प्रश्न पत्र
हल
1 (क) : गद्यांश का भावार्थ
मनुष्य अपने विचारों, भावों, इच्छाओं और अनुभूतियों को दूसरों तक पहुँचाने के लिए भाषा का उपयोग करता है। भाषा सामाजिक रूप से अर्जित संपत्ति है, जिसमें तत्सम और तद्भव दोनों प्रकार के शब्द शामिल होते हैं। यद्यपि भाव‑अभिव्यक्ति के अन्य साधन—जैसे संकेत, मुखाकृति या भावभंगिमा—भी उपयोगी होते हैं, परंतु विचारों को स्पष्ट और प्रभावी रूप से व्यक्त करने का सबसे सुगम और सर्वसुलभ माध्यम बोली जाने वाली भाषा ही है। विशेष परिस्थितियों में मूक अभिनय भी भाव व्यक्त कर सकता है, पर सामान्य जीवन में भाषा ही सर्वोत्तम साधन है।
1 (ख) : भाव-अभिव्यक्ति के साधन के रूप में भाषा
अवतरण के अनुसार भाषा मनुष्य की सामाजिक और अर्जित संपत्ति है, जिसके माध्यम से वह अपने मन के भावों को दूसरों तक पहुँचाता है। भाषा में न केवल तत्सम शब्द आते हैं, बल्कि उनके सरल तद्भव रूप भी शामिल होते हैं। मन में उत्पन्न विचार, भाव, इच्छाएँ और अनुभूतियाँ— इन सबको मनुष्य बोलकर, लिखकर या संकेतों द्वारा भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है। यद्यपि मुखाकृति, मुद्राएँ और भावभंगिमा भी भाव प्रकट कर सकती हैं, परंतु वे सीमित और कम प्रभावी हैं। बोली जाने वाली भाषा विचारों को स्पष्ट, विस्तृत और सटीक रूप में व्यक्त करने का सबसे सक्षम साधन है। इस प्रकार भाषा भाव-अभिव्यक्ति का सबसे सुगम, सर्वसुलभ और प्रभावी माध्यम है।
1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या
भाषा …………………………………….. प्रकट करते हैं।
व्याख्या— भाषा मनुष्य को जन्मजात रूप में नहीं मिलती, बल्कि समाज में रहकर वह इसे सीखता और अर्जित करता है। भाषा मनुष्य की वह सामूहिक धरोहर है, जिसके माध्यम से वह अपने मन के विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ और अनुभूतियाँ दूसरों तक पहुँचाता है। भाषा मनुष्य को सामाजिक जीवन में संवाद स्थापित करने, संबंध बनाने और विचारों का आदान‑प्रदान करने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए भाषा को मनुष्य की सामाजिक तथा अर्जित संपत्ति कहा गया है।
भाषा के अंतर्गत ………………………… में लगाते हैं।
व्याख्या— भाषा केवल एक प्रकार के शब्दों तक सीमित नहीं होती। इसमें संस्कृत से आए तत्सम शब्द भी शामिल होते हैं, जिन्हें हम यथारूप प्रयोग करते हैं; साथ ही उन तत्सम शब्दों से समय के साथ विकसित हुए तद्भव शब्द भी आते हैं, जिन्हें हम अधिक सरल, बोलचाल के रूप में उपयोग करते हैं। इस प्रकार भाषा में शब्दों का एक विस्तृत भंडार होता है— शुद्ध, परिष्कृत रूप भी और सरल, परिवर्तित रूप भी। यही विविधता भाषा को समृद्ध और व्यवहारिक बनाती है।
भाव प्रकट ……………………………… भाषा होती है।
व्याख्या— यहाँ लेखक संकेतों, मुखाकृति, मुद्राओं और भावभंगिमा जैसे अभिव्यक्ति‑साधनों की सीमाओं को रेखांकित करता है। यद्यपि ये साधन भाव व्यक्त करने में कुछ हद तक उपयोगी होते हैं, परंतु मनुष्य के जटिल विचारों, तर्कों और विस्तृत भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में इनकी क्षमता सीमित है। बोली जाने वाली भाषा विचारों को सटीक, विस्तृत और समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करती है। इसलिए भाषा अन्य सभी अभिव्यक्ति‑साधनों की तुलना में अधिक प्रभावी और सक्षम मानी जाती है।
इसीलिए ‘मूक अभिनय’ भी …………….. भाषा ही है।
व्याख्या— इस पंक्ति में लेखक यह स्वीकार करता है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में बिना बोले भी भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। नाट्यकला में मूक अभिनय ऐसा ही माध्यम है, जिसमें कलाकार केवल हावभाव, मुद्राओं और चेहरे की अभिव्यक्तियों से गहन भाव व्यक्त करता है। यद्यपि यह अभिनय का श्रेष्ठ रूप माना जाता है, फिर भी सामान्य जीवन में मनुष्य के विचारों और भावों को व्यक्त करने का सबसे सरल, सहज और सर्वसुलभ साधन भाषा ही है। इसलिए भाषा को भाव‑अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम कहा गया है।
2 (क) : शीर्षक
‘मानव-चिंतन’ या ‘चिंतन एवं सृजनशीलता’
2 (ख) : ज्ञान के साथ सक्रियता की आवश्यकता
गद्यांश के आधार पर—
- केवल ज्ञान होने से जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आता; सक्रियता ज्ञान को उपयोगी बनाती है।
- सक्रियता से व्यक्ति अपने ज्ञान को व्यवहार में उतारता है, जिससे प्रगति और खुशहाली आती है।
- निष्क्रिय ज्ञान बेमानी है, वह न व्यक्ति को आगे बढ़ाता है, न समाज को।
- सक्रियता ही सृजनशीलता को जन्म देती है; बिना प्रयास के सृजनशीलता के बीज अंकुरित नहीं होते।
इसलिए ज्ञान के साथ सक्रियता आवश्यक है ताकि व्यक्ति अपने विचारों को क्रियान्वित कर सके और जीवन में वास्तविक विकास हो। संक्षेप में— “ज्ञान तभी सार्थक है जब वह सक्रियता के साथ जुड़ा हो।”
2 (ग) : संक्षेपण
मनुष्य के चिंतन में हृदय, मन और मस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। चिंतन प्रगति के लिए आवश्यक है। ज्ञान तभी उपयोगी है जब उसके साथ सक्रियता जुड़ी हो। मनुष्य की सृजनशीलता को प्रयास और जिज्ञासा‑पूर्ति से विकसित किया जा सकता है। माता‑पिता और शिक्षकों द्वारा जिज्ञासा-शमन व मार्गदर्शन से बच्चों का बौद्धिक विकास होता है। सृजनशीलता मानव चिंतन का मूल है और मानव चिंतन का महत्त्व सर्वोपरि रहेगा।
उत्तर — 3
3 (क) : सरकारी पत्र का प्रारूप
पत्रांक ………
प्रेषक,
क॰ ख॰ ग॰,
संयुक्त सचिव,
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय,
भारत सरकार।
सेवा में,
मुख्य सचिव,
उत्तर प्रदेश शासन,
लखनऊ।
विषय: उत्तर प्रदेश में निर्माणाधीन केंद्रीय राजमार्गों के संदर्भ में।
महोदय,
मुझे आपसे यह कहने का निदेश हुआ है कि उत्तर प्रदेश में निर्माणाधीन केंद्रीय राजमार्गों की अद्यतन विस्तृत जानकारी प्रेषित करें।
2. इन जानकारियों में—
- केन्द्रीय राजमार्ग के निर्माण में वित्त आवंटन की स्थिति क्या है।
- ठेके प्रणाली के आधार पर कितना कार्य लिया गया है या लिया जाना है।
- मार्ग की गुणवत्ता निर्धारण के लिए किन-किन उपायों को अपनाया गया है।
3. उपर्युक्त विषयक माँगी गयी जानकारी शीघ्रातिशीघ्र प्रेषित करें, जिससे राजमार्ग निर्माण की स्थिति से शासन को अवगत कराकर वित्त का अतिरिक्त आवंटन किया जा सके।
भवदीय,
ह॰ ………
(क॰ ख॰ ग॰)
संयुक्त सचिव।
संख्या ……., तद्दिनांक।
प्रतिलिपि निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित—
- सचिव, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग एवं सड़क राजमार्ग मंत्रालय
- समस्त मुख्य विकास अधिकारी, उ॰ प्र॰
- समस्त राजमार्ग महा-अभियन्ता, उ॰ प्र॰ शासन
आज्ञा से,
ह॰ ………
(क॰ ख॰ ग॰)
संयुक्त सचिव।
3 (ख) : अर्ध-सरकारी पत्र : अन्तर और प्रारूप—
अन्तर—
| आधार | सरकारी-पत्र | अर्ध-सरकारी पत्र |
| उद्गम | पद से होता है। | अधिकारी / व्यक्ति के स्तर से होता है। |
| संचलन | सदैव पद से पद को प्रेषित होता है। ऐसे में तीन स्थितियाँ हो सकती हैं — क. समान पदों के बीच ख. वरिष्ठ से कनिष्ठ पद के बीच ग. कनिष्ठ से वरिष्ठ पद के बीच | प्रायः समान स्तर के अधिकारियों के बीच अथवा किसी अशासकीय व्यक्ति को भी सरकारी कार्य हेतु प्रेषित। |
| विषय-वस्तु | शासकीय प्रयोजन और पदीय दायित्वों की पूर्ति से सम्बन्धित | शासकीय प्रयोजन हेतु ध्यानाकर्षण, विचार-विमर्श और गोपनीय मामलों में वार्ता से सम्बन्धित |
| भाषा-शैली | औपचारिक भाषा में, रूढ़ व अन्य पुरुष शैली में तटस्थ भाव से लिखा जाता है। वैयक्तिक भावों का कोई स्थान नहीं। | अनौपचारिक भाषा में व्यक्तिगत और मैत्री व आत्मीय भाव से उत्तम व मध्यम पुरुष शैली में लिखा जाता है। |
| प्रेषिती | पत्र को प्रेषिती कार्यालय का नियत प्राधिकारी खोलता है। | व्यक्तिगत होने के कारण पत्र को सदैव प्रेषिती ही खोलता है। |
| सम्बोधन व समापन | इसमें मात्र औपचारिक शब्दावली ‘महोदय’ सम्बोधन और समापन के लिये कोई औपचारिक शब्द नहीं होता है। | इसमें अनौपचारिक शब्द शब्द ‘प्रिय श्री …’ ; ‘प्रिय महोदय’ से सम्बोधन और समापन के लिये आदरसूचक ‘सादर / ससम्मान /सद्भावनाओं सहित’ जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है। |
| उद्देश्य | अधिकारी अपने पदीय दायित्व का निर्वहन तटस्थ भाव से करते हैं। | अधिकारी व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासकीय समस्याओं का निर्वहन करते हैं। |
अर्ध-सरकारी पत्र : प्रारूप—

उत्तर— 4 : उपसर्ग और प्रत्यय
यहाँ पर दिये गये शब्दांशों में से उपसर्ग और प्रत्यय की पहचान करके उनसे एक-एक शब्द की रचना करनी है।
- उपसर्ग— वि, उत्, दु, अप, निर्
- प्रत्यय— इतर, आलु, नी, घ्न
- प्र— का प्रयोग उपसर्ग और प्रत्यय दोनो तरह से हो सकता है; जैसे— प्रक्रिया (प्र + क्रिया), विप्र (वि + प्र)।
उपसर्ग—
| उपसर्ग | निर्मित शब्द |
| वि | विकिरण |
| उत् | उत्सर्ग |
| दु | दुकाल |
| अप | अपकीर्ति |
| निर् | निराहार |
प्रत्यय—
| प्रत्यय | निर्मित शब्द |
| इतर | आर्येतर |
| आलु | कृपालु |
| नी | शेरनी |
| घ्न | कृतघ्न |
| प्र | विप्र |
उत्तर— 5 : शब्द-विलोम
| क्र॰ स॰ | शब्द | विलोम |
| 1. | मुखर | मौन |
| 2. | उपार्जित | अनुपार्जित |
| 3. | समष्टि | व्यष्टि |
| 4. | निंद्य | श्लाघ्य, वन्द्य, अनिंद्य |
| 5. | तिरस्कार | सत्कार, सम्मान, स्वीकार |
| 6. | शर्मनाक | शानदार, सम्मानपूर्ण |
| 7. | ऋजु | वक्र |
| 8. | लुभावना | घिनौना |
| 9. | विहित | अविहित, निषिद्ध |
| 10. | तामसिक | सात्त्विक (सात्विक) |
उत्तर— 6
6 (क) : वाक्य शुद्धि
- अशुद्ध : एक रुपये में कितना पैसा होता है?
- शुद्ध : एक रुपये में कितने पैसे होते हैं।
- अशुद्ध : वह सीधा-साधा आदमी हैं।
- शुद्ध : वह सीधा-सादा आदमी है।
- अशुद्ध : वहाँ भारी भीड़ एकत्रित हो गई।
- शुद्ध : वहाँ भीड़ एकत्रित हो गई।
- अशुद्ध : गोलियों की बाढ़ के सामने कोई न टिक सका।
- शुद्ध : गोलियों की बौछार के सामने कोई टिक न सका।
- अशुद्ध : हम गाँधी जी की मूर्ति का दर्शन करने गए थे।
- शुद्ध : हम गाँधी जी की मूर्ति देखने गए थे।
6 (ख) : वर्तनी शुद्धि
| क्र॰ सं॰ | अशुद्ध वर्तनी | शुद्ध वर्तनी |
| (i) | सन्यासी | संन्यासी |
| (ii) | आशिर्वाद | आशीर्वाद |
| (iii) | अनिरबचनीय | अनिर्वचनीय |
| (iv) | अन्तरतलेय | अन्तस्तलीय (अन्तः + तलीय) |
| (v) | बहुब्रीही | बहुव्रीहि |
उत्तर— 7 : वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द
| क्र॰ सं॰ | वाक्यांश | एक शब्द |
| (i) | जिस पर किसी का आतंक छाया हो। | आतंकित |
| (ii) | जो शोक करने योग्य न हो। | अशोच्य ( |
| (iii) | जिसे ऊपर कहा गया हो। | उपर्युक्त |
| (iv) | जिसके हृदय को चोट पहुँची हो। | मर्माहत |
| (v) | वह धन जो आधिकारिक रूप से राज्य को मिलता हो। | राजस्व |
उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग
(i) कलेजा मुँह को आना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— अत्यधिक घबरा जाना, अत्यधिक दुःख होना
प्रयोग— जंगल सफारी के दौरान अचानक जिप्सी के सामने चीता को देखते ही कलेजा मुँह को आ गया।
(ii) दिन में तारे दिखाई देना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— अत्यधिक कष्ट होना
प्रयोग— विराट कोहली की आक्रामक बल्लेबाजी से वेस्टइंडीज टीम के गेंदबाजों को दिन में तारे दिखाई देने लगे।
(iii) साँप छछूँदर की गति होना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— असमंजस की स्थिति। दुविधा की स्थिति
प्रयोग— वचन का पालन और पुत्र वियोग उत्पन्न होने की स्थिति से राजा दशरथ की स्थिति साँप छछूँदर की गति सी हो गई थी।
(iv) ढाक के वही तीन पात
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— सदा एक सा रहना
प्रयोग— यह आदमी तरक्की करने वाला नहीं है, जब भी मैंने देखा, इसे वही ढाक के तीन पात स्थिति वाला ही पाया।
(v) अन्धे के हाथ बटेर लगना
वर्ग— मुहावरा
अर्थ— बिना प्रयास प्राप्ति होना
प्रयोग— परीक्षा के लिए अधिक तैयारी न करने पर भी मैं पास हो गया। यही समझो कि अन्धे के हाथ में बटेर लग गया।
(vi) यह मुँह और मसूर की दाल
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— योग्यता से बढ़कर वस्तु पाने की अभिलाषा करना
प्रयोग— सुधाकर पढ़ाई में बिल्कुल शून्य है, परन्तु हमेशा सरकारी नौकरी पाने के सपने देखता रहता है। इसी को कहते हैं कि यह मुँह और मसूर की दाल।
(vii) हारे को हरिनाम
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— अन्तिम सहारा
प्रयोग— अमेरिका द्वारा आर्थिक सहायता बंद होने से पाकिस्तान के लिए चीन ही हारे को हरिनाम है।
(viii) अधजल गगरी छलकत जाए
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— कम गुणी/ज्ञानी व्यक्ति द्वारा अत्यधिक दिखावा
प्रयोग— दिनेश बारहवीं पास करके स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझने लगा है। ये तो वही बात हुई कि अधजल गगरी छलकत जाए।
(ix) बिंध गया सो मोती, रह गया सो सीप
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— जो वस्तु काम आ जाए वही अच्छी
प्रयोग— गोपीनाथ को कार दुर्घटना में चोट लगने पर पास खड़े टेम्पो से अस्पताल ले जाया गया, जिससे उनकी जान बच गई। सही कहावत है कि बिंध गया सो मोती, रह गया सो सीप।
(x) जैसे कंता घर रहे, वैसे रहे परदेश
वर्ग— लोकोक्ति
अर्थ— निकम्मा आदमी का घर या बाहर रहना एक समान है
प्रयोग— राहुल मुम्बई कमाने गया लेकिन कुछ दिनों बाद ही घर लौट आया। ठीक ही कहा गया है, ‘जैसे कंता घर रहे, वैसे रहे परदेश’।
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