प्रश्न पत्र
हल
1 (क) : गद्यांश का भावार्थ
मानव जीवन और समाज के कल्याण तथा उसके परिष्कार (संस्कार) के लिए कला अत्यंत आवश्यक है। कला केवल मनोरंजन या सौंदर्य प्रेमियों के विलास का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन को सुंदर और संतुलित बनाने का माध्यम है। मनुष्य अपने ज्ञान और चरित्र से अपने मानसिक व आध्यात्मिक जगत को सुंदर बनाता है तथा कला के माध्यम से अपने आसपास के स्थूल (भौतिक) जगत को आकर्षक रूप देता है। जब आंतरिक गुणों का सौंदर्य और बाहरी संसार का कलात्मक सौंदर्य आपस में मिलते हैं, तभी मनुष्य का जीवन पूर्ण रूप से सुखी, शांत और जीने योग्य बनता है। कला जीवन में प्रकाश और आनंद फैलाने वाले दीपक के समान है।
1 (ख) : जीवन किस स्थिति में रहने योग्य बनता है?
जीवन तब पूर्ण रूप से रहने योग्य बनता है जब मनुष्य द्विविध सौंदर्य (आंतरिक और बाह्य सौंदर्य) का निर्माण कर लेता है—
- आंतरिक सौंदर्य : मनुष्य अपने चरित्र, ज्ञान और सद्भाव द्वारा अपने मानसिक तथा आध्यात्मिक जगत को सुंदर और प्रेरणादायक बनाए।
- बाह्य सौंदर्य : मनुष्य अपने चारों ओर मौजूद स्थूल व भौतिक जगत की अनगढ़ वस्तुओं को कला के प्रभाव से सुंदर और आकर्षक रूप में ढाल ले।
जब ये दोनों सौंदर्य (सद्भाव-युक्त आंतरिक वातावरण और कलात्मक बाह्य वातावरण) आपस में मिलकर मनुष्य को प्रेरित और आह्लादित करते हैं, तब जीवन वास्तव में सुखद और रहने योग्य बन जाता है।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
जीवन के ………………… आवश्यकता है।
व्याख्या— उपर्युक्त रेखांकित पंक्तियों के अनुसार कला जीवन में संस्कार जैसे मूल्यों के विकास तथा समाज की परिस्थिति का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसलिए कला का ज्ञान जीवन में उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे साहित्य, धर्म एवं विज्ञान का ज्ञान रखना आवश्यक है।
वस्तुतः कला ………………….. कर सकता है।
व्याख्या— प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक का मानना है कि कला जीवन के सूक्ष्म एवं सुन्दर रूपों का दर्पण है, जो लोगों की जीवन शैली, सांस्कृतिक गतिविधियों को दर्शाता है। यह मन में शान्त भाव और जीवन में समन्वय की भावना का आभास कराता है। लेखक जीवन में कला की उपयोगिता को सूक्ष्मता से बता रहा है।
स्थूल के ……………. बनाते हैं।
व्याख्या— उपर्युक्त रेखांकित पंक्तियों के माध्यम से लेखक का मानना है कि कला के द्वारा ही बाह्य एवं आन्तरिक जगत् को स्वरूप और ज्ञान के अनुसार सौन्दर्य युक्त बनाया जा सकता है। इसी समन्वित सौन्दर्य के बीच जीवन प्रकाशित है।
कला का ……………. रहता है।
व्याख्या— उपर्युक्त रेखांकित पंक्तियों के माध्यम से लेखक यह स्वीकार करता है कि जिस प्रकार जगमगाते दीपक अपने परिधि के अन्दर सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार कला भी अपने कला रूपी प्रकाश से चारों ओर जगमग-जगमग करते हुए प्रकाश-पुंज से भर देता है।
2 (क) : शीर्षक
‘साहित्य और राजनीति की भाषा’ या ‘भाषा का महत्त्व’ या ‘भाषा की प्रासंगिकता’ या ‘साहित्य की प्रामाणिकता और राजनीति’
2 (ख) : साहित्य और राजनीति की भाषा में प्रमुख अंतर
उद्देश्य- राजनीति के लिए भाषा केवल एक कामचलाऊ साधन और किसी विशेष मकसद (या प्रचार) तक पहुँचने का माध्यम है। वहीं साहित्यकार के लिए भाषा जीवन की सच्चाई का एक जीता-जागता हिस्सा है।
सच्चाई और प्रामाणिकता- राजनीति की भाषा अक्सर एकतरफ़ा, प्रचार-प्रमुख, रेटारिकल (आडंबरपूर्ण) और व्यावहारिक होती है। इसके विपरीत, साहित्य भाषा की मूल गरिमा, प्रामाणिकता, गहराई और सच्चाई को बचाए रखने का प्रयास करता है।
2 (ग) : संक्षेपण
साहित्य जीवन को उसकी पूर्णता में देखता है, जबकि राजनीति भाषा को मात्र साधन मानती है। राजनीतिक भाषा प्रचारवादी, रेटारिकल और अक्सर नकली हो सकती है, क्योंकि उसके लिए भाषा प्राथमिक नहीं होती। जबकि साहित्यकार भाषा को जीवन की सच्चाई और गरिमा का हिस्सा मानकर उसे स्वार्थ, हिंसा और प्रदूषण से बचाता है। इसलिए साहित्य का काम राजनीति की भाषा में विलीन होना नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र और प्रामाणिक भाषा को बनाए रखना है, ताकि राजनीति भी अपनी सच्चाई के लिए साहित्य से भाषा ग्रहण करे, न कि साहित्य राजनीति का मुहावरा बनकर अपनी पहचान खो दे।
उत्तर — 3
3 (क) : परिपत्र
परिभाषा— “पत्र आलेखन का ऐसा रूप, जिसके द्वारा समान सूचना, निर्देश, अनुदेश इत्यादि सभी सम्बन्धित अथवा अधीनस्थ अधिकारियों को विभिन्न कार्यों के संदर्भ में प्रतिलिपियों के माध्यम से प्रेषित किया जाता है, परिपत्र कहलाता है।” या “जब प्रेषक एक हो, विषय एक हो लेकिन प्रेषिती (प्राप्तकर्ता) अनेक हों तब सरकारी पत्र ही परिपत्र बन जाता है।”
विशेषताएँ—
- यह अनेक विभागों/कार्यालयों को एक साथ भेजा जाता है। यह किसी विभाग अथवा कार्यालय द्वारा अपने अधीनस्थ कार्यालयों को भेजा जाता है।
- इसका प्रारूप सरकारी पत्र के उसी प्रारूप का हो जायेगा जैसा सरकारी पत्र हो; यथा- यदि शासकीय पत्र का परिपत्र हो तो वह शासकीय पत्र के प्रारूप में होगा बस प्रेषिती (सेवा में) की जगह एक न होकर क्रम देकर सभी का उल्लेख कर दिया जायेगा।
- अर्थात् इसकी अपनी कोई निश्चित भाषा-शैली नहीं होती, बल्कि परिपत्र की भाषा-शैली और प्रारूप उसी पत्र के अनुरूप हो जाता है जिस रूप में परिपत्र भेजा जाता है।
प्रारूप

3 (ख) : कार्यालय आदेश
कार्यालय आदेश परिचय एवं परिभाषा— “कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसके माध्यम से किसी कार्यालय अथवा सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान में एक वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों / कर्मचारियों के विभिन्न सेवा सम्बन्धी मामलों में; जैसे – नये पदों की स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति, अवकाश की स्वीकृति, अनुशासनिक मामले आदि की सूचना-विषयक संदेश दिन-प्रतिदिन के काम-काज के सम्बन्ध में प्रशासकीय दृष्टिकोण से जारी करते हैं।” अथवा “कार्यालय आदेश शासकीय पत्र-व्यवहार का वह विशिष्ट रूप है जिसका प्रयोग किसी कार्यालय या सरकारी संस्थान अथवा व्यापारिक संस्थान द्वारा आंतरिक प्रशासन सम्बंधी अनुदेश करने के लिये किया जाता है।”
गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार — कर्मचारी स्थानान्तरण हेतु कार्यालय आदेश (प्रारूप)

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम
| क्र॰ स॰ | शब्द | विलोम |
| 1. | परिचित | अपरिचित, अनजाना |
| 2. | आपत्ति | संपत्ति, अनापत्ति |
| 3. | पूर्ण | अपूर्ण, खाली, रिक्त |
| 4. | धरती | आकाश |
| 5. | प्रिय | अप्रिय |
| 6. | जय | पराजय |
| 7. | विहित | अविहित, निषिद्ध |
| 8. | स्निग्ध | अस्निग्ध, रुक्ष |
| 9. | भय | साहस, हिम्मत, अभय, निर्भय |
| 10. | शत्रु | मित्र |
उत्तर— 5
5 (क) : उपसर्ग
| शब्द | उपसर्ग + शब्द | प्रयुक्त उपसर्ग |
| संगोष्ठी | सम् + गोष्ठी | सम् |
| प्रत्यक्ष | प्रति + अक्ष | प्रति |
| पराक्रम | परा + क्रम | परा |
| निर्वसन | निः + वसन | निः (निर्) |
| निस्संदेह | निः + सम् + देह | निः (निस्), सम् |
5 (ख) : प्रत्यय
| शब्द | शब्द + प्रत्यय | प्रयुक्त प्रत्यय |
| शैव | शिव + अ | अ |
| नीलिमा | नील + इमा | इमा |
| दाक्षिणात्य | दक्षिण + त्य | त्य |
| खुर्दबीन | खुर्द + बीन | बीन |
| वर्तमान | वर्त (वृत्) + मान (शानच्) | मान |
उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (i) | जो कृतज्ञ न हो। | कृतघ्न, अकृतज्ञ |
| (ii) | जो सूर्य न देखे ऐसी स्त्री। | असूर्यम्पश्या (असूर्यंपश्या) |
| (iii) | जो रूढ़ियों में विश्वास करता हो। | रूढ़िवादी |
| (iv) | जो पूजा के योग्य हो। | पूजनीय, पूज्य |
| (v) | जो देश से प्रेम करता हो। | देशप्रेमी |
उत्तर— 7
7 (क) : वाक्य शुद्धि
- अशुद्ध : राम घर जाती है।
- शुद्ध : राम घर जाता है।
- अशुद्ध : मैंने जाना है।
- शुद्ध : मुझे जाना है।
- अशुद्ध : मैंने आपके घर में रखी पुस्तक को देख ली।
- शुद्ध : आपके घर में रखी पुस्तक को मैंने देख ली।
- अशुद्ध : विद्यालय में सभी कक्षा के विद्यार्थी बुलाए गए हैं।
- शुद्ध : सभी कक्षा के विद्यार्थी विद्यालय में बुलाए गए हैं।
- अशुद्ध : मनोज रोती है।
- शुद्ध : मनोज रोता है।
7 (ख) : वर्तनी शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (i) | निष्पापी | निष्पाप |
| (ii) | पूर्ती | पूर्ति |
| (iii) | मुनी | मुनि |
| (iv) | लिपी | लिपि |
| (v) | नीती | नीति |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(i) यथा राजा तथा प्रजा
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— एक समान स्वभाव
प्रयोग— वरिष्ठ अधिकारी जनता से जिस तरह से बर्ताव करेंगे, उसी प्रकार से उनके अधीनस्थ भी बर्ताव करेंगे। सही कहा गया है, यथा राजा तथा प्रजा।
(ii) अरहर की टट्टी गुजराती ताला
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ—मामूली वस्तु की रक्षा के लिए अधिक खर्च
प्रयोग— भारत में जीर्ण-शीर्ण भवन को धरोहर के नाम पर सुरक्षित रखने के लिए इतना खर्च किया जाता है कि उतने में नए भवन का निर्माण हो जाएगा। सही कहा गया है, अरहर की टट्टी गुजराती ताला।
(iii) आ बैल मुझे मार
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— जान-बूझ कर मुसीबत में पड़ना
प्रयोग— केन्द्र सरकार ने किसान बिल पेश क्या किया कि विपक्षी पार्टियों को बैठे-बिठाये मुद्दा मिल गया और ऊपर से गठबंधन दल की केन्द्रीय मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया, जो ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत को चरितार्थ करती है।
(iv) नौ दो ग्यारह हो जाना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— भाग जाना
प्रयोग— पुलिस की गाड़ी देखकर उपद्रवी नौ दो ग्यारह हो गये।
(v) जैसा देश वैसा भेष
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— परिस्थिति के अनुसार ढल जाना
प्रयोग— यदि व्यक्ति को जीवन में सफल होना है, तो उसे जैसा देश वैसा भेष अपनाना चाहिए।
(vi) दाल-भात में मूसरचन्द
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— बीच में दखल देने वाला
प्रयोग— दो लोगों के विवाद में दाल-भात में मूसरचन्द बनना ठीक नहीं है।
(vii) ऊँची दूकान फीके पकवान
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— प्रदर्शन अधिक वास्तविकता कम
प्रयोग— कुछ प्रतियोगी ऐसे होते हैं कि अभिभावक को देखकर पढ़ने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि लगता है, वे बहुत कठिन परिश्रम कर रहे हैं, उनके जाते ही वे अपनी पुरानी शैली में आ आते हैं, सही कहा गया है, ‘ऊँची दूकान फीके पकवान’।
(viii) मान न मान मैं तेरा मेहमान
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— जबरदस्ती रिश्ते कायम करना
प्रयोग— सफल व्यक्ति से सभी लोग किसी न किसी प्रकार से सम्बन्ध रखना चाहते हैं और यह कहावत चरितार्थ करते हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान।
(ix) अन्धेर नगरी चौपट राजा
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— न्याय, अन्याय एक समान होना
प्रयोग— प्रतियोगी परीक्षाओं में जिस प्रकार धाँधली होने से अयोग्य लोगों का चयन हो जाता है और योग्य चयन से बाहर हो जाते हैं, उसे देखकर यह कहना पड़ता है कि अन्धेर नगरी चौपट राजा।
(x) आसमान से गिरा खजूर में अटका
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— एक मुसीबत से छूटकर दूसरी मुसीबत में फँस जाना
प्रयोग— कोरोना काल में अधिकतर विद्यार्थियों के पैसे एवं खाद्य सामग्री समाप्त हो गए थे, पड़ोसियों एवं मित्रों के सहयोग से तो वे अपना पेट पाल रहे थे कि आवागमन प्रतिबंधित होने से तत्काल अपने गृह जनपद भी न जा सके। यही है, आसमान से गिरा खजूर में अटका।
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