उर्दू के प्रत्यय मुख्यतः दो भाषाओं अर्थात् फारसी और अरबी भाषा के हैं, इसलिये इन्हें पहले फारसी और अरबी में और पुनः प्रत्येक को कृत और तद्धित में बाँटकर समझना समीचीन है।
फारसी के प्रत्यय
कृत प्रत्यय
अ
- भाववाचक संज्ञा
- आमद, खरीद, दरख्वास्त, बरदाश्त, रसीद
- टिप्पणी— फारसी से जब ये शब्द हिन्दी में आते हैं, तो उनके अन्त का ‘अ’ स्वर का लोप हो जाता है, लेकिन शब्द का ढाँचा और अर्थ वही रहता है। आमदन् (क्रिया) → आमद् → आमद। खरीदन् → (क्रिया) → खरीद् → खरीद। दरख्वास्तन् (क्रिया) → दरख्वास्त् → दरख्वास्त। बरदाश्तन् (क्रिया) → बरदाश्त् → बरदाश्त। रसीदन् (क्रिया) → रसीद् → रसीद।
- और सरल रूप से देखें तो— 1. फारसी क्रिया का मूल रूप : आमदन् (अर्थ- आना); 2. मूल धातु प्राप्त करने हेतु ‘-न्’ या ‘-अन्’ का लोप : आमद्; 3. भाववाचक संज्ञा प्राप्त करने हेतु स्वर रहित धातु में ‘-अ’ प्रत्यय का योग : आमद् + अ = आमद। इसी तरह अन्य को भी समझा जा सकता है।
- दन् और तन् : फारसी व्याकरण में कुछ क्रियाएँ ऐसी होती हैं जिनके अंत में ‘दन्’ की जगह ‘तन्’ होता है; जैसे— दरख्वास्तन्।
आ
- (दान से) दाना, (रिह से) रिहा
- टिप्पणी— यह दान फारसी का शब्द है, जिससे दाना निर्मित है, जिसका अर्थ- ‘अनाज का कण’, ‘बीज’ या ‘बुनियादी इकाई’ होता है; इसका सम्बन्ध संस्कृत/हिन्दी के ‘दान’ से नहीं है।
आन (आँ)
- वर्तमानकालिक कृदंत
- (चस्प से) चस्पान → चस्पाँ → चस्पा, (पुर्स से) पुर्सां
इंदा
- कर्तृवाचक संज्ञा (कृदंत)— (कुन से) कुनिंदा, (जी से) जिंदा, (बाश से) बाशिंदा, (पर से) परिंदा
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार हिन्दी क्रिया ‘चुनना’ के साथ ‘इंदा’ प्रत्यय लगने से ‘चुनिंदा’ शब्द बना है, परन्तु यह अशुद्ध है।
इश
- आजमाइश, (कोश से) कोशिश, ख्वाहिश, गुजारिश, (नाल से) नालिश, नुमाइश, (परवर से) परवरिश, पैदाइश, (फरमाय से) फरमाइश, बंदिश, बारिश, (माल से) मालिश, (रंज से) रंजिश, रिहाइश, साजिश, सिफारिश
- (आज़मा से) आजमाइश, (कोश से) कोशिश, (ख़्वाह से) ख्वाहिश, (गुज़ार से) गुजारिश, (नाल से) नालिश, (नुमाय से) नुमाइश, (परवर से) परवरिश, (पैदा से) पैदाइश, (फरमाय से) फरमाइश, (बंद से) बंदिश, (बार से) बारिश, (माल से) मालिश, (रंज से) रंजिश, (रिहा से) रिहाइश, (साज़ से) साजिश, (सिफ़ार से) सिफारिश
- जिन शब्दों के अंत में “इश” प्रत्यय लगा हो वे प्रायः स्त्रीलिंग शब्द होते हैं।
ई
- भाववाचक
- (आमदन से) आमदनी, (रफतन से) रफतनी
ह
- भूतकालिक कृदंत
- (दाश्त से) दाश्तह → दाश्ता, (मुर्द से) मुर्दह → मुर्दा, (शुद से) शुदह → शुदा
तद्धित प्रत्यय
आ
- भाववाचक संज्ञा
- (खराब से) खराबा, (गरम से) गरमा, (सफेद से) सफेदा
आना
- वस्तुतः आना फारसी के ‘आनह’ से आया है।
- संज्ञा— रुपये के अर्थ में— (जुर्म से) जुर्माना, (तलब से) तलबाना, (नजर से) नजराना, (बै/बय से) बयाना, (मेहनत से) मेहनताना, (रोज से) रोजाना, (शुक्र से) शुक्राना, (साल से) सालाना, (हर्ज से) हर्जाना
- रोजाना और सालाना – संज्ञा वा विशेषण दोनों हैं। शेष संज्ञा हैं।
- टिप्पणी— एकाधिक वर्तनी : जुर्माना – जुरमाना। मेहनत – मिहनत : मेहनताना मिहनताना । शुक्र – शुकराना। हर्ज : हर्जाना – हरजाना।
- संज्ञा— (दस्त से) दस्ताना, (मौला से) मौलाना
- दस्त (संज्ञा) + आनह (प्रत्यय) = दस्तानह → दस्ताना (संज्ञा)
- मौलाना : कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे (मौलाना) को आनह (आना) प्रत्यय से निर्मित बताया गया है। जबकि R S. McGregor द्वारा संपादित ‘The Oxford: Hindi-English Dictionary’ में इसका निर्माण – मौला (संज्ञा) + ना (सर्वनाम) = मौलाना; यह अरबी शब्द है।
- विशेषण— (अमीर से) अमीराना, (जन से) जनाना, (मर्द से) मर्दाना (मरदाना), (रोज से) रोजाना, (शाह से) शाहाना, (साल से) सालाना
- आवह और आनह : ‘आवह’ से आना का उदाहरण डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में मिलता है, जिसके वे दो उदाहरण – जनाना और मरदाना – देते हैं। जबकि कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में आनह से ही आना माना गया है, इसे वे दो भागों में बाँटते हैं – एक, संज्ञा का निर्माण और दो, विशेषण का निर्माण; वे संज्ञा में – (रुपये के अर्थ में) जुर्माना, तलबाना, नजराना, हर्जाना, बयाना, मिहनताना, शुक्राना का और (अन्य के अर्थ में) दस्ताना व मौलाना का – उदाहरण देते हैं; जबकि विशेषण में – सालाना, रोजाना, मर्दाना, जनाना, शाहाना का उदाहरण देते हैं। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में भी आना प्रत्यय को फारसी के आनह से आया हुआ माना गया है और मर्दाना व जनाना का उदाहरण दिया गया है।
- गलत शब्द—
व्यापाराना
आवर
- अर्थ— युक्त, वाला, लानेवाला
- विशेषण— (जोर से) जोरावर, (दस्त से) दस्तावर, (दिल से) दिलावर, (बख्त से) बख्तावर
इंदा
- विशेषण— (कार से) कारिंदा, (शर्म से) शर्मिंदा
ई
- विशेषण → भाववाचक संज्ञा— (अमीर से) अमीरी, (इशारेबाज से) इशारेबाजी, (खराब से) खराबी, (खुश से) खुशी, (खुश्क से) खुश्की, (गरम से) गरमी, (गरीब से) गरीबी, (गुस्ताख से) गुस्ताखी, (तेज से) तेजी, (नरम से) नरमी, (नेक से) नेकी, (बद से) बदी, (बीमार से) बीमारी, (बेसमझ से) बेसमझी, (बेहतर से) बेहतरी, (मंजूर से) मंजूरी, (मस्त से) मस्ती, (शोख से) शोखी, (सफ़ेद से) सफ़ेदी, (सर्द से) सर्दी, (सियाह से) सियाही, (सुस्त से) सुस्ती।
- टिप्पणी— सियाह (स्याह) : सियाह (स्याह)।
- ये शब्द प्रायः विशेषण से बने हैं और अधिकतर स्त्रीलिंग हैं।
- संज्ञा → भाववाचक संज्ञा— (अफ़सर से) अफ़सरी, (गम से) गमी, (दलाल से) दलाली, (दुश्मन से) दुश्मनी, (दूकानदार से) दूकानदारी, (दोस्त से) दोस्ती, (नवाब से) नवाबी, (फकीर से) फकीरी, (सौदागर से) सौदागरी
- टिप्पणी— दूकानदार (दुकानदार) : दूकानदारी (दुकानदारी)
- ईकारांत होनेवाले ये शब्द प्रायः स्त्रीलिंग हैं।
- विशेषण/संज्ञा → भाववाचक संज्ञा— (जिंदह से) जिंदगी, (ताजह से) ताजगी, (परवानह से) परवानगी, (बंदह से) बंदगी, (रवानह से) रवानगी
- परवाना और बंदा— संज्ञा। शेष विशेषण हैं।
- विशेष— (ज्यादह से) ज्यादती।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार : शब्दांत के अंत में ‘ह’ बदलकर ‘ग’ हो जाता है और ‘ई’ प्रत्यय लगकर ‘गी’ हो जाता है, इसलिए डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में गी प्रत्यय मानकर दिल्लगी, बंदगी, सादगी के उदाहरण दिए हैं।
- टिप्पणी— फारसी के ये शब्द हिंदी में प्रायः आकारांत हो जाते हैं; जैसे— जिंदह से जिंदा, ज्यादह से ज्यादा, ताजह से ताजा, परवानह से परवाना, बंदह से बंदा, रवानह से रवाना
- संज्ञा → विशेषण— (आब से) आबी, (आसमान से) आसमानी, (इमारत से) इमारती, (एवज से) एवजी, (करामात से) करामाती, (काग़ज़ से) काग़ज़ी, (किताब से) किताबी, (किरमिज से) किरमिजी, (कीमत से) कीमती, (कुदरत से) कुदरती, (खयाल से) खयाली, (खाक से) खाकी, (खून से) खूनी, (गुलाब से) गुलाबी, (जंग से) जंगी, (जहाज से) जहाजी, (जात से) जाती, (तकनीक से) तकनीकी, (दिमाग से) दिमागी, (देश से) देशी, (नहर से) नहरी, (पंजाब से) पंजाबी, (फर्ज से) फर्जी, (फौज से) फौजी, (बादाम से) बादामी, (बैंगन से) बैंगनी, (माल से) माली (हालत), (मौज से) मौजी, (रेशम से) रेशमी, (शहर से) शहरी, (सरकार से) सरकारी, (हवा से) हवाई।
- जरूर (क्रिया-विशेषण) से जरूरी (विशेषण)। नजदीक (विशेषण) से नजदीकी (संज्ञा/विशेषण)
ईन
- संज्ञा → विशेषण— (नमक से) नमकीन, (पोस्त से) पोस्तीन, (रंग से) रंगीन, (शौक से) शौकीन, (संग से) संगीन
ईना
- विशेषण
- (कम से) कमीना, (पश्म से) पश्मीना
क
- ऊनतावाचक
- (तोप से) तुपक
कार
- कर्तृवाचक संज्ञा
- अर्थ— करनेवाला
- (अहल से) अहलकार, (आब से) आबकार, (आबाद से) आबादकार, (काश्त से) काश्तकार, (खता से) खताकार, (ज़फा से) ज़फाकार, (तजरबा से) तजरबाकार, (दखील से) दखीलकार, (पच्ची से) पच्चीकार, (पेश से) पेशकार, (पैरवी से) पैरवीकार (पैरोकार), (पैवंद से) पैवंदकार, (फन से) फनकार, (बद से) बदकार, (मीना से) मीनाकार, (रजा से) रज़ाकार, (सलाह से) सलाहकार
- टिप्पणी— जानकार : (ज्ञान → जाण → जान से) जानकार; संस्कृत के ज्ञान से हिन्दी में जान (तद्भव) बना और फारसी प्रत्यय कार से मिलकर जानकार बना।
गर (ग़र)
- कर्तृवाचक
- अर्थ— पेशेवर, अपने काम में माहिर
- (कलई से) कलईगर, (कार से) कारगर, (कार → कारी से) कारीगर, (जर से) जरगर, (जादू से) जादूगर, (जिल्द से) जिल्दगर, (जीन से) जीनगर, (बाजी से) बाजीगर, (मुलम्मा से) मुलम्मागर, (राह से) राहगर, (सितम से) सितमगर, (सौदा से) सौदागर
गार
- कर्तृवाचक
- (काम से) कामगार, (खिदमत से) खिदमतगार, (ख्वास्त से) ख्वास्तगार, (गुनाह से) गुनाहगार, (तलब से) तलबगार, (मदद से) मददगार, (याद से) यादगार
चा/इचा/ईचा
- लघुतावाचक प्रत्यय
- (कदम से) कदमचा, (कमान से) कमानचा → कमंचा, (कमान से) कमानचा, (गाली से) गालीचा/गलीचा, (चम से) चमचा, (डोल से) डोलचा, (दर → दरी से) दरीचा, (देग से) देगचा, (पाय से) पायँचा, (बाग से) बागीचा/बगीचा, (बार से) बारचा, (बुक से) बुकचा, (संदूक से) संदूकचा
- टिप्पणी— (बाग से) बागचा या बागीचा और हिन्दी में बगीचा। (गाली से) गालीचा और हिन्दी में गलीचा; इसका हिन्दी के ‘गाली’ (अपशब्द) से सम्बन्ध नहीं है।
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में चः और चा प्रत्यय बताया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में चा और इचा प्रत्यय बताया गया है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में चा और ईचा प्रत्यय बताया है।
- ची— चा प्रत्यय में ई प्रत्यय जोड़कर ची बनता है। यह चा का स्त्रीलिंग है। और छोटा के अर्थ में प्रयोग।— डोलची, देगची, दुमची, बगीची, बुकची, संदूकची
ची
- कर्तृवाचक प्रत्यय
- अर्थ— व्यापारवाचक संज्ञा
- (अफीम से) अफीमची, (खजाना से) खजानची, (गुलेल से) गुलेलची, (तंबूर से) तंबूरची, (तोप से) तोपची, (तबला से) तबलची, (नकल से) नकलची, (निशान से) निशानची, (बंदूक से) बंदूकची, (मशाल से) मशालची
- ये पुल्लिंग हैं।
जादह (ज़ादह)
- अर्थ— उत्पन्न हुआ
- (शाह से) शाहज़ादा, (हराम से) हरामज़ादा
- टिप्पणी— ज़ादह → ज़ादा
दान
- अधिकरणसूचक (पात्र या स्थान)
- अर्थ— पात्रवाचक
- (आतश से) आतशदान, (इत्र से) इत्रदान, (उगाल से) उगालदान, (कलम से) कलमदान, (कटोरा से) कटोरदान, (कूड़ा से) कूड़ेदान, (गुल से) गुलदान, (गुलाब से) गुलाबदान, (चाय से) चायदान, (धूप से) धूपदान, (नाव से) नाबदान, (पान से) पानदान, (पीक से) पीकदान, (फूल से) फूलदान, (रोशन से) रोशनदान, (शमा से) शमादान, (सिंगार से) सिंगारदान, (सिंदूर से) सिंदूरदान
- टिप्पणी— यह प्रत्यय हिन्दी शब्दों में भी लगता है; जैसे— (कटोरा से) कटोरदान, (कूड़ा से) कूड़ेदान, (चाय से) चायदान, (धूप से) धूपदान, (पान से) पानदान, (पीक से) पीकदान. (फूल से) फूलदान, (सिंदूर से) सिंदूरदान, (सिंगार से) सिंगारदान में क्रमशः कटोरा, कूड़ा, चाय, धूप, पान, पीक, फूल, सिंदूर और सिंगार हिन्दी शब्द हैं।
- टिप्पणी— सिंदूरदान = सिंदूर (हिंदी) + दान (फारसी), अर्थ- सिंदूर रखने का पात्र। सिंदूर-दान = सिंदूर (हिंदी) + दान (हिन्दी), अर्थ- विवाह के समय वर द्वारा वधू के माँग में सिंदूर भरने की क्रिया।
- दानी (दान + ई) : इसी ‘दान’ में ‘ई’ प्रत्यय लगाकर ‘दानी’ बनता है और यह वस्तुतः छोटे पात्रों के लिए प्रयुक्त किया जाता है; जैसे— उगालदानी, (गोंद से) गोंददानी, चायदानी, (चूहा से) चूहेदानी, धूपदानी, पीकदानी, (बच्चा से) बच्चेदानी, (बालू से) बालूदानी, मच्छड़दानी/मच्छरदानी, (मिस्सी से) मिस्सीदानी, (मूस से) मूसदानी, (साबुन से) साबुनदानी, सिंदूरदानी, (सुरमा से) सुरमेदानी। ध्यातव्य है कि दान में ई प्रत्यय लगने से दानी बना और यह पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाता है; जैसे— चायदान (पुल्लिंग), चायदानी (स्त्रीलिंग)।
- अन्य शब्द— (खान से) खानदान, खानदानी
नाक
- विशेषण
- अर्थ— भरा, हुआ
- (अलम से) अलमनाक, (ख़तरा से) ख़तरनाक, (ख़ौफ़ से) ख़ौफ़नाक, (ग़ज़ब से) ग़ज़बनाक, (ग़म से) ग़मनाक, (दर्द से) दर्दनाक, (शर्म से) शर्मनाक, (हैबत से) हैबतनाक, (हौल से) हौलनाक।
बान
- कर्तृवाचक प्रत्यय
- अर्थ— रखवाली करनेवाला
- (दर से) दरबान, (निगाह से) निगहबान, (पास से) पासबान, (फील से) फीलबान, (बाग से) बागबान, (बाद से) बादबान, (मेज से) मेजबान, (मेहर से) मेहरबान
- पुल्लिंग शब्द हैं।
- टिप्पणी— हिन्दी शब्दों में भी यह प्रत्यय लगता है, परन्तु हिन्दी में यह बान की जगह पर “वान” हो जाता है। कामताप्रसाद गुरु के अनुसार ‘इसका रूप संस्कृत के अनुकरण पर वान हो जाता है; जैसे— गाड़ीवान, हाथीवान।
मंद
- संज्ञा → विशेषण
- (अक्ल से) अक्लमंद, (एहसान से) एहसानमंद, (गरज़ से) गरज़मंद, (जरूरत से) जरूरतमंद, (दानिश से) दानिशमंद, (दौलत से) दौलतमंद।
वर
- विशेषण
- अर्थ— वाला
- (किस्मत से) किस्मतवर, (कीना से) कीनावर, (जान से) जानवर, (ताकत से) ताकतवर, (नसीब से) नसीबवर, (नाम से) नामवर, (पेशा से) पेशावर, (हिम्मत से) हिम्मतवर
- टिप्पणी— नाम शब्द हिन्दी है, जबकि शेष अरबी और फारसी शब्द हैं।
वार
- विशेषण/क्रिया-विशेषण
- अर्थ— वाला, के अनुसार
- (उम्मीद से) उम्मीदवार, (कसूर से) कसूरवार, (किश्त से) किश्तवार, (क्रम से) क्रमवार, (खता से) खतावार, (घंटा से) घंटेवार, (जिंस से) जिंसवार, (जिम्मा से) जिम्मेवार, (जिला से) जिलेवार, (तहसील से) तहसीलवार, (तफसील से) तफसीलवार, (तारीख से) तारीख़वार, (नंबर से) नंबरवार, (भाषा से) भाषावार, (महीना से) महीनावार, (माह से) माहवार, (ब्योरा से) ब्योरेवार, (सिलसिला से) सिलसिलेवार, (हम से) हमवार, (हफ्ता से) हफ्तेवार।
- आधार शब्द— हम सर्वनाम है और शेष संज्ञा हैं।
- संस्कृत भाषा के शब्द— क्रम, भाषा। हिन्दी भाषा के शब्द— घंटा, ब्यौरा। अँग्रेजी भाषा के शब्द— नंबर। फारसी भाषा के शब्द— महीना, माह, हम और हफ्ता। अरबी भाषा के शब्द— खता, जिंस, जिम्मा, जिला, तहसील, तफसील, तारीख और सिलसिला।
ह
- विविध अर्थ में
- (चश्म से) चश्मह → चश्मा, (दस्त से) दस्तह → दस्ता, (पेश से) पेशह → पेशा, (रोज से) रोजह → रोजा, (हफ्त से) हफ्तह → हफ्ता
- टिप्पणी— हिन्दी में ‘ह’ के स्थान पर ‘आ’ हो जाता है; जैसे— चश्मह → चश्मा।
विशेष
तद्धितांत से
निम्न शब्दों का प्रयोग प्रायः प्रत्यय के समान होता है— आब, नामा।
आब
- यह फारसी का संज्ञा (तद्धित) शब्द है। अर्थ— पानी
- गिलाब, गुलाब
- वस्तुतः ये समास हैं; जैसे— गिलाब = गिल (गुलाब) का पानी (आब), सम्बन्ध तत्पुरुष समास।
- शराब— यह अरबी मूल का अखंड और रूढ़ शब्द है और यह आब से नहीं बना है। यद्यपि कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इसे ‘आब’ से निर्मित बताया गया है।
नामा
- यह फारसी का संज्ञा (तद्धित) शब्द है। अर्थ— चिट्ठी
- इकरारनामा, निकाहनामा, मुख्तारनामा, सरनामा, हुक्मनामा।
- वस्तुतः ये समास हैं; जैसे— हुक्मनामा = हुक्म (आज्ञा) का नामा (पत्र), सम्बन्ध तत्पुरुष समास।
कृदंत से
संज्ञाओं में कुछ कृदंत जोड़ने से दूसरी संज्ञाएँ और विशेषण बनते है। वस्तुतः ये समास हैं, परन्तु ये प्रत्यय के साथ लिखे जाते हैं—
अंदाज़
- यह फारसी का कृदंत ‘शब्द’ है— हिन्दी में इसके दो रूप दिखते हैं; 1. स्वतंत्र प्रयोग, अर्थ- अनुमान, ढंग, तरीका, शैली। 2. यौगिक शब्दों में, अर्थ- फेंकनेवाला।
- वस्तुतः ‘अंदाज़’ से निर्मित यौगिक शब्द समास के उदाहरण हैं।
- (गोला से) गोलंदाज़, (तीर से) तीरंदाज़, (दस्त से) दस्तंदाज़, (नज़रंदाज़), (बर्क से) बर्कंदाज़
- विग्रह— गोलंदाज़ = गोला + अंदाज़, तोप के गोले चलानेवाला। तीरंदाज़ = तीर + अंदाज़, तीर को चलानेवाला। इसी तरह अन्य का विग्रह किया जा सकता है। ये तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
आवेज़
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— लटकानेवाला
- दस्तावेज़ = दस्त (हाथ) + आवेज़। तत्पुरुष समास का उदाहरण।
कुन
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— करनेवाला
- कारकुन, नसीहतकुन। तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
खोर (ख़ोर)
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— खानेवाला
- कर्तृवाचक संज्ञा— आदमखोर, (गम से) गमखोर, (गोता से) गोताखोर, घूसखोर, (चुगल से) चुगलखोर, (जमा से) जमाखोर, टुकड़खोर, (ब्याज से) ब्याजखोर, (मुनाफा से) मुनाफाखोर, (मुफ्त से मुफ्तखोर, (मुरदार से) मुरदारखोर, रिश्वतखोर, (शीर से) शीरखोर (शीरखोरा), (सूद से) सूदखोर, (हराम से) हरामखोर, (हलाल से) हलालखोर
- ये तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
गीर
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— पकड़नेवाला
- आलमगीर, दस्तगीर, जहाँगीर, राहगीर। तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
दान
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— जाननेवाला
- कारदान, कदरदान, हिसाबदान। तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
- अंतिम ‘न’ का उच्चारण प्रायः अनुनासिक होता है; जैसे— कदरदान → कदरदाँ।
दार
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— 1. रखनेवाला, 2. ‘उस विशेषता से युक्त’।
- जब दार का अर्थ ‘रखने वाला/मालिक/अधिकारी’हो, तब यह मूल रूप से ‘कृदंत पद’ है और इससे बने शब्द ‘उपपद तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हैं और ये कर्तृवाचक संज्ञा होते हैं; जैसे— सूबेदार, थानेदार, दुकानदार इत्यादि।
- ‘दार’ का अर्थ ‘उस विशेषता से युक्त’हो, तब यह ‘तद्धित प्रत्यय’ की तरह कार्य करता है और इससे बने शब्द तद्धितांत (विशेषण) कहलाते हैं; जैसे— मसालेदार, हवादार, चमकदार इत्यादि।
- कर्तृवाचक संज्ञा— (इलाका से) इलाकेदार, (ओहदा से) ओहदेदार, (काम से) कामदार, (कारखाना से) कारखानेदार, (किराया से) किरायेदार, (खरीद से) खरीदार :
खरीददार, (चौकी से) चौकीदार, (चोब से) चोबदार, (जमाअत से जमा से) जमादार, (जमानत से) जमानतदार, (जमीं/जमीन से) जमींदार/जमीनदार, (जागीर से) जागीरदार, (जामिन से) जामिनदार, (जिला से) जिलादार/जिलेदार, (जैल से) जैलदार, (ठेका से) ठेकेदार, (ड्योढ़ी से) ड्योढ़ीदार, (तहसील से) तहसीलदार, (थाना से) थानेदार, (दफा से) दफादार, (दीन से) दीनदार, (दुकान से) दुकानदार, (देना से) देनदार, (नंबर से) नंबरदार, (नाता से) नातेदार, (पट्टा से) पट्टेदार, (पट्टी से) पट्टीदार, (परगना से) परगनादार, (पहरा से) पहरेदार, (फौज से) फौजदार, (भागी से) भागीदार, (मंसब/मनसब से) मंसबदार/मनसबदार, (मुहल्ला से) मुहल्लेदार, (रिश्ता से) रिश्तेदार, (सर से) सरदार, (सूबा से) सूबेदार, (हवाल से) हवालदार/हवलदार, (हिस्सा से) हिस्सेदार- टिप्पणी— ‘दार’ प्रत्यय फारसी से आया है, परन्तु यह केवल अरबी और फारसी शब्दों में ही नहीं लगता वरन् हिन्दी शब्दों में भी लगता है और कुछ अँग्रेजी शब्दों में भी; जैसे— अरबी शब्द— इलाका, ओहदा, जमानत, जामिन, जिला, जैल, तहसील, दफा, दीन, फौज, मंसब/मनसब, मुहल्ला, सूबा, हवाल, हिस्सा। फारसी शब्द— कारखाना, किराया, खरीद, चोब, जमा, जमीं/जमीन, जागीर, दुकान, परगना, रिश्ता, सर। हिन्दी शब्द— चौकी, ठेका, ड्योढ़ी, थाना, देन, नाता, पट्टा, पट्टी, पहरा, भागी। अँग्रेजी शब्द— नंबरदार, लंबरदार (लंबर अँग्रेजी के नंबर से)।
- संज्ञा → विशेषण
- विशेषण— (असर से) असरदार, (इज्जत से) इज्जतदार, (ईमान से) ईमानदार, (काँटा से) काँटेदार, (खबर से) खबरदार, (खुशबू से) खुशबूदार, (चमक से) चमकदार, (चक्कर से) चक्करदार, (चित्ती से) चित्तीदार, (चुन्नट से) चुन्नटदार, (चूड़ी से) चूड़ीदार, (जान से) जानदार, (जिम्मा से) जिम्मेदार, (जोर से) जोरदार, (झालर से) झालरदार, (तरह से) तरहदार, (दाँत से) दाँतदार/दाँतेदार, (धार से) धारदार, (नोक से) नोकदार, (परत से) परतदार, (फल से) फलदार, (मजा से) मजेदार, (मसाला) मसालेदार, (माल से) मालदार, (रोयाँ से) रोयेंदार, (लचक से) लचकदार, (वफा से) वफादार, (शान से) शानदार, (समझ से) समझदार, (सूराख से) सूराखदार, (हक से) हकदार, (हवा से) हवादार
- टिप्पणी— ‘दार’ प्रत्यय फारसी से आया है, परन्तु यह केवल अरबी और फारसी शब्दों में ही नहीं लगता वरन् हिन्दी शब्दों में भी लगता है; जैसे— अरबी शब्द— असर, इज्जत, ईमान, खबर, जिम्मा, तरह, मसाला, माल, वफा, शान, हक, हवा। फारसी शब्द— खुशबू, जान, जोरदार, नोक, मजा, सूराख। हिन्दी शब्द— काँटा, चक्कर, चमक, चित्ती, चुन्नट, चूड़ी, झालर, दाँत, धार, परत, फल, रोयाँ, लचक, समझ
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘दार’ को ‘कृदंत’ मानते हुए यह कहा गया कि ये यथार्थ में समास बनाते हैं, परन्तु सुभीते के कारण प्रत्यय के अन्तर्गत रखा गया है। डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ दोनों में इसे प्रत्यय माना गया है।
नवीस
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— लिखनेवाला
- अख़बारनवीस, अरजीनवीस, ख़ुशनवीस, चिटनवीस, नक़्शानवीस, वाक़यानवीस, वासिलबाकीनवीस, स्याहनवीस
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
नशीन
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— बैठनेवाला
- गद्दीनशीन, तख़्तनशीन, परदानशीन
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
नुमा
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— दिखानेवाला
- किबलानुमा, किश्तीनुमा, कुतुबनुमा, खुशनुमा, गाँवनुमा, गुंबदनुमा, रहनुमा
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
पोश
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— पहननेवाला, छुपानेवाला
- जीनपोश, नकाबपोश, पापोश, मेज़पोश, सफ़ेदपोश, सरपोश
- वस्तुतः शब्द तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
बंद
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— बँधा हुआ, बाँधे हुए, बाँधनेवाला
- संज्ञा— (इज़ार से) इज़ारबंद, (तुक से) तुकबंद, (नाल से) नालबंद, (बिस्तर से) बिस्तरबंद, (लँगोट से) लँगोटबंद
- विशेषण— (कलम से) कलमबंद, (किला से) किलाबंद, (गला से) गलाबंद, (जत्था से) जत्थेबंद, (ज़बान से) ज़बानबंद, (डब्बा/डिब्बा से) डब्बाबंद/डिब्बाबंद, (मुहर से) मुहरबंद, (मोरचा/मोर्चा से) मोरचाबंद/मोर्चाबंद, (लट्ठ से) लट्ठबंद, (सिक्का से) सिक्काबंद/सिक्केबंद, (हथियार से) हथियारबंद।
- संज्ञा/विशेषण— (कमर से) कमरबंद, (नज़र से) नज़रबंद
- टिप्पणी— वस्तुतः ये ‘बंद’ से निर्मित ये शब्द तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
बंदी
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— गठन के अर्थ में
- (किला से) किलाबंदी/किलेबंदी, (घाट से) घाटबंदी, (घेरा से) घेराबंदी, (चक से) चकबंदी, (जत्था से) जत्थेबंदी, (ज़बान से) ज़बानबंदी, (डब्बा/डिब्बा से) डब्बाबंदी/डिब्बाबंदी, (तख्त से) तख्तबंदी, (ताला से) तालाबंदी, (तुक से) तुकबंदी, (धड़ा से) धड़ाबंदी, (नज़र से) नज़रबंदी, (नशा से) नशाबंदी, (नाका से) नाकाबंदी/नाकेबंदी, (नाल से) नालबंदी, (मोरचा/मोर्चा से) मोरचाबंदी/मोर्चाबंदी, (युद्ध से) युद्धबंदी, (हथियार से) हथियारबंदी, (हद से) हदबंदी
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘बंद’ प्रत्यय बताया गया है और उससे निर्मित शब्द के उदाहरण भी दिये हैं; जैसे— कमरबंद, इजारबंद, नालबंद, बिस्तरबंद। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि हिन्दी शब्दों में भी यह प्रत्यय लगता है; जैसे— हथियारबंद, गलाबंद, नाकेबंदी। परन्तु डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बंद’ और ‘बंदी’ दोनो को प्रत्यय मानकर ढेरों शब्दों के उदाहरण दिये गये हैं— बंद से तुकबंद, ज़बानबंद इत्यादि और बंदी से किलेबंदी, घाटबंदी, घेराबंदी इत्यादि। The Oxford : Hindi-English Dictionary (R.S. McGregor) में कुछ शब्दों को देखने से ज्ञात होता है कि “बंद + ई = बंदी”; जैसे— किलाबंदी (किला + बंद + ई), जत्थेबंदी (जत्था + बंद + ई), तुकबंदी (तुक + बंद + ई), नज़रबंदी (नज़र + बंद + ई), नालबंदी (नाल + बंद + ई), मोरचाबंदी (मोरचा + बंद + ई), हथियारबंदी (मोरचा + बंद + ई); साथ ही कुछ शब्दों को देखने से ज्ञात होता है कि “बंदी” प्रत्यय से ही कई शब्द बने हैं; जैसे— घाटबंदी (घाट + बंदी), घेराबंदी (घेरा + बंदी), चकबंदी (चक + बंदी), तालाबंदी (ताला + बंदी), हदबंदी (हद + बंदी) इत्यादि। श्यामसुन्दर दास द्वारा संपादित ‘हिन्दी शब्द-सागर’ और डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी शब्दकोश’ दोनों में “शब्द + बंदी” का ही प्रयोग मिलता है; जैसे— किलाबंदी (किला + बंदी) इत्यादि।
- टिप्पणी— वस्तुतः ये ‘बंदी’ से निर्मित ये शब्द तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं।
- अरबी शब्द— इज़ार, कलम, किला, नज़र, नाल, सिक्का, हद
- फारसी शब्द— कमर, ज़बान, तख्त, नशा, बिस्तर, मुहर, मोरचा
- हिन्दी शब्द— गला, घाट, घेरा, चक, जत्था, डब्बा/डिब्बा, ताला, तुक, धड़ा, नाका, युद्ध (संस्कृत), लँगोट, लट्ठ, हथियारबंद
बर
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— लेनेवाला
- (पैगाम से) पैगंबर, (दिल से)दिलबर
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
बरदार
- यह दो कृदंत शब्दों से बना कृदंत शब्द है। अर्थ— उठानेवाला
- कर्तृवाचक संज्ञा— (अलम से) अलमबरदार, (खास से) खासबरदार, (चिलम से) चिलमबरदार, (छड़ी से) छड़ीबरदार, (झंडा से) झंडाबरदार, (थैली से) थैलीबरदार, (फरमाँ/फरमान से) फरमाँबरदार, (बल्लम से) बल्लमबरदार, (भाला से) भालाबरदार, (मुहर से) मुहरबरदार, (हुक्का से) हुक्काबरदार, (हुक्म से) हुक्मबरदार
- टिप्पणी— यह प्रत्यय (बरदार) हिन्दी शब्दों के साथ भी लगाया जाता है; जैसे— छड़ीबरदार, झंडाबरदार, थैलीबरदार, बल्लमबरदार, भालाबरदार इत्यादि। इनमें छड़ी, झंडा, थैली, बल्लम और भाला हिन्दी शब्द हैं।
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
बाज (बाज़)
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— खेलनेवाला, प्रेम करनेवाला
- कर्तृवाचक संज्ञा— (अंटी से) अंटीबाज, (अखाड़ा से) अखाड़ेबाज, (अटकल से) अटकलबाज, (अड़ंगा से) अड़ंगेबाज, (आतश से) आतशबाज, (कबूतर से) कबूतरबाज, (गेंद से) गेंदबाज, (चंडू से) चंडूबाज, (चाल से) चालबाज, (चुहल से) चुहलबाज, (जखीरा से) जखीरेबाज, (दगा से) दगाबाज, (दिल्लगी से) दिल्लगीबाज, (धोखा से) धोखेबाज, (नखरा से) नखरेबाज, (नशा से) नशेबाज, (नारा से) नारेबाज, (पतंग से) पतंगबाज, (बटेर से) बटेरबाज, (मुकदमा से) मुकदमेबाज, (मंसूबा/मनसूबा से) मंसूबेबाज/मनसूबेबाज, (रंडी से) रंडीबाज, (लट्ठ से) लट्ठबाज, (लौंडा से) लौंडेबाज, (शतरंज से) शतरंजबाज, (सट्टा से) सट्टेबाज
- टिप्पणी— बाज प्रत्यय लगाने से प्रायः ‘कर्तृवाचक संज्ञा’ शब्द बनते हैं, और जब उसी शब्द में ई प्रत्यय का योग कर देते हैं ते प्रायः भाववाचक संज्ञा का निर्माण होता है; जैसे— अखाड़ा : अखाड़ा + बाज = अखाड़ेबाज (कर्तृवाचक संज्ञा); अखाड़ा + बाज + ई = अखाड़ेबाजी (भाववाचक संज्ञा)।
- विशेष— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में बाज और बाजी दोनों को प्रत्यय माना गया है। परन्तु कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’; डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ दोनों में बाज को ही प्रत्यय माना गया है। The Oxford : Hindi-English Dictionary (R.S. McGregor) में भी ‘बाज़’ को प्रत्यय माना गया है साथ ही इसी में कुछ शब्दों को देखने से ज्ञात होता है कि “बाज़ी = बाज़ + ई”। इस तरह बाज प्रत्यय है, बाजी कोई प्रत्यय नहीं है वरन् यह ई लगने से बना है।
- अखाड़ेबाजी (अखाड़ा + बाज़ + ई), आतशबाजी/आतिशबाजी (आतश/आतिश + बाज + ई), कबूतरबाजी (कबूतर + बाज + ई), गुलेलबाजी (गुलेल + बाज + ई), गेंदबाजी (गेंद + बाज + ई), जल्दबाजी (जल्द + बाज + ई), ठट्ठेबाजी (ठट्ठा + बाज + ई), दंगाबाजी (दंगा + बाज + ई), दगाबाजी (दगा + बाज + ई), धोखेबाजी (धोखा + बाज + ई), नखरेबाजी (नखरा + बाज + ई), नशेबाजी (नशा + बाज + ई), नारेबाजी (नारा + बाज + ई), निशानेबाजी (निशाना + बाज + ई), पतंगबाजी (पतंग + बाज + ई), बैठकबाजी (बैठक + बाज + ई), मुकदमेबाजी (मुकदमा + बाज + ई), मुक्केबाजी (मुक्का + बाज + ई), रंडीबाजी (रंडी + बाज + ई), लौंडेबाजी (लौंडा + बाज + ई), शतरंजबाजी (शतरंज + बाज + ई), सट्टेबाजी (सट्टा + बाज + ई)
- वस्तुतः ये बाज से निर्मित उपर्युक्त शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
बाजी (बाज़ी)
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- अखाड़ेबाजी, अटकलबाजी, अड़ंगेबाजी, आतशबाजी, इशारेबाजी, कबूतरबाजी, गुलेलबाजी, गेंदबाजी, चालबाजी, चुटकलेबाजी (चुट + कला + बाज + ई), चुहलबाजी, चोचलेबाजी, जल्दबाजी, ठट्ठेबाजी, तिकड़मबाजी (तिकड़म + बाज + ई), दंगाबाजी, दगाबाजी, दिल्लगीबाजी, धोखेबाजी, नखरेबाजी, नशेबाजी, नारेबाजी, निशानेबाजी, पतंगबाजी, बटेरबाजी (बटेर + बाज + ई), बहानेबाजी (बहाना + बाज + ई), बैठकबाजी, मुकदमेबाजी, मुक्केबाजी, रंडीबाजी, लेक्चरबाजी (अँग्रेजी + फारसी : लेक्चर + बाज + ई), लट्ठबाजी (लट्ठ + बाज + ई), लौंडियाबाजी, लौंडेबाजी, शतरंजबाजी, सट्टेबाजी
- बाजी प्रत्यय से निकृष्ट कर्म का बोध होता है।
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘बाज़’ प्रत्यय बताया गया है और उससे निर्मित शब्द के उदाहरण भी दिये हैं; जैसे— दगाबाज, नशेबाज, शतरंजबाज। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि हिन्दी शब्दों में भी यह प्रत्यय लगता है; जैसे— चालबाज, ठट्ठेबाज, धोखेबाज। डॉ॰ वासुदेवनन्दन कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘बाज’ प्रत्यय माना गया है और उदाहरणस्वरूप नशेबाज (नशा + बाज) शब्द दिया गया है। परन्तु डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘बाज़ी’ को प्रत्यय मानकर ढेरों शब्दों के उदाहरण दिये गये हैं— बैठकबाजी, कबूतरबाजी, मुकदमेबाजी इत्यादि। इसके विपरीत डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत राजपाल प्रकाशन की ‘हिन्दी शब्दकोश’ में ‘बाज़’ को प्रत्यय माना गया है और बहानेबाज़, चालबाज़, नशेबाज़ शब्दों के उदाहरण दिये गये हैं। The Oxford : Hindi-English Dictionary (R.S. McGregor) में भी ‘बाज़’ को प्रत्यय माना गया है और ठट्ठेबाज़ शब्द का उदाहरण दिया गया है; साथ ही इसी में कुछ शब्दों को देखने से ज्ञात होता है कि “बाज़ी = बाज़ + ई”; जैसे— अखाड़ेबाजी (अखाड़ा + बाज़ + ई), अटकलबाजी (अटकल + बाज + ई), अड़ंगेबाजी (अड़ंगा + बाज + ई), आतशबाजी/ आतिशबाजी (आतश/आतिश + बाज + ई), कबूतरबाजी (कबूतर + बाज + ई), गुलेलबाजी (गुलेल + बाज + ई), गेंदबाजी (गेंद + बाज + ई), जल्दबाजी (जल्द + बाज + ई), ठट्ठेबाजी (ठट्ठा + बाज + ई), दंगाबाजी (दंगा + बाज + ई), दगाबाजी (दगा + बाज + ई), दिल्लगीबाजी (दिल्लगी + बाज + ई), धोखेबाजी (धोखा + बाज + ई), नखरेबाजी (नखरा + बाज + ई), नशेबाजी (नशा + बाज + ई), नारेबाजी (नारा + बाज + ई), निशानेबाजी (निशाना + बाज + ई), पतंगबाजी (पतंग + बाज + ई), बैठकबाजी (बैठक + बाज + ई), मुकदमेबाजी (मुकदमा + बाज + ई), मुक्केबाजी (मुक्का + बाज + ई), रंडीबाजी (रंडी + बाज + ई), लट्ठबाजी (लट्ठ + बाज + ई), लौंडेबाजी (लौंडा + बाज + ई), शतरंजबाजी (शतरंज + बाज + ई), सट्टेबाजी (सट्टा + बाज + ई)
- वस्तुतः ये बाजी से निर्मित उपर्युक्त शब्द ‘तत्पुरुष समास’ के उदाहरण हैं।
बीन
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— देखनेवाला
- (खुर्द से) खुर्दबीन, (तमाशा से) तमाशबीन, (दूर से) दूरबीन
- वस्तुतः बीन से निर्मित उपर्युक्त शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
माल
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— मलनेवाला, पोंछनेवाला
- (दस्त से) दस्तमाल, (रू से) रूमाल
- वस्तुतः माल से निर्मित उपर्युक्त शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
साज (साज़)
- यह कृदंत शब्द है। अर्थ— बनानेवाला
- कर्तृवाचक संज्ञा— (आईना से) आईनासाज, (इत्र से) इत्रसाज, (ऐनक से) ऐनकसाज, (घड़ी से) घड़ीसाज, (चार से) चारासाज, (जमाना से) जमानासाज, (जाल से) जालसाज, (दुनिया से) दुनियासाज, (जिल्द से) जिल्दसाज, (रंग से) रंगसाज
- यह प्रत्यय हमें हिन्दी/संस्कृत शब्दों में भी दिखायी देता है; जैसे— घड़ीसाज (घड़ी – हिन्दी); रंगसाज (रंग – संस्कृत)।
- इन्हीं शब्दों में ‘ई’ प्रत्यय लगा दें तो भाववाचक संज्ञा बनेगा; जैसे— आईनासाजी, इत्रसाजी, ऐनकसाजी, घड़ीसाजी, चारासाजी, जमानासाजी, जालसाजी, दुनियासाजी, रंगसाजी
- वस्तुतः ये शब्द तत्पुरुष (उपपद) समास के उदाहरण हैं।
स्थानवाचक संज्ञा
संज्ञाओं में इन शब्दों और प्रत्ययों के योग से स्थानवाचक संज्ञाएँ बनती हैं।
आबाद
- अर्थ— बसा हुआ
- अहमदाबाद, इलाहाबाद, शाहजहानाबाद, हैदराबाद
- टिप्पणी— वस्तुतः ‘आबाद’ एक स्वतंत्र शब्द है, अतः यह अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। विग्रह— अहमदाबाद – अहमद का नगर (आबाद), तत्पुरुष समास।
इस्तान (स्तान)
- अधिकरण (पात्र या स्थान) सूचक प्रत्यय
- अर्थ— स्थान
- (अफगान से) अफगानिस्तान, (अरब से) अरबिस्तान, (इंगलिश से) इंगलिस्तान, (उज्बेक/उजबेक से) उज्बेकिस्तान/उजबेकिस्तान, (कजाख से) कजाखस्तान, (कब्र से) कब्रिस्तान, (काफिर से) काफिरिस्तान, (किर्गिज से) किर्गिस्तान, (कोह से) कोहिस्तान, (गोर से) गोरस्तान, (ताजिक से) ताजिकिस्तान, (तुर्क से) तुर्किस्तान, (तुर्कमेन से) तुर्किमेनिस्तान, (पाक से) पाकिस्तान, (रेग से) रेगिस्तान, (हिन्दू से) हिन्दुस्तान
- टिप्पणी— फारसी का ‘इस्तान’ प्रत्यय रूप और में संस्कृत के ‘स्थान’ शब्द के सदृश होने के कारण हिन्दी भाषा में बहुधा ‘स्थान’ हो जाता है; जैसे— राजस्थान, हिन्दुस्तान।
- कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘इस्तान’ प्रत्यय माना गया है; जबकि डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘स्तान (स्थान)’ को प्रत्यय माना गया है। इसीलिए हम कहीं इस्तान का प्रयोग पाते हैं तो कहीं स्तान का; इस्तान—अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, कब्रिस्तान, काफिरिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्किस्तान, तुर्किमेनिस्तान, पाकिस्तान, रेगिस्तान। स्तान— कजाखस्तान, किर्गिस्तान, गोरस्तान, हिन्दुस्तान। साथ ही हमें उच्चारण भिन्नता भी मिलती है; जैसे— कोहस्तान/कोहिस्तान।
खाना (ख़ाना)
- अधिकरणसूचक (पात्र या स्थान) / संज्ञा
- खाना फारसी भाषा के ‘खानह’ से आया है, जिसका अर्थ है— गृह, घर, आलय।
- आतशखाना, कबाड़-खाना, कसाई-खाना, कूड़ा-खाना, कैद-खाना, ग़रीबख़ाना, गाड़ी-खाना, गुसल-खाना, जेल-खाना, छाया-खाना, जुआ-खाना, डाक-खाना, तह-खाना, तोपखाना, दवाखाना, दौलत-खाना, पा-खाना/पै-खाना, पेशाबखाना, बूचड़-खाना, मवेशीखाना, मै-खाना, माल-खाना, मुसाफिर-खाना, यतीम-खाना, शराब-खाना, हमामखाना।
- टिप्पणी— खाना (खानह) स्वतंत्र शब्द है। इसलिए इसके योग से समास शब्द बनेंगे न कि प्रत्यय या उपसर्ग वाले शब्द। परन्तु : डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘खान, खाना’ को प्रत्यय मानकर कई शब्द निर्मित किये गये हैं। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘खाना’ को स्थानवाचक प्रत्यय के अंतर्गत रखा गया है, परन्तु उदाहरण नहीं दिया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘खाना’ को प्रत्यय माना गया है और कई उदाहरण दिये है; जैसे— कारखाना, कैदखाना, गाड़ीखाना, दवाखाना, दौलतखाना।
- इनमें से अधिकतर में तत्पुरुष समास है; जैसे—कबाड़-खाना = कबाड़ के लिए खाना (जगह)। कूड़ा-खाना = कूड़ा के लिए खाना (स्थल)। मुसाफिर-खाना = मुसाफिर के लिए खाना (आलय)। इनमें सम्प्रदान तत्पुरुष है। हाँ अगर कबाड़-खाना = कबाड़ का खाना (जगह), विग्रह करेंगे तो सम्बन्ध तत्पुरुष समास होगा। इसी तरह अन्य में भी कारक चिह्न लगाकर विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
गाह
- अधिकरणसूचक (पात्र या स्थान) प्रत्यय
- अर्थ— जगह, स्थल
- आराम-गाह, ईद-गाह, ऐश-गाह, कतल-गाह/कत्ल-गाह, ख्वाब-गाह, चरा-गाह, चारा-गाह, दर-गाह, नमाज-गाह, नुमाइश-गाह, बंदर-गाह, शिकार-गाह, सैर-गाह
- टिप्पणी— गाह स्वतंत्र शब्द है। इसलिए इसके योग से समास शब्द बनेंगे न कि प्रत्यय या उपसर्ग वाले शब्द। परन्तु : डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘गाह’ को प्रत्यय मानकर कई शब्द निर्मित किये गये हैं। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘गाह’ को स्थानवाचक प्रत्यय के अंतर्गत रखा गया है और ईदगाह का उदाहरण भी दिया गया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में ‘गाह’ को प्रत्यय माना गया है और कई उदाहरण दिये है; जैसे— ईदगाह, चरागाह, बंदरगाह, शिकारगाह। मजे की बात तो यह है कि कामताप्रसाद गुरु ने बंदरगाह को सम्बन्ध तत्पुरुष भी माना है।
- गाह से निर्मित ये शब्द तत्पुरुष समास है; जैसे— आराम-गाह = आराम का गाह (स्थान) – सम्बन्ध तत्पुरुष; आराम के लिए गाह (जगह) – सम्प्रदान तत्पुरुष। इसी तरह अन्य में भी कारक चिह्न लगाकर विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
जार
- गुलजार, बाजार
- टिप्पणी— जार (ज़ार) फारसी का स्वतंत्र संज्ञा शब्द है। अर्थ— स्थान, प्रचुरता। अतः यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। विग्रह— गुलजार = गुल (फूल) + ज़ार (स्थान), अर्थात् फूलों का स्थान, तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
बार
- दरबार, जंगबार, जंजीबार
- टिप्पणी— बार फारसी का स्वतंत्र संज्ञा शब्द है। अर्थ— द्वार। अतः यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। विग्रह— दरबार = दर (द्वार) + बार (सभा-स्थान), अर्थात् राजा का सभा-स्थान, तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
शन
- गुलशन
- टिप्पणी— शन फारसी का स्वतंत्र संज्ञा शब्द है। अर्थ— स्थान। अतः यह किसी अन्य शब्द से युक्त होकर ‘समास-निर्मित-शब्द’ बनायेगा। विग्रह— गुलशन = गुल (फूल) + शन (स्थान), अर्थात् फूलों का स्थान, तत्पुरुष समास। इसी तरह अन्य का विग्रह करके समास की पहचान की जा सकती है।
सार
- हिन्दी (विशेषण) + सार (प्रत्यय)— (एक से) एकसार
- हिन्दी (क्रिया/संज्ञा) + सार (प्रत्यय)— (चलना/चलन से) चलनसार, (मिलना/मिलन से) मिलनसार
- फारसी (संज्ञा) + सार (प्रत्यय)— (कोह से) कोहसार, (खाक से) खाकसार, (रुख से) रुखसार, (शर्म से) शर्मसार
अन्य
गरी / गिरी / गीरी
- यह प्रत्यय व्यवसाय / कार्य / पेशे का बोध कराता है।
- कारीगरी, (गुंडा से) गुंडागिरी, (जर से) जरगरी, (चमचा से) चमचागिरी, (जादू से) जादूगरी, (दारोगा से) दरोगागिरी, (दादा से) दादागिरी, (धोबी से) धोबीगिरी, (नेता से) नेतागिरी, (बाजी से) बाजीगरी, (मुंशी से) मुंशीगिरी, (रफू से) रफूगरी, (सिपाह से) सिपाहगरी/सिपाहगिरी, सौदागरी
- फारसी शब्द + फारसी प्रत्यय (शब्द + गर + ई) → (कार + गर + ई) कारीगरी, (जर + गर + ई) जरगरी, (जादू + गर + ई) जादूगरी, (बाजी + गर + ई) बाजीगरी, (रफू + गर + ई) रफूगरी, (सिपाह + गर + ई) सिपाहगरी/सिपाहगिरी, (सौदा + गर + ई) सौदागरी
- फारसी शब्द + फारसी प्रत्यय (शब्द + गिरी) → (चमचा से) चमचागिरी, (दारोगा से) दरोगागिरी
- अरबी शब्द + फारसी प्रत्यय (शब्द + गिरी / गीरी) → (मुंशी + गिरी / गीरी) मुंशीगिरी / मुंशीगीरी
- हिन्दी शब्द + फारसी प्रत्यय (शब्द + गिरी / गीरी) → (गुंडा + गिरी / गीरी से) गुंडागिरी / गुंडागीरी, (दादा + गिरी / गीरी से) दादागिरी / दादागीरी, (धोबी + गिरी / गीरी से) धोबीगिरी / धोबीगीरी, (नेता + गिरी / गीरी से) नेतागिरी / नेतागीरी
- टिप्पणी— डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ में ‘गरी / गिरी’ को प्रत्यय माना है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ में इस प्रत्यय का उल्लेख नहीं है। डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना में ‘गीर’ प्रत्यय का उल्लेख है। जबकि R. S. McGregor द्वारा सम्पादित ‘The Oxford : Hindi-English Dictionary’- में कई शब्दों के उदाहरण से स्पष्ट होता है कि गरी = गर + ई; जैसे— (जादू + गर + ई) जादूगरी।
गी
- (अलहदा से) अलहदगी, (आसूदा से) आसूदगी, एकबारगी, (कमीना से) कमीनगी, (गंदा से) गंदगी, (जिंदा से) जिंदगी, दिल्लगी, नामजदगी, नुमाइंदगी, पसंदगी, पेचीदगी, बेगानगी, बंदगी, बेहूदगी, मौजूदगी, मरदानगी, रवानगी, शर्मिंदगी, सादगी
- फारसी-हिन्दी : अलहदह-अलहदा, आसूदा- आसूदह, कमीना-कमीनह, गंदह-गंदा, जिंदह-जिंदा, नुमाइंदह-नुमाइंदा, पेचीदह-पेचीदा, बेगानह- बेगाना, मौजूदह-मौजूदा, मरदानह- मरदाना, रवानह-रवाना, शरमिंदह- शरमिंदा/शर्मिंदा, सादह-सादा
- टिप्पणी— कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ के अनुसार : शब्दांत के अंत में ‘ह’ बदलकर ‘ग’ हो जाता है और ‘ई’ प्रत्यय लगकर ‘गी’ हो जाता है, इसलिए डॉ॰ हरदेव बाहरी कृत ‘हिन्दी : शब्द-अर्थ-प्रयोग’ और ‘राजपाल : हिन्दी शब्दकोश’ में गी प्रत्यय मानकर दिल्लगी, बंदगी, सादगी आदि उदाहरण दिए हैं।
- टिप्पणी— फारसी के ये शब्द हिंदी में प्रायः आकारांत हो जाते हैं; जैसे— जिंदह से जिंदा, ज्यादह से ज्यादा, ताजह से ताजा, परवानह से परवाना, बंदह से बंदा, रवानह से रवाना
ज़नी
- भाववाचक संज्ञा बनानेवाला
- आगजनी, आतशज़नी, रहज़नी।
वान (बान)
- कर्तृवाचक संज्ञा
- अर्थ— वाला, चलानेवाला
- (ऊँट से) ऊँटवान, (इक्का/एक्का से) इक्कावान/एक्कावान, (कोच से) कोचवान, (गाड़ी से) गाड़ीवान, (पील से) पीलवान, (हाथी से) हाथीवान
- पुल्लिंग शब्द हैं।
- टिप्पणी— हिन्दी शब्दों में भी यह प्रत्यय लगता है, परन्तु हिन्दी में यह बान की जगह पर “वान” हो जाता है। कामताप्रसाद गुरु के अनुसार ‘इसका रूप संस्कृत के अनुकरण पर वान हो जाता है; जैसे— गाड़ीवान, हाथीवान।’ ऊँट, इक्का/एक्का, गाड़ी और हाथी शब्द हिन्दी के हैं, इसलिए फारसी का बान प्रत्यय यहाँ वान हो गया है; जैसे— ऊँट (हिन्दी शब्द) + बान (फारसी प्रत्यय) = ऊँट + वान = ऊँटवान।
अरबी के प्रत्यय
कृत प्रत्यय
अरबी के प्रायः सभी शब्द किसी न किसी ‘धातु’ से बने हुए हैं और अधिकांश धातु ‘त्रिवर्ण’ रहते हैं। कुछ धातु चार वर्णों के और कुछ पाँच वर्णों के भी होते हैं। धातुओं के मान (वजन) के अक्षर सब धातुओं में पाये जाते हैं और वे ‘मूलाक्षर’ कहलाते हैं। इन मूलाक्षरों के अतिरिक्त कुछ और भी अक्षर कृदंतों की रचना में प्रयुक्त होते हैं, जिन्हें ‘अधिकाक्षर’ कहते हैं। इन अधिकाक्षरों की संख्या सात है— अ, त, स, म, न, ऊ, य। इन्हें स्मरण करने के लिए इनसे “अतसमनूय” शब्द याद रख सकते हैं। एक धातु से बने हुए सभी कृदंत हिन्दी में नहीं आते, और जो आते हैं, उनमें भी बहुधा उच्चारण की सुगमता के लिए रूपांतर कर लिया जाता है।
अरबी में धातुओं और कृदंतों के सम्पूर्ण रूप मान (वजन) अर्थात् नमूने पर बनाये जाते हैं; और “फ़, अ, ल” को मूलाक्षर मानकर इन्हीं से सब प्रकार के वजन बनाते हैं। जब कभी चार या पाँच मूलाक्षरों का काम पड़ता है तब ल को दो वा तीन बार काम में लाते हैं।
धातु (जज़्र)
- अरबी के प्रायः सभी शब्द किसी न किसी ‘धातु’ से बने हुए हैं।
- अधिकांश धातु ‘त्रिवर्ण’ हैं, अर्थात् तीन अक्षरों की होती हैं; जैसे—
- क-त-ब → लिखना
- ज-ल-स → बैठना
- फ-अ-ल → करना
- क-ल-म → बोलना
- इन तीन अक्षरों को अरबी में “मूलाक्षर” कहा जाता है।
- कुछ धातु चार वर्णों के और कुछ पाँच वर्णों के भी होते हैं। परन्तु अरबी का नियम है कि मूल तीन अक्षर ही आधार रहता है। जब चार या पाँच वर्ण का अक्षर चाहिए तो अरबी भाषा में तीसरे अक्षर (ल) को दो बार या तीन बार आवश्यकतानुसार दोहरा दिया जाता है; जैसे—
- मूल— फ-अ-ल
- चार वर्ण— फ-अ-ल-ल
- पाँच वर्ण— फ-अ-ल-ल-ल
- अर्थात् अरबी भाषा में “बहुवर्ण धातु” (चार और पाँच वर्ण) भी मूलतः “त्रिवर्ण धातु का विस्तार” है।
वज़न (मान)
- अरबी भाषा में शब्द निर्माण का तरीका बहुत वैज्ञानिक है। हर धातु को एक नमूने/ढाँचे में डालकर शब्द बनाते हैं। इस नमूने को अरबी में वज़्न → वज़न (मान) कहते हैं। अरबी भाषा में वज़न बनाने के लिए तीन अक्षर फ, अ, ल को प्रतीक माना गया है—
- फ — धातु का पहला अक्षर
- अ — धातु का दूसरा अक्षर
- ल — धातु का दूसरा अक्षर
- उदाहरण—
| वज़न | धातु | शब्द | अर्थ |
| फ-अ-ल | क-त-ब | कतब | उसने लिखा |
| म-फ-अ-ल | क-त-ब | मकतब | दफ्तर, लिखने की जगह |
| फि-आ-ल | क-त-ब | किताब | पुस्तक |
धातु और वज़न
- अरबी भाषा में मात्रा धातु पर नहीं, वज़न (मान) पर होता है।
- धातु केवल अक्षर देती है, वज़न मात्राएँ और संरचना देता है।
- मान लीजिए एक साँचा है— फि-आ-ल; अर्थात् इसमें “ि – – ा –” मात्राएँ हैं और फ-अ-ल मूलाक्षर (धातु); जब हम इस ढाँचे में धातु के अधर को डालते हैं तो शब्द प्राप्त होता है— क-त-ब से किताब, अर्थात् फ-अ-ल (ि + फ + अ + ा + ल) के स्थान पर क्रमशः क-त-ब को डालने से किताब शब्द प्राप्त हुआ। इसी तरह फ-अ-ल (ि + फ + अ + ा + ल) के स्थान पर क्रमशः ल-ब-स को डालने से लिबास शब्द प्राप्त हुआ।
मूलाक्षर और अधिकाक्षर
- वे अक्षर जो हर धातु में पाये जाते हैं, उसे मूलाक्षर कहते हैं अर्थात् धातु के तीन अक्षर; जैसे— क-त-ब में “क, त, ब” मूलाक्षर हैं।
- इन तीन मूलाक्षरों के अलावा कुछ और शब्द भी धातुओं में जोड़कर नए शब्दों का निर्माण किया जाता है, ये धातु का हिस्सा नहीं होता, बल्कि कृदंत बनाने के काम आते हैं, इन्हीं को “अधिकाक्षर” कहते हैं। अरबी में अधिकाक्षरों की संख्या सात है— अ, त, स, म, न, ऊ, य → “अतसमनूय”। इन्हीं अधिकाक्षरों के वज़न में योग से नये शब्द बनते हैं; जैसे— म + फअल → मफअल; त + फअल → तफअल; अ + फअल → अफअल; न + फअल → नफअल इत्यादि।
हिन्दी और अरबी
- एक धातु से बने हुए सभी कृदंत हिन्दी में नहीं आते, और जो आते हैं, उनमें भी बहुधा उच्चारण की सुगमता के लिए रूपांतर कर लिया जाता है।
सार
- अरबी में हर शब्द एक धातु से बनता है।
- धातु सामान्यतः तीन अक्षरों की होती है।
- चार‑पाँच अक्षर वाली धातु भी मूलतः तीन अक्षरों का विस्तार है।
- अरबी में शब्द बनाने के लिए वज़न (मान) का उपयोग होता है।
- वज़न (मान) में “फ, अ, ल” को प्रतीक अक्षर मानते हैं।
- धातु के अक्षर इनकी जगह रखकर शब्द बनते हैं।
- वज़न (मान) में जो अतिरिक्त अक्षर लगते हैं, वे अधिकाक्षर हैं— अ, त, स, म, न, ऊ, य → “अतसमनूय”
- हिंदी में अरबी के सभी रूप नहीं आते; जो आते हैं, वे अक्सर सरल रूप में आते हैं।
धातु → क्रियार्थक संज्ञाएँ (भाववाचक संज्ञा)
- त्रिवर्ण धातु के मूल रूप से कई एक क्रियार्थक संज्ञाएँ (भाववाचक संज्ञा) बनती हैं। हिन्दी में प्रचलित वज़न (मान) और उदाहरण अधोलिखित हैं—
| वज़न/मान (ढाँचा) | धातु (जज़्र) | शब्द (कृदंत) | अधिकाक्षर | अर्थ |
| फ़अ्ल | क-त-ल | कत्ल | – | मार डालना |
| फ़िअ्ल | इ-ल-म | इल्म | – | जानना |
| फ़ुअ्ल | ह-क-म | हुक्म | – | आज्ञा देना |
| फ़अल | त-ल-ब | तलब | – | खोजना |
| फ़अ्लत | र-ह-म | रहमत | त | दया करना |
| फ़िअ्लत | ख-द-म | खिद्मत | त | सेवा करना |
| फ़ुअ्लत | क-द-र | कुद्रत | त | योग्य होना |
| फ़अलत | ह-र-क | हरकत | त | चलना |
| फ़इलत | स-र-क | सरिका | – | चोरी |
| फ़अ्ला | द-अ-व | दअवा (दावा) | – | हक |
| फ़आल | स-ल-म | सलाम | – | कुशल होना |
| फ़िआल | क-य-म | कियाम | – | ठहरना |
| फ़ुआल | स-व-ल | सुवाल | – | पूछना |
| फ़ऊल | क-ब-ल | कबूल | – | स्वीकार |
| फ़ुऊल | ज-ह-र | जुहूर | – | रूप |
| फ़अ्लान | द-र-व | दरवान | न | संचार |
| फ़आलत | ब-ग-व | बगावत | त | बलवा |
| फ़िआलत | क-त-ब | किताबत | त | लिखना |
| फ़ऊलत | ज-र-र | जरूरत | त | आवश्यकता |
| मफ्अलत | र-ह-म | मर्हमत | म, त | दया |
- मूल धातु ‘क-त-ल’ या ‘ह-क-म’ में अपने आप में कोई मात्रा निश्चित नहीं होती। जब इन्हें फ़अ्ल के साँचे में डालते हैं तो ‘कत्ल’ बनता है, और जब फ़ुअ्ल में डालते हैं तो ‘हुक्म’ बनता है। यह अरबी भाषा की अद्भुत गणितीय क्षमता है।
- ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि— रहमत, खिद्मत, कुद्रत, हरकत, बगावत, किताबत, जरूरत में ‘त’; दरवान में ‘न’ और मर्हमत में ‘म’ व ‘त’ अधिकाक्षर जुड़े हैं।
कृदंत विशेषण
- फ़ाइल – अपूर्ण कृदंत या कर्तृवाचक संज्ञा; जैसे—
- आलिम = विद्वान (अ-ल-म = जानना से)
- हाकिम = अधिकारी (ह-क-म = न्याय करना से)
- गाफ़िल = भूलनेवाला (ग-फ़-ल = भूलना से)
- मफ़्ऊल – भूतकालिक (कर्मवाचक) कृदंत; जैसे—
- मअलूम = जाना हुआ (अ-ल-म = जानना से)
- मन्जूर = स्वीकृत (न-ज़-र = देखना से)
- मशहूर = प्रसिद्ध (श-ह-र = प्रसिद्ध से)
- फ़ईल – इस रूप से गुण की स्थिरता अथवा अधिकता का बोध होता है; जैसे—
- हकीम = साधु, वैध (ह-क-म = न्याय करना से)
- रहीम = बड़ा दयालु (र-ह-म = दया करना से)
- टिप्पणी— उपर्युक्त तीनों वज़न (फ़ाइल, मफ़्ऊल, फ़ईल) से निर्मित शब्द प्रायः संज्ञा के समान प्रयुक्त होते हैं।
- फ़ऊल – इसका अर्थ तीसरे रूप के समान है; जैसे—
- गफ़ूर = अधिक क्षमाशील (ग-फ़-र = क्षमा करने से)
- जरूर = आवश्यक (ज-र्-र = सताना से)
- अफ़्अल – इस वज़न पर त्रिवर्ण कृदंत विशेषण से उत्कर्ष-बोधक विशेषण बनते हैं; जैसे—
- अकबर = बहुत बड़ा (कबीर = बड़ा से)
- अहमद = परम प्रशंसनीय (हमीद = प्रशंसनीय से)
- फ़अ्आल – इस नमूने पर व्यापार की कर्तृवाचक संज्ञाएँ बनती हैं; जैसे—
- जल्लाद (ज-ल-द = कोड़ा मारना)
- सर्राफ़ (स-र-फ़ = बदलना); हिन्दी में सराफ
- बज़्ज़ाज़; हिन्दी में बजाज
- बक्काल
त्रिवर्ण धातुओं से क्रियार्थक संज्ञाओं के और भी रूप बनते हैं, जिनमें दो वा अधिक अधिकाक्षर आते हैं। मूल क्रियार्थक संज्ञाओं के अनुरूप इन क्रियार्थक संज्ञाओं से भी कर्तृवाचक और कर्मवाचक विशेषण बनते हैं। दोनों के मुख्य साँचे नीचे अधोलिखित हैं—
- क्रियार्थक संज्ञाओं के अन्य रूप
- क्रियार्थक विशेषणों के अन्य रूप
क्रियार्थक संज्ञाओं के अन्य रूप
- तफ़ईल—
- तअलीम = शिक्षा (अ-ल-म = जानना से), हिन्दी में तालीम
- तहसील = प्राप्ति (ह-स-ल से)
- मुफ़ाअलत—
- मुकाबला = सामना (क-ब-ल = सामने होना से)
- मुआमला = विषय, उद्योग (अ-म-ल = अधिकार चलाना से), हिन्दी में मामला
- इफ़्आल—
- इन्कार = नहीं (न-क-र = न जानना से)
- इन्साफ़ = न्याय (न-फ़-स = न्याय करना से)
- तफ़उ्लल—
- तअल्लुक = सम्बन्ध (अ-ल-क = आसरा करना से), हिन्दी में ताल्लुक
- तख़ल्लुस = उपनाम (ख़-ल-स = रक्षित होना से)
- तकल्लुफ़ = (क-ल-फ़ = आदर करना से)
- इफ़्तिआल (इ-फ़्-ति-आ-ल)—
- इम्तिहान = परीक्षा (म-ह-न = परीक्षा करना से)
- ऐतराज़ = आपत्ति (अ-र-ज़ = आगे रखने से)
- ऐतबार = विश्वास (अ-व-र = विश्वास करना से)
- इस्तिफ़्आल (इ-स्-ति-फ़्-आ-ल)—
- इस्तिअमाल = उपयोग (अ-म-ल = काम में लाना से), हिन्दी में इस्तेमाल
- इस्तिमरार = स्थिरता (म-र्-र = होता रहना से)
क्रियार्थक विशेषणों के अन्य रूप
कर्तृवाचक और कर्मवाचक विशेषणों के वज़न (मान) अधोलिखित हैं। इनके रूपों में यह अंतर है कि पहले के अंत्याक्षर में ‘इ’ और दूसरे के अंत्याक्षर में ‘आ’ रहता है—
| कर्तृवाचक विशेषण का वज़न | उदाहरण | कर्मवाचक विशेषण का वज़न | उदाहरण |
| मुफ़इ्लइ | मुअल्लिम = शिक्षक (इल्म से) | मफ़अअल | मुअल्लम = शिष्य |
| मुफ़ाइल | मुहाफ़िज = रक्षक (हिफ़ज़ से) | मुफ़ाअल | मुहाफ़ज़ = रक्षित |
| मुफ़्इल | मुनसिफ़ = न्यायाधीश (नफ़स से) | मुफ़्अल | मुनसफ़ = न्याय पानेवाला |
| मुत्फ़इइल | मुत्बद्दिल = बदलनेवाला (बदल से) | मुतफ़अअल | मुतबद्दल = बदला हुआ |
| मुन्फ़इल | मुनसरिम = शासक (सरम से) | मुन्फ़अल | मुन्सरम = शासित |
| मुत्फ़ाइल | मुत्वातिर = लगातार (वतर से) | मुत्फ़ाअल | मुत्वातर = निर्विघ्न |
| मुस्तफ़्इल | मुस्तक्बिल = भविष्य (कबल से) | मुस्तफ़्अल | मुस्तकबल = चित्र |
स्थानवाचक और कालवाचक संज्ञाएँ
स्थानवाचक और कालवाचक संज्ञाएँ बहुधा ‘मफ़्अल’ या ‘मुफ़इल’ के वज़न पर निर्मित होती हैं और उनके आदि में ‘म’ अवश्य रहता है; जैसे—
- मक्तब = वह स्थान जिसमें लिखना सिखाया जाता है, (क-त-ब = लिखना से)
- मक्तल = कतल करने की जगह है, (क-त-ल = मार डालने से)
- मज़लिस = वह स्थान जहाँ अथवा वह समय जब सब लोग बैठते हैं, (ज-ल-स = बैठना से)
- मस्ज़िद = पूजा की जगह, (स-ज-द = पूजा करना से)
- मंज़िल = पड़ाव, (न-ज़-ल = उतरना से)
स्थानवाचक संज्ञाओं में कभी-कभी ‘ह’ जोड़ दिया जाता है; जैसे— मकबरह, मद्रसह; (हिन्दी में मकबरा, मदरसा)।
तद्धित प्रत्यय
आनी
- आनी प्रत्यय के योग से विशेषण बनते हैं।
- ज़िस्म (शरीर) + आनी = ज़िस्मानी (शारीरिक)। रूह (आत्मा) + आनी = रूहानी (आत्मिक)
इयत
- भाववाचक संज्ञा
- इंसान (मनुष्य) + इयत = इंसानियत (मनुष्यत्व)। कैफ़ (कैसे?) + इयत = कैफ़ियत (विवरण, वर्णन)। मा (क्या?) + इयत = माहियत (मूल)।
ई
- गुणवाचक
- (अरब से) अरबी, (इंसान से) इंसानी, (इल्म से) इल्मी, (ईसा से) ईसवी,
ची
- कर्तृवाचक संज्ञा या व्यापारवाचक संज्ञा
- (अफीम से) अफीमची, (खजाना से) खजानची, (गुलेल से) गुलेलची, (तंबूर से) तंबूरची, (तबला से) तबलची, (तोप से) तोपची, (नकल से) नकलची, (निशान से) निशानची, (बंदूक से) बंदूकची, (मशाल से) मशालची
- हिन्दी शब्द— अफीम। फारसी शब्द— गुलेल, तंबूर, निशान। अरबी शब्द— खजाना, तबला, नकल, बंदूक, मशाल। तुर्की शब्द— तोप।
- टिप्पणी— वस्तुतः ‘ची’ तुर्की भाषा का प्रत्यय है और फारसी से होते हुए हिन्दी-उर्दू में आया है। कामताप्रसाद गुरु कृत ‘हिन्दी व्याकरण’ और डॉ॰ वासुदेवनन्दन प्रसाद कृत ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ में ‘ची’ को अरबी प्रत्यय बताया गया है। R. S. McGregor कृत ‘The Hindi-English Dictionary’ में इसे ‘चि’ (तुर्की) → ‘ची’ (फारसी) बताया गया है।
म
- यह तुर्की भाषा का प्रत्यय है। इससे स्त्रीलिंग शब्द बनते हैं।
- (खान से) खानम, (बेग से) बेगम
उल्
- अरबी में ‘समास’ के लिए दो संज्ञाओं के मध्य में ‘उल्’ (= का) सम्बन्धवाचक रख देते हैं और भेद्य को भेदक के पहले लाते हैं।
- ज़लाल (प्रभुत्व) + उल् + दीन (धर्म) = ज़लालुद्दीन (धर्म-प्रभुत्व); इस उदाहरण में ‘उल्’ का अंत्य ‘ल्’ अरबी भाषा की संधि के अनुसार ‘द्’ होकर ‘दीन’ से मिलकर ‘द्दीन’ होकर ज़लालुद्दीन बनता है।
- दार (घर) + उल् + सल्तनत (राज्य) = दारुस्सल्तनत (राजधानी)
- हबीब (मित्र) + उल् + अल्लाह (ईश्वर) = हबीबुल्लाह (ईश्वर-मित्र)
- निज़ाम (व्यवस्था) + उल् + मुल्क (राज्य) = निज़ामुल्मुल्क (राज्य-व्यवस्थापक)
वलद (वल्द)
- दो हिन्दी के व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के मध्य में पिता-पुत्र का सम्बन्ध बताने के लिए प्रयुक्त होता है।
- पुत्र-वल्द-पिता; जैसे— अविनाश वल्द अजय (अजय का पुत्र अविनाश)। वस्तुतः हिन्दी में कानूनी भाषा में प्रयोग होता है।
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