुखिया, (बखेड़ा से) बखेड़िया, (भेद से) भेदिया, (मक्खन से) मक्खनिया, (मुख से) मुखिया, (मूँछ से) मुछाड़िया, (रस से) रसिया, (रसोई से) रसोइया, (लख से) लखिया।
- स्थानवाचक— (कन्नौज/कनौज से) कनौजिया (कलकत्ता से) कलकतिया, (मथुरा से) मथुरिया, (सरवार से) सरवरिया, (सुल्तानपुर से) सुल्तानपुरिया।
- लघुतावाचक/ऊनतावाचक संज्ञा→ (आम से) अँबिया, (कुत्ता से) कुतिया, (खाट से) खटिया, (गठरी से) गठरिया, (चोटी से) चुटिया, (चूहा से) चुहिया, (छाछ से) छछिया, (डला से) डलिया, (डब्बा/डिब्बा से) डबिया/डिबिया, (पुल से) पुलिया, (फोड़ा से) फुड़िया, (बाग से) बगिया, (बछवा से) बछिया, (बेटा से) बिटिया, (लकुट से) लकुटिया, (लोटा से) लुटिया।
- प्राचीन कविता के कई शब्दों में ‘इया’ प्रत्यय— (आँख से) अँखिया, (आग से) अगिया, (जी से) जिया, (पी से) पिया, (पाँव से) पैयाँ, (भाँग से) भँगिया।
- वस्त्रार्थी— (अंग से) अँगिया, (जाँघ से) जाँघिया
- ईकारांत पुल्लिंग और स्त्रीलिंग संज्ञा में अनादर और प्यार या दुलार के लिए— (तेली से) तेलिया/तिलिया, (दुर्गा से) दुर्गिया, (धोबी से) धुबिया/धोबिया, (बहिन से) बहिनिया, (भाई से) भैया, (माई से) मैया, (राधा से) रधिया, (सिपाही से) सिपहिया, (सरस्वती से सूरसती से) सुरसतिया, (हरी से) हरिया
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला— (कुत्ता से) कुतिया, (गुड्डा से) गुड़िया, (चिड़ा से) चिड़िया, (चूहा से) चुहिया, (बंदर से) बंदरिया, (बछवा से) बछिया, (बेटा से) बिटिया, (बूढ़ा से) बुढ़िया।
ई
- संज्ञा से विशेषण— (ऊन से) ऊनी, (कामयाब से) कामयाबी, (गुलाब से) गुलाबी, (झक से) झकी, (जंगल से) जंगली, (दुःख से) दुःखी, (देश से) देशी, (बैंगन से) बैंगनी, (बैसाख से) बैसाखी, (भार से) भारी, (लालच से) लालची, (लोभ से) लोभी, (विदेश से) विदेशी, (सनक से) सनकी, (सरकार से) सरकारी, (सुख से) सुखी, (सूत से) सूती, (हठ से) हठी
- ऊन, सूत — द्रव्यवाचक संज्ञा। जंगल — समूहवाचक संज्ञा। बैसाख — व्यक्तिवाचक संज्ञा। कामयाब, झक, दुःख, भार, लालच, लोभ, सनक, सुख, हठ — भाववाचक संज्ञा। गुलाब, देशी, बैंगन, विदेशी, सरकार — जातिवाचक संज्ञा।
- कामयाब, गुलाब, सरकार — (फारसी)
- भाषा और जाति— अँग्रेजी, अफ्रीकी, अमरीकी, अरबी, अवधी, असमी, इजराइली, ईरानी, कश्मीरी, कोंकणी, कोरियाई, गुजराती, चीनी, जापानी, नेपाली/नैपाली, पंजाबी, बंगाली, मराठी, मलयाली, मारवाड़ी, मिस्री, यूनानी, रूसी, विलायती, हिन्दी (भाषा), हिन्दुस्तानी।
- टिप्पणी— कुछ शब्द ऐसे हैं जिससे केवल भाषा का बोध होगा; जैसे— हिन्दी। कुछ शब्द ऐसे हैं जिससे केवल जाति अर्थात् देशवासी का बोध होगा; जैसे— हिन्दुस्तानी।
- लघुतावाचक/ऊनतावाचक संज्ञा— (उपला से) उपली, (कंकड़ से) कंकड़ी, (कटोरा से) कटोरी, (कड़ा से) कड़ी, (खूँटा से) खूँटी, (गगरा से) गगरी, (गट्ठर से) गठरी, (गोला से) गोली, (घंटा से) घंटी, (घाट से) घाटी, (चमचा से) चमची, (चिमटा से) चिमटी, (छूरा से) छूरी, (झोंपड़ा से) झोंपड़ी, (झोला से) झोली, (टोकरा से) टोकरी, (टोप से) टोपी, (डोरा से) डोरी, (ढोलक से) ढोलकी, (तुंड से) तुंडी, (नाला से) नाली, पटरी, (पहाड़ से) पहाड़ी, (प्याला से) प्याली, (भट्ठा से) भट्ठी, (मटका से) मटकी, (रस्सा से) रस्सी, (हथौड़ा से) हथौड़ी।
- भूषणार्थक— (अँगूठा से) अँगूठी, (कंठा से) कंठी, (जीभ से) जीभी, पहुँची, (टुकड़ा से) टुकड़ी, पैरी
- व्यवसायवाचक/व्यापारवाचक संज्ञाएँ— (तंबोल / तमोल से) तँबोली / तमोली, (तेल से) तेली, (धोवन → धोब से) धोबी, (माल/माला से) माली
- विशेषण → भाववाचक संज्ञा— (गृहस्थ से) गृहस्थी, (चतुर से) चातुरी, (चालाक से) चालाकी, (बुद्धिमान से) बुद्धिमानी, (सावधान से) सावधानी।
- इस अर्थ में यह उर्दू (फारसी/अरबी) शब्दों में भी आता है— (गरीब से) गरीबी, (नादान से) नादानी, (नेक से) नेकी, (बद से) बदी, (मुहताज से) मुहताजी, (सुस्त से) सुस्ती इत्यादि।
- संख्यावाचक विशेषण → समूहवाचक संज्ञा— (बीस से) बीसी, (बत्तीस से) बत्तीसी, (पच्चीस से) पच्चीसी
- संज्ञा → भाववाचक संज्ञा— (किसान से) किसानी, (खेत से) खेती, (गुण्डा/गुंडा से) गुण्डई/गुंडई, (घड़ीसाज से) घड़ीसाजी, (चमार से) चमारी, (चोर से) चोरी, (जज से) जजी, (जालसाज से) जालसाजी, (डाका से) डकैती, (डॉक्टर से) डॉक्टरी, (दलाल से) दलाली, (दोस्त से) दोस्ती, (बदमाश से) बदमाशी, (महाजन से) महाजनी, (मेहमान से) मेहमानी, (सर्राफ़ से) सर्राफ़ी।
- (सवार से) सवारी— यात्री के अर्थ में जातिवाचक संज्ञा है।
- यह प्रत्यय इस अर्थ में अँग्रेजी और उर्दू (अरबी/फारसी) शब्दों में भी लगता है— डॉक्टर, जज (अँग्रेजी)। जालसाज, दलाल, दोस्त, बदमाश, मेहमान, सर्राफ़ उर्दू (अरबी/फारसी)।
- अव्यय → विशेषण— (अंदर से) अंदरूनी, (बाहर से) बाहरी, (भीतर से) भीतरी
- अंदर (फारसी)
- पुल्लिंग → स्त्रीलिंग
- (आकारांत संज्ञा से ईकारांत संज्ञा (-आ से -ई))— (काका से) काकी, (चाचा से) चाची, (जीजा से) दीदी, (गधा से) गधी, (गीदड़ से) गीदड़ी, (घोड़ा से) घोड़ी, (चींटा से) चींटी, (ताया से) ताई, (दादा से) दादी, (दोहता से) दोहती, (नाना से) नानी, (नाला से) नाली, (पोता से) पोती, (बकरा से) बकरी, (बेटा से) बेटी, (भतीजा से) भतीजी, (भांजा से) भांजी, (मामा से) मामी, (मुर्गा से) मुर्गी, (मौसा से) मौसी, (लड़का से) लड़की, (साला से) साली।
- टिप्पणी— जीजा – जीजी; दादा – दीदी (?)। भानजा : भानजी।
- परन्तु कुछ अकारांत (व्यंजनांत) संज्ञापदों से भी “ई” प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग शब्द बनता है; जैसे— (कबूतर से) कबूतरी, (गीदड़ से) गीदड़ी, मेंढक से मेंढकी, (हिरन से) हिरनी।
- आकारांत विशेषण शब्दों से स्त्रीलिंग— (अंधा से) अंधी, (अच्छा से) अच्छी, (काला से) काली, (खोटा से) खोटी, (गंदा से) गंदी, (गहरा से) गहरी, (गूँगा से) गूँगी, (छोटा से) छोटी, (जूठा से) जूठी, (झूठा से) झूठी, (टेढ़ा से) टेढ़ी, (ढीला से) ढीली, (थोड़ा से) थोड़ी, (दोरंगा से) दोरंगी, (नकटा से) नकटी, (नंगा से) नंगी, (पतला से) पतली, (बुरा से) बुरी, (भला से) भली, (भेंगा से) भेंगी, (मीठा से) मीठी, (मैला से) मैली, (मोटा से) मोटी, (लड़ाका से) लड़ाकी, (सादा से) सादी, (सुथरा से) सुथरी, (हल्का से) हल्की
- (आकारांत संज्ञा से ईकारांत संज्ञा (-आ से -ई))— (काका से) काकी, (चाचा से) चाची, (जीजा से) दीदी, (गधा से) गधी, (गीदड़ से) गीदड़ी, (घोड़ा से) घोड़ी, (चींटा से) चींटी, (ताया से) ताई, (दादा से) दादी, (दोहता से) दोहती, (नाना से) नानी, (नाला से) नाली, (पोता से) पोती, (बकरा से) बकरी, (बेटा से) बेटी, (भतीजा से) भतीजी, (भांजा से) भांजी, (मामा से) मामी, (मुर्गा से) मुर्गी, (मौसा से) मौसी, (लड़का से) लड़की, (साला से) साली।
ईला
- संज्ञा → विशेषण बनानेवाला
- (काँटा से) कँटीला/कटीला, (कंठ से) कंठीला, (खर्च से) खर्चीला, (गंध से) गंधीला, (गाँठ से) गठीला, (चटक से) चटकीला, (चोट से) चुटीला, (छवि → छबि से) छबीला, (जहर से) जहरीला, (तड़क से) तड़कीला, (नशा से) नशीला, (नोक से) नोकीला/नुकीला, (पानी से) पनीला, (पपड़ी से) पपड़ीला, (पेच से) पेचीला, (फुरती से) फुरतीला, (बर्फ से) बर्फीला, (भड़क से) भड़कीला, (मटक से) मटकीला, (महक से) महकीला, (रंग से) रँगीला, (रस से) रसीला, (रेत से) रेतीला, (लचक से) लचकीला, (लचक/लच से) लचीला, (लाज से) लजीला, (शर्म से) शर्मीला, (साज/सज से) सजीला, (सुर से) सुरीला।
- खर्च, जहर, नशा, नोक, पेच, बर्फ— फारसी।
- टिप्पणी— महिला = मह् (धातु) + इल (इलच्) + आ (टाप्); अर्थात् ईला धातु से निर्मित नहीं है। नोक से नोकीला और नुकीला दोनों बना है। लचक से लचकीला और लचीला दोनों बना है।
- (गोबर से) गोबरीला (संज्ञा)— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में गोबर + ईला = गोबरीला। परन्तु हमें हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी शब्दकोश’ में गौबरैला और गौबरौरा शब्द मिलता है; श्यामसुन्दर दास कृत ‘हिन्दी शब्द-सागर’ में गोबरैला (गोबर + ऐला) और गोबरौला (गोबर + औला) शब्द मिलता है; R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ गोबरैला और गुबरैला शब्द मिलता है।
ईसा
- (उत् → ऊस से) उसीसा, (मूँड/मूँड़ से) मुँडीसा/मुँड़ीसा
- उसीसा— उत् + शीर्ष = उत्-शीर्ष (उच्छीर्ष) → उस्सीसक → उसीसा
उआ
- संज्ञा → विशेषण— (खार या खारु से) खारुआ, (गेरू से) गेरुआ, (गेहूँ से) गेहुँआ, (मधूक → महुअ → महु से) महुआ
- संज्ञा → संज्ञा— (अग्र → आगे से) अगुआ, (टहल से) टहलुआ, (फाग से) फगुआ, (मछली से) मछुआ
- लघुतावाचक संज्ञा बनानेवाला— (आँख से) अँखुआ, (बाबू से) बबुआ, (लाल से) ललुआ।
- स्त्रीलिंग → पुल्लिंग— (राँड + उआ से) रँडुआ
- टिप्पणी— ‘उआ’ और ‘उवा’— हिन्दी में जब दो स्वर (जैसे ‘उ’ और ‘आ’) पास-पास आते हैं, तो उच्चारण को सुगम बनाने के लिए उनके बीच में ‘व’ की ध्वनि स्वतः आ जाती है। इसे व्याकरण में ‘श्रुति-मूलक व’ कहते हैं। क्षेत्रीय प्रभाव— पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) और बिहार की बोलियों (भोजपुरी, मगही) में ‘उआ’ का उच्चारण ‘उवा’ के रूप में बहुत अधिक होता है; जैसे— मछुआ → मछुवा, गेहुँआ → गेहुँवा। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’; कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘उआ’ प्रत्यय मिलता है। ‘उआ’ का प्रयोग वांछनीय है, परन्तु जो शब्द ‘व’ (उवा) के साथ रूढ़ हो गये हैं वो स्वीकारा कर लिए गये हैं; जैसे— (बटना से) बटुवा।
ऊ
- प्रेम / दुलार में— (जगन्नाथ से) जग्गू, नंदू, (नन्हा से) नन्हू, (बच्चा से) बच्चू, (भोला से) भोलू, (लल्ला से) लल्लू, (श्याम से) श्यामू
- विशेषण बनानेवाला— (गरज से) गरजू, (घर से) घरू, (जंगल से) जाँगलू, (झाँसा से) झाँसू, (झेंप से) झेंपू, (डर से) डरू, (ढाल से) ढालू, (दूध से) दुधारू, (पेट से) पेटू, (बाजार से) बाजारू।
- (दुहाज से) दुहाजू (संज्ञा), (हित-संज्ञा/विशेषण से) हितू (संज्ञा)
- बदनाम बनानेवाला, अपमानबोधक— कल्लू, गबरू, (नाक से) नक्कू, (बुद्ध से) बुद्धू, मंगरू, मुल्लू, सटरू
- अवधी भाषा में उ या ऊ लगाने की प्रवृत्ति (श्रीरामचरितमानस)— रामू, आपू, प्रतापू, लोगू, योगू अथवा रामु, आपु, पितु, मातु।
ए
- संज्ञा/विशेषण → क्रिया-विशेषण या संबंधसूचक
- संज्ञा से— (आगा से) आगे, (तड़का से) तड़के, (धीरा से) धीरे, (पीछा से) पीछे, (बदला से) बदले, (लेखा से) लेखे, (सामना से) सामने
- विशेषण से— (ऐसा से) ऐसे, (जैसा से) जैसे, (वैसा से) वैसे
ऐं
- क्रमवाचक
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में
पाँचें,सातें,आठें,नवें,दसेंको ‘ऐं’ प्रत्यय से निर्मित क्रमवाचक बताया गया है, परन्तु ये रूप अशुद्ध हैं, वस्तुतः पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें, दसवें सही और मानक रूप हैं। (पाँच + वाँ = पाँचवाँ से) पाँचवें, (सात + वाँ = सातवाँ से) सातवें, (आठ + वाँ = आठवाँ से) आठवें, (नवाँ से) नवें या (नौवाँ से) नौवें, (दस + वाँ = दसवाँ से) दसवें
एर
- (अंध से) अँधेर, (मूँड़ से) मुँड़ेर
एरा
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा— (काँसा से) कसेरा, (चित्र से) चितेरा, (पट से) पटेरा, (पथ से) पथेरा, (लाख से) लखेरा, (साँप से) सँपेरा।
- टिप्पणी— इन शब्दों को कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में व्यापारवाचक शब्द कहा गया है।
- भाववाचक संज्ञा— (अंध से) अँधेरा
- विशेषण— (घन से) घनेरा, (बहुत से) बहुतेरा
- टिप्पणी— इन शब्दों को कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में गुणवाचक शब्द कहा गया है।
- सम्बन्धवाचक— (काका से) ककेरा, (चाचा से) चचेरा, (फूफा से) फुफेरा, (मामा से) ममेरा, (मौसा से) मौसेरा
एड़ी
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा
- (गाँजा से) गँजेड़ी, (भाँग से) भँगेड़ी
एली
- (हाथ से) हथेली
- टिप्पणी— (प्रहेलिका से) पहेली, (सह + अली से) सहेली; अर्थात् ये शब्द ‘एली’ प्रत्यय से नहीं बने हैं।
एल / एला / ऐल / ऐला
- संज्ञा → संज्ञा (-एल से)— (नाक से) नकेल, (फूल से) फुलेल
- विशेषण → विशेषण (-एला से)— (एक से) अकेला, (दब्बू से) दबेला, (दो / दुक्का से) दुकेला, (दुःख → दुह से) दुहेला, (नव से) नवेला, (सोह से) सुहेला,
- क्रिया → विशेषण (-एला से) — (दबना) से दबेला, (दुहना से) दुहेला।
- दुहेला— 1. दुःख → दुह + एला = दुहेला। 2. दुहना → दुह + एला = दुहेला।
- दबेला और दबैला— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में दब्बू (विशेषण) में एला प्रत्यय के योग से दबेला (विशेषण) का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English-Dictionary’ में दबना (क्रिया) में ऐल-प्रत्यय के लगने से दबैल (संज्ञा, विशेषण) का निर्माण बताया गया है।
- संज्ञा → विशेषण (-एला से)— (आधा से) अधेला (संज्ञा), (गह से) गहेला, (घर से) घरेला, (बाघ से) बघेला, (मोर से) मुरेला, (सौत से) सौतेला
- संज्ञा → विशेषण (-ऐल से)— (खपड़ा/खपरा से) खपड़ैल/खपरैल, (तोंद से) तोंदैल, (दूध से) दुधैल, (दाँत से) दँतैल,
- संज्ञा → विशेषण (-ऐला से)— (काठ से) कठैला, (कषाय → कस से) कसैला, (खपड़ा/खपरा से) खपड़ैला/खपरैला, (गंध से) गंधैला, (तुंद/तोंद से) तुंदैला/तोंदैला, (धूम से) धुमैला, (वन → बन से) बनैला, (भादों से) भदैला, (मूँछ से) मुँछैला, (मोर से) मुरैला / मोरेला
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में खपरैला (ऐला प्रत्यय) दिया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में खपरा से खपरैल (ऐल प्रत्यय) का निर्माण बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी शब्द-कोश’, श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English-Dictionary’ में खपरैल और खपड़ैल दोनों मिलते हैं, इन तीनों शब्दकोशों में खपड़ैल/खपड़ैल को संज्ञा बताया गया है। परन्तु कामताप्रसाद गुरु और वासुदेवनन्दन प्रसाद इसे विशेषण मानते हैं। डॉ॰ हरदेव बाहरी खपरैला को विशेषण मानते हैं। खपरा शब्द संस्कृत के ‘खर्पर’ से आया है।
- सुहेला— 1. सु (उपसर्ग) + हेल (मेल/खेल) → सुहेल (संज्ञा/विशेषण) + आ (प्रत्यय) = सुहेला। 2. सुख → सुह + एला = सुहेला। 3. सुहेल (अरबी) + आ (प्रत्यय) = सुहेला।
ऐत
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा या व्यवसायवाचक
- (कड़खा से) कड़खैत, (गतका से) गतकैत, (टीका से) टिकैत, (डाका से) डकैत, (दंगा से) दंगैत, (नाता से) नतैत, (विरद → बरद से) बरदैत, (भाला से) भालैत, (लट्ठ से) लठैत, (लरछा से) लरछैत, (लात से) लतैत
ओं
- चारों, दोनों, लाखों, सैकड़ों
ओई
- स्त्रीलिंग से पुल्लिंग
- (ननद + ओई से) ननदोई, (बहिन + ओई से) बहनोई
ओट / ओटा
- (चाम से) चमोटा, (लंग से) लंगोट
ओला
- लघुतावाचक / ऊनतावाचक संज्ञा
- (खाट से) खटोला, (गढ़ से) गढ़ोला, (घड़ा से) घड़ोला, (पट से) पटोला, (फफ से) फफोला, (बात से) बतोला, (माँझ से) मँझोला, (साँप से) सँपोला।
औटा
- अपत्यवाचक (उसका बच्चा)
- (पहला से) पहलौटा, (बिल्ली से) बिलौटा, (हिरन से) हिरनौटा
औटी
- (अक्षर से) अक्षरौटी, (चूना से) चुनौटी, (सच से) सचौटी, (हाथ से) हथौटी
औड़ा / औड़ी
- (बरस से) बरसौड़ी, (हाथ से) हथौड़ा
- टिप्पणी— हथौड़ा (हाथ + औड़ा) + ई = हथौड़ी; अर्थात् हथौड़ी शब्द ई प्रत्यय से बना है न कि औड़ी से।
औता / औती
- भाववाचक संज्ञा— (बाप से) बपौती, (बूढ़ा से) बुढ़ौती
- बाप (संज्ञा), बूढ़ा (संज्ञा, विशेषण)
- अधिकरण (पात्र या स्थान) बोधक संज्ञा— (काजर/काजल से) कजरौटा/कजलौटा, (काठ से) कठौता
- कजरौटा/कजलौटा और कठौती लघुतावाचक/ऊनतावाचक हैं जो ‘ई’ प्रत्यय से बने हैं।
क
- अनुकरणवाचक मूल अव्यय → नाम— (खट से) खटक, (तड़ से) तड़क, (धड़ से) धड़क, (धम से) धमक, (भड़ से) भड़क
- समुदायवाचक संज्ञा— चौक
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘क’ प्रत्यय से निर्मित चौक के साथ ही “पंचक, सप्तक और अष्टक” का भी निर्माण बताया गया है, परन्तु ये शब्द संस्कृत प्रत्यय के अंतर्गत आता है; जैसे— पंच + क (कन्) = पंचक।
- स्वार्थक अर्थ में— (कहुँ से) कहुँक, (ठंड/ठंढ से) ठंडक/ठंडक, (ढोल से) ढोलक
- कहुँक— कविताओं में प्रयोग
- संज्ञा → भाववाचक संज्ञा— कड़क, कसक, झनक, झलक, ठंडक, ठनक, धमक, भनक, मटक, महक, लटक, लपक
- टिप्पणी— इनमें से कई शब्द अनुकरणात्मक और भाववाचक हैं; जैसे— धमक।
कर, करके
- क्रिया-विशेषण
- (क्यों से) क्योंकर, (खास से) खासकर, बहुत-करके, (विशेष से) विशेषकर
का
- स्वार्थक अर्थ में— (चुप से) चुपका, (छाप से) छपका, (छोटा से) छुटका, (बड़ा से) बड़का, (बूँद से) बुँदका
- समुदायबोधक संज्ञा— इक्का, चौका, छक्का, दुक्का
- विविध— (मा से) मैका, (माटी से) मटका, (लाड़ से) लड़का
- अनुकरणात्मक ध्वनिबोधक संज्ञा— कड़का, खटका, घचका, चुपका, छौंका, झटका, झाँका, झोंका, टपका, टोटका, दचका, दारक, धचका, पटका, फुलका, भनका, भभका, लचका, हचका, हलका, हाँका
- (कड़क से) कड़का, (खट से) खटका, (घच से) घचका, (चुप) चुपका, (छौंक से) छौंका, (झटकना से) झटका, (झाँकना) झाँका, (झोंकना से) झोंका, (टप/टपकना से) टपका, टोटका, (दच/दचकना से) दचका, (दर/दरकना से) दरका, दारक, (धच/धचकना से) धचका, (पट/पटकना से) पटका, (भिन/भन/भिनकना से) भनका, (भाप/भभकना से) भभका, (लचकना से) लचका, (हच/हचकना से) हचका, (हल से) हलका, (हाँक/हाँकना से) हाँका। ?
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में अनुकरणात्मक ध्वनिबोधक संज्ञा के उदाहरण में “कड़का, खटका, घचका, चुपका, छौंका, झटका, झाँका, झोंका, टपका, टोटका, दचका, दारक, धचका, पटका, फुलका, भनका, भभका, लचका, हचका, हलका, हाँका” शब्द दिया है, साथ-ही खटका और झोंका को भाववाचक संज्ञा भी बताया गया है। इन शब्दों में से कई को कृदंत भी माना जा सकता है; जैसे— (छीलना से) छिलका, (फूलना से) फुलका इत्यादि। इसी तरह कई शब्द ऐसे भी हैं जिन्हें ‘आ’ और ‘का’ दोनों से बन सकते हैं; जैसे— कड़ + का → कड़का या कड़क + आ → कड़का, इत्यादि।
की
- ऊनवाचक
- (कण → कन से) कनकी, (टिम से) टिमकी
चंद
- विनोद या आदर सूचक संज्ञाओं में
- गीदड़चंद, मूसलचंद, वामनचंद
जा
- संबंधवाचक— भतीजा, भानजा
- क्रमवाचक— दूजा, तीजा
जी
- आदरवाचक— गुरुजी, पंडितजी, बाबूजी, (नाम + जी)
टा / टी
- लघुता / ऊनतावाची संज्ञा
- (काला से) कलूटा, (चोर से) चोट्टा, (बहू से) बहूटी, (रोआँ से) रोंगटा
ठो
- संख्यावाचक शब्दों के साथ अनिश्चय अर्थ में— दो-ठो, चार-ठो, पाँच-ठो इत्यादि।
ड़ा / ड़ी
- लघुतावाचक / ऊनतावाचक संज्ञा— (आँत से) अँतड़ी, (काठ से) काठड़ा, (चाम से) चमड़ा, चमड़ी, (चीथा से) चिथड़ा, (झड़ से) झड़ी, (झाड़ से) झाड़ी, (टाँग से) टँगड़ी, (टूक से) टुकड़ा, (तुंबा/तूँबा से) तूमड़ी/तूँबड़ी, (दुख से) दुखड़ा, (पंख से) पँखड़ी (पंखुड़ी), (पलँग से) पलँगड़ी, (पल्ला से) पलड़ा, (बच्छा से) बछड़ा, बछड़ी, (मुख से) मुखड़ा, (लँग से) लँगड़ा, (लाड़ से) लाड़ली, (संदूक से) संदूकड़ी
- अधिकरण (स्थानवाचक) संज्ञा— (आगा से) अगाड़ी, (पीछा से) पिछाड़ी
त
- भाववाचक संज्ञा
- (चाह से) चाहत, (मेल से) मिल्लत, (रंग से) रंगत
ता
- विविध अर्थ में— पाँयता, (राई से) रायता
ती
- भाववाचक संज्ञा— (कम से) कमती
- कम फारसी शब्द है।
तना
- सर्वनाम → परिमाणबोधक— (यह से) इतना, (वह से) उतना, (कौन से) कितना, (जो से) जितना
- टिप्पणी— व्यवहारिक मत : यह (सर्वनाम) + तना = इतना (यह → इ)। वह (सर्वनाम) + तना = उतना (वह → उ)। कौन (सर्वनाम) + तना = कितना (कौन → कि)। जो (सर्वनाम) + तना = जितना (जो → जि)। भाषा-वैज्ञानिक मत : वस्तुतः ये संस्कृत के परिमाणवाचक विशेषण हैं जो प्राकृत से होते हुए हिन्दी में आये हैं। इयत् → इतना। इसे इस तरह समझ सकते हैं—
| संस्कृत (मूल) | प्राकृत / अपभ्रंश | पुरानी हिन्दी | आधुनिक हिन्दी (मानक) |
| इयत् / एतावत् | एत्तिअ / एत्तिउ | एतना / इतनो | इतना |
| तावत् | तेत्तिअ / तेत्तिउ | ओतना / उतनो | उतना |
| कियत् | केत्तिअ / केत्तिउ | केतना / कितनो | कितना |
| यावत् | जेत्तिअ / जेत्तिउ | जेतना / जितनो | जितना |
था
- संख्या-क्रमवाचक— चौथा, छठा
नी
- विविध अर्थ में— (चाँद से) चाँदनी, (नथ से) नथनी, (पाँव से) पैंजनी
नी
- पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनानेवाला
- (ऊँट से) ऊँटनी, (जाट से) जाटनी, (जादूगर से) जादूगरनी, (ठग से) ठगनी, (डोम से) डोमनी, (नट से) नटनी, (प्रेत से) प्रेतनी, (बाघ से) बाघनी, (भील से) भीलनी, (भूत से) भूतनी, (महाराज से) महारानी, (मोर से) मोरनी, (रीछ से) रीछनी, (शेर से) शेरनी, (साजन से) सजनी, (सरदार से) सरदारनी, (सिंह से) सिंहनी, (हंस से) हंसनी, (हाथी से) हथिनी।
पन
- भाववाचक संज्ञा
- (अंधा से) अंधापन, (अक्खड़ से) अक्खड़पन, (अपना से) अपनापन, (अल्हड़ से) अल्हड़पन, (उपजाऊ से) उपजाऊपन, (ओछा से) ओछापन, (कंजर से) कंजरपन, (कच्चा से) कच्चापन, (कमीना से) कमीनापन, (काला से) कालापन, (कसाई से) कसाईपन, (गँवार से) गँवारपन, (गधा से) गधापन, (चुलबुला से) चुलबुलापन, (चौथा से) चौथापन, (छोटा से) छुटपन, (टिकाऊ से) टिकाऊपन, (टुच्चा से) टुच्चापन, (टेढ़ा से) टेढ़ापन, (दबंग से) दबंगपन, (देहाती से) देहातीपन, (नटखट से) नटखटपन, (निखट्टू से) निखट्टूपन, (नीला से) नीलापन, (पराया से) परायापन, (पागल से) पागलपन, (पीला से) पीलापन, (पूर्ण से) पूर्णपन, (फूहड़ ले) फूहड़पन, (बच्चा से) बचपन, (बड़ा से) बड़प्पन, (बाँक से) बाँकपन, (बाँझ से) बाँझपन, (बाल से) बालपन, (बेतुका से) बेतुकापन, (बेहूदा से) बेहूदापन, (भड़ुआ से) भड़ुआपन, (भद्दा से) भद्दापन, (भेंगा से) भेंगापन, (भोंड़ा से) भोंड़ापन, (भोंदू से) भोंदूपन, (भोला से) भोलापन, (रंडी से) रंडापन, (रूखा से) रूखापन, (लड़का से) लड़कपन, (लच्छड़ से) लच्छड़पन, (लीचड़ से) लीचड़पन, (लुच से) लुचपना, (लुच्चा से) लुच्चापन, (सनकी से) सनकीपन, (सिड़ी से) सिड़ीपन, (सीना से) सीनापन, (सूना से) सूनापन, (सीधा से) सीधापन।
पा (आपा)
- भाववाचक संज्ञा
- (अपना से) अपनापा, (कूट से) कुटनापा, (छोटा से) छुटापा, (जला से) जलापा, (पूजा से) पुजापा, (बहन/बहिन से) बहनापा/बहिनापा, (बूढ़ा से) बुढ़ापा, (मोटा से) मोटापा/मुटापा, (राँड़ से) रँड़ापा (रँडापा), (सुघड़ से) सुघड़ापा
- टिप्पणी— पा और आपा: डॉ॰हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में “आपा” प्रत्यय से उपर्युक्त भाववाचक संज्ञा का निर्माण बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में “पा” प्रत्यय से उपर्युक्त भाववाचक संज्ञा का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में “आपा” और “पा” दोनों का प्रत्यय के रूप में उल्लेख है और आपा = पा बताया गया है।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘आप’ प्रत्यय के अन्तर्गत जलना से जलापा और पूजना से पुजापा का निर्माण बताया गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आपा’ प्रत्यय के अंतर्गत जला से जलापा और पूजा से पुजापा का निर्माण बताया गया है। R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में जला से जलापा का निर्माण बताया गया है।
ब
- काल के अर्थ में— (यह से) अब, (कौन से) कब, (जो से) जब, (वह से) तब
भगवान
- आदरसूचक— वेद-भगवान
- विनोद (हास्य)— बंदर-भगवान
यों
- (कौन से) क्यों, (जो से) ज्यों, (वह से) त्यों, (यह से) यों
राम
- आदरसूचक— माताराम, पिताराम
- निरादर और विनोद— दूतराम, मेंढकराम, गीदड़राम
री
- लघुता / ऊनतावाची संज्ञा
- (कोठा से) कोठरी, (छत्ता से) छतरी, (बाँस से) बाँसुरी, (मोट से) मोटरी
ल
- विविध अर्थ में
- (घाव → घाय से) घायल, (पाँव → पाय से) पायल
ला
- विशेषण
- (आगे से) अगला, (ऊपर से) उपरला, (धुंध से) धुँधला, (नीचे से) निचला, (पीछे से) पिछला, (बाव से) बावला, (मध्य → माँझ से) मँझला, (लाड़ से) लाड़ला
ली
- ऊनतावाचक
- (खाज से) खुजली, (घंटा से) घंटाली, (टीका से) टिकली (टिकुली), (डफ से) डफली, (सूप से) सुपली
वंत
- गुण-अर्थ में
- (गुण से) गुणवंत, (दया से) दयावंत, (धन से) धनवंत, (शील से) शीलवंत
वाँ
- संख्या → क्रमवाचक
- पाँचवाँ, छठवाँ (छठा) सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ (नवाँ), दसवाँ, ग्यारहवाँ, बारहवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ, पंद्रहवाँ, सोलहवाँ, सत्रहवाँ, अठारहवाँ, उन्नीसवाँ, बीसवाँ, तीसवाँ, बयालीसवाँ, चौवनवाँ, अस्सीवाँ, बानबेवाँ, सौवाँ; इसी तरह हजारवाँ, लाखवाँ, करोड़वाँ, अरबवाँ, खरबवाँ इत्यादि
वा
- ऊनतावाचक
- (पुर से) पुरवा, (बच्चा से) बचवा, (बच्छ/बच्छा से) बछवा, (बेटा से) बेटवा/बिटवा, (मर्द से) मर्दवा, (रघुनाथ से) रघुनथवा
- टिप्पणी— पूर्वी हिन्दी में प्रयोग
वाल
- (कोट → कोत से) कोतवाल, (गया से) गयावाल, (पल्ली से) पल्लीवाल, (प्रयाग से) प्रयागवाल
- टिप्पणी— यह वाला प्रत्यय का शेष है, अर्थात् “वाला → वाल”।
वाला
- संज्ञा → कर्तृवाचक संज्ञा
- अखबारवाला, इक्केवाला, कलईवाला, कामवाला, किस्मतवाला, घरवाला, खोंचेवाला, गाड़ीवाला, जूतेवाला, टैक्सीवाला, टोपीवाला, दाढ़ीवाला, दूधवाला, धनवाला, पालकीवाला, पालिशवाला, पुलिसवाला, पैसेवाला, फूलवाला, फेरीवाला, बंसीवाला, बेटीवाला, बेटेवाला, मुरलीवाला, रंगवाला, रिक्शेवाला, सब्ज़ीवाला।
- चीनवाला, जापानवाला, रूसवाला,
- गाँववाला, दक्षिणवाला, मुहल्लेवाला, मेरठवाला, शहरवाला
- क्रिया-विशेषण → कर्तृवाचक संज्ञा
- अंदरवाला, ऊपरवाला, दूरवाला, नीचेवाला, पासवाला, बाहरवाला, सामनेवाला
स
- भाववाचक संज्ञा— (आप से) आपस, (घाम से) घमस
- क्रमवाचक संज्ञा— (ग्यारह से) ग्यारस, (बारह से) बारस, (तेरह से) तेरस, (चौदह से) चौदस
सा
- लघुता/ऊनतावाची संज्ञा— (अच्छा से) अच्छा-सा, (उड़ता से) उड़ता-सा, (ऊँचा से) ऊँचा-सा, (एक से) एक-सा, (खाली से) खाली-सा, (चालू से) चालू-सा, (दर्द से) दर्द-सा (नीला से) नीला-सा, (बुखार से) बुखार-सा, (भरा से) भरा-सा, (मरा से) मरा-सा, (लाल से) लाल-सा,
- परिमाणवाचक— (थोड़ा से) थोड़ा-सा, (बहुत से) बहुत-सा, (छोटा से) छोटा-सा
- प्रकारवाचक— (यह से) ऐसा, (वह से) वैसा, (कौन से) कैसा, (जो से) जैसा, (सो/तद् → त से) तैसा
सरा
- क्रमवाचक
- दूसरा, तीसरा
सों
- पूर्व-दिनवाचक
- नरसों, परसों
हर / हरा / हला / हार / हारा
- अधिकरण (पात्र और स्थान) बोधक संज्ञा (हरा से)— (काठ से) कठहरा → कटघरा, नैहर, पीहर
- संख्या + हरा; परतदार के अर्थ में— (एक से) इकहरा, (दो से) दोहरा, (तीन से) तिहरा, (चार से) चौहरा
- धातु + हरा/हला— (रूपा से) रुपहरा → रुपहला, (सोना से) सुनहरा → सुनहला
- हरा से— ककहरा
- व्यवसाय के अर्थ में—
- (दाल से) दलहरा, (फूल से) फुलहरा
- (घास से) घसिहारा (घसियारा), (चूड़ी से) चुड़िहारा, (पानी से) पनिहारा (पनिहार, पनहारा), (लकड़ी से) लकड़हारा
- (मणि → मनि से) मनिहार
- ‘हार’ वाला के अर्थ में— (खेना से) खेवनहार, (जानना से) जानहार, (मरना से) मरनहार, (रखना से) राखनहार, (होना से) होनहार
- (खनना से) खनहर
- (रोना से) रोवनहारा
हा
- (कबीर से) कबिराहा, (पानी से) पनिहा, (हल से) हलवाहा
ही
- सर्वनामों और क्रिया-विशेषणों में योग
- (अब से) अभी, (आज से) आजही, (उस से) उसी, (कब से) कभी, (किस से) किसी, (तुम से) तुम्हीं, (मैं से) मैंही, (यहाँ से) यहीं, (वह से) वही, (सब से) सभी इत्यादि।
विशेष
आया
- कटा-कटाया— कट (कटना) + आ → कटा; कटा (कटाना) + आ → कटाया। किया-कराया— कर (करना) + आ → करा/किया; करा (कराना) + आ → कराया। खुला-खुलाया— खुल (खुलना) + आ → खुला; खुला (खुलवाना/खोलना) + आ → खुलाया। गला-गलाया— गल (गलना) + आ → गला; गला (गलाना) + आ → गलाया। घिसा-घिसाया— घिस (घिसना) + आ → घिसा; घिसा (घिसाना) + आ → घिसाया। घुला-घुलाया— घुल (घुलना) + आ → घुलना; घुला (घोलना/घुलाना) + आ → घुलाया। चढ़ा-चढ़ाया— चढ़ (चढ़ना) + आ → चढ़ा; चढ़ा (चढ़ाना) + आ → चढ़ाया। चला-चलाया— चल (चलना) + आ → चला; चला (चलाना) + आ → चलाया। छिला-छिलाया— छिल (छिलना) + आ → छिला; छिला (छीलना/छिलाना) + आ → छिलाया। जमा-जमाया— जम (जमना) + आ → जमा; जमा (जमाना) + आ → जमाया। डरा-डराया— डर (डरना) + आ → डरा; डरा (डराना) + आ ; डराया। ढला-ढलाया— ढल (ढलना) + आ → ढला; ढला (ढालना/ढलाना) + आ → ढलाया। तुला-तुलाया— तुल (तुलना) + आ तुला; तुला (तौलना/तुलाना) + आ → तुलाया। धुला-धुलाया— धुल (धुलना) + आ → धुला; धुला (घुलाना) + आ → धुलाया। पढ़ा-पढ़ाया— पढ़ (पढ़ना) + आ → पढ़ा; पढ़ा (पढ़ाना) + आ → पढ़ाया। पला-पलाया— पल (पलना) + आ → पला; पला (पालना/पलाना) + आ → पलाया। फटा-फटाया— फट (फटना) + आ → फटा; फटा (फड़वाना/फटाना) + आ → फटाया। बना-बनाया— बन (बनना) + आ → बना; बना (बनाना) + आ → बनाया। बिछा-बिछाया— बिछ (बिछना) + आ → बिछा; बिछा (बिछाना) + आ → बिछाया। भुना-भुनाया— भुन (भुनना) + आ → भुना; भुना (भूनना/भुनाना) + आ → भुनाया। रखा-रखाया— रख (रखना) + आ → रखा; रखा (रखवाना) + आ → रखाया। लिखा-लिखाया— लिख (लिखना) + आ → लिखा; लिखा (लिखाना) + आ → लिखाया। सिला-सिलाया— सिल (सिलना) + आ → सिला; सिला (सिलाना) + आ → सिलाया।
| शब्द-युग्म | प्रथम पद का निर्माण (आधार – अकर्मक) | द्वितीय पद का निर्माण (आधार – सकर्मक/प्रेरणार्थक) |
| कटा-कटाया | कट (कटना) + आ | कटा (कटाना) + आ |
| किया-कराया | कर (करना) + आ = किया* | करा (कराना) + आ |
| खुला-खुलाया | खुल (खुलना) + आ | खुला (खुलवाना/खोलना) + आ |
| गला-गलाया | गल (गलना) + आ | गला (गलाना) + आ |
| घिसा-घिसाया | घिस (घिसना) + आ | घिसा (घिसाना) + आ |
| घुला-घुलाया | घुल (घुलना) + आ | घुला (घोलना/घुलाना) + आ |
| चढ़ा-चढ़ाया | चढ़ (चढ़ना) + आ | चढ़ा (चढ़ाना) + आ |
| चला-चलाया | चल (चलना) + आ | चला (चलाना) + आ |
| छिला-छिलाया | छिल (छिलना) + आ | छिला (छीलना/छिलाना) + आ |
| जमा-जमाया | जम (जमना) + आ | जमा (जमाना) + आ |
| डरा-डराया | डर (डरना) + आ | डरा (डराना) + आ |
| ढला-ढलाया | ढल (ढलना) + आ | ढला (ढालना/ढलाना) + आ |
| तुला-तुलाया | तुल (तुलना) + आ | तुला (तौलना/तुलाना) + आ |
| धुला-धुलाया | धुल (घुलना) + आ | धुला (धुलाना) + आ |
| पला-पलाया | पल (पलना) + आ | पला (पालना/पलाना) + आ |
| फटा-फटाया | फट (फटना) + आ | फटा (फड़वाना/फटाना) + आ |
| बना-बनाया | बन (बनना) + आ | बना (बनाना) + आ |
| बिछा-बिछाया | बिछ (बिछना) + आ | बिछा (बिछाना) + आ |
| भुना-भुनाया | भुन (भुनना) + आ | भुना (भूनना/भुनाना) + आ |
| मढ़ा-मढ़ाया | मढ़ (मढ़ना-अ.) + आ | मढ़ा (मढ़ना-स.) + आ |
| रखा-रखाया | रख (रखना) + आ | रखा (रखवाना) + आ |
| लिखा-लिखाया | लिख (लिखना) + आ | लिखा (लिखाना) + आ |
| सिला-सिलाया | सिल (सिलना) + आ | सिला (सिलाना) + आ |
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आया’ को विशेषण बनानेवाला प्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आया’ को प्रत्यय के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हिन्दी शब्दकोशों— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’, श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ में ‘आया’ को प्रत्यय नहीं माना गया है। ‘आया’ भूतकालिक कृदंत है जो ‘आना’ से बना है; आना → आ + आ → या = आया; जैसा कि हम जानते हैं कि हिन्दी में ‘ना’ हटाने से धातु प्राप्त होता है (आना = आ + ना, चलना = चल + ना)। इन क्रियाओं का वर्तमानकालिक क्रियाद्योतक कृदंत-विशेषण बनाने के लिए ‘ता’ प्रत्यय जोड़ा जाता है और भूतकालिक क्रियाद्योतक कृदंत-विशेषण बनाने के लिए ‘आ’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। यही ‘आ’ प्रत्यय श्रुति-मधुर या उच्चारण को आसान बनाने के लिए ‘या’ हो जाता है; उदाहरणार्थ— देना से दिया, धोना से धोया। परन्तु उपर्युक्त शब्दों को हम प्रायः युग्म में प्रयोग करते हैं, इन्हें व्याकरण में ‘अनुकरणवाचक’ या ‘सहचर’ शब्द-युग्मों की श्रेणी में रखा जाता है। इस युग्म का पहला पद अकर्मकरूप होता है और दूसरा पद सकर्मक या प्रेरणार्थकरूप। ये युग्म किसी कार्य की पूर्णता या उस कार्य के बने-बनाए स्वरूप को प्रकट करते हैं; जैसे— मुझे बना-बनाया भोजन मिला।
- निर्माण— 1. मूल अकर्मक क्रिया की धातु में ‘आ’ प्रत्यय जोड़कर बनाया जाता है; जैसे— कटना → कट + आ = कटा। 2. उसी क्रिया के सकर्मक या प्रेरणार्थक रूप में ‘आ’ प्रत्यय जोड़ा जाता है; जैसे— कटा + आ = कटाया।
आवटी (आवट + ई)
- दिखावटी, बनावटी, रुकावटी, सजावटी
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘आवटी’ को विशेषण बनानेवाला प्रत्यय बताया गया है। कमाता प्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘आवटी’ जैसा कोई प्रत्यय नहीं है। हिन्दी शब्दकोशों- डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’, श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’- में ‘आवटी’ जैसा कोई प्रत्यय नहीं मिलता है, हाँ R. S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’ में ‘आवट’ प्रत्यय मिलता है। वस्तुतः ‘आवट’ से निर्मित शब्दों में ‘ई’ प्रत्यय जोड़कर विशेषण का निर्माण होता है; जैसे— बन (बनना) + आवट = बनावट। बनावट भाववाचक संज्ञा है। बनावट + ई = बनावटी। बनावटी विशेषण है।
एती
- कालवाचक या अवस्थावाचक विशेषण
- (आगे से) अगेती, (पीछे से) पछेती
- टिप्पणी— कृषि-लोकभाषा में उपयोग; जैसे— अगेती फसल, पछेती फसल।
कार
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- (खन से) खनकार, (चह) चहकार, (चीत से) चीतकार, (जय से) जयकार, (झं से) झंकार, (झन से) झनकार, (टन से) टंकार, (ठन से) ठनकार, (धिक् से) धिक्कार, (फुँ से) फुंकार, (फुत से) फुतकार
घर
- घर पूर्ण शब्द है।
- घंटाघर, चिड़ियाघर, टिकटघर, डाकघर, तारघर, पौधघर, बंदीघर, बिजलीघर, भंडारघर, मुरदाघर, रसोईघर, सामानघर, स्नानघर
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में घर से निर्मित कई शब्दों का उदाहरण देते हुए इसे (घर) ‘अधिकरण (पात्र और स्थान) बोधक संज्ञा बनानेवाला बताया गया है। जबकि इसी पुस्तक में घर से निर्मित दो शब्दों (भंडारघर, रसोईघर) को तत्पुरुष (सम्प्रदान) समास का उदाहरण बताया गया है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में रसोईघर शब्द मिलता है और उसे तत्पुरुष (सम्प्रदान) समास के तहत रखा गया है। इसलिए घर से निर्मित उपर्युक्त शब्द समास के उदाहरण हैं। जैसे— रसोईघर = रसोई के लिए घर (सम्प्रदान तत्पुरुष समास) अथवा रसोई का घर (सम्बन्ध तत्पुरुष समास)। इसी तरह अन्य का भी विग्रह करते हुए समास पहचान सकते हैं।
मार
- ‘मार’ पूर्ण शब्द है।
- (गोता से) गोतामार, (चिड़ी से) चिड़ीमार, (छापा से) छापामार, (झपट्टा से) झपट्टामार, (डंडी से) डंडीमार, (पाकेट से) पाकेटमार, (बट से) बटमार, (मक्खी से) मक्खीमार, (मछली से) मछलीमार, (लट्ठ से) लट्ठमार
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में हमें ‘मार’ को प्रत्यय मानकर कई उदाहरण दिये गये हैं और साथ ही इससे निर्मित शब्द को ‘कर्मतत्पुरुष समास’ के अंतर्गत मानते हुए चिड़ीमार का उदाहरण दिया गया है। कमाता प्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में मार से निर्मित शब्द चिड़ीमार शब्द को ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के अंतर्गत शामिल किया गया है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ ‘मार’ से निर्मित शब्द चिड़ीमार और पाकिटमार को कर्मतत्पुरुष समास माना गया है। व्याकरणिक दृष्टि से ‘मार’ पूर्ण कृदंत शब्द है, जिसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता इसलिए मार से निर्मित उपर्युक्त शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हैं।
स्थानसूचक
- कोट, गढ़, गाँव, नगर, नेर, पुर, मेर, बाड़ा इत्यादि स्थानसूचक हैं।
- नगरकोट, देवगढ़, चिरगाँव, रामनगर, बीकानेर, चंपानेर, शिवपुर, अजमेर, राजवाड़ा।
संबंधित लेख
