सामान्य हिंदी | UPPSC (Main) Examination 2020: Question Paper and Solution

प्रश्न पत्र

2020
सामान्य हिन्दी
GENERAL HINDI
निर्धारित समय : तीन घंटे] [अधिकतम अंक : 150
Time Allowed : Three Hours] [Maximum Marks : 150

विशेष अनुदेश :
(i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(ii) प्रत्येक प्रश्न के अंत में निर्धारित अंक अंकित हैं।
(iii) पत्र, प्रार्थना पत्र या किसी अन्य प्रश्न के उत्तर के साथ अपना अथवा अन्य किसी का नाम, पता (प्रश्नपत्र में दिये गये नाम, पदनाम आदि को छोड़कर) एवं अनुक्रमांक न लिखें। आवश्यक होने पर क, ख, ग का उल्लेख कर सकते हैं ।
Specific Instructions :
(i) All questions are compulsory.
(ii) Marks are given against each of the question.
(iii) When writing Letter, Request-letter or any other answers don’t write your name or others name, address or Roll No. If it is necessary you can use only A, B, C.
1. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
भारत, प्रकृति की संसार में सबसे बडी लीला भूमि है। यहाँ सभी ऋतुएँ-किसी न किसी भाग में एक साथ मौजूद रहती हैं। नदी, पर्वत, वन और अन्नपूर्णा धरती से, भारतीय साहित्य का सदा से गहरा संबंध रहा है। क्योंकि उसने प्रकृति से अपनी सहधर्मिता और सहअस्तित्व को पहचाना है। भारत की पहली कविता ही पशु-पक्षी की हिंसा के विरुद्ध जन्मी थी। कवियों ने प्रकृति की हल्की से हल्की धड़कन और कंपन को महसूस किया है। आदिकवि वाल्मीकि जानते हैं कि कड़कड़ाती ठंड में जलचर हंस कैसे संभल कर, डरकर ठंडे पानी में पैर डालते हैं? कालिदास को पता है कि अनुकूल मंद-मंद पवन यात्रा का शुभ शकुन है। प्रेमचंद के बैल अपनी व्यथा-कथा हमारे कान में कह जाते हैं। प्रसाद की प्रकृति हमें अतिवाद के प्रति सावधान करती है। रचनाकार तो मनुष्य की संवेदना का प्रतीक भी है और प्रहरी भी। प्रकृति से उसका साहचर्य और संवाद मनुष्य से प्रकृति के संवाद और साहचर्य का प्रतीक है। इस तरह अंतः प्रकृति और वाह्यप्रकृति के सहारे निरंतर परिष्कृत, सरल और प्रांजल बनती है। आज प्रकृति के प्रति हिंस्र और विसंवादी होकर हमने क्या पाया है — तरह तरह के शारीरिक, मानसिक रोग, एक संकीर्ण और विकृत अंतःकरण, एक संवेदनहीन आत्मकेंद्रित जगत और चारों तरफ प्रदूषण का तांडव जो अंततः हमारा विनाश ही करेगा। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि पहाड़ और समुद्र को देखने भर से मनुष्य का हृदय विशाल होता है — तो यदि वे हमारे मन में ही बस जाएँ, तो हम कितने विराट और उदात्त हो सकेंगे?यह जान लेना जरूरी है कि प्रकृति मनुष्य का प्रतिपक्ष नहीं है, वह उसकी सहचरी है। जो रहस्य खोजे गए हैं — वे खोजने के लिए ही उसने बचाए हैं, ताकि मनुष्य का कृतित्व अकारथ न हो, उसका पौरुष हीनता — बोध में ना बदल जाए।
(क) प्रस्तुत गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। 5
(ख) मनुष्य और प्रकृति के आपसी रिश्ते को गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 5
(ग) उपर्युक्त गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। 20
2. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर निर्देशानुसार उत्तर लिखिए।
विद्वानों का मानना है कि राजनीति ने भाषा को भ्रष्ट कर दिया है; शब्दों से उनके सही अर्थ छीनकर उन्हें छद्म अर्थ पहना दिए हैं। संसद, संविधान, कानून, जनहित, न्याय, अधिकार, साक्ष्य, जाँच जैसे ढेरों (शब्द) अपना असली अर्थ खोकर बदशक्ल हो चुके हैं। शब्द भले ही अच्छा या बुरा कोई भी अर्थ प्रकट करता हो, जब अपना असली अर्थ खो देता है, तो वह बदशक्ल हो जाता है। भाषा का भ्रंश, अंततः सामाजिक मानवीय मूल्यों का भ्रंश है। कल्पना कीजिए कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जो कहे उसका वही अर्थ ना हो, जो भाषा प्रकट करती है या ऐसे अनुभवों की पुनरावृत्ति के कारण दूसरा व्यक्ति उसे सही अर्थ में ना लेकर उसमें अनर्थ या अन्य अर्थ खोजने लगे तो क्या होगा? यह मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठने का मामला है, जो सामाजिक विश्रृंखलता का पहला और अंतिम चरण है। पहला इसलिए कि भाषा को मनुष्य ने परस्पर संवाद और सही संप्रेषण के लिए गढ़ा है और अंतिम इसलिए कि आगे चलकर मनुष्य का कर्म भी भाषा के मूल अर्थ का नहीं उसके भ्रंश का रूप ले लेता है। यह इस तरह होता है कि छद्म अर्थ का वाहन करते-करते भाषा अंततः हमारे कर्म को ही छद्म में बदल देती है। क्या हम भाषा को भ्रष्ट करने की परिणति राजनीतिक और सामाजिक जीवन के चरम पतन में नहीं देख रहे?
(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उचित शीर्षक दीजिए। 5
(ख) उपर्युक्त गद्यांश के आधार पर भाषा की भूमिका पर प्रकाश डालिये। 5
(ग) उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। 20
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(क)
कार्यालय आदेश किसे कहते हैं? शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की ओर से जारी विशेष छात्रवृत्ति योजना संबंधी कार्यालय आदेश का प्रारूप तैयार कीजिए। 10
(ख)
मुखिया की ओर से पंचायत में कोविड-19 से हो रही मृत्यु संबंधी एक सरकारी पत्र जिलाधिकारी को लिखिए। 10
4.निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए। 10
सुषुप्ति, पूर्व, प्रसन्न, परकीय, महान, ज्ञानी, लघु, नीति, शोक, विघ्न
5.
(क) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों को निर्देश कीजिए। 5
अपव्यय, निष्काम, उन्नयन, संशय, स्वच्छ
(ख) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्ययों को अलग कीजिए। 5
क्रीड़ा, मिठाई, मरियल, भिक्षुक, धमकी
6. निम्नलिखित वाक्यांशों या पदबंध के लिए एक-एक शब्द लिखिए।
10
(1) जिसका आदि न हो
(2) व्यर्थ खर्च करने वाला
(3) बिना पलक झपकाए
(4) मरने की इच्छा
(5) जिसे दूर करना कठिन हो।
7.
(क) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए। 5
(1) निरपराधी को दंड नहीं मिलनी चाहिए।
(2) आप खाए कि नहीं?
(3) लड़की ने दही गिरा दी।
(4) आपके दवा से वह आरोग्य हुआ।
(5) कमरा लोगों से लबालब भरा है।
(ख) निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी का संशोधन कीजिए। 5
सिंहिनी, छुद्र, चर्मोत्कर्ष, चिन्ह, बरबर्ता
8. निम्नलिखित मुहावरों/लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
30
(1) आठ-आठ आँसू बहाना
(2) कागज की नाव
(3) चादर से बाहर पैर फैलाना
(4) टोपी उछाल
(5) मिट्टी खराब करना
(6) रँगा सियार होना
(7) का बरखा जब कृषि सुखाने
(8) कंगाली में आटा गीला
(9) नेकी कर कुएँ में डाल
(10) पर उपदेश कुशल बहुतेरे।

हल

उत्तर— 1

1 (क) : भावार्थ

भारत प्राकृतिक दृष्टिकोण से सम्पन्न है। प्रकृति का भारतीय साहित्य से गहरा नाता रहा है। कवियों ने प्रकृति की संवेदना को समझा और अपनी कविता में उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वाल्मीकि, कालिदास, जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचन्द की रचनाओं में प्राप्त होता है। रचनाकार मानव संवेदना को भी अपनी रचनाओं में पिरोने का कार्य करता है। इस तरह रचनाकार मानव और प्रकृति के मध्य एक कड़ी होता है। आज प्रकृति के प्रति हिंस्र व्यवहार करके हमने शारीरिक, मानसिक विकृतियाँ पाई, जिसका परिणाम हमें विनाश के रूप में मिला। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक संसाधन के गुण हमारे मन और हृदय को प्रभावित करते हैं, तो पहाड़ और समुद्र का गुण हमारे मन को विराट और उदात्त बनाते हैं। प्रकृति मनुष्य की विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी है। प्रकृति के जो रहस्य खोजे गए हैं, वे अनुसंधान के लिए ही सँजोए गए है, जिससे मनुष्य द्वारा किया गया खोज व्यर्थ न जाए और उसे अपनी पौरुष हीनता का बोध न हो।

1 (ख) : मानव और प्रकृति के रिश्ते

मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता अटूट है। अधिकतर कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रकृति को स्थान प्रदान किया है। प्रकृति ने मनुष्य को वे सभी संसाधन उपलब्ध कराए हैं, जो उसके लिए अति आवश्यक हैं। किन्तु प्रकृति का अति और अनावश्यक दोहन ने शारीरिक, मानसिक रोग के साथ ही अन्य विकृतियाँ भी पैदा की हैं। प्रकृति मनुष्य की सहयोगी है, किन्तु अति किसी भी चीज के लिए बुरी होती है।

1 (ग) : रेखांकित अंशों की व्याख्या

भारत, प्रकृति की ………………… लीला भूमि है।

व्याख्या— भारत को प्रकृति ने विविधता से परिपूर्ण किया है। यहाँ एक साथ कई ऋतुएँ देखी जाती हैं। जहाँ एक ओर उत्तुंग शिखर हैं वहीं विशाल लहराता सागर, नदी हैं, रेगिस्तान हैं, वसंत है और पतझड़ भी। यहाँ झमाझम बारिस होती है, कड़ाके की ठंडी भी पड़ती है और लू भी चलती है। इसीलिए भारत को प्रकृति की लीलाभूमि कहा गया है।

रचनाकार तो ………………….. साहचर्य का प्रतीक है।

व्याख्या— रचनाकार की रचनाशीलता अपने आस-पास की प्रकृति से ही प्रेरित तथा उससे ओत-प्रोत होती है। रेगिस्तान के कवि की रचना वहाँ के कठोर वातावरण से प्रेरित होगी, जबकि गंगा के मैदान में अधिवासित कवि की विषयवस्तु नदी, लहलहाते खेत इत्यादि होंगे। रचनाकार जिस तरह वाह्य प्रकृति से प्रेरित होकर रचनाशीलता करता है उसी तरह वह अपनी अन्तःप्रेरणा से भी रचना कार्य करता है, इसीलिए कहा गया है कि रचना मानव की संवेदनशीलता का परिचायक है तथा यह मानव प्रकृति के बीच संवाद व साहचर्य का प्रतीक भी है।

पहाड़ और समुद्र ……………. उदात्त हो सकेंगे?

व्याख्या— प्रकृति के गुण मानव-मन पर प्रभाव डालते हैं। पहाड़ और समुद्र की विशेषता है, विराटता और विशालता। जब मानव पहाड़ या समुद्र के सानिध्य में होते हैं तो उसके पास उनके इस विशेषता को धारण करने की प्रबल संभावना होती है। यदि मनुष्य प्रकृति के गुणों से प्रेरणा ले सकें या धारण कर सकें तो वह भी विराट और महान हो सकता हैं।

प्रकृति ……………. उसकी सहचरी है।

व्याख्या— प्रकृति और मानव पुरातन काल से ही सहयोगी रहे हैं। प्रकृति से उसे वह सब कुछ प्राप्त होता है जो आवश्यक है। परन्तु आधुनिक मानव का प्रकृति के प्रति व्यवहार बदलता जा रहा है। मानव अपने लोभ और स्वार्थ के कारण प्रकृति का अतिदोहन करने में लग गया है। मानव को समझना चाहिए कि उसका लाभ प्रकृति के अंधाधुंध दोहन में नहीं वरन् सहयोग और साहचर्य में है। 

उत्तर — 2

2 (क) : गद्यांश का शीर्षक

“भाषा का भ्रंश” या “राजनीतिक भाषा का भ्रंश”

2 (ख) : भाषा की भूमिका

जिस रूप में बोली जाए उसी रूप में वैसे ही समझी जाये तो भाषा का निश्चित व सही रूप प्रकट होता है। लेकिन यदि हम जो कुछ कहें उसको उसी रूप में न लेकर ‘शब्दों’ के अर्थ बदलकर समझा जाये या ऐसा समझे जाने की परम्परा बन जाए तो यह भाषा के साथ-साथ समाज के लिए भी अहितकारी होता है। भाषा का सही अर्थ न व्यक्त कर पाने के कारण मनुष्य का कर्म भी उसके मूल अर्थ व्यक्त नहीं कर पाता है, जिसके कारण हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन पतन की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर भाषा को भ्रष्ट होने से बचाना तथा प्रेम, न्याय, स्वतन्त्रता इत्यादि मौलिक शब्दों का उनकी मौलिकता में प्रयोग ही अनुमन्य है अन्यथा भ्रष्ट भाषा कर्म रूप में कब भ्रष्टाचार का कारण बनकर हमारी संस्कृति का हिस्सा बन जाये पता नहीं चलता।

2 (ग) : संक्षेपण

भाषा के शब्दों के निश्चित अर्थ होते हैं। परन्तु राजनीतिक गिरावट के कारण वर्तमान में कई शब्द अपना मौलिक अर्थ खोकर भ्रष्ट हो गए हैं, जिसे भाषा का भ्रंश कहा गया है। भाषा की भ्रष्टता कर्म रूप में परिवर्तित होकर समाज को भी भ्रष्ट कर देती है, अतः भाषा को भ्रष्ट होने से बचाने के लिए हमें सदैव सजगतापूर्वक इसका व्यवहार करना चाहिए।

उत्तर— 3

3 (क) : कार्यालय आदेश

“कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसके माध्यम से किसी कार्यालय अथवा सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान में एक वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों / कर्मचारियों के विभिन्न सेवा सम्बन्धी मामलों में; जैसे – नये पदों की स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति, अवकाश की स्वीकृति, अनुशासनिक मामले आदि की सूचना-विषयक संदेश दिन-प्रतिदिन के काम-काज के सम्बन्ध में प्रशासकीय दृष्टिकोण से जारी करते हैं।”

अथवा

“कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसका प्रयोग किसी कार्यालय या सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान द्वारा आंतरिक प्रशासन सम्बंधी अनुदेश करने के लिये किया जाता है।”

कार्यालय आदेश : प्रारूप

कार्यालय आदेश : प्रारूप - UPPSC - 2020

3 (ख) : सरकारी पत्र का प्रारूप

सरकारी पत्र का प्रारूप - UPPSC - 2020

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम

  • शब्द — विलोम
  • सुषुप्ति — जागरण
  • पूर्व — अपूर्व, अपर, पश्चिम, पश्च, पश्चात्
  • प्रसन्न — अप्रसन्न, खिन्न, दुःखी
  • परकीय — स्वकीय
  • महान — तुच्छ, महत्त्वहीन, क्षुद्र
  • ज्ञानी — अज्ञानी
  • लघु — दीर्घ, गुरु
  • नीति — अनीति
  • शोक — अशोक, हर्ष, आनंद
  • विघ्न — निर्विघ्न

उत्तर— 5

5 (क) : उपसर्ग

शब्दउपसर्ग + शब्दप्रयुक्त उपसर्ग
अपव्ययअप + व्ययअप
निष्कामनिः + कामनिः (निष्)
उन्नयनउत् + नयनउत्
संशयसम् + शयसम्
स्वच्छसु + अच्छसु 

5 (ख) : प्रत्यय

शब्दशब्द + प्रत्यय प्रयुक्त प्रत्यय
क्रीड़ाक्रीड् + आ
मिठाईमीठा + ई
मरियलमर + इयलइयल
भिक्षुकभिक्षा + उकउक
धमकीधमक + ई

उत्तर— 6 : वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द

क्र॰ सं॰वाक्यांश या पदबंधएक शब्द
(1)जिसका आदि न होअनादि  
(2)व्यर्थ खर्च करने वालाअपव्ययी   
(3)बिना पलक झपकाएनिर्निमेष, अपलक, एकटक, अनिमेष
(4)मरने की इच्छामुमूर्षा
(5)जिसे दूर करना कठिन होदुर्निवार, दुर्निवार्य

उत्तर— 7

7 (क) : वाक्य शुद्धि

(1) अशुद्ध : निरपराधी को दंड नहीं मिलनी चाहिए।

शुद्ध : निरपराध को दंड नहीं मिलन चाहिए।

(2) अशुद्ध : आप खाए कि नहीं?

शुद्ध : आप खाए या नहीं?                       

(3) अशुद्ध : लड़की ने दही गिरा दी।

शुद्ध : लड़की ने दही गिरा दिया।

(4) अशुद्ध : आपके दवा से वह आरोग्य हुआ।

शुद्ध : आपकी दवा से वह स्वस्थ हुआ। / आपकी दवा से वह रोगमुक्त हुआ।

(5) अशुद्ध : कमरा लोगों से लबालब भरा है।

शुद्ध : कमरा लोगों से खचाखच भरा है। / कमरा लोगों से ठसाठस भरा है।

उत्तर— 7 (ख) : वर्तनी शुद्धि

क्र॰ सं॰अशुद्ध वर्तनी शुद्ध वर्तनी
 (1)सिंहिनीसिंहनी
 (2)छुद्रक्षुद्र
 (3)चर्मोत्कर्षचरमोत्कर्ष
 (4)चिन्हचिह्न
 (5)बरबर्ताबर्बरता

उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग

(1) आठ-आठ आँसू बहाना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— पछताना
  • प्रयोग— परीक्षा में असफल होने पर लोग आठ-आठ आँसू बहाते हैं।

(2) कागज की नाव

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— क्षण भंगुर
  • प्रयोग— संतों की दृष्टि में यह संसार कागज की नाव है।

(3) चादर से बाहर पैर फैलाना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— आय से अधिक व्यय करना
  • प्रयोग— अधिकतर लोग दिखावे के लिए चादर से बाहर पैर फैलाते हैं।

(4) टोपी उछालना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— निरादर करना
  • प्रयोग— हमें अपने से बड़ों की टोपी नहीं उछालनी चाहिए।

(5) मिट्टी खराब करना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— दुर्दशा करना
  • प्रयोग— कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना की मिट्टी खराब कर दी।

(6) रंगा सियार होना

  • वर्ग— मुहावरा
  • अर्थ— छद्मवेशी व्यक्ति
  • प्रयोग— आजकल बहुत से सफेदपोश रंगे सियार बनकर ठगने का काम करते हैं।

(7) का बरखा जब कृषि सुखाने

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— हानि हो जाने के बाद उपचार से क्या लाभ
  • प्रयोग— फैक्ट्री पूरी जल जाने के बाद फायर ब्रिगेड पहुँची सही कहा गया है- का वर्षा जब कृषि सुखाने।

(8) कंगाली में आटा गीला

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— विपत्ति में और विपत्ति आना
  • प्रयोग— कोविड-19 काल में श्रमिकों के रोजगार तो समाप्त हुए ही साथ ही काफी श्रमिकों के परिजन भी कोविड-19 संक्रमण से मौत के शिकार हुए। इसे कहते हैं, कंगाली में आटा गीला।

(9) नेकी कर कुएँ में डाल

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— उपकार करने के बाद भूल जाना
  • प्रयोग— श्रेष्ठ लोग किसी के संकट आने पर नेकी करके कुएँ में डाल देते हैं, उसका गुणगान नहीं करते।

(10) पर उपदेश कुशल बहुतेरे

  • वर्ग— लोकोक्ति
  • अर्थ— दूसरे को उपदेश देना परन्तु स्वयं पर अमल न करना
  • प्रयोग— अधिकतर प्रतियोगी छात्र अपने कनिष्ठों को अध्ययन की रणनीति बताते हैं, पर स्वयं ऐसा नहीं करते हैं। सही कहा गया है, ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’।

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