प्रश्न पत्र
हल
1 (क) : गद्यांश का भावार्थ
लेखक कहता है कि साहित्य का उद्देश्य मनुष्य को ऊँचा उठाना है। ऐसा साहित्य सार्थक नहीं जो मनुष्य को हीनता, स्वार्थ और निर्भरता से मुक्त न कर सके, उसकी आत्मा को तेजस्वी न बनाए और उसके हृदय में दूसरों के दुःख के प्रति संवेदना न जगाए। लेखक अनुभव करता है कि वर्तमान समय अत्यन्त कठिन है; संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को इतना अन्धा बना दिया है कि वह जाति‑धर्म से ऊपर उठकर मानवहित की बात सोच ही नहीं पाता। दलगत स्वार्थों ने मनुष्यता को जकड़ लिया है, लोग छोटे‑छोटे समूहों में बँट गए हैं और अपने दल से बाहर के व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। उसके दुःख‑सुख, तप और सत्यनिष्ठा तक पर अविश्वास किया जाता है।
1 (ख) : साहित्य का लक्ष्य
गद्यांश के आधार पर साहित्य का लक्ष्य केवल मनोरंजन या शब्दजाल रचना नहीं है। लेखक के अनुसार—
- साहित्य मनुष्य को दुर्गति, हीनता और स्वार्थ से बचाए।
- साहित्य मनुष्य की आत्मा को तेजोद्दीप्त बनाए — अर्थात् उसे नैतिक, साहसी और जागरूक बनाए।
- साहित्य मनुष्य के हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील बनाए — यानी उसमें करुणा, सहानुभूति और मानवीयता का विकास करे।
- साहित्य संकीर्णताओं और दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समग्र मानवता की रक्षा करे।
इस प्रकार साहित्य का लक्ष्य मनुष्य को मानवीय मूल्यों से जोड़ना और समाज को व्यापक दृष्टि प्रदान करना है।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
मैं साहित्य ………………… संकोच होता है।
व्याख्या— उपर्युक्त रेखांकित पंक्तियों के अनुसार लेखक साहित्य की वास्तविक उपयोगिता और उद्देश्य पर बल देता है। लेखक के अनुसार साहित्य वही है जो मनुष्य को ऊँचा उठाए; दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से मुक्त करे; उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त बनाए; उसके हृदय में परदुःखकातरता और संवेदनशीलता जगाए।
लेखक ऐसे साहित्य को निरर्थक मानता है जो केवल शब्दों का जाल बुनता हो, पर मनुष्य के भीतर मानवीयता, करुणा और नैतिक शक्ति का विकास न कर सके। इसलिए वह कहता है कि मनुष्य‑केंद्रित दृष्टि से ही साहित्य का मूल्यांकन होना चाहिए; अन्यथा उसे साहित्य कहना भी संकोच का विषय है।
आज नाना ………………….. असम्भव हो गया है।
व्याख्या— यहाँ लेखक वर्तमान समाज की विघटनकारी स्थिति का चित्र प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि मनुष्य अनेक प्रकार के संकीर्ण स्वार्थों में उलझकर इतना अन्धा हो गया है कि वह व्यापक मानवहित को देख ही नहीं पाता। जाति, धर्म, समूह, वर्ग—इन सबकी सीमाएँ इतनी कठोर हो गई हैं कि मनुष्य इनसे ऊपर उठकर सार्वभौमिक मानवता की बात सोचने में असमर्थ हो गया है। स्वार्थों की यह संकीर्णता मनुष्य के विवेक को ढक देती है और उसे व्यापक हित से दूर कर देती है। लेखक का संकेत है कि जब मनुष्य का दृष्टिकोण इतना सीमित हो जाए, तब समाज में मानवीयता का ह्रास होना स्वाभाविक है।
दुनिया छोटे-छोटे ……………. हो गई है।
व्याख्या— इस रेखांकित पंक्तियों के माध्यम से लेखक समाज की विभाजित मानसिकता पर टिप्पणी करते हुआ कहता है कि लोग अपने‑अपने छोटे स्वार्थों, हितों और समूहवादी सोच के आधार पर अनेक दलों में बँट गए हैं। यह दलगत विभाजन इतना गहरा हो गया है कि मनुष्य अपने दल से बाहर के व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लगा है। इस विभाजन के कारण समाज में एकता, विश्वास और मानवीयता कमजोर पड़ रही है। लेखक का आशय है कि संकीर्ण दलगत स्वार्थों ने मनुष्य को बाँट दिया है और यह विभाजन मानवता के लिए अत्यन्त हानिकारक है।
2 (क) : शीर्षक
‘स्थिरता एवं गतिशीलता’ या ‘स्थिरता एवं गतिशीलता में संतुलन’ या ‘प्राचीनता एवं नवीनता में संतुलन’ या ‘तार्किकता के साथ परिवर्तन’
2 (ख) : प्राचीनता एवं नवीनता में संतुलन की आवश्यकता
गद्यांश के अनुसार—
- जीवन निरंतर परिवर्तनशील है; इसलिए नवीनता को स्वीकार करना आवश्यक है।
- परंतु केवल नवीनता के मोह में आँखें मूँदकर आगे बढ़ना जोखिमपूर्ण है।
- प्राचीन परम्पराओं में अनुभव, स्थिरता और सुरक्षा का तत्त्व होता है; वहीं नवीनता में ऊर्जा, गति और प्रयोगशीलता होती है।
- यदि हम केवल पुराने से चिपके रहें तो प्रगति रुक जाती है और यदि केवल नए के पीछे भागें तो भ्रम और अनिश्चितता बढ़ती है।
- इसलिए दोनों का विवेकपूर्ण परीक्षण करके ही संतुलित मार्ग चुनना चाहिए।
अतः प्राचीन और नवीन का संतुलन जीवन को सुरक्षित, गतिशील और विवेकपूर्ण बनाता है।
2 (ग) : संक्षेपण
परिवर्तन अनिवार्य है; उससे बचना दुर्गति है। स्थिरता सुरक्षा देती है, पर प्रगति जोखिम से ही संभव है। इसलिए स्थिरता और गतिशीलता का संतुलन आवश्यक है। नए‑पुराने का विवेकपूर्ण समन्वय जीवन को सही दिशा देता है। नवीनता को स्वीकार करें, पर पूर्वाग्रह रहित होकर उसके पक्ष‑विपक्ष का परीक्षण करें। प्रयोग करें, पर केवल नवीनता के आकर्षण में न बहें। जैसे पुरानी प्रथाओं की तर्क से समीक्षा करते हैं, वैसे ही नए को भी परखें, पर उससे भयभीत न हों।
उत्तर — 3
3 (क) : अधिसूचना
परिभाषा— “अधिसूचना पत्राचार का ऐसा रूप है जिसका प्रकाशन राजकीय गजट में सर्वसाधारण के सूचनार्थ किया जाता है।” या “लोक-विषयक मामलों, शासकीय निर्णयों, सूचनाओं और अन्य सांविधिक आदेशों को सर्वसाधारण के सूचनार्थ राजकीय गजट में प्रकाशित पत्र को अधिसूचना या विज्ञप्ति कहते हैं।”
अधिसूचना का प्रारूप—

3 (ख) : अर्ध-सरकारी पत्र – प्रारूप

उत्तर— 4 : उपसर्ग और प्रत्यय
यहाँ पर दिये गये शब्दांशों में से उपसर्ग और प्रत्यय की पहचान करके उनसे एक-एक शब्द की रचना करनी है।
- उपसर्ग— अधि, परि, नि, खुश
- प्रत्यय— अठ, इक, आइन, आई, अक्कड़
- भर— का प्रयोग उपसर्ग और प्रत्यय दोनो तरह से हो सकता है; जैसे— भरपेट (भर + पेट), रातभर (रात + भर)।
उपसर्ग—
| उपसर्ग | निर्मित शब्द |
| अधि | अधिकर |
| परि | परिभ्रमण |
| भर | भरपूर |
| नि | निकर्षण |
| खुश | खुशकिस्मत |
प्रत्यय—
| प्रत्यय | निर्मित शब्द |
| अठ | कर्मठ |
| इक | प्राकृतिक |
| आइन | ठकुराइन |
| आई | भलाई |
| अक्कड़ | बुझक्कड़ |
उत्तर— 5 : शब्द-विलोम
| क्र॰ स॰ | शब्द | विलोम |
| 1. | आवरण | निरावरण, अनावरण |
| 2. | कृतज्ञ | अकृतज्ञ, कृतघ्न |
| 3. | अज्ञ | विज्ञ, प्रज्ञ, सर्वज्ञ |
| 4. | नैसर्गिक | अनैसर्गिक, कृत्रिम |
| 5. | अधम | उत्तम, श्रेष्ठ, महान् |
| 6. | आहूत | अनाहूत |
| 7. | सकर्मक | अकर्मक |
| 8. | मान | अपमान, सम्मान |
| 9. | घात | प्रतिघात |
| 10. | वैतनिक | अवैतनिक |
उत्तर— 6
6 (क) : वाक्य शुद्धि
- अशुद्ध : यह आँखों से देखी घटना है।
- शुद्ध : यह आँखों देखी घटना है।
- अशुद्ध : सौ रुपया सधन्यवाद प्राप्त हुआ।
- शुद्ध : सौ रुपये प्राप्त हुए, धन्यवाद।
- अशुद्ध : गीता ने सीता से पूछा कि सीता कहाँ चली गई थी?
- शुद्ध : गीता ने सीता से पूछा कि तुम कहाँ चली गयी थी? / गीता ने सीता से पूछा कि आर कहाँ चली गयी थीं?
- अशुद्ध : दक्षिण का अधिकांश भाग पठार है।
- शुद्ध : दक्षिण का अधिकांश पठार है।
- अशुद्ध : मैंने बोला कि कल मत आना।
- शुद्ध : मैंने कह दिया कि कल मत आना।
6 (ख) : वर्तनी शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (i) | शिक्षणेत्तर | शिक्षणेतर |
| (ii) | उपरोक्त | उपर्युक्त |
| (iii) | सौहार्द्र | सौहार्द |
| (iv) | पूज्यनीय | पूजनीय |
| (v) | सौजन्यता | सौजन्य |
उत्तर— 7 : वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश या पदबंध | एक शब्द |
| (i) | आकाश को चूमनेवाला। | गगनचुम्बी |
| (ii) | सन्ध्या और रात के बीच का समय। | गोधूलि |
| (iii) | हमेशा रहने वाला। | शाश्वत |
| (iv) | सौ में सौ। | शत-प्रतिशत |
| (v) | जो बात वर्णन से परे हो। | वर्णनातीत, अवर्णनीय |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(i) नक्कारखाने में तूती की आवाज़
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— वरिष्ठों की उपस्थिति में कनिष्ठों को महत्त्वहीन समझना
प्रयोग— परिवार में अक्सर देखा जाता है कि उम्र में छोटे लोगों की बात नक्कारखाने में तूती की आवाज होती है।
(ii) मक्खी मारना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— समय काटना या कोई काम न करना
प्रयोग— बेरोजगारी का एक कारण यह भी है कि ज्यादा पढ़े-लिखे लोग छोटा काम करना नहीं चाहते या छोटा काम करने में अपनी बेइज्जती महसूस करते हैं। अतः कई युवा मक्खी मारते हैं।
(iii) तिल का ताड़ बनाना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— छोटी-सी बात को बढ़ा देना
प्रयोग— सत्ताधारी दल की छोटी सी भी भूल को विपक्ष तिल का ताड़ बना देता है।
(iv) सिर आँखों पर बैठाना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— बहुत सम्मान देना
प्रयोग— भारतीय परम्परा में अतिथि को सिर आँखों पर बैठाया जाता है।
(v) हवा का रंग देखना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— स्थिति को देखकर कार्य करना
प्रयोग— प्रतियोगी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए हवा का रंग देखकर रणनीति बनानी चाहिए।
(vi) ढाक के तीन पात
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— हमेशा एक-सी दशा में रहना
प्रयोग— सरकार किसानों के प्रति बहुत सहयोगात्मक भावना रखती है, फिर भी इनकी स्थिति वही ढाक के तीन पात के समान ही है।
(vii) गुरु कीजे जान के, पानी पीजे छान के
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— जानकारी प्राप्त कर ही कोई काम करना
प्रयोग— आजकल दलाल बिकी हुई जमीन को दिखाकर पुनः क्रेता को बेच देते हैं, जिससे क्रेता परेशानी में पड़ जाता है। सही कहा गया है, ‘गुरु कीजे जान के पानी पीजे छान के’।
(viii) कर खेती परदेस को जाए, वाको जनम अकारथ जाए
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— खेती रहने पर भी जो व्यक्ति चंद पैसे के लिए परदेस जाता है, उसका जीवन व्यर्थ है
प्रयोग— आजकल युवा पीढ़ी खेती रहने पर भी शर्म के कारण खेती नहीं करना चाह रही है और फैशन के कारण शहरों में जाकर कुछ पैसों के लिए नौकरी कर रही है। सत्य कहा गया है, ‘कर खेती परदेस को जाए, वाको जनम अकारथ जाए’।
(ix) फूहड़ चालें, नौ घर हालें
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— गँवार व्यक्ति का कृत्य दूसरों को भी क्षति पहुँचाता है
प्रयोग— ग्रामीण अंचलों में बिना किसी सैद्धान्तिक एवं प्रयोगात्मक शिक्षा प्राप्त अपने को तथाकथित डॉक्टर कहने वाले मरीजों को ठीक करने की जगह उनकी जान ले लेते है, ठीक ही कहा गया है, ‘फूहड़ चालें, नौ घर हालें’।
(x) अपनी करनी पार उतरनी
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— अपने यत्न से ही फल प्राप्त होता है
प्रयोग— यदि परीक्षा में सफल होना है, तो कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि अपनी करनी पार उतरनी।
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