सामान्य हिंदी | UPPSC (Main) Examination 2016 : Question Paper and Solution

👤 By Pinwas IAS📅 5 August 2026⏱ 1 min read
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प्रश्न पत्र

2016
सामान्य हिन्दी
GENERAL HINDI
निर्धारित समय : तीन घंटे] [अधिकतम अंक : 150
Time Allowed : Three Hours] [Maximum Marks : 150
नोट :
(i)
सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(ii)
प्रत्येक प्रश्न के अंत में निर्धारित अंक अंकित है।
(iii)
पत्र, प्रार्थना-पत्र या अन्य किसी प्रश्न के उत्तर के साथ अपना अथवा अन्य का नाम, पता एवं अनुक्रमांक न लिखें। आवश्यक होने पर क, ख, ग अथवा X, Y, Z लिख सकते हैं।
1. साहित्यकार अपने लेखन के माध्यम से मूल्यों का चित्रण कर सकता है, उसकी पक्षधरता कर सकता है, किन्तु यह उसके वश की बात नहीं है कि वह मूल्यों को हर आदमी में जागृत करता फिरे। मूल्यों को जीवन और समाज में चरितार्थ करना किसी रचनाकार के वश की बात नहीं है। यह काम तो कोई गांधी ही कर सकता था या कोई बड़ा समाजसुधारक कर सकता है। सच्चा साहित्यकार समय के सत्य की गहरी पहचान करता है। मानव-जीवन के प्रति गहरी आस्था उसके सर्जकीय जीवन का आधार है। साहित्यकार साहित्य में मानवीय संवेदना को अधिक समृद्ध और जीवन-दृष्टि को अधिक मानवीय बनाने वाला सांस्कृतिक प्रयत्न करता है। वह मनुष्य की खोई हुई मनुष्यता की गहरी तलाश और वापसी की आकांक्षा करता है, पर कुछ साहित्यकार ऐसे हैं, जो समाज में व्याप्त तमाम विकृतियों और जलालतभरी स्थितियों को यथार्थ मानकर उन्हें अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं और बिना किसी निदान के उसे छोड़ देते हैं। ऐसे रचनाकारों ने समाज के ऊपरी स्तर पर जो कुछ देखा, उसे ही जीवन का यथार्थ मान लिया, जिस प्रकार मीडिया और अखबार करते हैं। उनके पास जीवन-मूल्यों तक पहुँचने का कोई साधन नहीं है। मीडिया आज समाज में जो प्रस्तुत कर रहा है उसे देखकर तो यही लगता है कि सारा समाज भ्रष्ट और मूल्यहीन हो गया है और मूल्यहीनता चतुर्दिक सुरसा की तरह मुँह फैलाए खड़ी है घटिया लेखक यथार्थ के आवेश में समाज के ऊपरी स्तर पर फैली मूल्यहीन मान्यताओं और नैतिक पतन से भरी हुई जिन्दगी का चित्रण करके समझता है कि उसने जग जीत लिया है, पर अच्छे साहित्यकार यह मानते हैं कि जो आँखों से दिखाई पड़ता है, वही सच्चा यथार्थ और अन्तिम सत्य नहीं है।
(क)
उपर्युक्त गद्यांश का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। 5
(ख)
साहित्य में जीवन-मूल्यों की अवधारणा और प्रस्तुति को उपर्युक्त अवतरण के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 5
(ग)
उपर्युक्त गद्यांश में रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए। 20
2. ‘आदिवासी किसान’ शब्द से आप बेशक चौंक सकते हैं। पारम्परिक और मैदानी कृषि के सूत्रों के रूप में हमने केवल उन्हीं को किसान माना है, जिन्होंने केवल नकदी फसलें पैदा कीं। उन्हीं की खेती की हदबन्दी की गई। कृषि में स्वामी-भाव का उदय हुआ और जमीन और प्राकृतिक संसाधन विभिन्न स्वामियों में बँट गए। ‘आदिवासी’ और ‘किसान’ परस्पर दो विरोधी भाव इसलिए प्रतीत होते हैं, क्योंकि जल, जंगल और जमीन की अवधारणा को हमने सदैव सीमित उत्पादन बोध, विशेष उत्पादन बोध, रहस्यमयता से संपृक्त जीवन-शैली से जोड़कर देखा और समझा है। जहाँ मैदानी इलाकों के किसानों ने अपनी मृदा-सम्पदा का बहुविधि और सुनियोजित दोहन किया, वहीं आदिवासी कृषि सामुदायिक भावना से युक्त ‘जीवन दात्री मां’ के समान बनी रही। उन्होंने जल, जंगल और जमीन का संतुलित और आवश्यकता के अनुरूप उपयोग किया और उसकी समृद्धि और संरक्षण के प्रति भी सचेष्ट रहे। साहचर्य का यह रूप जितना ही संयमित था, उतना ही अनूठा। वे प्रकृति से इस तरह सम्बद्ध रहे कि एक-दूसरे के बिना उनके जीवन की कल्पना ही असम्भव थी।
(क)
उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। 5
(ख)
मैदानी किसान और आदिवासी किसान में क्या अन्तर है? विचार कीजिए। 5
(ग)
उपर्युक्त गद्यांश का संक्षेपण कीजिए। 20
3. (क)
सचिव, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को इस आशय के एक सरकारी-पत्र का प्रारूप तैयार कीजिए, जिसमें उन्हें अपने विश्वविद्यालय में समस्त रिक्तियों को यथाशीघ्र भरने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा जाए। 10
(ख)
परिपत्र क्या है? परिपत्र का एक उदाहरण दीजिए। 10
4. निम्नलिखित उपसर्गों / प्रत्ययों से एक-एक शब्द की रचना कीजिए :
10
परि, दुस, आ, भर, सु, आइन, इक, एरा, वाँ, हरा
5. निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए :
10
अध्यवसाय, अक्षर, आकर्षण, आविर्भाव, गणतंत्र, तेजस्वी, यथार्थ, बर्बर, क्षणिक, ध्वंस
6. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए : 10
(i) रविता हिन्दी की शोधार्थिनी है।
(ii) हजारों वर्षों पूर्व पृथ्वी आग की गोला थी।
(iii) पुस्तकों का प्राकथन परिचयात्मक होता है।
(iv) शाहजहाँ ने सड़क को बनवाई।
(v) आपकी सूचनार्थ निवेदन है।
7. निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द लिखिए :
10
(i) जिसका दमन किया गया हो
(ii) जिस पर उपकार किया गया हो
(iii) अतिथि सत्कार की भावना
(iv) जिसका उत्तर न दिया गया हो
(v) तुरन्त उत्पन्न होने वाली सूझ-बूझ
8. निम्नलिखित मुहावरों/लोकोक्तियों के अर्थ स्पष्ट कीजिए और अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए :
30
(i) उलटे छुरे से मूँड़ना
(ii) खेत रहना
(iii) गंगा लाभ होना
(iv) लाख से लीख होना
(v) हथेली पर सरसों उगाना
(vi) अशरफी की लूट, कोयले पर मुहर
(vii) छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल
(viii) बाप मरे अंधेरे में बेटे का नाम पावर हाउस
(ix) हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत
(x) घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध

हल

1 (क) : गद्यांश का भावार्थ

साहित्यकार अपने लेखन के माध्यम से जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त कर उनका पक्ष तो ले सकता है, लेकिन उन्हें समाज में पूरी तरह लागू करना किसी बड़े समाज सुधारक (जैसे महात्मा गांधी) का ही कार्य हो सकता है। एक श्रेष्ठ साहित्यकार काल-सापेक्ष सत्य की पहचान करता है तथा मानव-जीवन में अटूट विश्वास रखते हुए मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों को समृद्ध करने का प्रयास करता है। इसके विपरीत, कुछ सतही और घटिया लेखक मीडिया की तरह समाज में फैली विकृतियों, नैतिक पतन और मूल्यहीनता को ही अंतिम यथार्थ मानकर चित्रित कर देते हैं और कोई समाधान नहीं प्रस्तुत करते। जबकि सच्चा साहित्यकार बाहरी या दृश्यमान यथार्थ से परे जाकर मनुष्य की खोई हुई मानवता और जीवन के गूढ़ मूल्यों की तलाश करता है।

1 (ख) : साहित्य में जीवन-मूल्यों की अवधारणा और प्रस्तुति

साहित्य में जीवन-मूल्यों की अवधारणा और उनकी प्रस्तुति गद्यांश का अनुसार निम्नलिखित हैं—

  • सृजन का मूल आधार- जीवन-मूल्यों की अवधारणा मानव-जीवन के प्रति गहरी आस्था और मानवीय संवेदनाओं को समृद्ध करने पर टिकी है।
  • साहित्यकार की सीमा और दायित्व- साहित्यकार मूल्यों का चित्रण कर उनका समर्थन कर सकता है तथा पाठकों को मानवीय दृष्टि प्रदान कर सकता है। परंतु समाज में इन मूल्यों को व्यावहारिक रूप से स्थापित करना समाज सुधारकों का काम है, न कि केवल साहित्यकार का।
  • सच्ची प्रस्तुति बनाम सतही चित्रण—
    • श्रेष्ठ प्रस्तुति- अच्छा साहित्यकार केवल समाज की बुराइयों को दिखाकर नहीं छोड़ता, बल्कि वह मनुष्य की खोई हुई मनुष्यता को खोजने और पुनरुद्धार करने का यत्न करता है।
    • सतही प्रस्तुति- घटिया लेखक केवल ऊपरी तौर पर दिखने वाली मूल्यहीनता और विकृतियों को ही पूरा यथार्थ मानकर चित्रित कर देते हैं, जिससे समाज में निराशा फैलती है और मूल्यों का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आ पाता।

1 (ग) : रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या

“सच्चा साहित्यकार ………………….. जीवन का आधार है।”

व्याख्या : एक वास्तविक और गंभीर साहित्यकार अपने युग की परिस्थितियों, सामाजिक यथार्थ और काल के सत्य को बहुत गहराई से समझता है। उसकी रचनात्मकता और लेखन प्रक्रिया की नींव इस विश्वास पर टिकी होती है कि मानव-जीवन अत्यंत मूल्यवान है। मनुष्य और उसकी जीवंतता में विश्वास ही उसे सार्थक रचना रचने की प्रेरणा देता है।

“वह मनुष्य …………………………….. आकांक्षा करता है,”

व्याख्या : आधुनिक दौर में स्वार्थ, मूल्यहीनता और विकृतियों के कारण मनुष्यता कहीं खो गई है। सच्चा रचनाकार अपनी कृतियों के माध्यम से उस खोई हुई मानवीयता, करुणा और संवेदनाओं की खोज करता है तथा यह इच्छा रखता है कि समाज पुनः उन मानवीय गुणों की ओर लौटे।

“घटिया लेखक …………………….. जीत लिया है।”

व्याख्या : घटिया साहित्यकार यथार्थवाद के नाम पर केवल समाज में व्याप्त विकृतियों और नैतिक गिरावट को ही अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। वे समाज के केवल ऊपरी और नग्न यथार्थ को चित्रित करके यह भ्रम पाल लेते हैं कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा या युगांतरकारी कार्य कर लिया है। वे तात्कालिक सनसनी या घटनाओं को उभारकर अल्पकालिक प्रसिद्धि तो पा लेते हैं, परंतु इन सामाजिक समस्याओं के पीछे छिपे वास्तविक कारणों की पड़ताल नहीं करते और न ही उनका कोई सार्थक व सकारात्मक निदान प्रस्तुत करते हैं।

“जो आँखों ………………………… सत्य नहीं है।”

व्याख्या : एक श्रेष्ठ साहित्यकार केवल उसी घटना या स्थिति को अंतिम सत्य या यथार्थ नहीं स्वीकार करता जो आँखों से प्रत्यक्ष दिखाई देती है। दृश्यमान यथार्थ सत्य का केवल एक अंश हो सकता है, संपूर्ण सत्य नहीं। बाहरी रूप से दिखने वाली मूल्यहीनता, पतन या विकृतियों के पार भी जीवन में आशा, मानवीय संवेदनाएँ और नैतिक मूल्य छिपे होते हैं।

2 (क) : शीर्षक

‘आदिवासी किसान’ या ‘आदिवासी किसान और उनकी कृषि-संस्कृति’ या ‘आदिवासी और मैदानी कृषि का अंतर’ या ‘पर्यावरण-संरक्षण और आदिवासी कृषि’

2 (ख) : मैदानी किसान और आदिवासी किसान में अंतर

मैदानी और आदिवासी किसानों के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं—

  • कृषि का उद्देश्य और सोच- मैदानी किसान मुख्य रूप से नकदी फसलों, स्वामी-भाव (भूमि स्वामित्व) और सीमित उत्पादन-बोध पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि आदिवासी किसान कृषि को केवल व्यावसायिक न मानकर उसे जीवनदायिनी माँ के समान मानते हैं।
  • संसाधनों का दोहन बनाम संरक्षण- मैदानी किसानों ने अपनी मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों का बहुविध तथा अत्यधिक दोहन किया है। इसके विपरीत, आदिवासी किसान जल, जंगल और जमीन का केवल आवश्यकतानुसार एवं संतुलित उपयोग करते हैं तथा प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि और संरक्षण के प्रति सजग रहते हैं।
  • सामुदायिक और प्राकृतिक साहचर्य- मैदानी कृषि व्यक्तिगत स्वामित्व और सीमांकन (हदबंदी) से जुड़ी है, जबकि आदिवासी कृषि सामुदायिक भावना तथा प्रकृति के साथ गहरे, अनूठे और संयमित साहचर्य पर आधारित है।

2 (ग) : संक्षेपण

आदिवासी व मैदानी किसान दोनों कृषि-परंपरा का हिस्सा हैं। जहाँ मैदानी-किसान नकदी फसलों, व्यक्तिगत भूमि-स्वामित्व और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन करते हैं, वहीं आदिवासी-किसान प्रकृति के साथ साहचर्य रखते हैं। वे जल, जंगल और जमीन को जीवनदायिनी मानकर सामुदायिक भावना से इनका संतुलित उपयोग एवं संरक्षण करते हैं। उनका यह संयमित और अनूठा संबंध प्रकृति तथा मानव जीवन को पूरक बनाए रखता है।

उत्तर — 3 : सरकारी पत्र प्रारूप

टिप्पणी— प्रश्न में स्पष्ट रूप से ‘सरकारी पत्र’ का प्रारूप तैयार करने को कहा गया है, लेकिन पाने वाले जब अनेक हों तो वह ‘परिपत्र’ हो जाता है। प्रश्न में ‘कुलपतियों’ का उल्लेख है, अर्थात् एक ऐसा सरकारी पत्र जिसे अनेक कुलपतियों को भेजा जाना है। परिभाषा के अनुसार— “जब प्रेषक एक हो, विषय एक हो लेकिन प्रेषिती (प्राप्तकर्ता) अनेक हों तब सरकारी पत्र ही परिपत्र बन जाता है।” परन्तु प्रश्न में स्पष्ट रूप से ‘सरकारी पत्र’ का प्रारूप तैयार करने का निर्देश होने के कारण हम सरकारी पत्र का प्रारूप ही तैयार करेंगे।

पत्रांक ………

प्रेषक,

क॰ ख॰ ग॰,

सचिव,

मानव संसाधन विकास मंत्रालय,

भारत सरकार।

सेवा में,

कुलपति,

समस्त केन्द्रीय विश्वविद्यालय।

विषय: रिक्त पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में।

महोदय,

मुझे आपसे यह कहने का निदेश हुआ है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जो पद रिक्त हैं, उनके भरने की प्रक्रिया शीघ्र प्रारम्भ करें।

2. पदों की नियुक्ति से सम्बन्धित सूचनाएँ सम्बन्धित मंत्रालय को भेजें।

भवदीय,

ह॰ ………

(क॰ ख॰ ग॰)

सचिव।

संख्या ……., तद्दिनांक।

प्रतिलिपि निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित—

  1. मुख्य सचिव, सम्बन्धित राज्य सरकार
  2. सचिव, वित्त मंत्रालय
  3. सचिव, कार्मिक विभाग

आज्ञा से,

ह॰ ………

(क॰ ख॰ ग॰)

सचिव।

3 (ख) : परिपत्र

परिभाषा— “पत्र आलेखन का ऐसा रूप, जिसके द्वारा समान सूचना, निर्देश, अनुदेश इत्यादि सभी सम्बन्धित अथवा अधीनस्थ अधिकारियों को विभिन्न कार्यों के संदर्भ में प्रतिलिपियों के माध्यम से प्रेषित किया जाता है, परिपत्र कहलाता है।” या “जब प्रेषक एक हो, विषय एक हो लेकिन प्रेषिती (प्राप्तकर्ता) अनेक हों तब सरकारी पत्र ही परिपत्र बन जाता है।”

विशेषताएँ—

  • यह अनेक विभागों/कार्यालयों को एक साथ भेजा जाता है। यह किसी विभाग अथवा कार्यालय द्वारा अपने अधीनस्थ कार्यालयों को भेजा जाता है।
  • इसका प्रारूप सरकारी पत्र के उसी प्रारूप का हो जायेगा जैसा सरकारी पत्र हो; यथा- यदि शासकीय पत्र का परिपत्र हो तो वह शासकीय पत्र के प्रारूप में होगा बस प्रेषिती (सेवा में) की जगह एक न होकर क्रम देकर सभी का उल्लेख कर दिया जायेगा।

अर्थात् इसकी अपनी कोई निश्चित भाषा-शैली नहीं होती, बल्कि परिपत्र की भाषा-शैली और प्रारूप उसी पत्र के अनुरूप हो जाता है जिस रूप में परिपत्र भेजा जाता है।

उदाहरण—

उत्तर प्रदेश शासन

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग

परिपत्र (CIRCULAR)

संख्या : 1084/सत्रह-स्वास्थ्य-2/2026

प्रेषक,

श्री कखग,

(अपर) प्रमुख सचिव,

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,

उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ।

सेवा में,

  1. समस्त मण्डलायुक्त, पूर्वी उत्तर प्रदेश (गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, देवीपाटन मण्डल)।
  2. समस्त जिलाधिकारी, पूर्वी उत्तर प्रदेश।
  3. समस्त मुख्य चिकित्साधिकारी (C.M.O.), पूर्वी उत्तर प्रदेश।

विषय : पूर्वी उत्तर प्रदेश के जनपदों में बाल-वर्ग को मस्तिष्क-ज्वर से बचाव एवं समुचित चिकित्सीय प्रबन्धों के सम्बन्ध में।

महोदय / महोदया,

उपर्युक्त विषय के संदर्भ में मुझे यह कहने का निर्देश हुआ है कि मानसून सत्र के दौरान प्रदेश के पूर्वी जनपदों (विशेषकर गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर आदि) में बच्चों के मध्य मस्तिष्क-ज्वर (Acute Encephalitis Syndrome – AES / Japanese Encephalitis – JE) के प्रसार की संभावना बढ़ जाती है।

2. बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा एवं इस बीमारी से शत-प्रतिशत बचाव हेतु शासन द्वारा निम्नलिखित निर्देशों का तत्काल प्रभाव से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए—

  1. क. अस्पतालों में समर्पित पीडियाट्रिक बेड्स का आरक्षण : पूर्वी जिलों के सभी मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में मस्तिष्क-ज्वर से पीड़ित बच्चों के लिए समर्पित पीडियाट्रिक आईसीयू (PICU) तथा आवश्यक बेड्स आरक्षित रखे जाएँ।
  2. ख. जीवनरक्षक दवाओं एवं ऑक्सीजन की उपलब्धता : समस्त चिकित्सालयों में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर, सिरिंज पंप तथा आवश्यक जीवनरक्षक औषधियों का पर्याप्त स्टॉक (Buffer Stock) अनिवार्य रूप से बनाए रखा जाए।
  3. ग. सघन टीकाकरण एवं डोर-टू-डोर सर्विलांस : आशा तथा आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जाकर सर्वेक्षण कराया जाए। जापानी एन्सेफलाइटिस (JE) के टीके से वंचित (Left-out) बच्चों का प्राथमिकता के आधार पर शत-प्रतिशत टीकाकरण सुनिश्चित किया जाए।
  4. घ. स्वच्छता, एंटी-लार्वा छिड़काव एवं शुद्ध पेयजल : नगर निकायों तथा ग्राम पंचायतों के समन्वय से जलजमाव को समाप्त कराया जाए। प्रभावित क्षेत्रों में नियमित फॉगिंग तथा एंटी-लार्वा का छिड़काव किया जाए तथा पेयजल स्रोतों का क्लोरीनीकरण कराया जाए।
  5. ङ. त्वरित एम्बुलेंस सेवा एवं 24×7 कंट्रोल रूम : ‘108’ एम्बुलेंस सेवा को हाई अलर्ट पर रखा जाए ताकि सूचना मिलते ही मरीज बच्चे को बिना विलंब के अस्पताल पहुँचाया जा सके। प्रत्येक जिले में 24×7 कार्यरत कंट्रोल रूम स्थापित किया जाए।
  6. च. व्यापक जन-जागरूकता अभियान : ग्रामीणों को शुद्ध एवं उबला पानी पीने, बच्चों को पूरी बांह के कपड़े पहनाने, स्वच्छता बनाए रखने तथा बुखार के लक्षण दिखते ही तुरंत निकटतम सरकारी अस्पताल पहुँचने हेतु जागरूक किया जाए।

उक्त निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। किसी भी स्तर पर पाई गई लापरवाही को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा तथा दोषी अधिकारी/कर्मचारी के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक कार्यवाही की जाएगी।

भवदीय

ह॰ ……….

(कखग)

(अपर) प्रमुख सचिव।

पृष्ठांकन संख्या व तद्दिनांक-

प्रतिलिपि निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित :

  1. प्रमुख सचिव, मा० मुख्यमंत्री जी, उत्तर प्रदेश शासन।
  2. महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
  3. निदेशक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), उत्तर प्रदेश।
  4. समस्त संबंधित जनपदों के सूचना अधिकारी को व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु।
  5. गार्ड फाइल।

भवदीय

ह॰ ……….

(कखग)

(अपर) प्रमुख सचिव।

उत्तर— 4 : उपसर्ग और प्रत्यय  

यहाँ पर दिये गये शब्दांशों में से उपसर्ग और प्रत्यय की पहचान करके उनसे एक-एक शब्द की रचना करनी है।

  • उपसर्ग— परि, दुस्, आ, भर, सु
  • प्रत्यय— आइन, इक, एरा, वाँ, हरा
  • भर— का प्रयोग उपसर्ग और प्रत्यय दोनो तरह से हो सकता है; जैसे— भरपेट (भर + पेट), रातभर (रात + भर)।

उपसर्ग—

उपसर्गनिर्मित शब्द
परिपरिणय
दुस् दुस्साहस
आजन्म
भरभरपेट
सुसुजान

प्रत्यय—

प्रत्यय निर्मित शब्द
आइन चौधराइन
इकऐतिहासिक
एरालुटेरा
वाँदसवाँ
हराइकहरा

उत्तर— 5 : शब्द-विलोम

क्र॰ स॰शब्दविलोम
1.अध्यवसायअनध्यवसाय
2.अक्षर क्षर
3.आकर्षणअनाकर्षण, अपकर्षण, विकर्षण
4.आविर्भावतिरोभाव, अवसान
5.गणतंत्रराजतंत्र
6.तेजस्वी निस्तेज
7.यथार्थअयथार्थ, कल्पित, काल्पनिक, आदर्श
8.बर्बर सभ्य
9.क्षणिक शाश्वत, चिरंतन
10.ध्वंसनिर्माण

उत्तर— 6 : वाक्य शुद्धि

  • अशुद्ध : रविता हिन्दी की शोधार्थिनी है।
    • शुद्ध : रविता हिन्दी की शोधार्थी है।
  • अशुद्ध : हजारों वर्षों पूर्व पृथ्वी आग की गोला थी।
    • शुद्ध : हजारों वर्ष पूर्व पृथ्वी आग का गोला थी।
  • अशुद्ध : पुस्तकों का प्राकथन परिचयात्मक होता है।
    • शुद्ध : पुस्तकों का प्राक्कथन परिचयात्मक होता है।
  • अशुद्ध : शाहजहाँ ने सड़क को बनवाई।
    • शुद्ध : शाहजहाँ ने सड़कें बनवाई।
  • अशुद्ध : आपकी सूचनार्थ निवेदन है।
    • शुद्ध : सूचनार्थ निवेदन/प्रेषित है।

उत्तर— 7 : वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द

क्र॰ सं॰वाक्यांश या पदबंधएक शब्द
(i)जिसका दमन किया गया होदमित
(ii)जिस पर उपकार किया गया होउपकृत
(iii)अतिथि सत्कार की भावनाआतिथ्य-भाव, आतिथ्येत्व
(iv)जिसका उत्तर न दिया गया होअनुत्तरित
(v)तुरन्त उत्पन्न होने वाली सूझ-बूझप्रत्युत्पन्नमति

उत्तर — 8 : मुहावरे / लोकोक्तियाँ – अर्थ व वाक्य प्रयोग

(i) उल्टे छुरे से मूँड़ना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— बेवकूफ बनाकर काम निकालना

प्रयोग— क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के कुछ अधिकारी अक्सर गरीब किसानों को उलटे छुरे से मूँड़ने की कोशिश करते हैं।

(ii) खेत रहना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— युद्ध में मारा जाना

प्रयोग— राम सजीवन के दोनों पुत्र कारगिल युद्ध में खेत रहे।

(iii) गंगा लाभ होना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— मृत्यु के पश्चात् मोक्ष / मुक्ति पाना

प्रयोग— उसके जैसे सत्यनिष्ठ, परोपकारी एवं सदाचारी व्यक्ति का गंगा लाभ होना निश्चित है।

(iv) लाख से लीख होना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— प्रतिष्ठा नष्ट हो जाना

प्रयोग— भ्रष्टाचार प्रदर्शन सूचकांक में गिरती रैंकिंग से किसी भी देश की प्रतिष्ठा/वैभव लाख से लीख हो जाती है।

(v) हथेली पर सरसों उगाना

वर्ग— मुहावरा

अर्थ— असम्भव कार्य करना

प्रयोग— लोक निर्माण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एक दिन में समाप्त नहीं हो सकता और न ही ऐसी आशा करनी चाहिए, क्योंकि हथेली पर सरसों नहीं उगायी जा सकती।

(vi) अशरफी की लूट, कोयले पर मुहर

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— महत्त्वपूर्ण/कीमती वस्तुओं को छोड़कर बेकार वस्तुओं की निगरानी

प्रयोग— सरकारें भ्रष्टाचार को समाप्त करने के बजाय काला धन खोजने में लगी हैं, इसे ही कहते हैं कि अशरफी की लूट और कोयले पर मुहर।

(vii) छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— अयोग्य व्यक्ति को बड़ी/मूल्यवान वस्तु की प्राप्ति

प्रयोग— चुनाव जीतने के बाद नेताओं पर सरकारी सुख-सुविधाओं की धन वर्षा होने लगती है, कहते हैं न कि छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल।

(viii) बाप मरे अँधेरे में बेटे का नाम पॉवर हाउस

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— झूठा दिखावा करना

प्रयोग— पाकिस्तान के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि ऐसा काम करूँगा कि भारत भी हमसे कर्ज लेगा। इसी को कहते हैं बाप मरे अँधेरे में बेटे का नाम पॉवर हाउस।

(ix) हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— बेमेल होना

प्रयोग— मुकेश अरबपति व्यवसायी तो खुर्शीद कबाड़ी है, परन्तु फिर भी दोनों की दोस्ती हँसुए के ब्याह में खुरपे के गीत की तरह ही है।

(x) घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध

वर्ग— लोकोक्ति

अर्थ— अपने घर में सम्मान न मिलना, जबकि बाहर सम्मान मिलना

प्रयोग— भारत में बहुतायत इंजीनियर एवं तकनीशियन है, जिन्हें सम्मान प्राप्त नहीं होता, वहीं विदेशों में उन्हें मुँह-माँगा वेतन के साथ सम्मान भी प्राप्त है। इसीलिए कहा जाता है कि घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध।


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