प्रश्न पत्र
हल
1 (क) : गद्यांश का आशय
भारतीय समाज का वास्तविक आधार और शक्ति हमारा पारिवारिक जीवन है। परिवार केवल सदस्यों का समूह नहीं है, बल्कि यह कर्त्तव्य, त्याग और परस्पर सेवा-भाव का केंद्र है। रामायण जैसे महान ग्रंथ हमें पारिवारिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करना सिखाते हैं। जब परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अधिकारों की बजाय दूसरों के प्रति अपने कर्त्तव्योंऔर त्याग पर ध्यान देता है, तो जीवन में सुख और शांति (स्वर्ग जैसा वातावरण) बनी रहती है। इसके विपरीत जब लोग स्वार्थी होकर केवल पाने और छीनने की होड़ में लग जाते हैं, तो समाज में तनाव और संघर्ष पैदा होता है। इसलिए आज के दौर में परिवार की इस शक्ति को बचाए रखना और मजबूत बनाना बेहद जरूरी है।
1 (ख) : कर्तव्य-भावना का उपयोग
कर्तव्य-भावना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है—
- सेवा और त्याग का मार्ग – यह व्यक्ति को केवल अपने बारे में न सोचकर दूसरों की सहायता और सेवा करने के लिए प्रेरित करती है।
- पारिवारिक एवं सामाजिक सामंजस्य – जब परिवार के सभी सदस्य (माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि) अपने-अपने कर्त्तव्यों को पहचानकर उनका पालन करते हैं, तो आपसी प्रेम और सहयोग बढ़ता है।
- स्वार्थ और संघर्ष से बचाव – कर्त्तव्य-भावना व्यक्ति को दूसरों का हक छीनने से रोकती है और समाज को तनाव व आपसी विरोध से बचाती है।
- यज्ञीय (पवित्र) जीवन – अपने सुख और स्वार्थ को दूसरों के लिए समर्पित करना ही ‘यज्ञीय भावना’ है, जो जीवन को आदर्श और सुखद बनाती है।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
जहाँ व्यक्ति ……… विरोध उत्पन्न हो जाता है।
व्याख्या— सच्चा ‘स्वर्ग’ किसी भौगोलिक स्थान पर नहीं, बल्कि हमारे विचारों और आचरण से बनता है। जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, इच्छाओं और सुख-सुविधाओं का त्याग दूसरों की भलाई के लिए करता है, तो वही पारिवारिक या सामाजिक वातावरण ‘स्वर्ग’ बन जाता है। ऐसी स्थिति में आपसी प्रेम और सौहार्द्र का वातावरण होता है।
इसके विपरीत यदि मनुष्य का दृष्टिकोण केवल स्वार्थी हो जाए और वह हर जगह केवल अपने ‘अधिकारों’ की बात करे तथा दूसरों से केवल प्राप्त करने या छीनने की कोशिश करे तो रिश्तों में दरार आ जाती है। यह स्वार्थी आचरण परिवार और समाज में आपसी टकराव, मनमुटाव और भारी तनाव पैदा करता है।
उत्तर — 2
2 (क) : शीर्षक
‘सकारात्मक सोच और समृद्धि’ अथवा ‘गरीबी : मानसिकता और समाधान’ अथवा ‘गरीबी : एक मानसिक स्थिति और उसका समाधान’
2 (ख) : गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने का आशय
गरीबी से अर्ध-संतुष्ट होने’ का आशय उस मानसिक स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति अपनी अभावग्रस्त और कठिन परिस्थितियों को ही अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेता है। ऐसे लोग गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करना छोड़कर अपनी उन्नति की आशा खो बैठते हैं और परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं।
2 (ग) : संक्षेपण
गरीबी वास्तव में एक मानसिक स्थिति है। दुःख और दरिद्रता के विचारों को त्यागकर यदि मन को सुख, समृद्धि और आत्म-विश्वास से भरा जाए तो सफलता निश्चित मिलती है। सफल मनुष्य अपनी योग्यता पर विश्वास रखता है और नकारात्मक विचारों में समय नष्ट करने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। इसके विपरीत जो लोग अपनी गरीबी को नियति मानकर प्रयास छोड़ देते हैं वे कभी प्रगति नहीं कर पाते।
उत्तर — 3
3 (क) : अर्ध सरकारी पत्र

3 (ख) : अधिसूचना

उत्तर— 4 : शब्द-विलोम
| क्र॰ स॰ | शब्द | विलोम |
| 1. | अभिमुख | प्रतिमुख |
| 2. | अभ्यंतर | बाह्य |
| 3. | नागर | ग्रामीण, ग्राम्य |
| 4. | प्रकट | अप्रकट, गुप्त, प्रच्छन्न |
| 5. | लघिमा | गरिमा, महिमा |
| 6. | उद्धत | अनुद्धत, सौम्य, विनीत, विनत |
| 7. | पैना | भोथरा |
| 8. | अनुग्रह | विग्रह, निग्रह, कोप, दण्ड |
| 9. | घात | प्रतिघात |
| 10. | स्थावर | जंगम |
उत्तर— 5
5 (क) : उपसर्ग
| शब्द | उपसर्ग + शब्द | प्रयुक्त उपसर्ग |
| संकेत | सम् + केत (कित् + घञ्) | सम् |
| अन्वय | अनु + अय | अनु |
| अतीत | अति + इत | अति |
| स्वयं | सु + अयम् | सु |
| आबालवृद्ध | आ + बाल + वृद्ध | आ |
5 (ख) : प्रत्यय
| शब्द | शब्द + प्रत्यय | प्रयुक्त प्रत्यय |
| आदरणीय | आदृ + अनीय | अनीय |
| दृष्ट | दृश् + त | त |
| उठान | उठना + आन | आन |
| पुजारी | पूजा + आरी | आरी |
| श्रद्धालु | श्रद्धा + आलु | आलु |
उत्तर— 6 : पदबंध के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (i) | जिसका कोई शत्रु उत्पन्न न हुआ हो | अजातशत्रु |
| (ii) | पहाड़ के ऊपर की समभूमि | अधित्यका |
| (iii) | पैरों से लेकर सिर तक | आपादमस्तक |
| (iv) | रात को दिखाई न देने का रोग | रतौंधी |
| (v) | दूसरे के स्थान पर काम करने वाला | स्थानापन्न |
उत्तर— 7
7 (क) : वर्तनी शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (i) | सृष्टा | स्रष्टा |
| (ii) | महातम्य | माहात्म्य |
| (iii) | बिशम्भर | विश्वम्भर / विश्वंभर |
| (iv) | अंर्तधान | अंतर्धान / अन्तर्धान |
| (v) | वांङ्गमय | वाङ्मय |
7 (ख) : वाक्य-शुद्धि
- अशुद्ध वाक्य — मैं उसे सब कुछ समझा लूंगा।
- शुद्ध वाक्य — मैं उसे सब कुछ समझा दूँगा।
- अशुद्ध वाक्य — सदा सच बोलना उसकी आदत था।
- शुद्ध वाक्य — सदा सच बोलना उसकी आदत थी।
- अशुद्ध वाक्य — भोजन को स्वादिष्ठ होना चाहिए।
- शुद्ध वाक्य — भोजन स्वादिष्ट होना चाहिए।
- अशुद्ध वाक्य — तुम्हारा हृदय वज्र है, पत्थर है।
- शुद्ध वाक्य — तुम्हारा हृदय वज्र है। या तुम्हारा हृदय पत्थर है।
- अशुद्ध वाक्य — वह विलाप करके रोने लगा।
- शुद्ध वाक्य — वह विलाप करने लगा।
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(i) पगड़ी बदलना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— पक्की मित्रता होना
प्रयोग— देवराज और बलदेव ने पगड़ी बदली है।
(ii) बुलबुल पालना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— जान-बूझकर मुसीबत या व्यर्थ का झंझट मोल लेना / खर्चीले शौक पालना।
वाक्य प्रयोग: आमदनी आठ आने है और चले हैं महँगी गाड़ियाँ खरीदने, इसे कहते हैं बुलबुल पालना।
(iii) काले तिल चबाना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— पराधीन होना, अत्यंत कठिन या कष्टदायक स्थिति में दिन बिताना या किसी के अधीन रहकर मजबूरी सहना।
वाक्य प्रयोग— नौकरी छूटने के बाद रमेश को सेठ जी की जी-हुज़ूरी करते हुए काले तिल चबाने पड़ रहे हैं।
(iv) जुए को कंधे से उतारना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— भारी ज़िम्मेदारी या भार से मुक्त होना।
वाक्य प्रयोग— अपनी दोनों बेटियों की शादी धूमधाम से करके शर्मा जी ने आखिरकार अपने कंधे से जुआ उतार ही दिया।
(v) कंबल ओढ़ाकर लूटना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— मीठी-मीठी बातों में फँसाकर या धोखे से सब कुछ ठग लेना।
वाक्य प्रयोग— उस ढोंगी बाबा ने सीधे-साधे ग्रामीणों को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से कंबल ओढ़ाकर लूट लिया।
(vi) अशर्फियाँ लुटें और कोयलों पर मोहर
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— मूल्यवान वस्तु की अपेक्षा तुच्छ वस्तु का ध्यान।
प्रयोग— रमेश ने अपनी बहन की शादी के अवसर पर बहुत बढ़िया दावत दी, परन्तु पान तम्बाकू में कंजूसी करके अशरफियाँ लुटे, कोयलों पर मुहर को चरितार्थ कर दिया।
(vii) उतर गई लोई क्या करेगा कोई
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— इज्ज़त न रहने पर आदमी निर्लज्ज हो जाता है।
प्रयोग— सीमा अपने प्रेमी के साथ जब घर वापस आयी तो उसके घर वालों ने अपशब्द कहे तथा तिरस्कार करके घर से निकाल दिया। सीमा तथा उसका प्रेमी बगल में ही किराये का मकान लेकर रहने लगे। उतर गई लोई तो क्या करेगा कोई।
(viii) खूँटे के बल बछड़ा कूदे
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— दूसरे के बल पर काम करना व शेखी बघारना।
प्रयोग— पाकिस्तान भारत का सामना क्या करेगा? वह तो चीन के बल पर कूदता है। पाकिस्तान पर खूँटे के बल बछड़ा कूदे वाली कहावत चरितार्थ होती है।
(ix) दाल-भात में मूसल चंद
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— बीच में दखल देनेवाला।
प्रयोग— हम दोनों के बीच में तर्क वितर्क हो ही रहा था कि जयदेव का दाल भात में मूसलचन्द की भाँति बीच में बोलना मुझे अच्छा नहीं लगा।
(x) नौ की लकड़ी नब्बे खर्च
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— वस्तु के मूल्य से उसके रख-रखाव का खर्च अधिक होना। थोड़े फायदे के लिए अधिक खर्च।
प्रयोग— आज के महँगाई के जमाने में पुरानी मर्सिडीज कार रखना नौ की लकड़ी नब्बे खर्च के समान है।
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