समास क्या है?
समास का अर्थ है, संक्षेप। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट करना ‘समास’ का मुख्य प्रयोजन है।
“दो या अधिक शब्दों (पदों) का परस्पर सम्बन्ध बतानेवाले शब्दों अथवा प्रत्ययों का लोप होने पर उन दो या अधिक शब्दों से जो एक स्वतन्त्र शब्द बनता है, उस शब्द को सामासिक शब्द कहते हैं और उन दो या अधिक शब्दों का जो संयोग होता है, वह समास कहलाता है।”— पं० कामताप्रसाद गुरु
“समसनम् अनेकेषां पदानाम् एकपदीभवनं समासः।”
अर्थात् अनेक पद अपने जोड़नेवाले विभक्ति-चिह्नादि को छोड़कर परस्पर मिलकर एक पद बन जाते हैं, तो उस एक पद बनने की क्रिया को ‘समास’ एवं उस पद को ‘सामासिक पद’ अथवा ‘समस्त पद’ कहते हैं।
संक्षेप में—
- समास में कम-से-कम दो शब्दों (पदों) का योग होता है। दो पदों से अधिक का भी समास होता है, परन्तु हिन्दी की प्रवृत्ति दो पदों के समास की है।
- वे दो या अधिक पद एक पद हो जाते हैं— “एकपदीभावः समासः”।
- समास में समस्त होनेवाले पदों का विभक्ति-प्रत्यय लुप्त हो जाता है।
- समस्त पदों के बीच सन्धि की स्थिति होने पर सन्धि अवश्य होती है। यह नियम तत्सम (संस्कृत) शब्दों में अत्यावश्यक है; जैसे— रामावतार (राम + अवतार)। परन्तु हिन्दी और अन्य भाषा के शब्दों में बहुधा सन्धि नहीं होती; जैसे— घर-आँगन (घर + आँगन), बेईमान (बे + ईमान)।
उदाहरण—
- प्रेमसागर— प्रेम का सागर। इस शब्द में प्रेम और सागर दो शब्द हैं। इन दोनों का सम्बन्ध बतानेवाले सम्बन्ध कारक “का” चिह्न का लोप होने से “प्रेमसागर” एक स्वतन्त्र शब्द बना है।
- दहीबड़ा— दही में का बड़ा या दही में पड़ा हुआ बड़ा या दही में डूबा हुआ बड़ा। इस शब्द में दही और बड़ा दो शब्द हैं। इन दोनों को जोड़नेवाले “में का/ में पड़ा हुआ/ में डूबा हुआ” का लोप होने से “दहीबड़ा” एक स्वतन्त्र शब्द बना है।
- घोड़ा-गाड़ी— घोड़ा-युक्त गाड़ी या घोड़ा से युक्त गाड़ी। इस शब्द में घोड़ा और गड़ी दो शब्द हैं। इन दोनों को जोड़नेवाले “युक्त/ से युक्त” का लोप होने से “घोड़ा-गाड़ी” एक स्वतन्त्र शब्द बना है।
विग्रह
“वृत्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः।” अर्थात् बिखरे पद (अलग-अलग पद) ‘समास विग्रह’ कहलाते हैं।
समस्त या समासयुक्त शब्दों को अलग-अलग करने का नाम “विग्रह” है; जैसे—
- ‘रामराज्य’ का विग्रह है— राम के राज्य जैसा राज्य।
- ‘दाल-रोटी’ का विग्रह है— दाल और रोटी इत्यादि।
- ‘यथासंभव’ का विग्रह है— यथा (जैसे) संभव हो।
- ‘घनश्याम’ का विग्रह है— घन की तरह श्याम है जो।
सन्धि और समास
सन्धि और समास का अन्तर इस प्रकार है—
- समास में दो पदों का योग होता है; किन्तु सन्धि में दो वर्णों का। अर्थात् सन्धि में दो अक्षर (वर्ण) परस्पर मिलाये जाते है, समास में दो शब्दों पास-पास लाये जाते हैं।
- सन्धि = सम् + धि। ‘सम्’ अर्थात् अच्छी तरह और ‘धि’/‘धा’ अर्थात् रखना। इस तरह सन्धि में दो अक्षरों (वर्णों) को अच्छी तरह रखने पर विकार होता है और सन्धि बनता है।
- समास = सम् + आस। ‘सम्’ अर्थात् अच्छी तरह और ‘आस’ अर्थात् बैठाना। इस तरह समास में दो पदों (शब्दों) को पास-पास रखने पर समास बनता है।
- समास में पदों के प्रत्यय समाप्त कर दिये जाते हैं। सन्धि के लिये दो वर्गों के मेल और विकार की गुंजाइश रहती है, जबकि समास को इस मेल या विकार से कोई मतलब नहीं।
- सन्धि के तोड़ने को “विच्छेद” कहते हैं, जबकि समास का “विग्रह” होता है। जैसे; ‘पीताम्बर’ में दो पद हैं— ‘पीत’ और ‘अम्बर’। सन्धि-विच्छेद होगा पीत + अम्बर; जबकि समास-विग्रह होगा— पीत है जो अम्बर या पीत है जिसका अम्बर = पीताम्बर।
अर्थात् सन्धि वर्णों में होता है। समास में दो पद मिलते हैं जिसके दौरान विभक्ति चिह्न, प्रत्यय आदि का लोप होता है, साथ ही सन्धि के अनुसार वर्ण विकार भी होता है।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि हिन्दी में सन्धि केवल तत्सम पदों में होती है, जबकि समास संस्कृत तत्सम, हिन्दी, उर्दू हर प्रकार के पदों में। यही कारण है कि हिन्दी पदों के समास में सन्धि आवश्यक नहीं है।
समास पदों का निर्माण
समास में दो पदों (शब्दों) को पास-पास रखने पर समास बनता है; जैसे—
- घोड़ागाड़ी = घोड़ा + गाड़ी; घोड़ा खींचता है जिस गाड़ी को। इसमें खींचता है जिसको अर्थात् ‘गाड़ी’ गौण शब्द है, मुख्य शब्द हैं ‘घोड़ा’। इन्हीं मुख्य शब्दों को पास-पास बैठाने की विधि को समास कहते हैं।
- घोड़े पर सवार = घुड़सवार
- माँ और बाप = माँ-बाप
- जहाँ चार राहें मिलती हैं = चौराहा
इस प्रकार गौण शब्दों (कारक चिह्नों, संयोजक पदों, आदि) का लोप करके ‘समासयुक्त’ या ‘समस्त पद’ बनाये जाते हैं; जैसे—
- रामराज्य, दाल-रोटी, यथासंभव, घनश्याम आदि।
समास के भेद
जिन दो मुख्य शब्दों (पदों) के मेल से समास बनता है, उन शब्दों को खण्ड या अवयव कहते हैं। इनमें से पहला, पूर्व-पद या पूर्व-खण्ड और द्वितीय, उत्तर-पद या उत्तर-खण्ड कहलाता है; उदाहरण— घनश्याम में ‘घन’ पूर्व-पद या पूर्व-खण्ड है, ‘श्याम’ उत्तर-पद या उत्तर-खण्ड।
समास की पहचान और वर्गीकरण इस आधार पर किया जाता है कि दोनों पदों में से किस पद का अर्थ प्रधान है। अर्थ की प्रधानता के आधार पर समास के दोनों पदों में से एक प्रधान खंड होता है और दूसरा गौण खंड।
- जिस खंड पर अर्थ का मुख्य बल पड़ता है, उसे “प्रधान खंड” कहते हैं।
- जिस खंड पर अर्थ का बल नहीं पड़ता, उसे “गौण खंड” कहते हैं।
प्रधान खंड और गौण खंड के आधार पर समास के चार प्रकार हैं—
- जिस समास में पूर्व खण्ड प्रधान होता है, वह अव्ययीभाव समास है।
- जिस समास में उत्तरखंड प्रधान होता है, वह तत्पुरुष समास है। (कर्मधारय और द्विगु इसी का भाग है।)
- जिस समास में दोनों खंड प्रधान हों, वह द्वंद्व समास है।
- जिस समास में दोनों खंड प्रधान न होकर कोई तीसरा अर्थ प्रधान हो, वह बहुव्रीहि समास है।
| क्र० सं० | समास | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| 1. | अव्ययीभाव समास | पूर्वखण्ड प्रधान |
| 2 | तत्पुरुष समास | उत्तरखंड प्रधान |
| 3. | द्वन्द्व समास | दोनों खंड प्रधान |
| 4. | बहुव्रीहि समास | दोनों खंड प्रधान नहीं |
तत्पुरुष समास के अन्तर्गत ही दो समास और हैं— कर्मधारय और द्विगु। इसलिए कभी-कभी छः भेद भी माने जाते हैं—
- अव्ययीभाव समास
- तत्पुरुष समास
- कर्मधारय समास
- द्विगु समास
- द्वंद्व समास
- बहुव्रीहि समास

प्रयोग की दृष्टि से समास के भेद
प्रयोग की दृष्टि से समास के तीन भेद किये जा सकते हैं—
- संयोगमूलक समास अथवा संज्ञा-समास
- आश्रयमूलक समास अथवा विशेषण समास
- वर्णनमूलक समास अथवा अव्यय समास
संज्ञा-समास
संयोगमूलक समास को द्वन्द्व समास अथवा संज्ञा-समास कहते हैं। इस प्रकार के समास में दोनों पद संज्ञा होते हैं। दूसरे शब्दों में, इसमें दो संज्ञाओं का संयोग होता है; जैसे— माँ-बाप, भाई-बहन, माँ-बेटी, सास-पतोहू, दिन-रात, रोटी-बेटी, माता-पिता, दही-बड़ा, दूध-दही, थाना-पुलिस, सूर्य-चन्द्र इत्यादि। इनमें सभी पद प्रधान होते हैं। किन्तु, जहाँ योजक चिह्न (-) नहीं लगता, वहाँ तत्पुरुष समास होता है। तत्पुरुष में भी दो संज्ञाओं का संयोग होता है; जैसे— पाठशाला, गंगाजल, राजपुत्र, पर्णकुटीर इत्यादि।
विशेषण-समास
यह आश्रयमूलक समास है। यह प्रायः कर्मधारय समास होता है। इस समास में प्रथम पद विशेषण होता है, किन्तु द्वितीय पद का अर्थ बलवान होता है। कर्मधारय का अर्थ है कर्म अथवा वृत्ति धारण करनेवाला। यह विशेषण-विशेष्य, विशेष्य-विशेषण, विशेषण तथा विशेष्य पदों द्वारा सम्पन्न होता है। जैसे—
- जहाँ पूर्वपद विशेषण हो; यथा— कच्चाकेला, शीशमहल, महारानी।
- जहाँ उत्तरपद विशेषण हो; यथा— घनश्याम।
- जहाँ दोनों पद विशेषण हों; यथा— लाल-पीला, खट्टा-मीठा।
- जहाँ दोनों पद विशेष्य हों; यथा— मौलवीसाहब, राजाबहादुर।
अव्यय समास वर्णमूलक समास के अन्तर्गत बहुव्रीहि और अव्ययीभाव समास का निर्माण होता है। इस समास (अव्ययीभाव) में प्रथम पद साधारणतः अव्यय होता है और दूसरा पद संज्ञा; जैसे— यथाशक्ति, यथासाध्य, प्रतिमास, यथासम्भव, घड़ी-घड़ी, प्रत्येक, भरपेट, यथाशीघ्र इत्यादि।
समास की सामान्य विशेषताएँ
समास में कम से कम दो शब्दों या पदों का योग होता है। परन्तु इसमें दो से अधिक पद भी हो सकते हैं।
- ऐसे मेल वाले दो अथवा अधिक पद मिलकर एक हो जाते हैं।
- मिलने वाले पदों के विभक्ति प्रत्यय का लोप हो जाता है।
- संस्कृत (तत्सम) के होने पर संधि की स्थिति आने पर उनमें संधि भी हो सकती है; जैसे—
- गंगाजल— इसमें दो पद हैं— गंगा और जल। इसका विग्रह है— गंगा का जल। इसमें ‘का’ विभक्ति का लोप है, अर्थात् गंगाजल में “संबन्धतत्पुरुष” समास है।
- विद्यालय— इसमें दो पद हैं— विद्या और आलय। इसका विग्रह है— विद्या का आलय; अर्थात् विद्यालय में “संबन्धतत्पुरुष” समास है। इसमें ‘का’ विभक्ति का लोप है। संधि की दृष्टि से— विद्यालय = विद्या + आलय; आ + आ = आ; अर्थात् इसमें दीर्घ संधि है।
- शीतोष्ण— इसमें दो पद हैं— शीत और उष्ण। यहाँ संधि भी हुई है— शीत + उष्ण = शीतोष्ण; अर्थात् गुण संधि के अनुसार “अ + उ = ओ” हो गया। इस तरह संधि की दृष्टि से इसमें गुण संधि है और समास की दृष्टि से इसमें द्वन्द्व समास है।
- समास प्रायः ‘सजातीय’ शब्दों का ही होता है, अर्थात् समान भाषा के शब्द मिलकर समस्त पद बनाते हैं; जैसे— धर्मशाला = धर्म (संस्कृत) + शाला (संस्कृत), अधमरा = आधा (हिन्दी) + मरा (हिन्दी), खुशदिल = खुश (फारसी) + दिल (फारसी), तो ठीक है; लेकिन यदि कहें मजहबशाला तो गलत होगा। वैसे इसके बहुत से अपवाद भी हैं, क्योंकि भाषाई-सम्पर्क और हिन्दी भाषा के बढ़ते प्रयोग के कारण ‘विजातीय’ शब्दों से भी सासासिक पदों का निर्माण होता है; जैसे— बम-वर्षा (अँग्रेजी + संस्कृत), रेलगाड़ी (अँग्रेजी + हिन्दी), स्टेशन-अधीक्षक (अँग्रेजी + संस्कृत), जिलाधीश (अरबी + संस्कृत), रसोईखाना (हिन्दी + फारसी) इत्यादि।
- समास पद को तोड़ना ‘विग्रह’ कहलाता है, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि समास का विलोम “व्यास” होता है।
समास-सम्बन्धी कुछ विशेष बातें
उत्तरपद और पूर्वपद के बीच में या तो योजक-चिह्न (-) लगाना चाहिए या उन्हें मिलाकर एक में लिखना चाहिए। इन्हें पृथक्-पृथक् लिखना अशुद्ध है—
| शुद्ध | अशुद्ध |
|---|---|
| सुख-दुःख | सुख दुःख |
| माता-पिता | माता पिता |
| दहीबड़ा | दही बड़ा |
| घोड़ा-गाड़ी | घोड़ा गाड़ी |
एक समस्त पद में एक से अधिक प्रकार के समास हो सकते हैं। यह विग्रह करने पर स्पष्ट होता है। जिस समास के अनुसार विग्रह होगा, वही समास उस पद में माना जायेगा; जैसे—
| समस्त पद | विग्रह | समास प्रकार |
|---|---|---|
| पीताम्बर | पीत है जो अम्बर / पीला कपड़ा | कर्मधारय |
| पीत है अम्बर जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण या विष्णु | बहुव्रीहि | |
| निडर | बिना डर का | अव्ययीभाव |
| नहीं है डर जिसे | प्रादि का नञ् बहुव्रीहि | |
| सुरूप | सुन्दर है जो रूप | कर्मधारय |
| सुन्दर है रूप जिसका | बहुव्रीहि | |
| चन्द्रमुख | चन्द्र के समान मुख | कर्मधारय |
| चन्द्र के समान मुख हो जिसका | बहुव्रीहि | |
| चन्द्रवदन | चन्द्र के समान वदन (मुख) | कर्मधारय |
| चन्द्र के समान वदन (मुख) हो जिसका | बहुव्रीहि | |
| बुद्धिबल | बुद्धि ही है बल | कर्मधारय |
| बुद्धि का बल | सम्बन्धतत्पुरुष | |
| पुरुषरत्न | पुरुष जो रत्न है | कर्मधारय |
| पुरुषों में रत्न | अधिकरण तत्पुरुष | |
| वज्रदेह | देह जो वज्र के समान है | कर्मधारय |
| वज्र की देह | सम्बन्धतत्पुरुष | |
| वज्र के समान देह है जिसकी | बहुव्रीहि | |
| जलपान | जल का पान | सम्बन्धतत्पुरुष |
| जल-पान करना अर्थात् कलेवा या नाश्ता | बहुव्रीहि | |
| पशुपति | पशुओं के पति (स्वामी) | सम्बन्धतत्पुरुष |
| पशुओं के पति (स्वामी) अर्थात् शिव | बहुव्रीहि | |
| अनन्त | न अन्त | नञ् तत्पुरुष |
| जिसका अन्त न हो अर्थात् ईश्वर | बहुव्रीहि | |
| रसोईघर | रसोई के लिए घर | सम्प्रदान तत्पुरुष |
| रसोई का घर | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| पनचक्की | पानी से चलनेवाली चक्की | करण तत्पुरुष |
| पानी की चक्की | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| कूपमंडूक | कूप में रहनेवाला मंडूक (मेंढक) | अधिकरण तत्पुरुष |
| कूप का मंडूक (मेंढक) | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| ऊटपटांग | ऊट पर टांग | अलुक् तत्पुरुष |
| ऊट पर टांग अर्थात् बेतुका | बहुव्रीहि | |
| मंदमति | मंद मति | कर्मधारय |
| मंद है मति जिसकी वह मनुष्य | बहुव्रीहि | |
| द्वैमातुर | जिसकी दो माताएँ हैं | द्विगु |
| दो माताएँ हैं जिसकी अर्थात् जरासंध | बहुव्रीहि | |
| त्रिनेत्र | तीन आँख | द्विगु |
| तीन नेत्र हैं जिसके अर्थात् शिव | बहुव्रीहि | |
| सत्यव्रत | सत्य और व्रत | द्वन्द्व |
| सत्य ही व्रत | कर्मधारय | |
| सत्य व्रत | कर्मधारय | |
| सत्य का व्रत | तत्पुरुष | |
| सत्य है व्रत जिसका | बहुव्रीहि | |
| वज्रबाहु | भुजाएँ जो वज्र के समान हों | कर्मधारय |
| वज्र की भुजाएँ | सम्बन्ध तत्पुरुष | |
| वज्र के समान भुजाएँ हैं जिसकी | बहुव्रीहि | |
| दशानन | दस हों आनन (मुख) जिसके | द्विगु समास |
| दस हैं (मुख) जिसके अर्थात् रावण | बहुव्रीहि समास |
समासों का विग्रह करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि यथासम्भव समास में आये पदों के अनुसार ही विग्रह हो; जैसे—
- ‘पीताम्बर’ का विग्रह ‘पीत है जो अम्बर’ अथवा ‘पीत है अम्बर जिसका’, ऐसा होना चाहिए; न कि ‘पीला है जो कपड़ा’ अथवा ‘पीला है कपड़ा जिसका’।
- कुम्भकार अर्थात् ‘कुम्भ को बनाने वाला’ न कि ‘बनाता है जो कुम्भ’।
बहुधा संस्कृत के समासों, विशेषकर अव्ययीभाव, बहुव्रीहि और उपपद समासों का विग्रह हिन्दी के अनुसार करने में कठिनाई होती है। ऐसे स्थानों पर हिन्दी के शब्दों से सहायता ली जा सकती है। जैसे—
| समस्त पद | विग्रह | समास प्रकार |
|---|---|---|
| कुम्भकार | कुम्भ को बनानेवाला | तत्पुरुष (कर्मतत्पुरुष) |
| खग | आकाश में जानेवाला / ख (आकाश) में ग (पक्षी) | तत्पुरुष (अधिकरण) |
| यथाक्रम | क्रम के अनुसार | अव्ययीभाव |
| आमरण | मरण तक | अव्ययीभाव |
| व्यर्थ | बिना अर्थ का | अव्ययीभाव |
| विमल | हट गया मल जहाँ से | अपादान बहुव्रीहि |
| निर्जन | निकल गया हो जनसमूह जिससे | अपादान बहुव्रीहि |
सामासिक पद में पदों की संख्या— हिन्दी में प्रायः दो शब्दों का समास होता है, परन्तु दो से अधिक पदों वाले समास भी मिलते हैं; जैसे— मनसा-वाचा-कर्मणा।
- अव्ययीभाव समास में दो ही पद होते हैं।
- बहुव्रीहि में भी साधारणतः दो ही पद रहते हैं।
- तत्पुरुष में दो से अधिक पद हो सकते हैं; जैसे— हर-फन-मौला।
- द्वन्द्व में तो सभी समासों से अधिक पद रह सकते हैं। जैसे— तन-मन-धन, नोन-तेल-लकड़ी, आम-अमरूद-इमली, आम-जामुन-कटहल-कचनार इत्यादि।
एक से अधिक समास वाले पद—
दो से अधिक शब्दों के समास हो सकते हैं और उनमें एकाधिक समास-भेद भी हो सकते हैं; जैसे—
- गुरुजनसेवक— गुरु जन (कर्मधारय समास) + गुरुजन का सेवक (तत्पुरुष समास)।
- महाराजपुत्र— महान् राजा (कर्मधारय समास) + महाराज का पुत्र (तत्पुरुष समास)।
- पूर्वप्रथानुसार— पूर्व प्रथा (कर्मधारय समास) + पूर्वप्रथा के अनुसार (अव्ययीभाव समास)।
यदि एक समस्त पद में अनेक समासवाले पदों का मेल हो, तो अलग-अलग या एक साथ भी विग्रह किया जा सकता है। जैसे—
- चक्रपाणिदर्शनार्थ = चक्र है पाणि में जिसके = चक्रपाणि (बहुव्रीहि); दर्शन के अर्थ = दर्शनार्थ (अव्ययीभाव), चक्रपाणि के दर्शनार्थ = चक्रपाणिदर्शनार्थ (अव्ययीभाव)। समूचा पद क्रियाविशेषण अव्यय है, इसलिए अव्ययीभाव है। एक साथ विग्रह इस तरह होगा— चक्र है पाणि में जिसके, उसके दर्शन के अर्थ = चक्रपाणिदर्शनार्थ।
- पीताम्बरवनमाला = पीत है अम्बर जिसका पीताम्बर (बहुव्रीहि); वन के फूलों की माला वनमाला (मध्यमपद०); पीताम्बर की वनमाला = पीताम्बरवनमाला (सम्बन्धतत्पुरुष)। अथवा— वन के फूलों की माला = वनमाला, पीत है अम्बर जिसका, उसकी वनमाला। यहाँ यदि ‘पीत है अम्बर जिसका उसकी वन के फूलों की माला’ ऐसा विग्रह किया जाय, तो अच्छा नहीं मालूम होता। इसलिये एक साथ विग्रह न करके अलग-अलग करना ज्यादा अच्छा होगा।
संस्कृत समासों के कुछ विशेष नियम—
किसी-किसी बहुव्रीहि समास का उपयोग अव्ययीभाव समास के समान होता है; जैसे— प्रेमपूर्वक, विनयपूर्वक, सादर, सविनय, सप्रेम।
तत्पुरुष समास में निम्नलिखित विशेष नियम पाये जाते हैं—
- अहन् शब्द किसी-किसी समास के अंत में अह्न हो जाता हैं; जैसे— पूर्वाह्र, अपराह्न, मध्याह्न।
- राजन् शब्द के अंत्य व्यंजन का लोप हो जाता है; जैसे— राजपुरुष (राजा का पुरुष), राजकुमार, जनकराज, धर्मराज।
- इस समास में जब पहला पद सर्वनाम होता है, तब भिन्न-भिन्न सर्वनामों के विकृत रूप का प्रयोग होता है—
| हिन्दी | संस्कृत | विकृत रूप | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| मैं | अहम् | मत् | मत्पुत्र |
| हम | वयम् | अस्मत् | अस्मत्पिता |
| तू | त्वम् | त्वत् | त्वद्गृह |
| तुम | यूयम् | युष्मत् | युष्मत्कुल |
| भवान् | भवत् | भवन्मया | |
| वह, वे | तद् | तत् | तत्काल, तद्रूप |
| यह, ये | एतद् | एतत् | एतद्देशीय |
| जो | यद् | यत् | यत्कृपा |
- कभी-कभी तत्पुरुष समास का प्रधान पद पहले ही आता है; जैसे— पूर्वकाय (काया अर्थात् शरीर का पूर्व अर्थात् अगला भाग), मध्याह्र (अहन् अर्थात् दिन का मध्य), राजहंस (हंसों का राजा)।
- जब अन्नंत और इन्नंत शब्द तत्पुरुष समास के प्रथम स्थान में आते हैं, तब उनके अंत्य का लोप होता है; जैसे— आत्मबल, ब्रह्मज्ञान, हस्तिदंत, योगिराज, स्वामिभक्त।
- विद्वान्, भगवान्, श्रीमान् इत्यादि शब्दों के मूल रूप विद्वस्, भगवत्, श्रीमत् समास में आते हैं; जैसे— विद्वज्जन, भगवद्भक्त, श्रीमद्भागवत।
- नियमविरुद्ध शब्द वाचस्पति, बलाहक (वारीणां वाहकः, जल का वाहक मेघ), पिशाच (पिशिच अर्थात् मांस भक्षण करनेवाले), बृहस्पति, वनस्पति (वनस्य पतिः, वन का पति), प्रायश्चित इत्यादि।
कर्मधारय समास के संबंध में अधोलिखित नियम हैं—
- महत् शब्द का रूप महा होता है; जैसे— महाराज, महादशा, महादेव, महाकाव्य, महालक्ष्मी, महासभा। अपवाद— महदतर, महदुपकार, महत्कार्य।
- अनंत शब्द के द्वितीय स्थान में आने पर अंत्य नकार का लोप हो जाता है; जैसे— महाराज (महत् राजन्), महोक्ष (बड़ा बैल)।
- रात्रि शब्द समास के अंत में रात्र हो जाता है; जैसे— पूर्वरात्र, अपरात्र, मध्यरात्र, नवरात्र।
- ‘कु’ के बदले किसी-किसी शब्द के आरंभ में ‘कत्’, ‘कद’ और ‘का’ हो जाता है; जैसे— कदन्न, कदुष्ण, कवोष्ण, कापुरुष।
बहुव्रीहि समास के विशेष नियम अधोलिखित हैं—
- सह और समान के स्थान में प्रायः ‘स’ आता है; जैसे— सादर, सविनय, सवर्ण, सजात, सरूप।
- अक्षि (आँख), सखि (मित्र), नाभि, इत्यादि कुछ इकारांत शब्द समास के अंत में आकारांत हो जाते हैं; जैसे— पुंडरीकाक्ष (पुंडरीक के समान नेत्र हैं जिसके अर्थात् विष्णु, बहुव्रीहि), मरुत्सख (मरुत् है सखा जिसका अर्थात् अग्नि, बहुव्रीहि), पद्मनाभ, (पद्म है नाभि में जिसके अर्थात् विष्णु, बहुव्रीहि)।
- किसी-किसी समास के अंत में ‘क’ जोड़ दिया जाता है; जैसे— सपत्नीक, शिक्षाविषयक; अल्पवयस्क, ईश्वरकर्तृक, सकर्मक, अकर्मक, निरर्थक।
- नियमविरुद्ध शब्द द्वीप (जिसके दोनों ओर पानी है अर्थात् टापू), अंतरीप (स्थल का अग्र भाग जो पानी में चला गया हो, समीप (पानी के पास, निकट), शतधन्वा, सपत्नी (समान पति है जिसका, सौत), सुगंधि, सुदंती (सुंदर दाँत हैं जिसके वह स्त्री)।
द्वंद्व समास के कुछ विशेष नियम अधोलिखित हैं—
- कहीं-कहीं प्रथम पद के पीछे अंत में दीर्घ आ जाता है; जैसे— मित्रावरुण।
- नियम के विरुद्ध शब्द— जायः +पति = दंपति, जंपती = जायापती, अन्य + अन्य = अन्योन्य, पर + पर = परस्पर, अहन् + रात्रि = अहोरात्र।
यदि किसी समास के अंत में ‘आ’ वा ‘ई’ (स्त्री० प्रत्यय) हो और समास का अर्थ उसके अवयवों से भिन्न हो, तो उस प्रत्यय को ह्रस्व कर देते हैं; जैसे— निर्लज्ज, सकरुण, लब्धप्रतिष्ठ, दृढ़प्रतिज्ञ। ‘ई’ के उदाहरण हिंदी में नहीं आते।
संस्कृत सामासिक शब्दों में परिवर्तन के सामान्य नियम संक्षेप में निम्नलिखित हैं—
- महत् का महा हो जाता है; जैसे— महादेव, महाबाहु, महाराज।
- संज्ञा का न् नहीं रहता; जैसे— हस्ति-शावक, राजवंश, गुणिगण, योगिराज।
- शब्द के अंत में रात्रि का रात्र हो जाता है; जैसे— नवरात्र, अहोरात्र, पंचरात्र।
- शब्द के अंत में राजन् का राज रह जाता है; जैसे— धर्मराज, महाराज।
- सामासिक शब्द के अंत में नाभि का नाभ हो जाता है; जैसे— पद्मनाभ।
- समास के अंत में अक्षि का अक्ष या अक्षी हो जाता है; जैसे— रुद्राक्ष, पुण्डरीकाक्ष, विशालाक्षी, मीनाक्षी।
- अहन् का अह्न हो जाता है; जैसे— पूर्वाह्न, अपराह्न, सप्राह्न।
- ‘कु’ उपसर्ग स्वर से पहले ‘क’ हो जाता है; जैसे— कदन्न, कोदण्ण।
- द्वंद्व समास में दो पदों के मध्य ‘आ’ या ‘विसर्ग’ आ जाता है; जैसे— मित्रावरुण, इंद्रावस्था, अहोरात्र, अहर्निश।
- तत्पुरुष समास के मध्य में भी ‘आ’ आ जाता है। विश्वामित्र (विश्व + मित्र) और दीनानाथ (दीन + नाथ) में।
- प्रादि तत्पुरुष में स्त्रीलिंग-द्योतक ‘आ’ का लोप हो जाता है; जैसे— निर्दय, अक्षम, निराश।
हिंदी समासों के कुछ विशेष नियम अधोलिखित हैं—
तत्पुरुष समास—
- इस समास में यदि प्रथम पद का आद्य स्वर दीर्घ हो, तो वह बहुधा ह्रस्व हो जाता है और यदि पद आकारांत वा ईकारांत हो, तो वह आकारांत हो जाता है; जैसे— घुड़सवार, पनभरा, मुँहचोर, कनफटा, रजवाड़ा, अमचुर, कपड़छन।
- अपवाद— घोड़ागाड़ी, रामकहानी, राजदरबार, सोनामाखी ।
कर्मधारय समास—
- इसमें प्रथम स्थान में आनेवाले छोटा, बड़ा, लंबा, खट्टा, आधा आदि आकारांत विशेषण बहुधा अकारांत हो जाते हैं और उनका आद्य स्वर हस्व हो जाता है; जैसे— छुटभैया, बड़गाँव, लमडोर, खटमिट्ठा, अधपका।
- अपवाद— भोलानाथ, भूरामल।
- ‘लाल’ शब्द के साथ छोटा, गोरा, भूरा, नन्हा, बाँका आदि विशेषणों के अंत्य ‘आ’ के स्थान में ‘ए’ होता है; जैसे— भूरेलाल, छोटेलाल, बाँकेलाल, नन्हेंलाल।
- ‘काला’ के बदले कालू अथवा कल्लू होता है; जैसे— कालूराम, कल्लूसिंह।
बहुव्रीहि समास—
- इसके प्रथम स्थान में आनेवाले आकारांत शब्द (संज्ञा और विशेषण) अकारांत हो जाते हैं; और दूसरे शब्द के अंत में बहुधा आ जोड़ दिया जाता है। यदि दोनों पदों के आद्य स्वर दीर्घ हों, तो उन्हें बहुधा ह्रस्व कर देते हैं; जैसे— दुधमुँहा, बड़पेटा, लमकना, (चूहा), नकटा (नाक है कटी हुई जिसकी), कनफटा, टुटपुँजिया, मुछमुंडा।
- अपवाद— लालकुर्ती, बड़भागी, बहुरंगी।
- बहुव्रीहि समासों का प्रयोग बहुधा विशेषण के समान होता है और आकारांत शब्द पुल्लिंग होते हैं। स्त्रीलिंग में इन शब्दों के अंत में ई वा नी कर देते हैं; जैसे— दुधमुँही, नकटी, बड़पेटी, टुटपुंजनी।
- बहुव्रीहि और दूसरे समासों में जो संख्यावाचक विशेषण आते हैं, उनका रूप बहुधा बदल जाता है, ऐसे कुछ विकृत रूपों के उदाहरण ये हैं—
| मूल शब्द | विकृत रूप | उदाहरण |
|---|---|---|
| दो | दु | दुराज, दुचिता, दुगुना, दुराज, दुपट्टा |
| तीन | ति, तिर | तिपाई, तिरसठ, तिबासी, तिखूँटी |
| चार | चौ | चौखूँटा, चौदह, चौमासा |
| पाँच | पच | पचमेल, पचमहला, पचलोना, पचलड़ी |
| छह | छ | छप्पय, छटाँक, छदाम, छकड़ी |
| सात | सत | सतनजा, सतमासा, सतखड़ा, सतसैया |
| आठ | अठ | अठखेली, अठन्नी, अठोतर |
- समास में बहुधा पुल्लिंग शब्द पहले और स्त्रीलिंग शब्द पीछे आता है; जैसे— भाई-बहन, दूध-रोटी, धी-शक्कर, बेटा-बेटी, देखा-देखी, कुरत-टोपी, लोटा-थाली।
- माँ-बाप, घंटी-घंटा, सास-ससुर।
हिन्दी के सामासिक शब्दों में परिवर्तन के संक्षेप में नियम अधेलिखित हैं—
- हिन्दी समासों में यदि प्रथम शब्द का पहला स्वर दीर्घ हो तो वह प्रायः ह्रस्व हो जाता है; जैसे— ‘आ’ का ‘अ’; ‘ऊ’, ‘ओ’ का ‘उ’; ‘ई’, ‘ए’ का ‘इ’ हो जाता है। उदाहरण—
- कनकटा (कान), नकटा (नाक), पंचमेल (पाँच), सतनजा (सात) आदि।
- दुधमुहा (दूध), घुड़सवार (घोड़ा), मुँछमुड़ा (मूँछ), दुगुना (दो) आदि।
- इसी प्रकार हिन्दी के पहले शब्द के अन्तिम स्वर का कभी-कभी लोप भी हो जाता है; जैसे— घुड़दौड़ (घोडा), पनचक्की (पानी), कपड़छन (कपड़ा), अधपका (आधा) तथा छुटभैया (छोटा) आदि।
- परन्तु इन दोनों के अपवाद भी मिलते हैं; जैसे— घोड़ागाड़ी, काफीहाउस, हाथी-खाना इत्यादि। वस्तुतः अपवाद वे शब्द हैं, जिनके दोनों पद पूरी तरह मिलकर एकाकार नहीं हुए हैं।
समास के सामान्य नियम—
- हिंदी और (उर्दू) समास जो पहले से बने हैं, वे ही भाषा में प्रचलित हैं। इनके सिवा शिष्ट लेखक किसी विशेष कारण से नये शब्द बना सकते हैं।
- एक समय में आनेवाले शब्द एक ही भाषा के होने चाहिए। यह एक साधारण नियम है; पर इसके कई अपवाद भी हैं; जैसे— रेलगाड़ी (अरबी + हिन्दी), हरदिन (फारसी + हिन्दी), मनमौजी (हिन्दी + फारसी), इमामबाड़ा (अरबी + हिन्दी), शाहपुर (फारसी + संस्कृत), धनदौलत (संस्कृत + अरबी)।
- कभी-कभी एक ही समास का विग्रह अर्थभेद से कई प्रकार होता है; जैसे—
| समास शब्द | विग्रह | समास का प्रकार |
|---|---|---|
| त्रिनेत्र | तीन आँख | द्विगु |
| तीन नेत्र हैं जिसके अर्थात् शिव | बहुव्रीहि | |
| सत्यव्रत | सत्य और व्रत | द्वन्द्व |
| सत्य ही व्रत | कर्मधारय | |
| सत्य व्रत | कर्मधारय | |
| सत्य का व्रत | तत्पुरुष | |
| सत्य है व्रत जिसका | बहुव्रीहि |
- ऐसी अवस्था में समास का विग्रह केवल पूर्वापर (आगे-पीछे) सम्बन्ध से हो सकता है।
- कभी-कभी बिना अर्थभेद के एक ही समास के एक ही स्थान में दो विग्रह हो सकते हैं; जैसे— लक्ष्मीकांत शब्द तत्पुरुष भी हो सकता है और बहुव्रीहि भी।
- लक्ष्मीकांत = लक्ष्मी का कांत (पति); तत्पुरुष
- लक्ष्मीकांत = लक्ष्मी है कांता (स्त्री) जिसकी; बहुव्रीहि
- इन दोनों विग्रहों का एक ही अर्थ है, इसलिए कोई एक विग्रह स्वीकृत हो सकता है और उसी के अनुसार समास का नाम रखा जा सकता है।
- कई एक तद्भव हिंदी सामासिक शब्दों के रूप में इतना अंग-भंग हो गया है कि उनका मूल रूप पहचानना संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ लोगों के लिए कठिन है। इसलिए इन शब्दों को समास न मानकर केवल यौगिक अथवा रूढ़ ही मानना ठीक है; जैसे—
- ‘ससुराल’ शब्द यथार्थ में संस्कृत ‘श्वसुरालय’ का अपभ्रंश है, परंतु आलय शब्द आल बन गया है, जिसका प्रयोग केवल प्रत्यय के समान होता है।
- ‘पड़ोस’ शब्द (प्रतिवास) का अपभ्रंश है, पर इसके एक भी मूल अवयव का पता नहीं चलता।
- कई एक ठेठ हिंदी सामासिक शब्दों में भी उनके अवयव एक दूसरे से ऐसे मिल गये हैं कि उनका पता लगाना कठिन है। उदाहरण—
- ‘दहेंड़ी’ एक शब्द है जो यथार्थ में ‘दही हाँड़ी’ है, पर उसके ‘हाड़ी’ शब्द का रूप केवल ‘एँड़ी’ रह गया है।
- ‘अँगोछा’ शब्द है जो ‘अंगप्रौंछा’ का अपभ्रंश है, पर ‘प्रौंछा’ शब्द ‘ओछा’ हो गया है। ऐसे शब्दों को सामासिक शब्द मानना ठीक नहीं जान पड़ता।
- हिंदी में सामासिक शब्दों के लिखने की रीति में बड़ी गड़बड़ी है। जिन शब्दों को सटाकर लिखना चाहिए वे योजक चिह्न (हाइफन) से मिलाये जाते हैं और जिन्हें केवल योजक से मिलाना उचित है, वे सटाकर लिखे दिये जाते हैं। फिर, जिस सामासिक शब्द को किसी न किसी प्रकार मिलाकर लिखने की आवश्यकता है वह अलग-अलग लिखा जाता है।
समास पहचान में द्विविधा
कई बार हम पाते हैं कि एक ही समस्त पद में एक से अधिक प्रकार के समास होते हैं। दरअसल समास कौन सा होगा यह समास पद के विग्रह से निर्धारित होता है।
द्विगु और बहुव्रीहि में अन्तर
- यदि प्रथम पद संख्यावाची विशेषण हो तथा निर्मित सामासिक पद विशिष्ट अथवा रूढ़ अर्थ का बोध न कराकर मूल अर्थ को व्यक्त कर रहा हो, तब वहाँ निश्चित रूप से द्विगु समास होगा; जैसे— नवरत्न, चौराहा, पाँचवाँ इत्यादि।
- परंतु जब सामासिक पद विशिष्ट अर्थ ध्वनित करने लगे तब वह बहुव्रीहि होता है; जैसे— चतुर्भुज (विष्णु), एकदन्त (गणेश) इत्यादि।
कर्मधारय और बहुव्रीहि में भेद
- जहाँ पर दोनों पद तुलनात्मक (उपमेय-उपमान) अथवा विशिष्टताबोधक (विशेषण-विशेष्य) हो तथा अपने मूल अर्थ को व्यक्त करते हों, तब वहाँ कर्मधारय समास की स्थिति बनती है; जैसे— चरण-पादुका, नीलाम्बर, गौमुखी इत्यादि।
- परंतु जब दोनों पद किसी पूर्वाग्रही अथवा पर्याय अर्थ का बोध कराने लगे, तब वहाँ बहुव्रीहि समास की स्थिति प्रकट होने लगती है; जैसे— लम्बोदर (गणेश), सुदर्शनधारी (विष्णु) इत्यादि।
कर्मधारय और द्वन्द्व में भेद
- जब किसी सामासिक पद में दोनों पद विशेषण हों और विशेषण का ही अर्थ प्रदान करते हों, तब वहाँ कर्मधारय समास होता है, जबकि जब वही पद संज्ञा के रूप में आते हों, तब वहाँ समाहार द्वंद्व की स्थिति बनती है, जैसे— लँगड़ा-लूला, गूँगा-बहरा, भूखा-प्यासा इत्यादि में ये दोनों स्थितियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
- इसी प्रकार, जब दो विशेषण-पद साथ आयें और विशेषता के अर्थ में प्रयुक्त हुए हों, तब वो कर्मधारय कहलाएँगे, परंतु जब वही पद वैकल्पिक स्थिति (या/अथवा) के रूप में आये हों, तब वहाँ वैकल्पिक द्वंद्व की स्थिति बन जाएगी; जैसे— भला-बुरा, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा।
- इसी प्रकार एक सामासिक पद है ‘दहीबड़ा’, जब इसे ‘दहीबड़ा’ के रूप में लिखा जाए, तब वह कर्मधारय का भाव देता है, परंतु जब इसे ‘दही-बड़ा’ के रूप में लिखा जाए, तब वहाँ द्वंद्व समास हो जाएगा। उक्त दशाओं में भाव तथा प्रसंग के अनुरूप ही सामासिक पदों की स्थिति तय करनी चाहिए।
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