प्रश्न पत्र
हल
उत्तर— 1
1 (क) : भावार्थ
भारत प्राकृतिक दृष्टिकोण से सम्पन्न है। प्रकृति का भारतीय साहित्य से गहरा नाता रहा है। कवियों ने प्रकृति की संवेदना को समझा और अपनी कविता में उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वाल्मीकि, कालिदास, जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचन्द की रचनाओं में प्राप्त होता है। रचनाकार मानव संवेदना को भी अपनी रचनाओं में पिरोने का कार्य करता है। इस तरह रचनाकार मानव और प्रकृति के मध्य एक कड़ी होता है। आज प्रकृति के प्रति हिंस्र व्यवहार करके हमने शारीरिक, मानसिक विकृतियाँ पाई, जिसका परिणाम हमें विनाश के रूप में मिला। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक संसाधन के गुण हमारे मन और हृदय को प्रभावित करते हैं, तो पहाड़ और समुद्र का गुण हमारे मन को विराट और उदात्त बनाते हैं। प्रकृति मनुष्य की विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी है। प्रकृति के जो रहस्य खोजे गए हैं, वे अनुसंधान के लिए ही सँजोए गए है, जिससे मनुष्य द्वारा किया गया खोज व्यर्थ न जाए और उसे अपनी पौरुष हीनता का बोध न हो।
मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता अटूट है। अधिकतर कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रकृति को स्थान प्रदान किया है। प्रकृति ने मनुष्य को वे सभी संसाधन उपलब्ध कराए हैं, जो उसके लिए अति आवश्यक हैं। किन्तु प्रकृति का अति और अनावश्यक दोहन ने शारीरिक, मानसिक रोग के साथ ही अन्य विकृतियाँ भी पैदा की हैं। प्रकृति मनुष्य की सहयोगी है, किन्तु अति किसी भी चीज के लिए बुरी होती है।
1 (ग) : रेखांकित अंशों की व्याख्या
भारत, प्रकृति की ………………… लीला भूमि है।
व्याख्या— भारत को प्रकृति ने विविधता से परिपूर्ण किया है। यहाँ एक साथ कई ऋतुएँ देखी जाती हैं। जहाँ एक ओर उत्तुंग शिखर हैं वहीं विशाल लहराता सागर, नदी हैं, रेगिस्तान हैं, वसंत है और पतझड़ भी। यहाँ झमाझम बारिस होती है, कड़ाके की ठंडी भी पड़ती है और लू भी चलती है। इसीलिए भारत को प्रकृति की लीलाभूमि कहा गया है।
रचनाकार तो ………………….. साहचर्य का प्रतीक है।
व्याख्या— रचनाकार की रचनाशीलता अपने आस-पास की प्रकृति से ही प्रेरित तथा उससे ओत-प्रोत होती है। रेगिस्तान के कवि की रचना वहाँ के कठोर वातावरण से प्रेरित होगी, जबकि गंगा के मैदान में अधिवासित कवि की विषयवस्तु नदी, लहलहाते खेत इत्यादि होंगे। रचनाकार जिस तरह वाह्य प्रकृति से प्रेरित होकर रचनाशीलता करता है उसी तरह वह अपनी अन्तःप्रेरणा से भी रचना कार्य करता है, इसीलिए कहा गया है कि रचना मानव की संवेदनशीलता का परिचायक है तथा यह मानव प्रकृति के बीच संवाद व साहचर्य का प्रतीक भी है।
पहाड़ और समुद्र ……………. उदात्त हो सकेंगे?
व्याख्या— प्रकृति के गुण मानव-मन पर प्रभाव डालते हैं। पहाड़ और समुद्र की विशेषता है, विराटता और विशालता। जब मानव पहाड़ या समुद्र के सानिध्य में होते हैं तो उसके पास उनके इस विशेषता को धारण करने की प्रबल संभावना होती है। यदि मनुष्य प्रकृति के गुणों से प्रेरणा ले सकें या धारण कर सकें तो वह भी विराट और महान हो सकता हैं।
प्रकृति ……………. उसकी सहचरी है।
व्याख्या— प्रकृति और मानव पुरातन काल से ही सहयोगी रहे हैं। प्रकृति से उसे वह सब कुछ प्राप्त होता है जो आवश्यक है। परन्तु आधुनिक मानव का प्रकृति के प्रति व्यवहार बदलता जा रहा है। मानव अपने लोभ और स्वार्थ के कारण प्रकृति का अतिदोहन करने में लग गया है। मानव को समझना चाहिए कि उसका लाभ प्रकृति के अंधाधुंध दोहन में नहीं वरन् सहयोग और साहचर्य में है।
उत्तर — 2
2 (क) : गद्यांश का शीर्षक
“भाषा का भ्रंश” या “राजनीतिक भाषा का भ्रंश”
2 (ख) : भाषा की भूमिका
जिस रूप में बोली जाए उसी रूप में वैसे ही समझी जाये तो भाषा का निश्चित व सही रूप प्रकट होता है। लेकिन यदि हम जो कुछ कहें उसको उसी रूप में न लेकर ‘शब्दों’ के अर्थ बदलकर समझा जाये या ऐसा समझे जाने की परम्परा बन जाए तो यह भाषा के साथ-साथ समाज के लिए भी अहितकारी होता है। भाषा का सही अर्थ न व्यक्त कर पाने के कारण मनुष्य का कर्म भी उसके मूल अर्थ व्यक्त नहीं कर पाता है, जिसके कारण हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन पतन की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर भाषा को भ्रष्ट होने से बचाना तथा प्रेम, न्याय, स्वतन्त्रता इत्यादि मौलिक शब्दों का उनकी मौलिकता में प्रयोग ही अनुमन्य है अन्यथा भ्रष्ट भाषा कर्म रूप में कब भ्रष्टाचार का कारण बनकर हमारी संस्कृति का हिस्सा बन जाये पता नहीं चलता।
2 (ग) : संक्षेपण
भाषा के शब्दों के निश्चित अर्थ होते हैं। परन्तु राजनीतिक गिरावट के कारण वर्तमान में कई शब्द अपना मौलिक अर्थ खोकर भ्रष्ट हो गए हैं, जिसे भाषा का भ्रंश कहा गया है। भाषा की भ्रष्टता कर्म रूप में परिवर्तित होकर समाज को भी भ्रष्ट कर देती है, अतः भाषा को भ्रष्ट होने से बचाने के लिए हमें सदैव सजगतापूर्वक इसका व्यवहार करना चाहिए।
उत्तर— 3
3 (क) : कार्यालय आदेश
“कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसके माध्यम से किसी कार्यालय अथवा सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान में एक वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों / कर्मचारियों के विभिन्न सेवा सम्बन्धी मामलों में; जैसे – नये पदों की स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति, अवकाश की स्वीकृति, अनुशासनिक मामले आदि की सूचना-विषयक संदेश दिन-प्रतिदिन के काम-काज के सम्बन्ध में प्रशासकीय दृष्टिकोण से जारी करते हैं।”
अथवा
“कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसका प्रयोग किसी कार्यालय या सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान द्वारा आंतरिक प्रशासन सम्बंधी अनुदेश करने के लिये किया जाता है।”
कार्यालय आदेश : प्रारूप

3 (ख) : सरकारी पत्र का प्रारूप

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम
- शब्द — विलोम
- सुषुप्ति — जागरण
- पूर्व — अपूर्व, अपर, पश्चिम, पश्च, पश्चात्
- प्रसन्न — अप्रसन्न, खिन्न, दुःखी
- परकीय — स्वकीय
- महान — तुच्छ, महत्त्वहीन, क्षुद्र
- ज्ञानी — अज्ञानी
- लघु — दीर्घ, गुरु
- नीति — अनीति
- शोक — अशोक, हर्ष, आनंद
- विघ्न — निर्विघ्न
उत्तर— 5
5 (क) : उपसर्ग
| शब्द | उपसर्ग + शब्द | प्रयुक्त उपसर्ग |
| अपव्यय | अप + व्यय | अप |
| निष्काम | निः + काम | निः (निष्) |
| उन्नयन | उत् + नयन | उत् |
| संशय | सम् + शय | सम् |
| स्वच्छ | सु + अच्छ | सु |
5 (ख) : प्रत्यय
| शब्द | शब्द + प्रत्यय | प्रयुक्त प्रत्यय |
| क्रीड़ा | क्रीड् + आ | आ |
| मिठाई | मीठा + ई | ई |
| मरियल | मर + इयल | इयल |
| भिक्षुक | भिक्षा + उक | उक |
| धमकी | धमक + ई | ई |
उत्तर— 6 : वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (1) | जिसका आदि न हो | अनादि |
| (2) | व्यर्थ खर्च करने वाला | अपव्ययी |
| (3) | बिना पलक झपकाए | निर्निमेष, अपलक, एकटक, अनिमेष |
| (4) | मरने की इच्छा | मुमूर्षा |
| (5) | जिसे दूर करना कठिन हो | दुर्निवार, दुर्निवार्य |
उत्तर— 7
7 (क) : वाक्य शुद्धि
(1) अशुद्ध : निरपराधी को दंड नहीं मिलनी चाहिए।
शुद्ध : निरपराध को दंड नहीं मिलन चाहिए।
(2) अशुद्ध : आप खाए कि नहीं?
शुद्ध : आप खाए या नहीं?
(3) अशुद्ध : लड़की ने दही गिरा दी।
शुद्ध : लड़की ने दही गिरा दिया।
(4) अशुद्ध : आपके दवा से वह आरोग्य हुआ।
शुद्ध : आपकी दवा से वह स्वस्थ हुआ। / आपकी दवा से वह रोगमुक्त हुआ।
(5) अशुद्ध : कमरा लोगों से लबालब भरा है।
शुद्ध : कमरा लोगों से खचाखच भरा है। / कमरा लोगों से ठसाठस भरा है।
उत्तर— 7 (ख) : वर्तनी शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (1) | सिंहिनी | सिंहनी |
| (2) | छुद्र | क्षुद्र |
| (3) | चर्मोत्कर्ष | चरमोत्कर्ष |
| (4) | चिन्ह | चिह्न |
| (5) | बरबर्ता | बर्बरता |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(1) आठ-आठ आँसू बहाना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— पछताना
- प्रयोग— परीक्षा में असफल होने पर लोग आठ-आठ आँसू बहाते हैं।
(2) कागज की नाव
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— क्षण भंगुर
- प्रयोग— संतों की दृष्टि में यह संसार कागज की नाव है।
(3) चादर से बाहर पैर फैलाना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— आय से अधिक व्यय करना
- प्रयोग— अधिकतर लोग दिखावे के लिए चादर से बाहर पैर फैलाते हैं।
(4) टोपी उछालना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— निरादर करना
- प्रयोग— हमें अपने से बड़ों की टोपी नहीं उछालनी चाहिए।
(5) मिट्टी खराब करना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— दुर्दशा करना
- प्रयोग— कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना की मिट्टी खराब कर दी।
(6) रंगा सियार होना
- वर्ग— मुहावरा
- अर्थ— छद्मवेशी व्यक्ति
- प्रयोग— आजकल बहुत से सफेदपोश रंगे सियार बनकर ठगने का काम करते हैं।
(7) का बरखा जब कृषि सुखाने
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— हानि हो जाने के बाद उपचार से क्या लाभ
- प्रयोग— फैक्ट्री पूरी जल जाने के बाद फायर ब्रिगेड पहुँची सही कहा गया है- का वर्षा जब कृषि सुखाने।
(8) कंगाली में आटा गीला
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— विपत्ति में और विपत्ति आना
- प्रयोग— कोविड-19 काल में श्रमिकों के रोजगार तो समाप्त हुए ही साथ ही काफी श्रमिकों के परिजन भी कोविड-19 संक्रमण से मौत के शिकार हुए। इसे कहते हैं, कंगाली में आटा गीला।
(9) नेकी कर कुएँ में डाल
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— उपकार करने के बाद भूल जाना
- प्रयोग— श्रेष्ठ लोग किसी के संकट आने पर नेकी करके कुएँ में डाल देते हैं, उसका गुणगान नहीं करते।
(10) पर उपदेश कुशल बहुतेरे
- वर्ग— लोकोक्ति
- अर्थ— दूसरे को उपदेश देना परन्तु स्वयं पर अमल न करना
- प्रयोग— अधिकतर प्रतियोगी छात्र अपने कनिष्ठों को अध्ययन की रणनीति बताते हैं, पर स्वयं ऐसा नहीं करते हैं। सही कहा गया है, ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’।
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