सामान्य हिंदी | UPPSC (Main) Examination 2025: Question Paper and Solution

👤 By Pinwas IAS📅 29 July 2026⏱ 1 min read
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प्रश्न पत्र

2025
सामान्य हिन्दी
GENERAL HINDI
निर्धारित समय : तीन घंटे अधिकतम अंक : 150
Time Allowed : Three Hours Maximum Marks : 150

विशेष अनुदेश / SPECIFIC INSTRUCTIONS
नोट :
(i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(ii) प्रत्येक प्रश्न के अंत में निर्धारित अंक अंकित है।
(iii) पत्र, प्रार्थना-पत्र या किसी अन्य प्रश्न के उत्तर के साथ अपना अथवा अन्य किसी का नाम, पता (प्रश्नपत्र में दिये गये नाम, पदनाम आदि को छोड़कर) एवं अनुक्रमांक न लिखें। आवश्यक होने पर क, ख, ग का उल्लेख कर सकते हैं।
Note :
(i) All questions are compulsory.
(ii) Marks are given against each of the question.
(iii) Do not write your or another’s name, address (excluding those name, designation etc. given in the question paper) and roll no. with letter, application or any other question. You can mention क, ख, ग if necessary.
1. निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
भारतीय समाज की शक्ति का स्रोत उसका पारिवारिक जीवन है। अनेक परिवर्धनों के बीच में परिवार की यह दृढ़ शक्ति बारंबार उभरती हुई दिखाई पड़ती है। परिवार की इस शक्ति का विघटन किसी भी प्रकार समाज के लिए हितकारी नहीं हो सकता। भारतीय-परिवार सामाजिक जीवन के क्षेत्र में मूल्यवान प्रयोग है, उसे सब तरह से बढ़ाना, पल्लवित और पुष्पित करना आवश्यक है। आजकल के संक्रांति काल में तो परिवार के संगठन को और भी सुसंस्कृत करना आवश्यक है। कुल-संस्कृति का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘रामायण’ है। जैसे भारतीय संस्कृति का प्रतीक कुल है, वैसे ही भारतीय साहित्य की विशिष्ट कृति ‘रामायण’ है। धर्म तत्त्व परिवार के प्रत्येक सदस्य के समक्ष कर्तव्य का संदेश लाता है। माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन, जाति-बंधु, जिनका परिवार से नाता होता है, वे सब कर्तव्य के ऋण से बँधे होते हैं। कर्तव्य द्वारा व्यक्ति सेवा का मार्ग अपनाता है। कर्तव्य-भावना का ही दूसरा नाम यज्ञीय भावना है। जहाँ व्यक्ति दूसरे के लिए अपने स्वार्थ और सुख का समर्पण करता है, उस जीवन को स्वर्ग कहते हैं। महान् ग्रंथ जो आदर्श सिखाते हैं, उनकी भावना यही है। परिवार के प्रेममय वातावरण में सब सदस्य अपने कर्तव्य को पहचानकर उसका पालन करते हैं। दूसरों से छीन-झपटकर अपने लिए कुछ प्राप्त करने की बात वे मन में नहीं लाते । यही पारिवारिक जीवन का रस है।जहाँ एक व्यक्ति दूसरे की सहायता और सेवा करने की बात सोचता है, वही आदर्श स्थिति स्वर्ग है। इसके विपरीत जब हम प्रत्येक वस्तु को अपने स्वार्थ की दृष्टि से देखते हैं और अधिकार की बात कहकर केवल पाने या लेने की इच्छा रखते हैं, तो हमारे उस आचरण से संघर्ष और विरोध उत्पन्न हो जाता है। उस तनाव की स्थिति में जो न हो जाए, थोड़ा है।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का आशय अपने शब्दों में लिखिए। 5
(ख) कर्तव्य-भावना क्यों उपयोगी है? 5
(ग) गद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। 20
2. निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गरीबी हमारा मानसिक रोग है। यदि आप इस रोग से पीड़ित हैं अथवा इस रोग के शिकार हैं, तो अपने मानसिक भाव को बदल दीजिए। दुःख-दरिद्रता तथा लाचारी के विचार मन में लाने के स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, स्वाधीनता तथा आनंद के विचारों से अपने मानस-क्षेत्र को प्रकाशित कीजिए। फिर यह देखकर आपके आश्चर्य का पार न रहेगा कि आपकी उन्नति कितने जोरों से हो रही है।
गरीबी हमारा मानसिक रोग है। यदि आप इस रोग से पीड़ित हैं अथवा इस रोग के शिकार हैं, तो अपने मानसिक भाव को बदल दीजिए। दुःख-दरिद्रता तथा लाचारी के विचार मन में लाने के स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, स्वाधीनता तथा आनंद के विचारों से अपने मानस-क्षेत्र को प्रकाशित कीजिए। फिर यह देखकर आपके आश्चर्य का पार न रहेगा कि आपकी उन्नति कितने जोरों से हो रही है। हमें विजय और सफलता पूर्णतया मन की वैज्ञानिक प्रक्रिया से प्राप्त होती है। जो मनुष्य समृद्धिशाली और सौभाग्यशाली होता है उसका यह अखण्ड विश्वास होता है कि वह समृद्धिशाली और सौभाग्यशाली हो रहा है। उसे अपनी कमाने की योग्यता पर विश्वास रहता है। वह अपने समय को गरीबी की बातों तथा विचारों में नहीं गँवाता। दरिद्रता से लड़खड़ाता हुआ नहीं चलता। वह अपनी शक्ति को उस वस्तु की ओर मोड़ता है, जिसके लिए कोशिश कर रहा है तथा जिसकी प्राप्ति में उसका पूरा विश्वास एवं दृढ़ निश्चय है। देश में ऐसे गरीब लोग हैं, जो अपनी गरीबी से अर्ध-संतुष्ट हो गए हैं और जिन्होंने उसके विकराल पंजों से निकलने का प्रयत्न ही छोड़ दिया है। अब वे चाहे कितना ही कठिन परिश्रम करें, उन्होंने तो अपनी आशा खो दी है — स्वाधीनता प्राप्त करने की उमंग नष्ट कर दी है।
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। 5
(ख) गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने का क्या आशय है? 5
(ग) गद्यांश का संक्षेपण (एक-तिहाई शब्दों में) कीजिए। 20
3.
(क)
सचिव, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से संयुक्त सचिव (नीति), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार को प्रेषित किए जाने वाले एक अर्ध-सरकारी पत्र का प्रारूप प्रस्तुत कीजिए, जिसमें आयात नीति निर्धारण विषयक सूचनाएँ शीघ्र भेजने का संदर्भ हो। 10
(ख)
सचिव, गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जारी की जाने वाली अधिसूचना का प्रारूप प्रस्तुत कीजिए, जिसमें गोवर्धन पर्वत के परिक्रमा पथ में एक अस्थायी थाना सृजित करने की सूचना हो। 10
4.निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए। 10
अभिमुख, अभ्यंतर, नागर, प्रकट, लघिमा, उद्धत, पैना, अनुग्रह, घात, स्थावर
5.
(क) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्ग पृथक् कीजिए। 5
संकेत, अन्वय, अतीत, स्वयं, आबालवृद्ध
(ख) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय को पृथक् कीजिए। 5
आदरणीय, दृष्ट, उठान, पुजारी, श्रद्धालु
6. निम्नलिखित वाक्यांश या पदबंध के लिए एक-एक शब्द लिखिए।
10
(i) जिसका कोई शत्रु उत्पन्न न हुआ हो
(ii) पहाड़ के ऊपर की समभूमि
(iii) पैरों से लेकर सिर तक
(iv) रात को दिखाई न देने का रोग
(v) दूसरे के स्थान पर काम करने वाला
7. (क) निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए। 5
सृष्टा, महातम्य, बिशम्भर, अंर्तधान, वांङ्गमय
(ख) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए। 5
(i) मैं उसे सब कुछ समझा लूंगा।
(ii) सदा सच बोलना उसकी आदत था।
(iii) भोजन को स्वादिष्ठ होना चाहिए।
(iv) तुम्हारा हृदय वज्र है, पत्थर है।
(v) वह विलाप करके रोने लगा।
8. निम्नलिखित मुहावरों / लोकोक्तियों का अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में इस प्रकार प्रयोग कीजिए कि अर्थ स्पष्ट हो जाए।
10+20=30
(i) पगड़ी बदलना
(ii) बुलबुल पालना
(iii) काले तिल चबाना
(iv) जुए को कंधे से उतारना
(v) कंबल ओढ़ाकर लूटना
(vi) अशर्फियाँ लुटें और कोयलों पर मोहर
(vii) उतर गई लोई क्या करेगा कोई
(viii) खूँटे के बल बछड़ा कूदे
(ix) दाल-भात में मूसल चंद
(x) नौ की लकड़ी नब्बे खर्च

हल

1 (क) : गद्यांश का आशय

भारतीय समाज का वास्तविक आधार और शक्ति हमारा पारिवारिक जीवन है। परिवार केवल सदस्यों का समूह नहीं है, बल्कि यह कर्त्तव्य, त्याग और परस्पर सेवा-भाव का केंद्र है। रामायण जैसे महान ग्रंथ हमें पारिवारिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करना सिखाते हैं। जब परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अधिकारों की बजाय दूसरों के प्रति अपने कर्त्तव्योंऔर त्याग पर ध्यान देता है, तो जीवन में सुख और शांति (स्वर्ग जैसा वातावरण) बनी रहती है। इसके विपरीत जब लोग स्वार्थी होकर केवल पाने और छीनने की होड़ में लग जाते हैं, तो समाज में तनाव और संघर्ष पैदा होता है। इसलिए आज के दौर में परिवार की इस शक्ति को बचाए रखना और मजबूत बनाना बेहद जरूरी है।

1 (ख) : कर्तव्य-भावना का उपयोग

कर्तव्य-भावना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है—

  • सेवा और त्याग का मार्ग – यह व्यक्ति को केवल अपने बारे में न सोचकर दूसरों की सहायता और सेवा करने के लिए प्रेरित करती है।
  • पारिवारिक एवं सामाजिक सामंजस्य – जब परिवार के सभी सदस्य (माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि) अपने-अपने कर्त्तव्यों को पहचानकर उनका पालन करते हैं, तो आपसी प्रेम और सहयोग बढ़ता है।
  • स्वार्थ और संघर्ष से बचाव – कर्त्तव्य-भावना व्यक्ति को दूसरों का हक छीनने से रोकती है और समाज को तनाव व आपसी विरोध से बचाती है।
  • यज्ञीय (पवित्र) जीवन – अपने सुख और स्वार्थ को दूसरों के लिए समर्पित करना ही ‘यज्ञीय भावना’ है, जो जीवन को आदर्श और सुखद बनाती है।

1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या

जहाँ व्यक्ति ……… विरोध उत्पन्न हो जाता है।

व्याख्या— सच्चा ‘स्वर्ग’ किसी भौगोलिक स्थान पर नहीं, बल्कि हमारे विचारों और आचरण से बनता है। जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, इच्छाओं और सुख-सुविधाओं का त्याग दूसरों की भलाई के लिए करता है, तो वही पारिवारिक या सामाजिक वातावरण ‘स्वर्ग’ बन जाता है। ऐसी स्थिति में आपसी प्रेम और सौहार्द्र का वातावरण होता है।

इसके विपरीत यदि मनुष्य का दृष्टिकोण केवल स्वार्थी हो जाए और वह हर जगह केवल अपने ‘अधिकारों’ की बात करे तथा दूसरों से केवल प्राप्त करने या छीनने की कोशिश करे तो रिश्तों में दरार आ जाती है। यह स्वार्थी आचरण परिवार और समाज में आपसी टकराव, मनमुटाव और भारी तनाव पैदा करता है।

उत्तर — 2

2 (क) : शीर्षक

‘सकारात्मक सोच और समृद्धि’ अथवा ‘गरीबी : मानसिकता और समाधान’ अथवा ‘गरीबी : एक मानसिक स्थिति और उसका समाधान’

2 (ख) : गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने का आशय

गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने’ का आशय उस मानसिक स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति अपनी अभावग्रस्त और कठिन परिस्थितियों को ही अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेता है। ऐसे लोग गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करना छोड़कर अपनी उन्नति की आशा खो बैठते हैं और परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं।

2 (ग) : संक्षेपण

गरीबी वास्तव में एक मानसिक स्थिति है। दुःख और दरिद्रता के विचारों को त्यागकर यदि मन को सुख, समृद्धि और आत्म-विश्वास से भरा जाए तो सफलता निश्चित मिलती है। सफल मनुष्य अपनी योग्यता पर विश्वास रखता है और नकारात्मक विचारों में समय नष्ट करने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। इसके विपरीत जो लोग अपनी गरीबी को नियति मानकर प्रयास छोड़ देते हैं वे कभी प्रगति नहीं कर पाते।

उत्तर — 3

3 (क) : अर्ध सरकारी पत्र

अर्ध-सरकारी पत्र- 2025

3 (ख) : अधिसूचना

अधिसूचना - 2025

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम

क्र॰ स॰शब्दविलोम
1.अभिमुखप्रतिमुख
2.अभ्यंतरबाह्य
3.नागरग्रामीण, ग्राम्य
4.प्रकटअप्रकट, गुप्त, प्रच्छन्न
5.लघिमागरिमा, महिमा
6.उद्धतअनुद्धत, सौम्य, विनीत, विनत
7.पैनाभोथरा
8.अनुग्रहविग्रह, निग्रह, कोप, दण्ड
9.घातप्रतिघात
10.स्थावरजंगम

उत्तर— 5

5 (क) : उपसर्ग

शब्दउपसर्ग + शब्दप्रयुक्त उपसर्ग
संकेतसम् + केत (कित् + घञ्)सम्
अन्वयअनु + अयअनु
अतीतअति + इतअति
स्वयंसु + अयम्सु
आबालवृद्धआ + बाल + वृद्ध

5 (ख) : प्रत्यय

शब्दशब्द + प्रत्ययप्रयुक्त प्रत्यय
आदरणीयआदृ + अनीयअनीय
दृष्टदृश् + त
उठानउठना + आनआन
पुजारीपूजा + आरीआरी
श्रद्धालुश्रद्धा + आलुआलु

उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द

क्र॰ सं॰वाक्यांश या पदबंधएक शब्द
 (i)जिसका कोई शत्रु उत्पन्न न हुआ होअजातशत्रु
 (ii)पहाड़ के ऊपर की समभूमिअधित्यका
 (iii)पैरों से लेकर सिर तकआपादमस्तक
 (iv)रात को दिखाई न देने का रोगरतौंधी
 (v)दूसरे के स्थान पर काम करने वालास्थानापन्न

उत्तर— 7

7 (क) : वर्तनी शुद्धि

क्र॰ सं॰अशुद्ध वर्तनीशुद्ध वर्तनी
 (i)सृष्टास्रष्टा
 (ii)महातम्य माहात्म्य 
 (iii)बिशम्भरविश्वम्भर / विश्वंभर
 (iv)अंर्तधानअंतर्धान / अन्तर्धान
 (v)वांङ्गमयवाङ्मय

7 (ख) : वाक्य-शुद्धि

  • अशुद्ध वाक्य — मैं उसे सब कुछ समझा लूंगा।
  • शुद्ध वाक्य — मैं उसे सब कुछ समझा दूँगा।
  • अशुद्ध वाक्य — सदा सच बोलना उसकी आदत था।
  • शुद्ध वाक्य — सदा सच बोलना उसकी आदत थी।
  • अशुद्ध वाक्य — भोजन को स्वादिष्ठ होना चाहिए।
  • शुद्ध वाक्य — भोजन स्वादिष्ट होना चाहिए।
  • अशुद्ध वाक्य — तुम्हारा हृदय वज्र है, पत्थर है।
  • शुद्ध वाक्य — तुम्हारा हृदय वज्र है। या तुम्हारा हृदय पत्थर है।
  • अशुद्ध वाक्य — वह विलाप करके रोने लगा।
  • शुद्ध वाक्य — वह विलाप करने लगा।

उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग

(i) पगड़ी बदलना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— पक्की मित्रता होना

प्रयोग— देवराज और बलदेव ने पगड़ी बदली है।

(ii) बुलबुल पालना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— जान-बूझकर मुसीबत या व्यर्थ का झंझट मोल लेना / खर्चीले शौक पालना।

वाक्य प्रयोग: आमदनी आठ आने है और चले हैं महँगी गाड़ियाँ खरीदने, इसे कहते हैं बुलबुल पालना।

(iii) काले तिल चबाना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— पराधीन होना, अत्यंत कठिन या कष्टदायक स्थिति में दिन बिताना या किसी के अधीन रहकर मजबूरी सहना।

वाक्य प्रयोग— नौकरी छूटने के बाद रमेश को सेठ जी की जी-हुज़ूरी करते हुए काले तिल चबाने पड़ रहे हैं।

(iv) जुए को कंधे से उतारना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ—  भारी ज़िम्मेदारी या भार से मुक्त होना।

वाक्य प्रयोग— अपनी दोनों बेटियों की शादी धूमधाम से करके शर्मा जी ने आखिरकार अपने कंधे से जुआ उतार ही दिया।

(v) कंबल ओढ़ाकर लूटना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— मीठी-मीठी बातों में फँसाकर या धोखे से सब कुछ ठग लेना।

वाक्य प्रयोग— उस ढोंगी बाबा ने सीधे-साधे ग्रामीणों को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से कंबल ओढ़ाकर लूट लिया।

(vi) अशर्फियाँ लुटें और कोयलों पर मोहर

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— मूल्यवान वस्तु की अपेक्षा तुच्छ वस्तु का ध्यान।

प्रयोग— रमेश ने अपनी बहन की शादी के अवसर पर बहुत बढ़िया दावत दी, परन्तु पान तम्बाकू में कंजूसी करके अशरफियाँ लुटे, कोयलों पर मुहर को चरितार्थ कर दिया।

(vii) उतर गई लोई क्या करेगा कोई

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— इज्ज़त न रहने पर आदमी निर्लज्ज हो जाता है।

प्रयोग— सीमा अपने प्रेमी के साथ जब घर वापस आयी तो उसके घर वालों ने अपशब्द कहे तथा तिरस्कार करके घर से निकाल दिया। सीमा तथा उसका प्रेमी बगल में ही किराये का मकान लेकर रहने लगे। उतर गई लोई तो क्या करेगा कोई।

(viii) खूँटे के बल बछड़ा कूदे

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— दूसरे के बल पर काम करना व शेखी बघारना।

प्रयोग— पाकिस्तान भारत का सामना क्या करेगा? वह तो चीन के बल पर कूदता है। पाकिस्तान पर खूँटे के बल बछड़ा कूदे वाली कहावत चरितार्थ होती है।

(ix) दाल-भात में मूसल चंद

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— बीच में दखल देनेवाला।

प्रयोग— हम दोनों के बीच में तर्क वितर्क हो ही रहा था कि जयदेव का दाल भात में मूसलचन्द की भाँति बीच में बोलना मुझे अच्छा नहीं लगा।

(x) नौ की लकड़ी नब्बे खर्च

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— वस्तु के मूल्य से उसके रख-रखाव का खर्च अधिक होना। थोड़े फायदे के लिए अधिक खर्च।

प्रयोग— आज के महँगाई के जमाने में पुरानी मर्सिडीज कार रखना नौ की लकड़ी नब्बे खर्च के समान है।


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